गाय पर ऐसी चर्चा कितनी जायज?

चाय पर चर्चा करने वाले हमारे देश में यूं तो गाय पर चर्चा होती रहती है, लेकिन ये चर्चा इस कदर हिंसक रूप अख्तियार कर लेगी कि एक शख्स को अपनी जान गंवानी पड़े ये शायद किसी ने नहीं सोचा था। बीते दिनों uttar pradesh के दादरी में जो कुछ हुआ, उसने एक बार फिर बाबरी और गोधरा कांड की वीभत्स यादों को ताजा कर दिया है। साथ ही ये सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या हम कभी उस दौर से बाहर निकल पाएंगे? जिस 50 वर्षीय अखलाक मोहम्मद  को मौत के घाट उतारा गया, वो अपने परिवार के साथ पिछले कई सालों से दादरी के बिसराड़ा गांव में रह रहे थे। ये गांव भले ही हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए न पहचाना जाता हो, लेकिन अखलाक के दोस्तों की फेहरिस्त में सबसे पहले नाम हिंदुओं के थे। जिस सांप्रदायिक सौहाद्र्ध का तानाबाना अखलाक और उनके जैसे लोग बुनते आ रहे थे, क्या वो वास्तव में इतना कमजोर था कि एक अफवाह से बिखर गया? इसका जवाब हम सबको खोजन होगा।
                    अखलाक को महज इसलिए पीट-पीटकर मार डाला गया कि उन पर गाय का मांस खाने का शक था। दंगाइयों ने न अखलाक की दलील सुनी न ही उनके परिवार की। उन्होंने शक को सबूत माना और क्रूर, अमानवीय, घृणित कृत्य को जनता का इंसाफ बताकर चले गए।  गाय को हिंदू धर्म में माता माना जाता है। लाखों-करोड़ों हिंदुओं के लिए गाय अराध्य है। कई राज्यों ने इसे देखते हुए गाय के मांस पर प्रतिबंध भी लगा रखा है। ऐसे में गौहत्या की खबर से संवेदनाओं के भडक़ने को समझा जा सकता है। किसी भी धर्म-समुदाय में यह आम बात है, लेकिन संवेदनाएं आक्रोश की सीमा लांगते हुए क्रूरता की पराकाष्ठा में परिवर्तित हो जाएं, इसे बिल्कुल भी सामान्य नहीं कहा जा सकता। यह पूर्णत वहशीपन है, जिसकी इजाजत दुनिया का कोई धर्म-समुदाय नहीं दे सकता। इस पूरे मामले ने जहां भावनाओं के सांप्रदायिककरण को उजागर किया, वहीं राजनीतिक संवदेनशून्यता भी सामने आई। दादरी दिल्ली से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर है, लेकिन राजनेताओं को पीडि़त परिवार की सुध लेने में एक हफ्त से ज्यादा का वक्त लग गया। न तो खुद को दलित-किसानों का महीसा कहलवाने वाले राहुल गांधी ने संवेदनशीलता दिखाई और न ही आम आदमी के हितों की बात करने वाले अरविंद केजरीवाल ने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से भी आपेक्षित प्रतिक्रिया पीडि़त परिवार को नसीब नहीं हुई। उल्टा इस घटना को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर सही करार देने की कोशिशें जरूर होती रहीं। यह बेहद दुखद है कि जिस पार्टी का प्रधानमंत्री देश में सांप्रदायिक एकता और सौहाद्र्ध बढ़ाने पर जोर देता है, उसी पार्टी के नेता-कार्यकर्ता एकरूपता के ढांचे को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। कम से कम उत्तर प्रदेश के परिवेश में यही नजर आता है। घटना के बाद गांव पहुंचे पार्टी विधायक संगीत सोम जो बयान दिया था, उससे इसकी पुष्टि भी होती है। सोम ने कहा था, अगर हिंदू समुदाय के निर्दोष लोगों को फंसाया गया तो हिंदी मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है। तनावपूर्ण माहौल में इन शब्दों को या शांति कायम करने के लिहाज से देखा जा सकता है?
                               केवल सोम ही नहीं, कई नेता-कार्यकर्ता जब तक गंगा-जमुनी तहजीब में जहर घोलने वाले बयान देते रहते हैं। अफसोस ये है कि ऐसे बयानों को निजी राय करार देकर सबकुछ भुला दिया जाता है। बात किसी एक दल तक सीमित नहीं है, कमोबेश हर पार्टी इससे पीडि़त है। समाजवादी पार्टी नेता आजम खां इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाने की बात कह रहे हैं, इससे मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद बयान और क्या हो सकता है। प्रदेश में अपनी ही पार्टी की सरकार होने के बावजूद आजम का कथन ये दर्शाता है कि कानून-व्यवस्था को सक्षम बनाने में समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया अक्षम हो चुके हैं। अखिलेश यादव के सत्ता संभालने के बाद से उत्तर प्रदेश मेें कई सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं, हर बार अखिलेश और मुलायम सिंह दूसरे दलों पर उंगलियां उठाकर अपनी निष्क्रीयता पर पर्दा डाल देते हैं। इस बात से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता कि सियासी नफे-नुकसान के लिए चंद लोग नफरत की फसल बोने से भी गुरेज नहीं करते, लेकिन ये भी सत्य है कि अगर कानून-व्यवस्था का खौफ हो तो ऐसे मंसूबों को नेस्ताबूद किया जा सकता है। सही मायनों में देखा जाए तो उत्तर प्रदेश सरकार केवल पीडि़तों को मुआवजा देने तक ही सीमित रह गई है। अखलाक के परिवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हवाई मार्ग से लखनऊ बुलाने के बाद तीन बार मुआवजे की घोषणा की। लेकिन वो पीडि़तों के मन में वो विश्वास पैदा नहीं कर सके कि जो उन्हें सुरक्षित महसूस कराए। मुख्यमंत्री से भरोसा मिलने के बाद भी अखलाक का परिवार गांव छोडक़र चला गया, सरकार और उसके तंत्र के लिए इससे करारा तमाचा और क्या हो सकता है। beef-banसांप्रदायिक हिंसा के मामलों में दादरी की घटना न तो पहली और न ही आखिरी, मगर गाय के नाम पर यूं किसी को जान से मार देना संभवत: पहले सुनने में नहीं आया। गाय के लिए मरने-मारने का जो दुस्साहस दंगाइयों या कुछ कथित हिंदुओं ने किया, उसका एक प्रतिशत भी अगर वो मातुल्य गाय की दशा को सुधारने में लगाएं तो शायद हर रोज इस मां को तिलतिल कर मरना न पड़े। जिस उत्तर प्रदेश में यह घटना हुई, वहां भूख-प्यास से तड़पती गायों को सडक़ों पर देखना आम है।  दूध खत्म हो जाने के बाद उन्हें बेसहारा करने वालों में हिंदू भी कम नहीं होते, उस वक्त इस मां के प्रति आदर-सम्मान, जान देने-लेने का जज्बा कहां चला जाता है? गाय की स्थिति भी बूढ़े-मां बाप की तरह हो गई है, जिनकी याद बच्चों को केवल तभी आती है, जब उनसे कुछ हासिल किया जा सके। फिर चाहे वो सांप्रदायिक उन्माद ही क्यों न हो। दादरी से गाय पर शुरू हुई यह क्रूर चर्चा भविष्य में कितने अखलाकों की जिंदगी छीनेगी, नहीं कहा जा सकता। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि अगर हम अपने अंदर के इंसान पर नफरत के हैवान को हावी न होने दें तो शायद ऐसे हालात पैदा ही न हों, जिसमें किसी को अपनी जान गंवानी पड़े।

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