पुणे रेलवे स्टेशन में सुरक्षित नहीं आपकी गाड़ी

parking'अगर आप पुणे स्टेशन की निर्धारित पार्किंग में वाहन लगाकर सोच रहे हैं कि वो सुरक्षित है तो सावधान हो जाइए। हो सकता है कि आपके खून-पसीने की कमाई से खरीदी गई गाड़ी को कोई दूसरा लेकर चलता बने और पार्किंग ठेकेदार उसे रोकने की जहमत भी न उठाए। पार्किंग के लिए टू-व्हीलर से 20 और फोर व्हीलर से 40 रुपए वसूले जाते हैं, बावजूद इसके गाडिय़ों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। मारपीट पर उतारू रहने वाले ठेकेदार के कर्मचारियों का ध्यान महज इस बात पर रहता है कि किस तरह नो-पार्किंग में खड़ी गाडिय़ों से भी पैसे उगाहे जाएं। ताज्जुब की बात तो ये है कि सबकुछ जानते हुए भी रेल प्रशासन इस अंधेरगर्दी पर आंखें मूंदें बैठा है।

एक स्टिंग ऑपरेशन में पाया गया कि पार्किंग में गाडिय़ों की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह की सतर्कता नहीं बरती जाती। ठेकेदार के कर्मचारी न तो वाहन का नंबर देखते हैं और न ही वापसी पर स्लिप (पर्ची) की मांग करते हैं। ऐसे में कोई भी किसी का वाहन महज 20 या 40 रुपए में लेकर चंपत हो सकता है। लगातार मिल रहीं शिकायतों के बाद टीम को पड़ताल के लिए स्टेशन पहुंची। एक प्रतिनिधि ने जीआरपी कार्यालय के सामने से दाखिल होते हुए पार्किंग में बाइक लगाई। इसके लिए बाकायदा दूसरे राज्य के नंबर वाली बाइक का इस्तेमाल किया गया ताकि वो आसानी से पहचान में आ जाए। इस दौरान प्रतिनिधि ने जानबूझकर कर्मचारियों से बातचीत की, लेकिन गाड़ी लगाने तक किसी ने भी नंबर देखकर पर्ची देने की जहमत नहीं उठाई। वापसी में एक कर्मचारी ने पूछा गाड़ी का नंबर क्या है और पर्ची पर लिखकर दे दिया। जो नंबर बताया गया, वो असली था भी या नहीं ये जांचने की उसने कोशिश तक नहीं की।

कुछ देर बाद दूसरा प्रतिनिधि बिना पर्ची के वही बाइक लेेने पहुंचा। वो काफी देर तक गाड़ी खोलने की कोशिश करता रहा, लेकिन किसी ने उससे सवाल नहीं किया। इतना ही नहीं बाहर निकलते वक्त उससे 20 रुपए शुल्क मांगने वाले ने ये तक जानना जरूरी नहीं समझा कि जो गाड़ी वो ले जा रहा है वो उसकी है भी या नहीं। प्रतिनिधि ने जानबूझकर उसे खुले पैसा नहीं दिए, ताकि उसे पर्ची लेने की याद आ जाए। मगर लापरवाही की आदत उसकी याददाश्त पर भारी पड़ी। कर्मचारी ने बिना पर्ची देखे ही गाड़ी को जाने दिया। इससे साफ होता है कि पुणे स्टेशन की पार्किंग में अपना कीमती वाहन लगाना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। गाड़ी चोरी होने पर पार्किंग ठेकेदार पुलिस में शिकायत कराने की सलाह देक अपना पल्ला झाड़ लेगा।
नो-पार्किंग में पार्किंग का भी पैसा
पुणे स्टेशन पर पुराने डीआरएम कार्यालय के बाहर के हिस्से को नो-पार्किंग जोन बनाया गया है, लेकिन इस नियम की हर रोज धज्जिया उड़ती हैं। ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी में वाहन चालक वहां गाडियां लगा जाते हैं और लौटने पर उन्हें पार्किंग ठेकेदार के कर्मचारियों की बदतमीजी का सामना करना पड़ता है। अगर कोई वाहन चालक पैसे देने से इंकार करता है तो कर्मचारी उसके साथ हाथापाई करने से भी नहीं चूकते। सोमवार को पुराने डीआरएम कार्यालय के ठीक सामने एक चालक अपनी कार खड़ी कर गया। ठेकेदार के कर्मचारी भी उस वक्त वहां मौजूद थे, लेकिन उन्होंने निर्धारित पार्किंग में कार लगाने की उसे सलाह नहीं दी। जब वो लौटा तो कर्मचारी ने 40 रुपए की मांग की, इस पर संबंधित चालक ने नो-पार्किंग का हवाला देते हुए पैसे देने से इंकार कर दिया। इस बात पर कर्मचारी इतना आग-बबूला हुआ कि कार के आगे आकर गाली-गलौच करने लगा। काफी देर तक विवाद चलता रहा, मगर थोड़ी दूरी पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने सुध लेना जरूरी नहीं समझा।

एक अन्य घटना में जीआरपी कार्यालय के सामने एक बाइक चालक नो-पार्किंग में बाइक लगाकर चला गया। वापसी पर जैसे ही उसने बाइक स्र्टाट की, पार्किंग ठेकेदार कर्मचारी उससे वसूली के आ धमका। यहां भी इंकार करने पर उसे गालियां देते हुए पुलिस में चलने की धमकी देना शुरू कर दिया। काफी देर के बाद भी जब कर्मचारी की उग्रता में कोई कमी नहीं आई तो पीडि़त चालक को मजबूरन उसे 20 रुपए देने पड़े। सूत्र बताते हैं कि पुलिस की छत्रछाया में ही कर्मचारियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं।

क्या सो रहा है प्रशासन
पार्किंग कर्मचारियों की उदंडता के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं, बावजूद इसके रेल प्रशासन द्वारा कड़ी कार्रवाई नहीं की जा रही। जब कोई वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री आता है तो सारी व्यवस्थाएं सुधर जाती हैं, लेकिन कुछ ही देर बार सबकुछ पहले जैसा हो जाता है। आखिर आम यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के बारे में रेलवे की कोई जिम्मेदारी बनती भी है या नहीं। स्टेशन पर मौजूद ट्रैफिक पुलिसकर्मी भी महज बातों के अलावा कभी मुस्तैदी से अपना काम करते नजर नहीं आते।

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