काली ही रही Diwali

एक तरफ जहां पूरा देश दिपावली की खुशियों में डूबा है, वहीं शरतचंद्र रॉय के लिए यह Diwali भी काली ही रहने वाली है। अपने बेटे को इंसाफ दिलाने की उनकी कोशिशें पुणे पुलिस की असंवेदनशीलता के चलते परवान नहीं चढ़ पाई हैं। 1 जून, 2013 को शरतचंद्र रॉय के बेटे अभिषेक की उसके abhiवाघोली स्थिति फ्लैट में चाकूओं से गोदकर हत्या कर दी गई थी। तब से अब तक रॉय लोनीकंद पुलिस स्टेशन से सैंकड़ों चक्कर लगा चुके हैं, मगर हर बार उन्हें मायूस होकर ही लौटना पड़ा। इस मामले में पुलिस जांच चल रही है से ज्यादा कुछ भी बताने को तैयार नहीं होती। रॉय ने इंसाफ के लिए तत्कालीन ग्रामीण पुलिस अधीक्षक मनोज लोहिया कमिश्नर सतीश माथुर, राज्य के पूर्व गृहमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक से गुहार लगाई, लेकिन किसी ने भी दुखी पिता की फरियाद नहीं सुनी। आज का खबरी से बातचीत में रॉय ने कहा, “मेरे लिए दीवाली का कोई मतलब नहीं। जब मेरे घर का चिराग ही बुझ गया तो हम किसके लिए दीये जलाएं। जब पुलिस मेरे बेटे के हत्यारों को सलाखों के पीछे पहुंचाएगी, मैं उसी दिन दीवाली मनाऊंगा”। रॉय का कहना है कि लोकनीकंद पुलिस ने कभी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया, वो शुरुआत से ही इसे चोरी के दौरान हुई हत्या मानकर चलती रही। जबकि तथ्य चिल्ला चिल्लाकर कह रहे थे मेरे बेटे को सुनियोजित तरीके से मौत के घाट उतारा गया है। मैंने हर वो दरवाजा खटखटाया, जहां मदद मिलने की उम्मीद थी, लेकिन किसी को एक बाप के आंसू नहीं दिखे। मूलत: भोपाल निवासी अभिषेक  मैकेनिकल इंजीनियर था और नौकरी के सिलसिले में पुणे आया था, लेकिन इससे पहले कि वो अपने नए जीवन की शुरुआत कर पाता उसकी हत्या कर दी गई।

संदेह में पुलिस की भूमिका
इस हत्याकांड में पुलिस की भूमिका शुरुआत से ही संदेह के घेरे में है। पुलिस की जांच महज इस थ्योरी पर केंद्रित है कि घर में चोरी के इरादे से घुसे अज्ञात बदमाशों को पकड़ने के दौरान अभिषेक की हत्या हुई। इसलिए उसने मृतक के मोबाइल फोन तक खंगालना जरूरी नहीं समझा। पीड़ित परिवार ने खुद मोबाइल पुलिस के हवाले किए ताकि कोई सुराग मिल सके। आज का खबरी से बातचीत में शरदचंद्र राय ने कहा, अभिषेक की हत्या के बाद पुलिस ने खुद उसके मोबाइल फोन की मांग नहीं की, हमने ही जाकर उसे मोबाइल सौंपे। इसके अलावा पुलिस ने ये तक जानने की कोशिश नहीं की कि अभिषेक की किसी से दुश्मनी आदि तो नहीं थी।forsite

वो चार लडक़े कहां हैं?
शरदचंद्र राय के मुताबिक, अभिषेक वाघोली स्थित जिस मकाने में अपने दो दोस्तों के साथ किराए पर रहता था, वहां पास में चार अन्य लडक़े भी रहते थे। पुलिस उनके बारे में कुछ भी बताने को तैयार नहीं है। पहले कहा गया था कि उनके बयान दर्ज कर लिए गए हैं, अब पुलिस निरीक्षक चंद्रकांत जाधव इस सवाल का कोई जवाब नहीं देते। राय ने कहा, उन लड़कों को मेरे बेटे की हत्या के बारे में कुछ पता है या नहीं ये जानने का मुझे अधिकार है। अगर सबकुछ ठीक है तो पुलिस उनके बारे में बताने से क्यों कतरा रही है।

संघर्ष का निशान तक नहीं
मृतक की मां ने कहा, अभिषेक बहुत तेज और चुस्त लडक़ा था। वो दो-तीन लोगों को आसानी से संभाल लेता था। इसलिए ये मानना हमारे लिए मुश्किल है कि दो चोर उसे आसानी से मारकर चले गए। अभिषेक के दिल के पास चाकू मारा गया, इसके अलावा उसके शरीर पर ऐसा कोई निशान नहीं है जिससे ये साफ होता हो कि उसने संघर्ष करने की कोशिश की। अगर वो चोरों को पकडऩे की कोशिश कर रहा था तो उसके हाथ-पैर पर चोट का कोई न कोई निशान तो होना चाहिए था।

चीखा नहीं या चीख नहीं सुनी?
हत्याकांड वाले दिन अभिषेक अपने दोस्त सिद्धार्थ जैन धमासिया के साथ फ्लैट में था, जबकि कृष्ण कुमार नौकरी पर गया हुआ था। अगर उसे कोई अंज्ञान व्यक्ति नजर आया तो उसने सिद्धार्थ को उठाया क्यों नहीं। आमतौर पर ऐसे मामलों में लोग सबसे पहले चिल्लाते हैं, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। सिद्धार्थ को अभिषेक की आवाज तब सुनाई दी, जब हमलावर उसे चाकू मार चुके थे। अभिषेक के दिल के पास चाकू मारा गया।

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