विदेशनीति के लिए अच्छा रहा साल

modipmनरेंद्र मोदी सरकार के एक साल पूरा करने के बाद अब इस बात पर मंथन शुरू हो गया है कि क्या भाजपा जनता से किए वादे पूरे करने में सफल रही? कांग्रेस सहित तमाम छोटे-बड़े दल जो भाजपा और मोदी की विचारधारा से सरोकार नहीं रखते, उनकी नजर में सरकार ने बड़ी-बड़ी बातों के अलावा कुछ खास नहीं किया, लेकिन जनता शायद विपक्ष की इस सोच से इत्तेफाक न रख़े क्योंकि वो बखूबी जानती है कि विपक्ष के विरोध का तार्किक या अतार्किक आधार नहीं होता़ ये तो महज रस्मअदायगी भर है़ सत्ता में रहते वक्त कांग्रेस को जो फैसले नीतिपूर्ण एवं तर्कसंगत नजर आते थे, वही अब जनविरोधी हो गए हैं़ फिर बात चाहे केंद्र की हो या राज्यों की़ ये बात सही है कि महंगाई सहित कुछ चुनिंदा मुद्दों पर उम्मीदों के अनुरूप प्रगति नहीं हुई, लेकिन इसे सरकार की असफलता के तौर पर कतई रेखांकित नहीं किया जा सकता़ इस एक साल में मोदी सरकार ने तमाम ऐसे कार्य भी किए हैं जिन पर इससे पहले खास ध्यान नहीं दिया गया़ मसलन, विदेशनीति कांग्रेसकाल में भारत के दूसरे देशों से रिश्ते कैसे थे? ये जगजाहिर है, निसंदेह अमेरिका से परमाणु करार एक बड़ी उपलब्धि था, मगर उसके प्रारूप से लेकर प्रावधानों तक में अमेरिकी वर्चस्व साफ तौर पर नजर आया। यह कहना गलत नहीं होगा कि यूपीए सरकार की विदेशनीति पूरी तरह से अमेरिका के इर्द-गिर्द ही सिमटकर रह गई थी़ इसी के चलते वामदलों का कांग्रेस से तलाक हुआ़ इसके विपरीत मोदी सरकार बेहद संतुलित तरीके से सभी देशों को साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम कर रही है।

सबसे अच्छी बात तो ये है कि पाकिस्तान को लेकर जो दोहरा रवैया पिछली सरकार के वक्त नजर आता था, वो अब तक इस सरकार में देखने को नहीं मिला है़ मोदी इस बात को अच्छे से समझते हैं कि किसी एक के ज्यादा करीब जाना रणनीतिक संतुलन के लिहाज से नुकसानदायक हो सकता है़ इसलिए वे अमेरिका, चीन के साथ-साथ जापान, नेपाल, श्रीलंका और भूटान को बराबरी का सम्मान दे रहे हैं़ बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली आधिकारिक यात्र भूटान थी, जो इस बात का सबसे बड़ा सबूत है़ आमतौर पर प्रधानमंत्री अपने विदेश दौरों की शुरुआत किसी सशक्त देश से करते हैं़

मोदी के अलावा सरकार की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज भी रिश्तों में मिठास घोलने के लिए कई देशों की यात्र कर चुकी हैं़ इनमें कुछ तो ऐसे हैं, जिनके नाम भी यदा-कदा सुनने में आते हैं़ कांग्रेस के कार्यकाल में भारत और श्रीलंका के बीच जो दूरियां बढ़ी थीं, मौजूदा सरकार उसे भी पाटने में जुटी हुई है़ सामरिक तौर पर श्रीलंका भी हमारे लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि नेपाल़ लेकिन जब लिट्टे से संघर्ष के दौरान श्रीलंक को हमारे साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तभी तमिलनाडु में अपनी राजनीति बचाने के लिए कांग्रेस ने हाथ खड़े कर दिए़ चीन ने इसका फायदा उठाते हुए श्रीलंका को हथियारों की सप्लाई की। इसके बाद से भारत के प्रति श्रीलंका का मिजाज तल्ख होता गया़ ये तल्खी श्रीलंकाई सेना द्वारा भारतीय मछुआरों के साथ बर्बरता के रूप में कई बार सामने आ चुकी है। हालांकि अब इस तरह की घटनाएं कम होने लगी हैं़ सरकार की विदेशनीति की एक अच्छी बात ये भी है कि वो रूस को फिर से करीब लाने के प्रयास कर रही है़ मनमोहन सरकार ने अमेरिका से निकटता बढ़ाने की जद्दोजहद में रूस को नजरअंदार कर दिया था। रूस और भारत के रिश्तों का इतिहास काफी सुनहरा रहा है़ अंतरिक्ष से लेकर भारत की विभिन्न क्षेत्रों में कामयाब छलांग के पीछे रूस की भूमिका अहम थी़ बावजूद इसके रूस को लेकर प्राथमिकताएं बदलती रहीं़ गोश्र्वकोव सहित कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच बढ़ती दूरियां पूरी दुनिया को दिखाई दीं़ भारतीय राजनीति के इतिहास में मनमोहन सिंह अकेले ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिनका मास्को दौरा महज 24 घंटों में समाप्त हो गया वो भी औपचारिकापूर्ण समझौतों के साथ।
प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी अब तक 19 विदेश यात्रएं कर चुके हैं़ इस बात को लेकर उनकी आलोचना भी हो रही है़ कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों का तर्क है कि देश पर ध्यान देने के बजाए प्रधामनंत्री विदेशों में समय गुजार रहे हैं़ लेकिन वो शायद भूल गए हैं कि घर की सुख-शांति तभी कायम रह सकती है जब आस-पड़ोस शांत हो़ अशांत पड़ोसी ताकतवर से ताकतवर व्यक्ति के समक्ष मुश्किलें खड़ी कर सकता है़ चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में हम ये देखते ही आ रहे हैं़ पाकिस्तान को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सबसे ज्यादा शह चीन से मिलती है, ऐसे में चीन को साधने की नरेंद्र मोदी की कोशिश की आलोचना नहीं, सराहना की जानी चाहिए़ आमतौर पर भारतीय प्रधानमंत्री के चीन दौरे को सीमा विवाद के हल से जोडक़र देखा जाता है़ यही वजह है कि जब इस मुद्दे पर कोई बात नहीं बनती तो दौरे को असफल करार दे दिया जाता है़ जबकि संभावनएं तलाशने के दूसरे रास्ते भी हैं़ मोदी के दौरे में सीमा विवाद पर चर्चा हुई, मगर सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया़ इसके अलावा हर बार की तरह व्यापार पर समझौते भी हुए़ दोनों देशों ने 63 हजार रुपयों के करार पर हस्ताक्षर किए हैं़ मोदी का मानना है कि आपसी संवाद का दायरा जितना विस्तृत होगा, दोनों मुल्कों के लोग एक-दूसरे के जितना करीब आएंगे सीमा विवाद जैसे जटिल मुद्दे सुलझने की संभावना उतनी ही अधिक रहेगी़ ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह विकसित करने के समझौते को भी मोदी की विदेशनीति की सफलता के तौर पर देखा जाना चाहिए़ रणनीतिक और सामरिक लिहाज से भारत इस समझौते के जरिए पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन कायम रख सकता है।

बंदरगाह विकसित होने के बाद उसे पाकिस्तान को किनारे करते हुए अफगानिस्तान पहुंचने का आसान मार्ग सुलभ हो जाएगा़ अफगानिस्तान को और करीब लाने में यह बंदगाह महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है़ चीन एवं पाकिस्तान की इस क्षेत्र में बढ़ती जुगलबंदी को देखते हुए ईरान से इस समझौते की अहमियत और भी बढ़ जाती है़ एक बार बंदरगाह विकसित हो गया तो भारतीय सामान अफगानिस्तान के अलावा तुर्कमेनिस्तान, तजाकिस्तान और उजेबिस्तान जैसे मध्य इशियाई देशों तक आसानी से पहुंच सकेगा़ अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के वक्त भी इस समझौते को परवान चढ़ाने की कोशिशें हुई थीं, लेकिन सफलता मोदी के कार्यकाल में मिली़ कुल मिलाकर कहा जाए तो नरेंद्र मोदी सरकार का एक साल विदेशनीति के लिहाज से काफी अच्छा गया है, जहां तक बात महंगाई या अन्य कुछ मुद्दों की है तो आने वाले वक्त में उन पर भी विजय हासिल कर ली जाएगी़ क्योंकि सरकार की नीयत साफ है और कार्यप्रणाली पारदर्शी।

Leave a Reply