व्यापारी क्या जाने पर्यावरण का मोल?

पेरिस समझौते से अमेरिका का हटना चिंता की बात तो है ही, साथ ही यह दर्शाता है कि जब कोई व्यक्ति गलत पेशा अपना ले तो किस तरह वो सबके विनाश का कारण बनता है. डोनाल्ड ट्रम्प खलिस व्यापारी हैं, जो सत्ता के लालच के चलते राजनीति में आए. दशकों तक उन्होंने महज मुनाफे का गुणा-भाग लगाया है, इसलिए राष्ट्रपति बनने के बाद भी वो आदत उनसे छूट नहीं रही है. जिस तरह से इस महत्वपूर्ण समझौते पर ट्रम्प ने हाथ खड़े किए, उससे साफ़ है कि उनकी नज़र में यह एक ऐसा व्यापारिक समझौता है, जिससे अमेरिका का खजाना सिर्फ खाली होगा. वैसे देखा जाए तो पर्यावरण हमेशा से ही इस व्यापारिक सोच की बलि चढ़ते आ रहा है. भारत में ही पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानूनों की धज्जियां उड़ाते अनगिनत कारखाने संचालित हैं. छोटे-बड़े हर स्तर पर मुनाफे के लिए पर्यावरण का गला घोंटा जा रहा है. एक व्यापारी होने के नाते ट्रम्प के लिए यह समझना मुश्किल है कि भारत और चीन जैसे देशों को जो तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं, वित्तीय सहायता और तकनीक क्यों मुहैया करवाई जाए? वो यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर अमेरिका पर्यावरण के लिए अपनी सुख-सुविधाओं और विकास पर कुल्हाड़ी क्यों चलाए? कोई भी व्यापारी घाटे का सौदा नहीं करता, और न ही वो सालों बाद होने वाले प्रभावों पर ज्यादा ध्यान देता है. इसलिए ट्रम्प की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक है. पूरे विश्व में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में अमेरिका का योगदान 15 से 20 फीसदी है, यानी उसे इस लिहाज से ही जेब ढीली करनी होगी. इसके अलावा यदि वो पेरिस समझौते पर राजी होता है तो उसे अपनी कोयले की खदानों को भी पूरी तरह से बंद करना होगा. कई खदानों के बंद होने से इस क्षेत्र में रोजगार की समस्या पहले से ही खड़ी हुई है और ट्रम्प नहीं चाहते कि पर्यावरण की खातिर उन्हें दोनों मोर्चों पर नुकसान उठाना पड़े.

दूरदर्शी थे ओबामा
इसके उलट बराक ओबामा के कार्यकाल में पर्यावरण को लेकर अमेरिका की सोच काफी सकारात्मक रही. उन्होंने पेरिस समझौते को संपूर्ण विश्व की जीत बताया था. ओबामा दूरदर्शी सोच वाले राष्ट्रपति थे जो पर्यावरण में आ रहे गंभीर बदलावों को समझते थे. जबकि ट्रम्प पर्यावरण में भी नफा-नुकसान तलाश रहे हैं. जाहिर है ऐसे संवेदनशील मुद्दों से निपटने की सोच उनमें अब तक विकसित नहीं हो पाई है. ट्रम्प उस सामंतवादी विचारधारा से ग्रस्त हैं, जहां अपने दोष नज़र नहीं आते. भारत में कोयले के इस्तेमाल और पारंपरिक श्रोतों से बिजली उत्पन्न करने पर ट्रम्प को आपत्ति है, लेकिन आज भी अमेरिका में भारत से ज्यादा कोयले की खपत होती है. हर अमेरिकी 15000 किलोवाट बिजली खर्च करता है, जबकि भारत में यह आंकड़ा 1000 किलोवाट के आसपास है. कार्बन उत्सर्जन की बात करें तो भारत में प्रतिव्यक्ति कार्बन डायऑक्साइड 2.5 टन है, वहीं अमेरिका में 20 टन. पर्यावरण को दूषित करने वाले एसी, फ्रिज जैसे सुख-सुविधाओं के साधनों के इस्तेमाल में भी अमेरिका आगे है, हमारे यहां तो 30 करोड़ लोगों के पास बिजली ही नहीं है.

भुगतना होगा खामियाजा
अमेरिका बढ़ते तापमान को रोकने के लिए विकासशील देशों को वित्तीय सहायता और तकनीक मुहैया करवाने वाली सबसे अहम् कड़ी रहा है, जो अब टूटने के कगार पर है. ग्रीन हाउस गैसों के चलते धरती तेज़ी से गर्म हो रही है और इसकी तपन से अमेरिका भी अछूता नहीं है, बावजूद इसके डोनाल्ड ट्रम्प का पेरिस समझौते से हाथ खींचना उनकी नासमझी को दर्शाता है. अमेरिकियों ने एक व्यापारी को राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठाकर जो गलती की है, उसका खामिजा आने वाले वक़्त में पूरी दुनिया को भुगतना होगा.

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