साजिश का शिकार तो नहीं हो रही ‘आप’?

अरविंद केजरीवाल इस वक़्त बुरे दौर से गुज़र रहे हैं. पहले चुनावों में शिकस्त और अब भ्रष्टाचार के आरोप. इन आरोपों की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि इन्हें लगाने वाले विपक्षी नहीं बल्कि केजरीवाल के अपने हैं. और यही वजह है कि हर तरफ से केजरीवाल पर सवालों की बौछार हो रही है. लोग यह जानना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार की खिलाफत पर राजनीतिक पार्टी की नींव रखने वाला एक करिश्माई नेता क्या खुद भ्रष्टाचार में डूब गया है? आम आदमी पार्टी के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि इस बार चोट सीधे उसकी जड़ों पर हुई है. और जब जड़ें कमज़ोर पड़ने लगें तो फिर पेड़ का गिरना स्वभाविक हो जाता है.
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यहां से केजरीवाल के लिए यह साबित करना बेहद मुश्किल होगा कि जो आरोप उनपर लगाएं गए हैं वो बेबुनियाद हैं. और बिना यह साबित करे वो शायद उस विश्वास को पुन: हासिल न कर पाएं, जो इस खुलासे से कुछ हद तक खो गया है. दिल्ली के पूर्व मंत्री और आप से बर्खास्त नेता कपिल मिश्रा का कहना है कि केजरीवाल ने 2 करोड़ की रिश्वत ली, इसके अलावा पार्टी के चंदे को लेकर भी सरकार को अँधेरे पर रखा गया. कपिल के आरोपों को यदि एक ऐसे व्यक्ति की प्रतिक्रिया के तौर पर स्वीकार भी लिया जाए, जो भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता, तब भी बहुत कुछ ऐसा है जो यह संदेह पैदा करता है कि आम आदमी पार्टी राजनीतिक साजिश का शिकार हो रही है. केंद्र  में सत्ता परिवर्तन के बाद से जिस तरह से एक के बाद एक आप नेता नकारात्मक कारणों से सुर्खियां बंटोर रहे हैं, क्या वो महज़ इत्तेफ़ाक है?

पिछले दो-ढाई सालों में तकरीबन रोज़ किसी न किसी आप नेता पर कोई न कोई आरोप लगा. आरोपों की यह रफ़्तार तो पश्चिम बंगाल में भी देखने को नहीं मिली जहां तृणमूल कांग्रेस और वामदल एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं. कल तक सुशिक्षित और साफ़-सुथरी छवि वाले नेताओं की पार्टी आज एक ऐसी पार्टी बन गई है, जिसके अधिकांश नेता कठघरे में खड़े हैं. क्या ये संभव है? एक-दो नेताओं के आचरण या कार्यशैली सवालों के घेरे में हो सकती है, लेकिन जब पूरी की पूरी पार्टी को एक ही नज़रिए से देखा जाए तो सवाल उठाना लाज़मी है. दरअसल आप ने भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ जिस नई राजनीति की शुरुआत की, यह उसका ही परिणाम है. जब आप कुछ अलग करने की कोशिश करते हैं, तो आपको आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है. और जब आप अपनी कोशिशों में सफल हो जाते हैं तो आलोचनाएं हितों का टकराव बन जाती हैं. आप के साथ भी कुछ ऐसा ही होता नज़र आ रहा है.

kapilआम आदमी पार्टी ने एक ऐसे राजनीतिक परिदृश्य का निर्माण किया, जिसका इंतजार लोगों को लंबे वक़्त से था. एक ऐसा परिदृश्य जहां वादे महज़ वोट हासिल करने का हथियार नहीं थे, बल्कि जनता के दरकते विश्वास को मज़बूत करने का साधन थे. महज़ दिल्ली ही नहीं वीआईपी संस्कृति से मुक्त इस नई सोच की पूरे देश में सराहना हुई. थोड़े ही वक़्त में आप ने इतनी ख्याति अर्जित कर ली कि मंझे हुए राजनीतिज्ञों के मंच तक हिलने लगे. क्या ये वजह आप के खिलाफ साजिश के लिए काफी नहीं है? क्या केंद्रीय एजेंसियों का बार-बार आप पर घेरा कसना साजिश के संदेह को गहरा नहीं करता? सवाल कई हैं, जिनके जवाब खोजे जाने चाहिए और इसके लिए केजरीवाल को भी आगे आना होगा. जिस तरह से उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों पर सीधा जवाब देने के बजाय ईवीएम का मुद्दा उठाया उससे यह संदेश गया कि केजरीवाल कुछ छुपा रहे हैं फिर भले ही उनकी मंशा इसे तूल न देने की रही हो. स्थिति पहली जितनी सरल नहीं है, अब ख़ामोशी का अर्थ होगा स्वीकृति. इसलिए केजरीवाल और उनकी टीम को काउंटर अटैक के साथ ही सेल्फ डिफेन्स का प्रदर्शन भी करना होगा, वरना साजिशों के बादल और घने होते जाएंगे.

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