मोदीजी, क्या पाई-पाई के लिए तरसना सम्मान है?

नोटबंदी पर संसद से सड़क तक सरकार अपने फैसले का समर्थन कर रही है। संसद में विपक्ष के तीखे हमलों का जवाब देते हुए सरकार ने कहा है कि देश में पहली बार ईमानदार को सम्मान और बेईमान को नुकसान हुआ है। सरकार की इस दलील से जहां कुछ लोग संतुष्ट हैं, वहीं कुछ का मानना है कि पीएम मोदी ने दूरदर्शिता नहीं दिखाई। 500 और 1000 के नोट बंद किए जाने के इतने दिनों बाद भी हालात सामान्य नहीं हो सके हैं। बैंक और एटीएम के बाहर अलसुबह ही लाइनें लग जाती हैं, जो देर शाम तक लगी atmsbiरहती हैं। एक तरफ बैंककर्मी काम के दबाव से त्रस्त हैं, तो दूसरी तरफ आम जनता कैश की किल्लत से परेशान है। लोग पीएम से जानना चाहते हैं कि क्या पाई पाई के लिए हाथ फैलाना ही सम्मान है?

वो क्या समझेंगे?
पुणे के सांगवी स्थित बैंक ऑफ महाराष्ट्र की ब्रांच के बाहर सुबह के 6 बजे से ही लोगों का जमावड़ा शुरू हो गया था, जो 9 बजते बजते लंबी लाइन में तब्दील हो गया। इस लाइन में बुजुर्ग भी थे, महिलाएं और पुरुष भी। सबकी बस एक ही मुराद थी कि इस बार उनका बैंक आना सार्थक हो जाए। कई लोग ऐसे थे, जो पिछले कई दिनों से कैश निकालने आ रहे हैं, लेकिन सफलता नहीं मिली। लाइन में लगी एक महिला ने कहा, “नोटबंदी का फैसला अच्छा है या नहीं मैं नहीं जानती, मुझे बस इतना पता है कि मेरे पास जरूरी सामान खरीदने के भी पैसे नहीं बचे हैं”। गार्ड से बार-बार बैंक खुलने का समय पूछ रहे एक बुजुर्ग ने कहा, “क्या पाई पाई के लिए हाथ फैलाना सम्मान है? पीएम बस इस बात का जवाब दें। हम जो परेशानी झेल रहे हैं, वो वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले नहीं समझ सकते”।

दिक्कत ही दिक्कत
शुक्रवार पेठ स्थित बैंक ऑफ इंडिया ब्रांच लगी भीड़ में कुछ लोग मोदी सरकार के फैसले से खुश थे, जबकि अधिकांश नाराज। उनकी नाराजगी केवल इस बात की थी कि सरकार ने फैसला लेने से पहले आम आदमी को होने वाली परेशानी के बारे में नहीं सोचा। एक व्यापारी ने कहा, “नोटबंदी से हमारा धंधा तो मंदा हो ही गया है, रोजमर्रा का खर्चा चलाने में भी दिक्कत हो रही है। बैंक और एटीएम दोनों में ही सीमित पैसा है, जिसके चलते कई बार खाली हाथ लौटना पड़ता है”। एक युवक ने कहा, “नोटबंदी का फैसला काफी अच्छा है, लेकिन पैसे नहीं मिलने से अब परेशानी बढ़ने लगी है। हम बस इंतजार ही कर सकते हैं कि जल्दी से स्थिति सामान्य हो जाए”।

बैंक कर रहे इंकार
पिंपले सौदागर स्थित एसबीआई एटीएम के बाहर खड़े एक युवक ने कहा, सरकार ने नोट बदलने और पैसा निकालने की जितनी लिमिट तय की है, उतना भी नहीं हो पा रहा है। एक तरफ आरबीआई की तरफ से कहा जा रहा है कि पैसे की कमी नहीं है, वहीं बैंक पैसों की कमी का हवाला देकर पूरा कैश देने में टालमटोल कर रहे हैं। बैंकों की मजबूरी तो समझ आती है, लेकिन आरबीआई व्यवस्था दुरुस्त करने के बजाए गलत दावे क्यों कर रहा है? सरकार को अब बयानबाजी छोड़कर आम जनता की परेशानी कम करने की कोशिश करनी चाहिए।

Leave a Reply