We have lost 212 soldiers in 3 years, hope 2018 brings peace

हमने पिछले 3 सालों में अपने 212 जवानों (Soldiers) हो खोया है. ऐसा तब है जब देश में आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति रखने वाली सरकार है. हालांकि हम उम्मीद कर सकते हैं कि मोदी सरकार 2018 में पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए सख्त कदम उठाएगी और हमें अपने जवानों को यूं शहीद होते नहीं देखना पड़ेगा. देखें पूरा वीडियो:

हारने वाले खिलाड़ी को क्या सजा देता है उत्तर कोरिया?

उत्तर कोरिया (North Korea) के अजीबो-गरीब नियम-कायदों के बारे में तो आपने सुना होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ओलंपिक जैसी प्रतियोगिताओं में हारने वाले कोरियाई खिलाड़ियों के साथ क्या सलूक किया जाता है? ओलंपिक में जीत दर्ज करने वाले खिलाड़ियों पर तोहफों की बरसात होती है, उन्हें रोल मॉडल के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन हारते ही खिलाड़ी के प्रति सरकार का नजरिया बदल जाता है. यह हार तब और भी ज्यादा दर्दनाक बन जाती है, जब वह किसी दुश्मन देश के हाथों मिली हो, जैसे कि जापान, दक्षिण कोरिया या अमेरिका.

इस साल फरवरी में होने वाले ओलंपिक खेलों में उत्तर कोरिया भाग ले सकता है. ख़ास बात यह है कि ये आयोजन दक्षिण कोरिया के शहर प्योंगचांग में होने जा रहा है. उत्तर कोरिया ने अब तक 56 पदक जीते हैं, जिनमें से 16 गोल्ड है. इस देश में आमतौर पर खेलों के आयोजन को बाद में टेलीकास्ट किया जाता है. यानी उत्तर कोरियावाली लाइव टेलीकास्ट नहीं देख सकते. ऐसा इसलिए कि अगर खिलाड़ी हार जाए तो उस मैच को हमेशा के लिए दफन क्र दिया जाए.

2014 के एशियाई खेलों में उत्तर कोरिया की फुटबॉल टीम को फाइनल में दक्षिण कोरिया से हार का सामना करना पड़ा था. इस मैच को उत्तर कोरिया में कभी प्रसारित किया ही नहीं गया. 1990 में बीजिंग एशियाई खेलों में जब एक जूडो खिलाड़ी को हार नसीब हुई, तो उसे कोयले की खदान में भेज दिया गया. हालांकि ये बात अलग है कि इसका कोई प्रमाण नहीं मिला. यह भी कहा जाता है कि हारने वाले खिलाड़ियों को जेल में डाल दिया जाता है. अगर हार किसी दुश्मन देश से मिली हो तो सजा और भी कड़ी हो जाती है.

अमेरिका में धूम मचा रहा ये बिहारी

पटना में जन्मे प्रभाकर शरण इन दिनों अमेरिका में काफी लोकप्रिय हैं. उनकी पहली स्पैनिश फिल्म फिल्म ‘एनरेडाडोस: ला कंफ्यूजन (इनटेंगल्ड: द कंफ्यूजन)’ को लैटिन अमेरिका में अच्छा रिस्पांस मिला. कहा जा रहा है कि यह पहली ऐसी अमेरिकी फिल्म है जिसे बॉलीवुड स्टाइल में बनाया गया है. इस फिल्म में हिंदी फिल्मों की तरह गाने भी हैं. इसकी शूटिंग कोस्टा रिका, मुंबई और पनामा में हुई है. प्रभाकर के साथ इस फिल्म में मुख्य किरदार में नैन्सी डोबल्स हैं. वो यहां की टीवी होस्टेस हैं. प्रभाकर की योजना अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को हिंदी, अंग्रेजी और भोजपुरी में ‘एक चोर, दो मस्तीखोर’ के नाम से रिलीज करने की है.

यह फिल्म पिछले साल फरवरी में कोस्टा रिका, पनामा, निकारागुआ, होंडुरास, ग्वाटेमाला और सान सल्वाडोर में रिलीज हुई थी. प्रभाकर का कहना है कि यह फिल्म लैटिन अमेरिकी फिल्म उद्योग में मील का पत्थर बन चुकी है. 2000 में प्रभाकर कोस्टा रिका पढ़ाई के लिए गए थे और पढ़ाई के बाद कपड़े और रेस्तरां के कारोबार से जुड़ गए. साल 2006 से वह बॉलीवुड फिल्मों को कोस्टा रिका लेकर आने लगे. पहली बार उनकी ही कंपनी मध्य अमेरिका में बॉलीवुड फिल्मों को कारोबार के लिए लेकर आई थी.

Video: Congress MLA Asha Kumari Slaps Woman Constable, Gets Slapped Back

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में हार की समीक्षा करने के लिए शिमला पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अब इस बात की भी समीक्षा करनी चाहिए कि अपने नेताओं के मिजाज को किस तरह ठंडा रखा जाए. एक महिला कांस्टेबल ने जब कांग्रेस विधायक आशा रानी को बैठक में जाने से रोका तो उन्होंने उसे थप्पड़ रसीद कर दिया, हालांकि ये बात अलग है चंद ही सेकंड में उनके गाल भी लाल हो गए. देखिये पूरा video….

Major Prafulla: सच्चाई जाने बिना ही वीडियो कर दिया वायरल

ख़बरों को सबसे जल्दी फ्लैश करने के चक्कर में नामी मीडिया संस्थान यह भी जांचना ज़रूरी नहीं समझते कि खबर सही है या नहीं. शहीद मेजर प्रफुल्ल अंबादास मोहरकर (Major Prafulla) का जो वीडियो मीडिया और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है वो असल में उनका है ही नहीं. हिंदुस्तान, दैनिक जागरण सहित कई दिग्गज मीडिया संस्थानों ने अपनी वेबसाइट पर इस वीडियो को मेजर प्रफुल्ल के आखिरी शब्द बताकर शेयर किया है. जबकि 16 जनवरी 2017 को ये वीडियो सीआरपीएफ यानि केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स ने अपने ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किया था. वीडियो पोस्ट करते हुए ये बताया गया था कि सीआरपीएफ के अस्टिटेंट कमांडेंट सतवंत सिंह ने छत्तीसगढ़ के बस्तर में किस तरह अपनी बहादुरी और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया?

दरअसल वारयल वीडियो 8 साल पहले साल 2009 का है जब असिस्टेंट कमाडेंट सतवंत सिंह छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ एक एनकाउंटर में बुरी तरह घायल हो गए थे. आपको बता दें कि वायरल वीडियो में दिख रहे सतवंत सिंह को बचा लिया गया था. सिंह फिलहाल सीआरपीएफ से रिटायर हो चुके हैं और मुंबई में रिजर्व बैंक ऑफ में तैनात हैं.

आप जानते हैं कि ATM किसके दिमाग की उपज थी?

आज बैंकों से पैसा निकालना पहले जितना मुश्किल नहीं रहा. ATM कार्ड साथ हो, तो पलक-झपकते ही पैसा निकल जाता है. इसके अलावा अब तो ATM द्वारा अपने खातों में पैसा जमा करने की सुविधा भी शुरू हो गई है. ATM के आविष्कार से पहले तक पैसा निकालने या जमा करने के लिए बैंकों में लंबी-लंबी लाइनें लगा करती थीं. अब अधिकांश लोग उस स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकते. हालांकि नोटबंदी ने ज़रूर कुछ महीनों तक लोगों को गुज़रे ज़माने में पहुंचा दिया था. ATM से पैसा निकालते समय क्या कभी आपके मन में आया है कि यह किसके दिमाग की उपज है? सबसे पहला ATM कहाँ लगा और भारत में इसकी शुरुआत कब हुई? आइए हम आपको बताते हैं….

सबसे पहले ATM मशीन का इस्तेमाल 27 जून, 1967 को लंदन के बार्कलेज बैंक में हुआ था. जिस शख्स ने इसका आविष्कार किया उनका नाम था जॉन शेफर्ड बैरन. बहुत कम लोग जानते हैं कि स्कॉटलैंड निवासी बैरन का जन्म 23 जून 1925 को भारत के मेघालय में हुआ था. बैरन के जन्म के समय उनके पिता चिटगांव पोर्ट के कमिश्नरेट के चीफ़ इंजीनियर थे.

कैसे आया ख्याल?
ATM के आविष्कार के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. एक दिन शेफर्ड बैरन को किसी ज़रूरी काम के लिए बैंक से पैसा निकालना था. लेकिन जब तक के बैंक पहुंचे, बैंक बंद हो चुका है. उस वक़्त बैरन को काफी गुस्सा आया. उन्होंने सोचा कि ऐसा कुछ होना चाहिए, जिससे लोग जब चाहें पैसा निकाल सकें. यह विचार मन में आते ही उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया. उनकी कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद लंदन के बार्कलेज बैंक की एक शाखा में दुनिया की पहली ATM मशीन लगी.

भारत में शुरुआत
ATM मशीन की शुरुआत भारत में 1987 के आसपास मानी जाती है. सबसे पहले हांगकांग एंड शंघाई बैंकिंग कॉर्पोरेशन (HSBC) की मुंबई शाखा में ATM मशीन लगाई गई. उसके बाद धीरे-धीरे बाकी बैंकों ने भी इस आविष्कार को अपना अभिन्न अंग बना लिया और आज तो इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

2017 की ये तस्वीरें बताती हैं कि इंसानियत अभी जिंदा है

ऐसे वक़्त में आपकी सौहार्द और भाईचारा राजनीतिक साजिशों की भेंट चढ़ रहा है 2017 की कुछ तस्वीरें बताती हैं कि दुनिया में इंसानियत अभी भी जिंदा है. आइए तस्वीरों के माध्यम से जानते हैं कुछ ऐसे ही लोगों के बारे में जिन्होंने अपनी परवाह किए बिना दूसरों की जिंदगी बचाई..

रोक दिया राष्ट्रपति का काफिला
ऐसे मामले कम ही सुनने में आते हैं जब किसी सामान्य व्यक्ति की जान बचाने के लिए वीवीआईपी को इंतज़ार करवाया जाए. बेंगलुरु ट्रैफिक पुलिस के सब इंस्पेक्टर एमएल निजालिंगप्पा को जब पता चला कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के काफिले की वजह से एक एम्बुलेंस फंसी हुई है, तो उन्होंने राष्ट्रपति के काफिले को रोककर एम्बुलेंस को रास्ता दिया.

मुश्किल वक़्त में मिली मदद
बारिश के दौर में कभी न थमने वाले मुंबई की रफ़्तार भी मंद पड़ जाती है. इस साल जब ऐसा हुआ तो मुंबईवासियों ने बारिश में फंसे लोगों के लिए मदद के दरवाजे खोल दिए. उन्हें खाना-पानी से लेकर ज़रूरत का हर समान मुहैया करवाया गया. पीड़ितों के लिए फ़रिश्ता बनकर आने वालों में कई मुस्लिम परिवार भी शामिल थे. दादर स्थित गुरुद्वारे में 750 लोगों को आसरा दिया गया था.

मिलती है मुफ्त की सवारी
ऑटो वालों पर अक्सर ज़रूरत से ज्यादा पैसे वसूलने के आरोप लगते हैं, लेकिन कर्नाटक निवासी मंजुनाथ निगप्पा ज़रुरतमंदों को मुफ्त में सफ़र करवाते हैं. दिन में मंजुनाथ आम इंसान की तरह नौकरी करते हैं और रात को लोगों की मदद. दिन ढलते ही उनका ऑटो एम्बुलेंस बन जाता है, कोई भी बस एक कॉल पर उनसे सहायता मांग सकता है. इतना ही नहीं अपनी कमाई का कुछ हिस्सा को एक संस्था को दान भी करते हैं.

जवान बने हॉकर का सहारा
उत्तर प्रदेश में जब एक हॉकर की साइकिल चोर ले भागे, तो पुलिसकर्मियों ने मदद का हाथ आगे बढ़ाया. उत्तर प्रदेश पुलिस के डायरेक्टर जनरल के कार्यालय से ट्विटर पर यह स्टोरी पोस्ट की गई थी. पुलिसकर्मियों ने हॉकर को नई साइकिल खरीद के दी, ताकि उसे पैदल न भटकना पड़े.

वीडियो नहीं बनाया, बचाया
टेक्सास में जब एक गाड़ी में डूबने लगी और कोई सहायता नहीं आई, तो आसपास मौजूद लोगों ने इंसानियत का परिचय दिया. लोगों ने मानव श्रृंखला बनाकर कार में फंसे आदमी को सुरक्षित बाहर निकाला. आजकल इस तरह के नज़ारे कम ही देखने को मिलते हैं, क्योंकि लोग किसी की मदद करने के बजाए वीडियो बनाना ज्यादा पसंद करते हैं.

उतर गया 80 फीट गहरे कुंए में
दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जो जानवरों के प्रति भी संवेदना रखते हैं. राजस्थान के अलवर में जब एक आवारा कुत्ता 80 फीट गहरे कुएं में गिर गया तो एक शख्स अपनी जान दांव पर लगाकर उसकी जान बचाई. स्थानीय एनजीओ की मदद से वो शख्स रस्सी के सहारे कुएं में उतरा और कुत्ते को बाहर निकालकर लाया.

ऑटो वाला बना मिसाल
वरिजाश्री वेनुगोपाल को वीजा इंटरव्यू के लिए 5 हजार की ज़रूरत थी, लेकिन किसी भी एटीएम से पैसे नहीं निकल रहे थे. ऐसे मुश्किल वक़्त में एक ऑटो ड्राइवर ने उनकी सहायता की. उस ड्राइवर ने अपने पास से पांच हजार रुपए वरिजाश्री को दिए. हालांकि वरिजाश्री को सिर्फ एक सवारी के रूप में ही जानते थे, फिर भी वो मदद के लिए तैयार हो गए. सोशल मीडिया पर यह स्टोरी काफी वायरल हुई थी.

Christmas celebration in Canadian way

By Anuj Ismail

It is that time of the year again where we meet our near and dear ones, celebrate the joy of Christmas with our family, exchange gifts and cherish the old memories of Christmas. It is indeed the most wonderful time of the year wherein people call over their friends and family to celebrate the joy of the season.

Christmas in Canada is celebrate with great enthusiasm, Canadians start preparing for Christmas about a month in advance, due to severe weather condition in December where most of the province is enveloped midst snow coupled with severe winds. However that does not dampen the spirit of Christmas most of the inhabitants are done with external decoration by the first week of November.

Shopping malls are overcrowded with people who want to get done with their shopping list and start utilizing the weekend by calling over friends and family for dinner, So that they can spend the Christmas Eve and the day of Christmas with their close member of the family and prepare traditional Christmas meal which often consist of turkey, potatoes, cranberry sauce and pudding for desert.

People who attend church regularly attend the midnight mass on the Christmas Eve, and majority of the people attend the regular Christmas service on the 25. People share their greetings with the members of the church followed by lunch for the church members.

“I still haven’t done my Christmas shopping, I was caught up at work I hope to get it done by the weekend, I do work on Christmas Eve but that does not dampen my spirit it is the most wonderful time of the year.” Says Robert Walker

“It’s been a hectic month I am finally done with my shopping list and this week will be full of family dinner and get tighter with my near and dear ones. I hope I do not fall sick as it will -25 on the day of Christmas.” Says Nicole Alano

फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से क्यों डर रहे हैं नेता?

आपराधिक मामलों का सामना कर रहे नेता इन दिनों खौफ में हैं. इस खौफ की वजह मोदी सरकार का वह हलफनामा जिसमें उसने आपराधिक मामलों में शामिल सांसद और विधायकों के मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालत बनाने की बात कही थी. नेताओं की बेचैनी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने राज्यसभा में इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया. उन्होंने इस संबंध में संविधान की धारा 15 का उल्लेख करते हुए कहा, जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता. मैं सांसद और विधायक को अलग जाति मानता हूँ. तो फिर किस आधार पर सरकार सांसदों और विधायकों के लिए अलग अदालत बना सकती है?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय का मानना है कि जब नेताओं को स्पेशल स्टेटस चाहिए, तो फिर स्पेशल कोर्ट क्यों नहीं? उनके मुताबिक, देश में सांसद-विधायकों पर 1500 से ज्यादा आपराधिक मामले चल रहे हैं. यही वजह है कि उपाध्याय ने कोर्ट से गुहार लगायी है कि ऐसे मामलों के निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट बनाया जाए.

महाराष्ट्र सबसे आगे
एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) के अनुसार 2014 में लोकसभा में चुनकर आए 542 सांसदों में से 185 आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो देश के 34 फीसदी सांसद आपराधिक रिकॉर्ड वाले हैं. 2009 की लोकसभा में यह आंकड़ा 158 था. राज्यों के हिसाब से देखा जाए तो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसद हैं. दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश और फिर बिहार का नंबर आता है.

GPS बंद होने पर भी ट्रैक होती है लोकेशन!

इस बात से तो आप वाकिफ होंगे कि GPS (Global Positioning System) से आपकी लोकेशन का पता लगाया जा सकता है, लेकिन क्या आप यह भी जानते हैं कि GPS बंद होने पर भी ऐसा मुमकिन है? हाल ही में Princeton University के शोधकर्ताओं ने सिद्ध किया है. शोधकर्ताओं के मुताबिक, स्मार्टफ़ोन में GPS बंद होने के बावजूद आपकी लोकेशन ट्रैक की जा सकती है. उन्होंने एक ऐसा ऐप डिज़ाइन करके दिखाया, जो आपके स्मार्टफ़ोन के बेसिक सेंसर्स से डेटा निकालता है, फिर भले ही आपका GPS बंद हो ये आपकी लोकेशन ट्रैक करने की क्षमता रखता है.

हर हरकत पर नज़र
ये डेटा Accelerometer, Magnetometer और Barometer जैसे ऐप्स से मिलता है जिन्हें आपसे लोकेशन एक्सेस करने की अलग से इजाज़त नहीं लेनी होती. Sensors से मिलने वाले डेटा से यह अनुमान लगाया जाता है कि आप पैदल चल रहे हैं, ड्राइव कर रहे हैं या फिर विमान में हैं. कुल मिलाकर कहा जाए तो आपकी हर हरकत पर नज़र रखी जा रही है.

रहें सावधान
आपने एक बात नोट की होगी कि जब भी आप कोई ऐप डाउनलोड करते हैं, तो आपसे GPS एक्सेस की अनुमति मांगता है. इसलिए केवल उन्हीं ऐप को डाउनलोड करें जिनका सोर्स विश्वसनीय हो. अन्यथा आप खतरे में पड़ सकते हैं. इसके अलावा ज़रूरत न हो तो अपना GPS बंद ही रखें.