Gujarat: इस जीत में छिपी हैं चिंताएं!

गुजरात (Gujarat) में भाजपा ने लगातार छठवीं बार सत्ता पर कब्ज़ा ज़रूर कर लिए है, लेकिन इस जीत में कई चिंताएं भी छुपी हैं. जिस तरह के प्रचंड बहुमत की उम्मीद नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह कर रहे थे, वोट का आंकड़ा उससे काफी दूर रहा. भाजपा यहां 100 के फेर में ही उलझ गई, जबकि पिछली बार यानी 2012 के विधानसभा चुनाव में उसने 115 सीटें हासिल की थी. इस बात में कोई दोराय नहीं कि जो जीता, वही सिकंदर, लेकिन गिरता वोट प्रतिशत कहीं न कहीं दर्शाता है कि गुजरात की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के कामकाज से खुश नहीं था. जहाँ तक बात हिमाचल की है, तो वहां नरेंद्र मोदी लहर पूरी तरह नज़र आई. राज्य की जनता ने कांग्रेस को काफी गंभीर चोटें दी हैं. हिमाचल में एक तरह से यह साफ़ हो गया था कि जनता सत्ता परिवर्तन चाहती है. क्योंकि कांग्रेस उसकी उम्मीदों के अनुरूप शासन देने में नाकाम रही. पार्टी नेता जनता की सुध लेने के बजाए अपने लड़ाई-झगड़े सुलझाने में ही लगे रहे.

फायदे में कांग्रेस
गुजरात के नतीजे भाजपा के पक्ष में ज़रूर हैं, मगर कांग्रेस राज्य में मज़बूत होती दिखाई दे रही है. अगर पिछले चुनाव से तुलना की जाए, तो पार्टी का रिकॉर्ड सुधरा है. 2012 में कांग्रेस को 61 सीटें मिलीं थीं और इस बार वो 80 के आंकड़े को पार कर गई है. उसे 20 से ज्यादा सीटों का फायदा मिला है. सौराष्ट्र में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा हुआ है. जबकि भाजपा को अपने गढ़ में उम्मीद माफिक परिणाम नहीं मिले हैं. इसके अलावा पटेल बहुल इलाकों में भी भाजपा को नुकसान झेलना पड़ा है.

भाजपा को नुकसान
गुजरात भाजपा को इस बार सीधे तौर पर 19 से 20 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है. 182 सीटों वाले राज्य में 20 सीटों पर हार काफी मायने रखती है. हालांकि इसके पीछे हार्दिक पटेल फैक्टर ने भी काम किया है. भाजपा यदि पटेल को अपने पाले में करने में कामयाब रहती तो जिस प्रचंड जीत के दावे पीएम मोदी और शाह कर रहे थे उसे हासिल किया जा सकता था.

नहीं संभले तो….
गुजरात के नतीजे इशारा कर रहे हैं कि लोगों में भाजपा को लेकर सोच बदल रही है. आलाकमान को ख़ुशी मानाने के साथ ही मंथन भी करना होगा, अन्यथा आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है. भाजपा की जीत के एक बड़ी वजह यह भी रही कि लोग राहुल गांधी को उतना परिपक्व नहीं मानते हैं. कांग्रेस पर भरोसा करने के उनके पास वाजिब कारण नहीं हैं. ये स्थिति काफी हद तक बिल्कुल वैसी ही है, जैसी 2014 से पहले भाजपा की थी. लेकिन समय बदला और भाजपा ने सारे समीकरण बदल दिए. इसलिए भाजपा को भी इसी नज़रिए से सोचना होगा.

दोस्त हो तो ऐसा! इस अभिनेता ने अपने दोस्तों को दिए एक-एक मिलियन डॉलर

दोस्ती के किस्से तो आपने बहुत सुने होंगे, लेकिन ये सबसे अलग है. हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता जॉर्ज क्लूनी (George Clooney) ने अपने 14 सबसे करीबी दोस्तों को एक-एक मिलियन डॉलर उपहार के तौर पर दिए हैं. क्लूनी के दोस्त रानडे गेरबेर ने इस बात का खुलासा किया है. गेरबेर के मुताबिक 2013 में क्लूनी ने अपने घर पर एक डिनर रखा था, जिसमें उनके अलावा 13 अन्य दोस्तों को आमंत्रित किया गया था. जब सभी दोस्त आए, तो क्लूनी ने उनसे कुर्सियों पर रखे 14 सूटकेस खोलने को कहा. जैसे कि उन्होंने सूटकेस खोला, उनकी आँखें खुली रह गईं. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, क्लूनी ने कहा, “मैं आप लोगों को बताना चाहता हूँ कि मेरे जीवन में आप क्या मायने रखते हैं. जब मैं लॉस एंजिल्स आया, तो मैंने सड़कों पर रातें गुजरीं. मैं खुद को भाग्यशाली समझता हूँ कि उस मुश्किल वक़्त में आप सभी मेरा साथ देने के लिए मौजूद थे. अगर आप न होते थे मैं कभी इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता”.

टैक्स भी भरा
क्लूनी ने आगे कहा, “यह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था, आज भी जब हम एक साथ हैं, तो मैं आपको कुछ वापस देना चाहता हूँ”. गेरबेर के मुताबिक, सूटकेस में पैसों के साथ एक-एक रसीद भी रखी हुई थी, जब हमने उसे देखा तो पता चला कि क्लूनी ने टैक्स भी खुद भी भर दिया था, ताकि सभी दोस्त पूरी राशि घर ले जा सकें.

कोई चिंता नहीं
क्लूनी ने अपने दोस्तों से कहा, “अब आपको अपने बच्चों की पढ़ाई की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, आपको अपने कर्ज को लेकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. इतना ही नहीं मैंने सभी का टैक्स भी भर दिया है, अब यह एक मिलियन आपके हैं”. गेरबेर मशहूर मॉडल सिंडी क्रॉफोर्ड के पति हैं और क्लूनी के बिज़नेस पार्टनर भी. पहले उन्होंने एक मिलियन डॉलर लेने से इंकार किया, लेकिन जब क्लूनी ने जोर दिया तो मना नहीं कर सके. हालांकि गेरबेर का कहना है कि वे इस राशि को दान कर देंगे.

जब बाजुओं में दम था-सब दीवाने थे, जब उम्र बढ़ी-अकेला छोड़ गए!

किसी ज़माने में अपने बाजुओं की ताकत से विश्व विख्यात बॉक्सर मोहम्मद अली को टक्कर देने वाले कौर सिंह (kaur singh) आज दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं. आलम ये है कि उन्हें अपने इलाज के लिए प्राइवेट फाइनेंसर से 2 लाख रुपए उधार लेने पड़े हैं. कौर सिंह एकमात्र ऐसी बॉक्सर हैं, जिन्हें 1980 में एक एग्बिज़ीशन मैच के दौरान मोहम्मद अली से लड़ने मौका मिला. इतना ही नहीं 1982 के एशियाई खेलों में उन्होंने भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता था. इस उपलब्धि के लिए सरकार ने कौर को पहले अर्जुन अवॉर्ड और 1983 में पद्मश्री से सम्मानित किया. 1984 में कौर सिंह ने लॉस एंजलिस ओलिंपिक में लगातार को बाउट जीतकर सबको चौंका दिया था.

सेना का वीर
कौर सिंह का सफ़र 1971 में सेना में हवलदार के रूप में शुरू हुआ. ये वही दौर था जब भारत और पाकिस्तान जंग के मैदान में आमने-सामने थे. सिंह ने इस युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया था, जिसके लिए सेना ने उन्हें बहादुरी सम्मान से नवाजा. रिटायर्ड होने के बाद वे पंजाब स्थित अपने गाँव वापस आ गए. गुज़रते वक्त के साथ-साथ कौर सिंह गुमनामी के अंधेरे में खोते गए. न तो सरकार ने और न ही किसी चाहने वाले ने उनकी सुध ली.
देर से सही पर मदद आई
उन्हें दिल की बीमारी के इलाज के लिए पैसे उधार लेने पड़े. हालांकि सेना ने 3 लाख रुपए की मदद ज़रूर की, लेकिन ये रकम इलाज के लिए काफी नहीं थी. कौर सिंह का मामला जब सुर्ख़ियों में आया तब कहीं जाकर केंद्र सरकार की नींद खुली और खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने नेशनल वेलफ़ेयर फंड फॉर स्पोर्ट्स पर्सन्स से कौर सिंह को 5 लाख रुपये देने की घोषणा की है. सरकार के इस कदम की सराहना हुई, लेकिन सवाल भी ज़रूर उठे कि क्या देश का नाम रौशन करने वालों के प्रति सरकारी उदासीनता कब समाप्त होगी?

तिरेंगे में क्यों लिपटे थे शशि कपूर?

बीते दिनों जब बॉलीवुड अभिनेता शशि कपूर का निधन हुआ, तो ज़्यादातर लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर उनके शव को तिरंगे में क्यों लपेटा गया. उनके मन में यह सवाल था कि शशि कपूर कोई विख्यात नेता या मुख्यमंत्री भी नहीं रहे, तो फिर ऐसा क्यों किया गया? दरअसल, शशि कपूर पद्म विभूषण से सम्मानित थे, इसलिए उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई. उनके शव को तिरंगे में लपेटा गया और पुलिस ने उन्हें बंदूकों की सलामी दी.

किसे मिलता है राजकीय सम्मान
भारत में वर्तमान और पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्री मंत्री और मुख्यमंत्रियों को राजकीय सम्मान दिया जाता है. इसके अलावा अगर केंद्र और राज्य सरकारें चाहें तो वह देश के किसी भी सम्मानित व्यक्ति को यह सम्मान दिला सकती हैं.

क्या है प्रक्रिया
राजनीति, साहित्य, विज्ञान, कानून और कला क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली हस्तियों को यह सम्मान दिया जा सकता है. साथ ही भारत रत्न, पद्म विभूषण और पद्म भूषण प्राप्त शख्स भी इसके हक़दार हो सकते हैं. हालांकि इसके लिए केंद्र या राज्य सरकार को इसकी सिफारिश करनी होती है. निर्णय लेने के बाद राज्य के डीजीपी को इससे अवगत कराया जाता है, ताकि अंतिम संस्कार के समय राजकीय सम्मान की तैयारी की जा सके.

योगी राज में उत्तर प्रदेश (UP) पुलिस बिना किसी सियासी खौफ़ के काम कर रही है…इसकी एक बानगी उस वक़्त देखने को मिली जब अपने समर्थकों को छुड़ाने थाने पहुंचीं  सपा महिला नेता को SSP मंजिल सैनी ने खूब फटकार लगाई. आप भी देखिये यह VIDEO:

Gujarat: विकास पर क्यों खामोश रहे मोदी?

अपने हर भाषण में विकास की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Gujarat चुनाव में विकास से बचते नजर आए. अपनी चुनावी रैलियों में उनका पूरा जोर कांग्रेस खासकर राहुल गांधी की कमजोरियों को रेखांकित करने पर ही केन्द्रित रहा. मोदी में आए इस बदलाव से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गुजरात में इस बार भाजपा को नुकसान होने जा रहा है. कांग्रेस नेता मणिशंकर के “नीच” वाले बयान के बाद जिस तरह से मोदी ने अपने लिए इस्तेमाल हुए शब्दों की दुहाई दी और जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के तार पाकिस्तान से जोड़े, उससे इन कयासों को बल मिलता है. जीएसटी आदि कई ऐसे मुद्दे रहे जिन्होंने गुजरात में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया और हार्दिक पटेल ने इस हवा की गति बढ़ाने का काम किया. बावजूद इसके भाजपा का पलड़ा कुछ हद तक भारी समझा जा रहा था, लेकिन पार्टी नेता और खासकर नरेंद्र मोदी के हावभाव देखकर अब यह लगने लगा है कि कांग्रेस की वर्षों की मुराद पूरी हो सकती है.

नयापन नदारद
गुजरात में मोदी के भाषण कांग्रेस की बुराई और राष्ट्रवाद, सेना, चीन, पाकिस्तान, भ्रष्टाचार और गुजराती अस्मिता के इर्द-गिर्द रहे. उन्होंने गुजरात में विकास की बात छेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और न ही बेरोजगारी, निवेश में कमी, लघु एवं मध्यम उपक्रमों की बर्बादी, स्थिर निर्यात एवं मूल्यवृद्धि जैसे मुद्दों पर बात की. कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा बार-बार विकास पर बात करने की चुनौती को भी मोदी ने नहीं स्वीकारा. मोदी के भाषण इस बार पारंपरिक राजनीति तक ही सिमटकर रह गए, उनमें कुछ नयापन नजर नहीं आया. उन्होंने खुद को गुजरात के बेटे के रूप में प्रोजेक्ट कर भावनात्मक आधार पर वोट मांगे. राजनीति का यह अंदाज़ 2014 के नरेंद्र मोदी के अंदाज़ से बिल्कुल अलग है. जो कहीं न कहीं यही इशारा करता है कि गुजरात के लिए भाजपा के पास कोई विकास मॉडल नहीं है.

बदली रणनीति
मोदी यह समझ गए हैं कि इस बार समीकरण अलग हैं. अच्छे दिनों के जो सपने उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान दिखाए थे, वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं. इसलिए विकास की बातों से बात बनने वाली नहीं है. शुरुआती मौकों पर जब स्वयं मोदी और अमित शाह की सभाओं से भीड़ कम होती चली गई और रैलियों में भाजपा के खिलाफ हुटिंग हुई, तभी पार्टी ने अपनी रणनीति को जाति-धर्म से जोड़ दिया. कभी अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, तो कभी राहुल गांधी के धर्म का. हालांकि सभाओं में पहले जैसी भीड़ फिर भी न खिंच सकी. हालांकि जनता का फैसला आना अभी बाकी है, इसके बात ही तय होगा कि उसे भाजपा पसंद है या कांग्रेस.

बदलते गए नारे
अगर 2007 से अब तक की बात करें, जो 2017 के चुनाव में भाजपा किसी खास स्लोगन के साथ मैदान में नहीं आई है.

  • 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी का मुख्य नारा था आतंकवाद विरुद्ध राष्ट्रवाद. ये चुनाव गुजरात दंगों के कुछ महीने बाद ही हुए थे. सांप्रदायिक हिंसा के साये में एक भव्य गौरव यात्रा का आयोजन किया गया था, जिसमें गुजरात की गरिमा और सम्मान को चुनाव का केंद्र बिंदु बनाया गया था.
  • 2007 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ‘जीतेगा गुजरात’ नाम से स्लोगन जारी किया था. इस चुनाव में विकास के प्रति झुकाव देखा गया. कांग्रेस के लिए सोनिया गांधी का मौत के सौदागर वाला बयान नुकसानदायक साबित हुआ था.
  • 2012 में भाजपा ने एकमत गुजरात का नारा केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार की तरफ से गुजरात की गई अनदेखी के खिलाफ एकजुट होने के लिए बनाया गया।
Is the Modi Government scared?

MODI सरकार के कुछ हालिया फैसले बताते हैं कि अब उसे आर्थिक सुधारों के नाम पर जनता पर बोझ डालने से डर लगने लगा है. देखें Video:

In defense of the tigers

By Dr. Suhas Kumar

A debate has started on tigers about which the tigers are totally unaware. The debaters belong to two schools of thoughts – there is one group that believes tigers have the same rights as a human being has – unless it is a persona non-grata or one that is drifting on the high sea. And then there is the other group that considers only human life precious and therefore they firmly believe a tiger that has killed or injured a human being as expendable without even a fair trial.

Tiger as a race is an oppressed lot, its home has been destroyed, natural prey has been usurped, and its pathways have been blocked. Lately with the government doled reservations the tiger is bouncing back, but it is not the right time for it to bounce back as outside the reservations ( that are very small in size) it finds itself in the company of humans, who over the years have become extremely insensitive and intolerant to tiger’s presence around them.

Centuries of persecution by humans has ingrained a natural fear of man in tigers – especially those that restrict themselves within the safe confines of the reserves but situation has changed now. The protection afforded to them in the reserves has forced the surplus population out in the open. Tigers now inhabit scrubs and crop fields, and now they are even breeding there. The young ones born near human habitations are no more fearful of the humans. This situation often brings them face to face with men and women and accidents happen. The small-sized and weirdly designed CTH ( e.g., Bor Nawegaon- Nagzira TR) offer no space for tigers – the tigers walk three kms and they are out in the danger zone. Such tiger too may cause injury and death of human beings if threatened or harassed or if someone comes between the tiger and its prey – the village cattle. Means, one should expect tiger-human face-off on a daily basis, especially in those states where hard working foresters have toiled tirelessly to revive the tiger populations.

The scenario of intolerance against tigers clearly depicts a stark truth, India needs no more tigers and may be even those within the Tiger reserve needs to be restrained by erecting fences all along the periphery of tiger reserves and other forested area harbouring tigers. Don’t waste your time on reviving corridors. Your thoughts, please.