आखिर क्यों हार रहे हैं केजरीवाल?

दिल्ली नगर निगम चुनावों में आप आदमी पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसे ही इशारे कर रहे थे. इस हार के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या आम आदमी पार्टी अपने शुरूआती बिंदु पर पहुंचने वाली है? क्या अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक करियर ख़त्म हो गया है? इन सवालों पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि हार और जीत केवल राजनीति ही नहीं बल्कि हर मुकाबले की हकीकत है. और यह ज़रूरी नहीं कि हारने वाला फिर से खड़े होने का साहस न जुटा पाए. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आज जिस दौर से गुज़र रही हैं, भाजपा भी उस दौर से गुज़र चुकी है. इसलिए अरविंद केजरीवाल के पास भी वापसी का मौका है और आगे भी रहेगा, जब तक कि वो खुद अपनी पारी समाप्ति की घोषणा नहीं करते. दिल्ली नगर निगम पर इससे पहले भी भाजपा का कब्ज़ा था, इसलिए यदि वो हारती तो उसे आप से ज्यादा आघात लगता. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह शिकस्त केजरीवाल और उनकी पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. क्योंकि इससे यह प्रत्यक्ष तौर पर नज़र आता है कि जनता आम आदमी पार्टी से मुंह मोड़ रही है. लेकिन इसकी क्या वजह है? क्या केजरीवाल ने अपने वादे पूरे नहीं किए? क्या आप के विधायक और कार्यकर्ताओं ने वैसी ही दबंगई दिखाई, जैसी आजकल यूपी में भाजपाई या उससे पहले सपा और बसपा कार्यकर्ता दिखाते थे? अगर नहीं, तो फिर केजरीवाल में विश्वास दिखाने वाली दिल्ली की जनता एकाएक से उनके खिलाफ कैसे हो गई?
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सूरत तो बदली है
इससे शायाद ही कोई इंकार करे कि केजरीवाल राज में दिल्ली का विकास हुआ है. जिन सरकारी स्कूलों को हिकारत की नज़रों से देखा जाता था, वहां की स्थिति न केवल सुधरी है, बल्कि नई संभावनाएं भी वहां जन्म ले रही हैं. मोहल्ला क्लीनिक के रूप में लोगों को एक ऐसा डॉक्टर मिल गया है, जो बेवजह के चक्कर नहीं लगवाता और ना ही बेवजह जेब ढीली करने पर जोर देता है. सड़कों पर रात गुजरने वालों को भी अच्छे शेल्टर नसीब हो रहे हैं. ख़ास बात यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जो सबसे ज़रूरी और अहम् है. आमतौर पर शिक्षक भी सरकारी ढर्रे में शामिल हो जाते हैं और बच्चों की नैया राम भरोसे आगे बढ़ती रहती है. जैसे कि देश के अधिकांश सरकारी स्कूलों में हो रहा है. दिल्ली के लोग इस बदलाव को महसूस भी कर रहे हैं, लेकिन ये अहसाह अगर वोट में तब्दील नहीं हो सका तो इसकी वजह काफी हद तक आम आदमी पार्टी की कलह और केजरीवाल खुद हैं.

ऐसी पार्टी क्यों चुनें?
दिल्ली में ताजपोशी के बाद से ही लगभग हर सुबह आम आदमी पार्टी से किसी की विदाई का संदेश लेकर आई. गोपाल राय, योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण से लेकर अलग-अलग इकाई के छोटे-बड़े कई नेता पार्टी से अलग होते गए. पिछले कुछ वक़्त से तो पार्टी धधकते माहौल से गुज़र रही है, जिसका धमाका नगर निगम में मिली हार के साथ ही हो गया है. केजरीवाल के सबसे ख़ास कहे जाने वाले कुमार विश्वास भी अपने कवि अंदाज़ में भाजपा को निशाना बनाते-बनाते पार्टी मुखिया पर तीर दाग रहे हैं. और आशुतोष जैसे दूसरे नेताओं के साथ केजरीवाल के संबंधों में भी खिंचाव है. सीधे शब्दों में कहें तो पार्टी बिखराव के रस्ते पर चल निकली है और ऐसी स्थिति में उसके लिए जीत हासिल करना लगभग नामुमकिन है. जनता एक ऐसी पार्टी से अपनी समस्याएं सुलझाने की उम्मीद कैसे कर सकती है, जो खुद के झगड़े ही नहीं सुलझा पा रही है. जिसके नेता अपनी ही पार्टी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. फिर भले ही विरोधी पार्टियां उससे कमतर क्यों न हों. मुंबई हमले के वक़्त देश में कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा था, महंगाई पहले से ही यूपीए सरकार की नींव कमज़ोर कर रही थी, बावजूद इसके जनता ने भाजपा को नकारते हुए कांग्रेस को दोबारा चुना. इसकी वजह महज इतनी ही थी कि भाजपा में आंतरिक कलह अपने चरम पर थी और लाख बुराइयों के बावजूद कांग्रेस एक अनुशासन वाली पार्टी बनी हुई थी.

इतने नकारात्मक क्यों?
इसके अलावा अरविंद केजरीवाल की नकारात्मक राजनीति भी जनता की नज़रों में आप की चमक को फीका करने में लगी है. सुधारों की बात करने वाले केजरीवाल अब राजनीति के कमाल खान बनते जा रहे हैं, जिन्हें हर मुद्दे पर हवा का रुख विरोधी पार्टियों की ओर मोड़ना है. चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो या नोटबंदी केजरीवाल प्रत्यक्ष तौर पर नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते रहे, ये जानते हुए भी कि देश नोटबंदी के फैसले का समर्थन कर रहा है. बुलेट ट्रेन को भी केजरीवाल ने बेकार साबित करने में देर नहीं लगाई, और गोवा एवं पंजाब विधानसभा चुनावों में हार के लिए ईवीएम पर उंगली उठाना शुरू कर दिया. नगर निगम चुनाव में शिकस्त को भी वो इसी नज़रिए से देख रहे हैं. केजरीवाल की बातों में सच्चाई है या नहीं, विषय अब यह नहीं रह गया है, बल्कि यह हो गया है कि आखिर केजरी इतने नकारात्मक क्यों हैं? आप सोशल मीडिया पर देख लीजिये, लोग यही सवाल केजरीवाल से कर रहे हैं. ये वही सोशल मीडिया है, जिसने दिल्ली में आप की जीत में अहम् किरदार निभाया था. नगर निगम हार आम आदमी पार्टी के लिए एक सबक है, और यदि उसने इससे भी कुछ नहीं सीखा, तो परिणाम ज्यादा घातक होंगे.

Punjab: हारकर भी जीत गई आप

Punjab is still new hope for Aam Aadmi Party.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अगर सबसे ज्यादा कुछ आश्चर्यजनक रहा, तो वो पंजाब और गोवा के नतीजे. दोनों ही राज्यों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे थे, लेकिन परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे. इस हार के बाद केजरीवाल की रणनीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं, इस बात पर चर्चा की जा रही है कि क्या आप का राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दस्तक देने का सपना टूट गया है? अगर हम उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा के जबरदस्त प्रदर्शन से बाहर निकलकर सोचने का प्रयास करें तो इस सवाल का जवाब निश्चित तौर पर ना punjabहोगा. ये बात सही है कि पार्टी को पंजाब में हार का सामना करना पड़ा और गोवा में वो खाता खोलने में भी असफल रही, लेकिन क्या इस तरह की चर्चाओं और टिप्पणियों से पहले आप के राजनीतिक अनुभव पर नज़र नहीं डालनी चाहिए? भाजपा या कांग्रेस से तुलना की जाए तो आम आदमी पार्टी उस युवा की तरह है, जो बचपन से निकलकर जवानी में कदम रख रहा है. और ऐसा युवा अगर धुरंधरों के सामने कुछ देर भी अपने कदम ज़माए रख पता है तो उसके भविष्य को लेकर सवाल खड़े नहीं किए जाते बल्कि संभावनाएं व्यक्त की जाती हैं. आप ने पहली बार दिल्ली से बाहर निकलकर पंजाब और गोवा में अपनी किस्मत आजमाई, पंजाब में उसे भाजपा और कांग्रेस के अलावा अकाली दल के वोट भी काटने थे. ये सभी पार्टियां सत्ता की राजनीति में लंबा अनुभव रखती हैं, इसलिए आम आदमी पार्टी ने जब अपने चुनावी अभियान को यहां से आगे बढ़ाने का ऐलान किया तो किसी के माथे पर ज्यादा सिलवटें देखने को नहीं मिलीं. अधिकतर नेता यह मानते रहे हैं कि सोशल मीडिया पर लड़ाई लड़ने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली के बाहर अपनी छाप नहीं छोड़ सकती. लेकिन जब आप की सभाओं में भीड़ जुटने लगी, केजरीवाल को सुनने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचने लगे तो सिसायत के मंझे हुए खिलाड़ियों के होश उड़ना शुरू हो गए. यहीं से एक हवा बनना शुरू हुई कि आम आदमी पार्टी पंजाब में झाड़ू लगा सकती है. केवल केजरीवाल या आप कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि विरोधी दलों को भी अपनी हार की आशंका होने लगी थी.

भाजपा को मात

हालांकि परिणाम कुछ और रहे, मगर फिर भी आप अप्रत्यक्ष तौर पर उस भाजपा को मात देने में कामयाब रही, जिसने मोदी लहर पर सवार होकर यूपी और उत्तराखंड में न सिर्फ भगवा झंडा फहराया बल्कि कई रिकॉर्ड भी ध्वस्त कर दिए. बादल की काली छाया भी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को अपने आगोश में नहीं ले सकी. पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं, उसमें आम आदमी पार्टी ने 20 पर जीत हासिल की, जबकि को भाजपा को महज 3 सीटों पैर जीत मिली और उसकी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल महज 15 पर सिमट गई. कांग्रेस को सबसे ज्यादा 77 सीटें मिलीं. अब यदि 2012 के चुनाव परिणाम देखें तो अकाली दल को 56 और भाजपा को 12 पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस के 46 उम्मीदवार ही जीत पाए थे. आम आदमी पार्टी ने पहली बार पहली बार चुनाव लड़ा और सत्ताधारी पार्टियों से ज्यादा वोट प्रतिशत प्राप्त किया, क्या ये किसी जीत से कम है? क्या इसका सीधा सा मतलब ये नहीं है कि जनता भाजपा और अकाली दल के स्थान पर आम आदमी पार्टी को देखना चाहती है?

punjabबस एक चूक

पंजाब में आम आदमी के प्रदर्शन को निराशाजनक नहीं बल्कि उम्मीदों के अनुरूप न होना कहा जा सकता है. पार्टी यहां जनता के सामने एक मजबूत स्थानीय नेतृत्व रखने में चूक गई, और यही शायद उसके कम वोटों का कारण रहा. भगवंत मान और एचएस फुल्का से पार्टी को भले ही फायदा मिला हो, लेकिन यह स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरा साबित नहीं हो सकते थे. इसके अलावा केजरीवाल का पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की अफवाह ने भी पार्टी के खिलाफ काम किया. इससे आप आयात किए हुए नेताओं की पार्टी महसूस होने लगी. लोगों को लगने लगा कि बिना पंजाब को जाने-समझे कोई व्यक्ति कैसे राज्य की बागडोर संभाल सकता है? इसलिए अमरिंदर सिंह की छवि केजरीवाल पर भारी पड़ी. यदि आप मजबूत स्थानीय नेतृत्व पेश करती तो निश्चित तौर पर उसकी झोली में ज्यादा सीटें आतीं.

अब भी मौका

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी चुनाव ज़रूर हारी है, लेकिन विपक्ष की कुर्सी पर उसी का कब्ज़ा है. अगर वो अपनी इस भूमिका को सही ढंग से निभा पाती है, तो अगले चुनाव तक वो जनता के बीच खुद को अच्छी तरह से स्थापित करने में कामयाब होगी. जिन मुद्दों को पार्टी ने चुनाव के दौरान उठाया था उन्हें अब वो विधानसभा में उठा सकती है. यह सब जानते हैं कि अमरिंदर सिंह को लगभग खाली खजाने से जनता की उम्मीदों को पूरा करना होगा, ऐसे में आम आदमी पार्टी को कई मौके मिलेंगे जब वो खुद को बेहतर साबित कर सकती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो आप ने पंजाब में हार कर भी काफी कुछ पाया है, ज़रूरत है उसे समझने और आगे की तैयारी करने की. जहां तक बात गोवा की है तो परिणाम दुःख देने वाले हैं, लेकिन पार्टी का ये पहला प्रयोग था और प्रयोग सफल – असफल होते रहते हैं.

पत्रकार ने यूं बयां किया नौकरी से निकाले जाने का दर्द

पत्रकार सबका दर्द समझते हैं, लेकिन जब वो खुद दर्द से गुजरते हैं तो कोई उसे समझने की कोशिश नहीं करता। यहां तक कि उनकी बिरादरी वाले भी मुंह मोड़ लेते हैं। एबीपी समूह के अखबार द टेलीग्राफ के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार बिस्वजीत रॉय ने 1000 शब्दों का पत्र लिखकर अपना दर्द बयां किया है। रॉय उन 700 मीडियाकर्मियों में शुमार हैं, जिन्हें आनंद बाजार पत्रिका समूह ने आर्थिक तंगी का हवाला देकर एक ही पल में बेरोजगार बना दिया। रॉय ने अपने पत्र के माध्यम से बड़ी बड़ी बातें करने वाले मीडिया समूहों का असली चेहरा तो प्रदर्शित किया ही है, साथ ही यह भी दर्शाया है कि पत्रकारों के हितों के लिए खड़ी की गईं प्रेस क्लब जैसी संस्थाएं भी जुबानी जमाखर्ची से ज्यादा कुछ नहीं करतीं। एबीपी प्रबंधन के तुगलकी फरमान के खिलाफ रॉय ने जब कोलकाता प्रेस क्लब का दरवाजा खटखटाया तो निराशा ही हाथ लिखी। यहां हम रॉय के पत्र को हूबहू आपके सामने पेश कर रहे हैं, ताकि आप जान सकें कि कर्मचारियों से सत्य निष्ठा और वफादारी की उम्मीद करने वाले मीडिया संस्थान खुद इस पर कितना अमल करते हैं:

Finally I resigned from The Telegraph, albeit under duress like 700 odd fired journalists and non-journalists in the ABP Group. Twenty journalists including 17 district correspondents in TT Bengal reporting have lost their jobs in this round. The ABP management did not allow me to write my resignation letter but got me signed on a one line format that had no mention of the company’s current culling of its workforce. Instead, it pretended that I left out of my free will. Neither had I received a written assurance on the details of the ‘special package’ and statutory dues when I had to sign another format about payments. One of editorial bosses countersigned the latter as I asked for a promissory note from the management. My HR handler told that the company would not commit formally to an individual (even if the job contract was between the company and me as individual) but no reason was offered. I had to insist for the photocopies of the two papers. The pressure on me to put in my resignation at the earliest was aimed at accomplishing the management’s mission by this month.

Although I would be released on March 1, my access to the office computer system was deactivated even before I tendered my resignation. It was meant to make me feel completely unwanted.
Also I was asked to surrender my entry swipe card. The arm-twisting tactics was evident as I was told that the processing of my dues would not begin unless I comply with. I became an outsider effectively on the very day. Now I would have to call or meet HR/accounts or editorial nodal men and meet them at the reception, if they want, to get my dues cleared. So I am at the mercy of the management to receive the fruits of its benevolence after serving the house for20 plus years.
I am told to trust the company which did not think twice before humiliating and firing 700 odd men and women in the name of financial crisis but never bother to explain or discuss with the staffs on ways to overcome it. It did not bother to offer us an honorable exit or an amicable separation except a unilateral but informal assurance of a soothing package. Instead, a piece of paper handed over to the victims revealed the Orwellian absurdity of the world of ABP’s HR mandarins. It offered us help from career counselors, psychiatrists and tax consultants except an audience with the top guns or some exchange of parting messages, not even the corporate niceties like the exit interviews.
Like Kafka’s Castle, we never reached the sanctum sanctorum of the media empire unless the presiding demigods wanted us to do so. Their high priests who are now manning the castle watchtowers are trying their best to behave like compassionate killers. But they may not know when and how the axe will fall on them. Those in the newsroom carried the defiant note by Columbia Journalism Review in the wake of America becoming the Trumpland or mocked Modi and Mamta for their megalomania, hardly showed the same courage of conviction when they were asked to change tunes from time and time as it suited the super bosses. If professionalism is the convenient euphemism for their meek submission, I expected them to protect the lambs they had shepherded so far, if not the perpetual prodigals like me. But sadly, that did not happen. Perhaps it’s easy to defy Trump, Modi or Mamta than taking on the behemoths inside media empires that goaded us to bask under the vainglory of independent journalism only under their strict control.

The all pervasive fear and deafening silence down the line is more alarming. I could not bid adieu digitally to my younger colleagues in the reporting since my access to internal system was locked. I thought of taking leave of everybody in person. But the silence and indifference was chilling as none met my eyes. It was the girl at the reception who said: ‘good bye sir’. There was some personal touch. And, I felt like crying. For the humiliation heaped on me at the fag end of my career, for the loneliness I suffered for my defiance, above all, for the shame of my inability to fight back.
The cowardice of my community leaders before the media owners is even more depressing. Despite the concerted attacks on journalists and non-journalists livelihoods across the country by the media barons they are keeping mum. “What can we do!” a Kolkata Press club office-bearer who himself has suffered termination just before his retirement told me when I asked him to call a meeting covering all the affected houses. If his reply was typical of a man who had resigned to his fate and wanted to reap the benefits out of losses at the end of his career, the deafening silence of community elders and bodies in Kolkata and elsewhere will surely invite further onslaughts on young men and women in the profession in a short time. If the latter is behaving like proverbial ostriches at the time of sandstorm, it the older jackasses with rubber spines are to be blamed more.
Kolkata Press club has managed to hold protest meetings and marches against ruling party or police attacks on journalists at different times despite the opposition and sabotage by the cronies of the rulers of the day, both at the state and centre. But I don’t remember any protest meet, let alone a march, against the media Mughals in my 30 plus years in the profession.

Many watchdogs of democracy bark at the perceived or real intruders, often expecting pats from its masters. But unlike the real canines they never bark at or bite the abusive and cruel masters. They are better at drowning their grief in the drinks after sundown while networking for change of masters. But the problem is that the masters are far and fewer now while our tribe has a baby boom. Pedigrees are rare and most of us are mongrels hardly having any taker. Mongrels are doomed if we follow the assorted asslickers who are relishing lairs of shit for good life, usually licking political and corporate masters by turn. My collar is rusted and my bones are weary. Hope someday some young canines will take up the barking and if needed, biting too.
-BISWAJIT ROY

क्या सुसाइड करने समुद्रतट पर आईं थीं व्हेल?

न्यूजीलैंड के समुद्रतट पर बीते दिनों सैकड़ों व्हेल (Whale) मृत पाई गईं। एक दिन जब सुबह लोग दक्षिण आइलैंड टापू के फेयरवेल स्पिट तट पर पहुंचे तो हर तरफ व्हेल ही व्हेल नजर आ रही थीं। बिना वक्त गंवाए बचाव कार्य शुरू किया गया, लेकिन तब तक 300 से ज्यादा व्हेल दम तोड़ चुकी थीं। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है, भारत सहित तमाम देशों में समुद्र किनारे व्हेलों के मारे जाने की घटनाएं होती रही हैं। फेयरवेल स्पिट बीच पर 2015 में भी 100 के आसपास व्हेल मारी गई थीं। पिछले साल तमिलनाडु के तूतीकोरिन तट पर 73 व्हेल मृत पाईं गई थीं। इसी दौरान ब्रिटेन के लिंकनशायर समुद्र तट पर भी तीन स्पर्म व्हेल ने दम तोड़ दिया था। ये मछलियां अपेकक्षाकृत ज्यादा गहरे पानी में रहती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों के लिए ये समझना मुश्किल था कि आखिर स्पर्म व्हेल किनारे आईं कैसे?

सुसाइडल टेंडेंसी (Suicidal Tendencies)
व्हेल का समुद्र तट की ओर रुख करने का स्पष्ट कारण अब तक सामने नहीं आ सका है। हालांकि ऐसा माना जाता है कि बीमार या घायल होने के चलते व्हेल रास्ता भटककर समुद्र तट पर आ पहुंचती हैं। कई बार ऐसा होता है कि एक व्हेल किनारे आ जाती है और  फिर वो दूसरी व्हेलों को मदद का संकेत भेजती है। संकेत मिलने पर दूसरी व्हेल वहां आने लगती हैं और वो भी फंस जाती हैं। वैसे इसके पीछे सुसाइडल टेंडेंसी से भी इंकार नहीं किया जा सकता। खुद वैज्ञानिक इस थ्योरी को पूरी तरह खारिज नहीं करते।

इतिहास में उल्लेख
आज से करीब दो हजार साल पहले यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने एक घोड़े की खुदकुशी का जिक्र किया था। उनके मुताबिक जब घोड़े को इस बात का अहसास हुआ कि उसने अपनी मां के साथ सेक्स किया है तो उसने समुंदर में कूदकर खुदकुशी कर ली। इसी तरह ग्रीक विचारक क्लॉडियस ऐलियन ने अपनी किताब में जानवरों की आत्महत्या की 21 घटनाओं पर प्रकाश डाला था। इसमें शिकारी कुत्तों की एक घटना का भी जिक्र है, जिन्होंने अपने मालिक की मौत के बाद खाना छोड़कर जान दे दी। एक बाज के बारे में भी क्लॉडियस ने बताया है, जिसने अपने मालिक की चिता में खुद को जला लिया था।

खुद को डुबा दिया
1845 में लंदन के अखबार इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज में छपी एक खबर ने सबको यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या जानवरों में भी इंसानों जैसे भाव होते हैं? खबर के मुताबिक, काले रंग के एक कुत्ते ने समुंदर में कूदकर जान दे दी। कुत्तों को अच्छा तैराक माना जाता है, लेकिन इस कुत्ते ने तैरने की कोशिश ही नहीं की। कुत्ते को डूबता देखकर कुछ लोग उसे बाहर निकालकर लाए, मगर वो दोबारा पानी में कूद गया और अपनी जान देकर ही माना। एक अन्य खबर में बिल्ली के पेड़ से लटककर जान देने का उल्लेख किया गया, जो अपने बच्चों की मौत से बेहद दुखी थी। इसी तरह चीन में बाड़े में बंद भालू ने अपने बच्चे को मारकर खुद भी जान दे दी थी। बच्चे को एक बेहद तकलीफदेह इंजेक्शन लगाया जाता था। मां से बच्चे की यह तकलीफ देखी नहीं गई और बच्चे को मारकर खुद भी आत्महत्या कर ली।

मादाओं की संख्या ज्यादा
इंसानों की तरह जानवरों में सुसाइडल टेंडेंसी मादाओं में ज्यादा होती है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि नर की अपेक्षा ज्यादातर मादाएं मानसिक तनाव और पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए खुदकुशी कर लेती हैं। हालांकि सुसाइडल टेंडेंसी पर अब तक कोई एक राय नहीं बन पाई है। कुछ वैज्ञानिक ऐसे भी हैं, जिन्हें लगता है जानवरों में ऐसी कोई भावना नहीं होती।

सबसे बड़ा सवाल?
यह बात हम सब जानते हैं कि मनुष्य जैसी संवेदनाओं के चलते जानवर भी डिप्रेशन सरीखी मानसिक बीमारियों का शिकार होते हैं। इसलिए मालिक के साथ कुछ बुरा होने पर उन्हें भी बुरा महसूस होता है। वो दर्द होने पर रोते भी हैं और खुशी में चहकते भी हैं, बस उनका अंदाज अलग होता है। जब इंसान डिप्रेशन में अपनी जान देने जैसा कदम उठा सकता है, तो क्या जानवर ऐसा नहीं कर सकते? इस सवाल का जवाब पूरी तरह मिलना अभी बाकी है।

टीसी ने यात्री को मारे थप्पड़!

  • पुणे रेलवे स्टेशन की घटना, TC के बचाव में उतरा रेलवे.
पुणे रेलवे स्टेशन पर एक टीसी द्वारा यात्री से मारपीट का मामला सामने आया है। ‘आज का खबरी’ के पास इस घटना का वीडियो में जिसमें साफ तौर पर नजर आ रहा है कि पहले एक युवा टीसी बिना उकसावे के यात्री को थप्पड़ मारता है उसके बाद वहां मौजूद आरपीएफ कर्मी भी उसके साथ मारपिटाई करता है। हालांकि रेलवे का कहना है कि उक्त यात्री ने पहले टीसी के साथ बदसलूकी की थी। जानकारी के मुताबिक एक फरवरी रात 12.30 बजे के आसपास टिकट चेकिंग स्टाफ ने यात्री को प्लेटफॉर्म नंबर 6 से पकड़ा। इसके बाद उसे डीसीटीआई कार्यालय लेकर लाया गया और यहां उसके साथ मारपीट की गई। जबकि, रेलवे का कहना है कि यात्री से जब टिकट दिखाने को कहा गया तो उसने न केवल गालीगलौच की बल्कि टीसी की शर्ट भी फाड़ दी।
गलती उसकी थी पर हाथ उठाना गलत
सीनियर डिविजनल कमर्शियल मैनेजर क्रिष्णनथ पाटिल ने कहा, “उक्त यात्री के पास मान्य टिकट नहीं थी, जब टीसी ने उसे जुर्माना भरने को कहा तो उसने गालियां देना शुरू कर दिया। इसके बाद उसे टीसी ऑफिस लाया गया, यहां भी उसने रेलवे स्टाफ के साथ बदसलूकी की। हालांकि बाद में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने लिखित माफी मांगी”। पाटिल का भी मानना है कि इस तरह टीसी का हाथ उठाना गलत है। उन्होंने कहा, हमने टीसी को इस बारे में हिदायत दे दी है।
आम हैं घटनाएं
एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, “पुणे स्टेशन पर इस तरह की घटनाएं आम हैं। खासकर देर रात यात्रा करने वालों के साथ रेलवे स्टाफ और पुलिसकर्मी सबसे ज्यादा बदसलूकी करते हैं। यात्रियों से मोबाइल दिखाने को कहा जाता है और गलती से उसमें कोई अश्लील वीडियो क्लिप मिल गई तो जबरन वसूली की जाती है। जो पैसे देने से इंकार करता है उसके साथ मारपीट होती है”।
छोड़ा क्यों, कार्रवाई करते
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्षा हर्षा शाह ने कहा, “अगर यात्री ने बदसलूकी की थी तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए थी, ताकि भविष्य में लोगों को सबक मिल सके। महज माफीनामा लेकर उसे छोड़ना समझ से परे है। जहां तक बात टीसी द्वारा हाथ उठाए जाने की है तो वो बिल्कुल गलत है। सरकारी अधिकारी को इस तरह अपना आपा नहीं खोना चाहिए”।

दम तोड़ रहा था बेजुबान… मिली नई जिंदगी

यूं तो बेजुबानों की मदद के लिए तमाम संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन अक्सर जरूरत के वक्त कोई काम नहीं आता। या तो ऐसी संस्थाएं खुद को अधिकार क्षेत्र की सीमा में बांध लेती हैं, या फिर उनके पास मदद न करने के तमाम बहाने होते हैं। तस्वीर में दिखाई दे रहा कुत्ता कुछ दिनों पहले आज का खबरी के एक सदस्य को बेहद बुरी अवस्था में मिला। उसकी एक आंख लगभग खराब हो चुकी थी और वो खड़े होने की स्थिति में भी नहीं था। पॉमेरियन नस्ल के इस कुत्ते को उसका मालिक यहां छोड़ गया था,   शायद इसकी वजह कुत्ते की बीमारी रही हो। कुत्ता इस कदर सदमें में था कि उसने भूखा होने के बावजूद कुछ नहीं खाया। इस बारे में एनीमल वेलफेयर के लिए काम करने वाली संस्था पीपुल्स फॉर एनीमल्स को जानकारी दी गई, लेकिन उसने खुद सहायता करने के बजाए रेस्क्यू नामक संस्था से संपर्क करने को कहा। पीएफए के पुणे प्रमुख को वॉट्सएप पर कुत्ते की तस्वीर भी भेजी गई, जिसे देखने के बाद शायद उस इंसान का दिल भी पसीज जाता जिसे जानवरों से कोई प्यार नहीं, लेकिन उन्होंने तस्वीर को भी अनदेखा कर दिया।

मिला सहारा
रेस्क्यू संस्था से सीधे संपर्क का कोई साधन नहीं, जब तक ऑनलाइन फॉर्म भरकर, घायल जानवर की फोटो अपलोड करके उन्हें नहीं भेजते, जब तक नहीं मिल सकती। फिर भले ही घायल दम क्यों न तोड़ दे। सब तरफ से निराशा हाथ लगने पर पिंपरी चिंचवड़ महानगरपालिका के प्राणी विभाग प्रमुख डॉ गोरे को पूरी स्थिति से अवगत कराया गया। उन्होंने तत्काल पशुसंवर्धन शेती व वन प्रकल्प विकास संस्था से बात की और थोड़ी ही देर में मदद पहुंच गई। कुत्ते को जब अस्पताल पहुंचाया गया तो डॉक्टर भी उसकी हालत देखकर सकते में आ गए।

घर में दिया आसरा
कुत्ते ने कई दिनों से कुछ खाया नहीं था। अगर एक दो दिन वो इसी अवस्था में रहता था, उसकी मौत निश्चित थी। सबसे पहले उसे सलाइन चढ़ाई गईं और फिर आगे का उपचार शुरू किया। लगातार एक हफ्ते देखभाल के बाद कुत्ता अपने पैरों पर खड़ा होने लगा है। उसकी सेहत में तेजी से सुधार आ रहा है। पशुसंवर्धन संस्था के पास कोई शेल्टर नहीं है, इस वजह से संस्था के सुनील और उनकी बहन जयश्री घायल जानवरों को अपने घर में आसरा देते हैं।

मदद की दरकार
पशुसंवर्धन संस्था को उस रेस्क्यू किए गए कुत्ते सहित बाकी जानवरों की देखभाल और इलाज के लिए मदद की दरकार है। आज का खबरी ने कुछ पशु प्रेमियों की मदद से इस दिशा में कदम आगे बढ़ाया है, लेकिन मदद के दायरे को विस्तृत करने की जरूरत है ताकि बेजुबान जानवरों को जिंदगी थोड़ी आसान बन सके।

पर्रिकर के GOA में भाजपा से नाराज हैं लोग!

अब जब गोवा (GOA) सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान हो गया है, तो ये बात काफी मायने रखती है कि मनोहर पर्रिकर के गोवा में भाजपा को लेकर गुस्सा है। संभव है कि 4 फरवरी को होने वाले मतदान में यह गुस्सा किसी बड़े उलटफेर की कहानी लिख जाए। गोवा की आधे से ज्यादा आबादी पर्यटन पर निर्भर है और नोटबंदी के चलते उसकी आमदनी पर करारी चोट हुई है। भाजपा के लिए मुसीबत यह है कि नोटबंदी के साइड इफेक्ट समाप्त होने से पहले ही राज्य में चुनावी बिगुल बज गया है। कुछ स्थानीय नेता मानते हैं कि यदि चुनाव साल के अंत तक होते तो ज्यादा बेहतर होता।

गड़बड़ाएगा गणित
नोटबंदी को केंद्रीय स्तर पर भले ही बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा हो, लेकिन राज्य में जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ता अच्छे से जानते हैं कि जनता को परेशानी तो हुई है। और इस परेशानी का बदला लेने का मौका उसे कुछ जल्दी मिल गया GOAहै। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 40 में से 22 सीटें अपने नाम की थी और इस जीत में उत्तरी गोवा का काफी योगदान था, लेकिन इस बार उसका गणित गड़बड़ा सकता है। क्योंकि यहां भाजपा को लेकर असंतोष का माहौल है। आज का खबरी ने जब गोवा वासियों का दिल टटोलने की कोशिश तो एक बड़े वर्ग में भगवा पार्टी के प्रति गुस्सा साफ तौर पर नजर आया। फिर भले ही वे पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग हों, मछुआरे या फिर टैक्सी ड्राइवर।

कुछ असर तो होना चाहिए
कैंडोलियम निवासी जॉर्ज भाजपा समर्थक रहे हैं, उनके घर के वोट कभी किसी दूसरी पार्टी को नहीं गए, मगर इस बार वो आम आदमी पार्टी का साथ देने का मन बना चुके हैं। जॉर्ज कहते हैं, बात केवल डिमॉनिटाइज़ेशन की नहीं है, कई मुद्दे पर जिन पर मौजूदा सरकार नाकामयाब रही। लिहाजा इस बार दूसरे विकल्प को आजमाना मैं बेहतर समझूंगा। जॉर्ज की तरह रफीक भी भाजपा से नाराज हैं, हालांकि उनकी नाराजगी पूरी तरह से नोटबंदी तक सीमित है। पर्यटन क्षेत्र से जुड़े रफीक कहते हैं, नोटबंदी का जितना असर हम पर हुआ है, उसका कुछ प्रतिशत तो भाजपा पर होना ही चाहिए। मेरा वोट भाजपा को नहीं जाएगा, ये पक्का है। जॉर्ज और रफीक की तरह उत्तरी गोवा में अनगिनत लोग हैं, जिनका भाजपा से मोहभंग हो चुका है।

कई और भी हैं वजह
पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग जहां नोटबंदी जैसे फैसलों के चलते भाजपा से नाराज हैं, तो आम जनता राज्य सरकार की वादाखिलाफी से नाराज है। इसमें सबसे प्रमुख है मंडोवी नदी पर तैरते कैसीनो, सत्ता में आने से पहले भाजपा ने कहा था कि वो इन्हें यहां से दूर ले जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अंग्रेजी की अपेक्षा स्थानीय भाषाओं को तवज्जो न देने को लेकर भी पार्टी की आलोचना हो रही है।

GOA: ऐसा न हो डुबकी लगाएं और डायपर साथ ले आएं!

अगर आप गोवा (GOA) के किसी समुद्र तट पर पानी में डुबकी लगा रहे हैं, तो इस बात के लिए तैयार रहें कि आपका सामना बीयर की बोतल, बच्चों के इस्तेमाल किए गए डायपर और यहां तक सेनेटरी नैपकिन से भी हो सकता है। गोवा के अधिकांश तटों पर पर्यटकों द्वारा इस कदर गंदगी फैलाई जा रही है, जिसे साफ करना प्रशासन के बस के बाहर होता जा रहा है। आलम ये है कि जहां नजर घुमाओ शराब की खाली बोलतें, पॉलिथीन, सिगरेट की टुकड़े आदि नजर आ जाते हैं। प्रशासन की ओर से बीच पर लगाए गए डस्टबिन महज शो पीस बनकर रह गए हैं, क्योंकि गोवा आने वाले ज्यादातर लोग स्वच्छता की आदत को घर छोड़कर आते हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पर्यटकों के चलते उनके शहर की खूबसूरती खराब हो रही है।

goaगंदगी से स्वागत
गोवा के सबसे प्रसिद्ध समुद्र तटों में पहला नाम कलंगुट का आता है। यहां सैलानियों की सबसे ज्यादा भीड़ जमा होती है, यही वजह है कि इस बीच पर गंदगी भी सबसे ज्यादा है। बीच पर दाखिल होने से पहले ही आपको दोनों तरफ बिखरी गंदगी नजर आ जाएगी। कई बार बीयर की टूटी बोतलों के चलते लोग घायल हो चुके हैं। इस बीच की सफाई के लिए प्रशासन ने 10 सफाई कर्मियों को नियुक्त किया है, लेकिन बढ़ती गंदगी को देखते हुए ये संख्या कम पड़ने लगी है। पर्यटक खाने पीने का सामन लेकर बीच पर आते हैं, और कचरा डस्टबिन में फेंकने के बजाए वहीं छोड़कर चले जाते हैं।

बैन बेमानी
गंदगी और महिला पर्यटकों के साथ होने वाली अभद्रता को रोकने के लिए राज्य सरकार ने 2013 में बीच पर शराब का सेवन बैन किया था। हालांकि शैक जैसे निर्धारित स्थानों को इस बैन से दूर रखा गया था। लेकिन यह बैन अब पूरी तरह से बेमानी साबित हो रहा है। अधिकांश पर्यटक बाहर से शराब खरीदते हैं, बीच पर आकर पीते हैं और बोलतें वहीं फेंक जाते हैं। गोवा पुलिस की इंडियन रिजर्व बटैलियन विंग पर समुद्र तटों पर कानून व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी है। पुलिस के जवान बीच पर गश्त भी करते हैं, लेकिन इसके बावजूद पर्यटक वहां शराब लेकर पहुंच जाते हैं।

हिंदुस्तानी आगे
कैंडोलियम बीच कलंगुट की अपेक्षाकृत कम गंदा है, लेकिन सुबह के वक्त यहां हर कदम संभालकर रखना पड़ता, क्योंकि पता नहीं कब पैर किसी बोलत पर आ जाए। ये आलम तब है जब बीच पर मौजूद भी शैक अपने स्तर पर साफ सफाई करते हैं। यदि वो भी इसे प्रशासन की जिम्मेदारी मानकर हाथ खड़े कर लें, तो फिर यहां बैठना तक मुश्किल हो जाएगा। बॉबी शैक में काम करने वाले पीटर इसके लिए पूरी तरह से भारतीय पर्यटकों को कुसूरवार ठहराते हैं। वो कहते हैं, विदेशी सैलानी कचरे को डस्टबिन में फेंककर जाते हैं, लेकिन हिंदुस्तानी उसे बीच पर ही छोड़ जाते हैं। अगर उन्हें समझाने की कोशिश करो तो उल्टा लड़ने को तैयार हो जाते हैं। मेरे साथ ऐसा कई बार हो चुका है, इसलिए हम किसी को कुछ कहने के बजाए जितना हो सके खुद ही कचरा हटा देते हैं।

पहले ऐसा न था
एक अन्य शैक में काम करने वाले रफीक ने कहा, कई बार विदेशी टूरिस्ट हमसे पूछते हैं कि बीच की सफाई नहीं होती तो बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है। पहले हम गंदगी फैलाने वाले लोगों को टोकते थे, लेकिन अब हमने बंद कर दिया है। बाइक ऑन रेंट के मालिक डेविड मानते हैं कि पर्यटकों की वजह से गोवा की खूबसूरती प्रभावित हो रही है। वो कहते हैं, गोवा के बीच पहले कभी इतने गंदे नहीं रहते थे और न ही वहां पर शराब पीने की मनाही थी। गंदगी के चलते हम लोगों का बीच पर जाने का मन ही नहीं करता। जो विदेशी यहां आते हैं उनकी नजर में हमारे देश की क्या छवि बनती होगी इस बारे में कोई नहीं सोचता। अब जरूरत है कि बीच पर गंदगी फैलाने वालों से भारी जुर्माना वसूला जाए।

आप चौंक जाएंगे
लाइफ गार्ड आनंद कहते हैं, बाघा बीच पर पानी से आय दिन डायपर और सैनेटरी नैपकीन निकलते हैं। अब ये तो लोगों को नहीं सिखाया जा सकता कि ऐसी चीजों को डस्टबिन में फेंकना चाहिए। अगर आप साफ सफाई के वक्त बीच का नजारा देखें आपको विश्वास नहीं होगा कि कैसी कैसी चीजें लोग यहां छोड़ जाते हैं। पॉलिथीन और बीयर की बोतलें तो आम हैं। इतना ही नहीं लोगों को जिस काम को करने से मना किया जाता है, वही सबसे ज्यादा करते हैं। अगर उन्हें कहा जाए कि समुद्र में उस तरफ न जाएं, खतरा है तो वहीं जाएंगे।

मोदीजी हमारी तो टिप ही मारी गई

नोटबंदी से कालेधन वालों की कमाई पर असर पड़ा होगा या नहीं, कहना मुश्किल है, लेकिन वेटरों की जेब जरूर हल्की हो गई है। आलम ये है कि एक दिन में 1000-2000 रुपए की ऊपरी कमाई करने वाले वेटरों को बमुश्लिक 50-60 रुपए ही नसीब हो रहे हैं। 9 नवंबर के बाद से उन्हें टिप मिलना लगभग बंद हो गया है। दिसंबर से जनवरी तक का समय गोवा के वेटरों के लिए कमाई के लिहाज से सबसे अच्छा रहता है। लेकिन इस बार उनकी जेब खाली है। बात केवल छोटे रेस्त्रां या होटलों तक ही सीमित नहीं है, आलिशान होटलों में काम करने वाले वेटर भी मायूस हैं। पीक सीजन में गोवा में सैलानियों का जमावड़ा लगता है। भारी संख्या में यहां विदेशी पर्यटक भी आते हैं, ऐसे में वेटरों की कमाई का आंकड़ा भी ऊपर उठने लगता है। लेकिन कैश की किल्लत के चलते लोग टिप देने से बच रहे हैं।

मिल जाए तो किस्मत
कैंडोलिम बीच के पास स्थित होटल इन्फर्नो के मैनेजर का कहना है, डिमॉनिटाइजेशन से हमारी कमाई तो कम हुई ही है वेटरों को टिप मिलना भी बंद हो गया है। भारतीय हो या विदेशी टूरिस्ट टिप कोई दे ही नहीं रहा है। अगर किसी को मिल जाए तो वो उसकी किस्मत। वेटर डेविड ने कहा, हमारे यहां विदेशी टूरिस्ट ज्यादा आते हैं, पहले उनसे काफी अच्छी खासी टिप मिल जाया करती थी मगर अब सबकुछ बंद हो गया है। क्रिसमस या नए साल के मौके पर तो बहुत अच्छी कमाई होती थी।

निकलता नहीं पैसा
होटल कैकटस में बतौर वेटर काम करने वाले विनय ने कहा, मोदीजी के फैसले के चलते तो हमारी टिप बंद ही हो गई है सर। दिसंबर का समय तो हमारी कमाई का समय होता था। टूरिस्ट इस सीजन में ज्यादा आते हैं, इसलिए हमें टिप भी अच्छी खासी मिल जाती थी। कभी कभी तो एक दिन में 1000 रुपए तक मिल जाते थे, लेकिन अब तो कोई हमारे लिए पैसा निकालता ही नहीं। टूरिस्ट कार्ड से पहले भी पेमेंट करते थे, मगर टिप कैश में दे जाते थे।

खुद ही पूछ रहे
कैंडोलिम स्थित टीमा नामक रेस्त्रां के वेटरों ने टिप कमाने का अलग तरीका निकाला है। कार्ड से पेमेंट करने वाले पर्यटकों से वो खुद ही पूछ लेते हैं कि क्या आप कुछ टिप देना चाहते हैं, यदि व्यक्ति हां बोलता है तो टिप की राशि मिलाकर बिल बना दिया जाता है। कार्ड से पेमेंट के बाद वेटर मैनेजर से अपने हिस्से की राशि प्राप्त कर लेते हैं। वेटर विनय ने कहा, अब क्या करें सर, कई बार लोग खुद टिप देना चाहते हैं मगर कैश न होने के चलते वो ऐसा नहीं कर पाते। इसलिए हमने सोचा कि क्यों न ये तरीका अपनाया जाए। ऐसा करने से कुछ न कुछ टिप तो आ ही रही है, हालांकि पहले के मुकाबले आंकड़ा बेहद कम है।

बस, मुस्कुरा देते हैं
होटल पाम्स के एक वेटर के मुताबिक, टिप के रूप में मिलने वाली कमाई आधी से भी कम हो गई है। विदेशी सैलानी सबसे ज्यादा टिप देते थे, लेकिन अब वो बस मुस्कुरा देते हैं। देसी पर्यटकों से भी कुछ कमाई नहीं हो रही। पिछले साल मुझे इतनी टिप मिली थी कि एक नया फोन खरीद लिया था मगर इस बार तो जेब खाली है।

नोटबंदी ने फीकी की गोवा की चमक

  • पर्यटन विभाग के दावे खोखले
  • अधिकांश गोवा इलेक्ट्रॉनिक भुगतान से दूर

नए साल के स्वागत के लिए गोवा में सैलानियों का जमावड़ा लगने लगा है, लेकिन पहले जैसी रौनक नजर नहीं आ रही। आलम ये है कि पिछले साल के मुकाबले पर्यटन क्षेत्र से जुड़े व्यापारियों की कमाई का आंकड़ा इस बार आधे से भी कम है। खासकर उन व्यापारियों पर सबसे ज्यादा मार पड़ी है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे। दिसंबर से जनवरी तक गोवा में सबसे ज्यादा चहल पहल होती है। पीक सीजन में छोटे बड़े व्यापारी पूरे साल की कमाई कर लेते हैं, मगर नोटबंदी के साइड इफ्ेक्ट के चलते पर्यटन व्यवसाय की कमर टूट गई है। इस सीजन में भी गोवा के अधिकतर होटल, रेस्त्रां खाली पड़े हैं। जो देसी विदेशी सैलानी गोवा पहुंच भी रहे हैं, वो कैश की किल्लत के चलते इलेक्ट्रॉनिक भुगतान को तवज्जो दे रहे हैं। जिसका फायदा केवल सीमित वर्ग को हो रहा है, क्योंकि आज भी गोवा में अधिकतर व्यापारी नकदी पर ही निर्भर हैं। पर्यटन विभाग भले ही गोवा को कैशलेस सिटी घोषित कर रहा हो, मगर हकीकत इससे कोसो दूर है।

आधी हुई कमाई
goaकैंडोलिम बीच के पास स्थित रेस्त्रां इनफर्नो सैलानियों के बीच काफी लोकप्रिय है। नोटबंदी से पहले तक यहां इतनी भीड़ होती थी कि पर्यटकों को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता था। लेकिन आज यहां का नजारा काफी अलग है। अधिकतर कुर्सियां खाली पड़ी हुईं हैं। रेस्त्रां के मैनेजर ने कहा, डीमॉनिटाइजेशन के चलते हमारी कमाई आधी हो गई है। हम शुरू से ही डिजिटल पेमेंट स्वीकारते आ रहे हैं, लेकिन कैश में भुगतान करने वालों की संख्या ज्यादा ही रही है। दिसंबर की शुरुआत से ही हमारे यहां इतने सैलानी आते थे कि सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती थी। अब आप देख ही सकते हैं, मैं कितने आराम से बैठा हूं।

खाली कुर्सियां
इनफर्नो से कुछ ही दूरी पर टीमा नामक रेस्त्रां है। यहां ग्राउंड फ्लोर पर आपको बीयर का लुत्फ उठाते विदेशी सैलानी जरूर नजर आ जाएंगे, लेकिन यदि आप फर्स्ट फ्लोर पर बने रेस्टोरेंट में जाएं तो आपको खाली कुर्सियां ही नजर आएंगी। यहां के कर्मचारियों को डर है कि यदि हालात ऐसे ही बने रहे तो कहीं उन्हें नौकरी से हाथ न धोना पड़े। वेटर योगेश ने कहा, रेस्टोरेंट में काफी कम लोग आ रहे हैं। जो कुछ कुर्सियां भरती हैं, वो रात में ही भरती हैं। दिन में तो हमारे पास ज्यादा काम ही नहीं होता। पिछले साल दिसंबर में काफी भीड़ थी।

शैक भी बेजार
goaबीच पर बने शैक की बात करें तो यहां भी हालात कुछ अलग नहीं है। समुद्र की खूबसूरती को निहारते हुए पेट पूजा करने वालों की संख्या पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। अधिकांश जो सैलानी बीच पर आ रहे हैं, वो कुछ खाने पीने रेस्टबैड पर आराम फरमाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। बॉबी शैक में काम करने वाले पीटर ने कहा, अधिकतर पर्यटकों का यही सवाल होता है कि कार्ड चलेगा? चूंकि अब तक मशीन मिली ही नहीं है, इसलिए हमें मना करना पड़ता है। जो कुछ कमाई हो रही है वो सिर्फ रेस्टबैड से ही हो रही है। क्योंकि ये महज 100 रुपए घंटे में मिल जाता, तो सैलानियों को दिक्कत भी नहीं होती।

हर कोई त्रस्त
नुकसान केवल होटल या रेस्त्रां मालिकों को ही नहीं हुआ है। टैक्सी चलाने वाले, छोटा मोटा सामान बेचने वाले भी त्रस्त है। इन goaदिनों टैक्सी ड्राइवर जयेश का अधिकतर वक्त दोस्तों से बात करने में गुजरता है, जबकि पिछले साल तक उनके पास खाना खाने का भी वक्त नहीं रहता था। जयेश ने कहा, धंधा तो जैसे खत्म ही हो गया है। मापसा बस स्टैंड से कौंडोलिम बीच तक पहले दिन में 5 6 चक्कर लग जाते थे और एक ट्रिप के 500 रुपए मिलते थे। इसके अलावा साइट सीइंग से जो कमाई होती थी वो अलग। अब तो बमुश्किल एक दो चक्कर ही लग पा रहे हैं। कुछ ऐसी ही कहानी कैंडोलिम मार्केट में कपड़ों की दुकान चलाने वाले अल्ताफ की है। अल्ताफ मूलरूप से कश्मीर से हैं और पिछले कई सालों से गोवा में रह रहे हैं। उन्होंने कहा, कमाई तो बहुत कम हो गई है। समझ नहीं आ रहा कि खर्चे कैसे चलेंगे। हमने पीओएस मशीन के लिए अप्लाई किया है, लेकिन उसे आने में वक्त लगेगा।

क्या -क्या बंद होगा
goaकलंगुट बीच पर कपड़ों की दुकान चलाने वाले दिनेश कुमार का हाल भी अल्ताफ की तरह है। मूलरूप से उत्तर भारतीय दिनेश तंज भरे लहजे में कहते हैं, पता नहीं आने वाले दिनों में और क्या क्या बंद होगा। जिनका नाम लेकर नोटबंदी की गई उनकी सेहत पर कोई असर हुआ होगा या नहीं, ये हम नहीं जानते लेकिन हमारी स्थिति बहुत खराब हो गई है। पीक सीजन होने के बावजूद आप देख ही रहे हैं पूरी दुकान खाली पड़ी है। अब इससे ज्यादा और मैं क्या कह सकता हूं।

 

कभी ऐसा नहीं हुआ
जूलियट कार बाइक रेंटल के मालिक मिस्टर डिसूजा कहते हैं, आप देख सकते हैं मेरी सारी गाडि़यां यहीं खड़ी हैं। पिछले साल स्थिति ये थी कि मुझे अपने साथियों की गाडि़यां मांगनी पड़ी थीं। दिसंबर आधे से ज्याद गुजर गया है, लेकिन कमाई न के बराबर हुई है। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि मेरी एक भी गाड़ी किराए पर नहीं गई। देखते हैं आगे क्या होगा।

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