कहीं मोदीजी बैंक एग्जाम में फेल तो नहीं हुए थे?

नोटबंदी को पूरा एक महीना हो चुका है, लेकिन अब तक न तो आम आदमी की परेशानी कम हुई है और न ही बैंककर्मियों का बोझ। हालांकि ये बात अलग है कि सरकार की नज़र में गाड़ी पटरी पर लौटने लगी है। आम आदमी की तरह बैंककर्मी भी नोटबंदी को लेकर अलग अलग राय रखते हैं। कुछ को लगता है कि यह जल्दबाजी में लिया गया गलत फैसला है, जबकि कुछ इससे संतुष्ट हैं। modiवैसे एक बात है, जिसकर पर सभी बैंक वाले एकजुट नजर आते हैं, वो ये कि मोदी के सत्ता संभालते ही उनका काम कई गुना ज्यादा बढ़ गया है। पीएम मोदी ने अब तक जितनी भी महत्वकांक्षी योजनाओं की शुरुआत की है, उसका अमल में लाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बैंकों पर है। फिर चाहे, वो जनधन हो या मुद्रा योजना। बैंककर्मी तो मजाक में यहां तक कहने लगे हैं कि मोदीजी बैंकों से किसी पुरानी दुश्मनी का बदला निकाल रहे हैं।

कहीं ऐसा तो नहीं?
एक बैंककर्मी ने कहा, राष्ट्रीयकृत बैंकों में पहले से ही इतना स्टाफ नहीं है कि रोजाना का काम सुचारू ढंग से चल सके, ऐसे में नोटबंदी के बाद तो हमारी मुश्किलें कई गुना ज्यादा बढ़ गई हैं। काम इतना ज्यादा है कि उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। कुछ साथी तो तबीयत खराब होने के बावजूद कार्यालय आ रहे हैं, जबकि कुछ अत्याधिक काम के चलते अस्पताल पहुंच चुके हैं। अगर स्टाफ पर्याप्त हो तो अतिरिक्त बोझ भी सहन किया जा सकता, लेकिन यहां तो एक व्यक्ति को चार चार का काम करना पड़ रहा है। हम बैंककर्मी तो मजाक में एक दूसरे से यही कहते हैं कि मोदीजी शायद किसी बैंक एग्जाम में फेल हो गए होंगे या किसी बैंक वाले से उनका मनमुटाव होगा, जिसका बदला वो अब निकाल रहे हैं।

खुन्नस निकाल रहे?
एक अन्य बैंककर्मी ने कहा, लगता है कि मोदीजी किसी पिछले खुन्नस का बदला निकाल रहे हैं। पहले मुद्रा योजना का काम बैंकों को सौंप दिया फिर जनधन और अब नोटबंदी। जैसा आम लोगों को लगता है कि बैंककर्मियों के पास ज्यादा काम नहीं रहता, वैसा ही शायद सरकार को भी लगता है। तभी तो एक के बाद एक बोझ बढ़ाए जा रही है। स्थिति ये हो चली है कि हमारे पास न तो अपने और न अपने परिवार के लिए वक्त है। एक दिन, दो दिन, एक महीना तो अतिरिक्त काम किया जा सकता है, लेकिन हमारे लिए तो इस रात की सुबह ही नहीं हो रही।

क्या मैं देशद्रोही हूं?
बैंक में 15 साल गुजार चुकीं एक महिला कर्मी ने कहा, हमसब सरकार के साथ हैं, लेकिन इसके लिए अपने परिवार को तो दांव पर नहीं लगा सकते। हम महिलाओं को घर से निकलने से पहले नाश्ता, दोपहर का खाना बनाना होता है और वापस पहुंचकर रात का खाना, लेकिन इसे कोई ध्यान में रखना नहीं चाहता। एक पुरुषकर्मी अगर रात को देर से घर आता तो चल सकता है, पर यदि हम देर से पहुंचे तो बाकी काम कौन करेगा? नोटबंदी के बाद से तो हालात ये हो चली है कि खुद खाना खाने का वक्त नहीं मिलता, तो फिर बनाने की बात तो अलग है। अगर एक दिन की छुट्टी मांगों तो सीनियर ऐसे देखते हैं जैसे मैं कोई देशद्रोही हूं।

demo picवित्तमंत्रीजी दोहरा व्यवहार क्यों?
एक युवा बैंककर्मी को इस बात से शिकायत है कि एक तरफ सरकारी योजनाओं को बैंकों के माध्यम से लागू किया जा रहा है और दूसरी तरफ बैंककर्मियों से कहा जा रहा है कि वो खुद को सरकारी कर्मचारी न समझें। दरअसल, कुछ वक्त पहले वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि बैंककर्मी स्वयं को सरकारी कर्मचारी न समझें। बैंक स्टाफ का कहना है कि जब हम सरकारी कर्मचारी ही नहीं हैं, तो फिर सरकारी योजनाओं का बोझ हम पर क्यों लादा जा रहा है? युवा बैंककर्मी ने कहा, ज्यादा काम करने में परेशानी नहीं है, लेकिन उसको पहचान भी तो मिलनी चाहिए। जब हमारे हितों से जुड़े मुद्दों की बात आती है तो वित्तमंत्री जी हमें सरकारी कर्मचारी मानने से ही इंकार कर देते हैं। और जब योजनाओं को लागू करने का वक्त आता है तो हम सरकार के अपने हो जाते हैं, ये दोहरा व्यवहार क्यों?

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