किसकी किस्मत बदलेगा BIHAR?

बिहार विधानसभा चुनाव में भले ही अभी थोड़ा वक्त हो, लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल अपने चरम पर पहुंच गई है। संसद के हंगामेदार मानसून सत्र की समाप्ति के बाद तकरीबन सभी सियासी दल बिहार तक सीमित होकर रह गए हैं। बदले समीकरणों के लिहाज से यह चुनाव भाजपा, कांग्रेस, जेडीयू और राजद के लिए प्रतिष्ठा का विषय है। भाजपा को जहां यह साबित करना है कि वो नीतीश कुमार के बिना भी सरकार बना सकती है, वहीं यही स्थिति नीतीश की भी है। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में मिली सबसे बड़ी शिकस्त से बाहर निकलने के लिए बिहार में अच्छे प्रदर्शन की दरकरार है। इसी तरह, सालों तक बिहार को अपने इशारों पर नचाते रहे लालू प्रसाद यादव की राजनीति में वापसी भी इसी चुनाव पर टिकी biharहै। वैसे, राज्य की जनता के लिए यह समय ज्यादा विचार-विमर्श का है, क्योंकि उसने थोड़े से वक्त में दो बड़े सियासी बदलाव देखेे हैं। पहला, भाजपा-जेडीयू के 18 साल पुराने रिश्ते का तलाक और दूसरा, धुरविरोधी माने जाने वाले नीतीश और लालू का मिलन।  पिछले विधानसभा चुनाव तक जनता के सामने तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट थी, राजद को नापंसद करने वालों के पास जेडीयू और भाजपा का विकल्प था। चूंकि कांग्रेस अपने बलबूत BI में ज्यादा प्रभावी नहीं मानी जाती, इसलिए मतदाताओं ने भाजपा और जेडीयू पर भरोसा जताया। लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं। लालू का विरोध करने वाले नीतीश को वोट देंगे? या नीतीश के विरोधी लालू के पक्ष में वोट डालेंगे? क्योंकि दोनों ही स्थितियों में मतदाता किसी एक को सत्ता से बाहर रखने के अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएंगे, इसलिए यह सवाल सबके लिए अहम बना हुआ है। शायद यही वजह है कि नीतीश बीच-बीच में लालू पर अप्रत्यक्ष तौर पर कटाक्ष करते रहते हैं। भाजपा इस मिलन को अपने लिए फायदे के तौर पर देख रही है। गया और उसके बाद की प्रधानमंत्री की रैलियों में नीतीश-लालू गठजोड़ को जंगलराज पार्ट-2 की शुरुआत के तौर पर प्रचारित किया गया। लालू राज की कटू यादों को वर्तमान में सामने रखकर भाजपा जनता को यह बताने का प्रयास कर रही है, केवल वही उसके दुखों को हर सकती है। हालांकि, उसके पास बिहार को लेकर कोई रोडमैप नजर नहीं आता। लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने विकास के नाम पर लड़ा, महंगाई और दूसरे बड़े मुद्दों पर यूपीए की असफलता को उसने भुनाया, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका प्रभावशाली समाधान नहीं सुझा सकी। जिस तरह नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव से पूर्व रैलियों में देश के लिए विजन की बात किया करते थे, वो BIHAR को लेकर अब तक कहीं दिखाई नहीं दिया। भाजपा को खुद कहीं न कहीं इस बात का आभास है, इसलिए उसने अपने प्रचार अभियान का रुख नीतीश-लालू की तरफ मोड़ रखा है। नरेंद्र मोदी द्वारा नीतीश को लेकर दिए गए डीएनए वाले बयान से इसकी पुष्टि भी हो जाती है। हालांकि इस बयान को पार्टी के भीतर ही पसंद नहीं किया जा रहा।

कई नेता मानते हैं कि मोदी ने शब्द चयन में गलती की, जिसका फायदा विरोधियों को हो रहा है। वैसे, मोदी के इस बयान पर जिस तरह की त्वरित और तीखी प्रतिक्रिया लालू यादव की ओर से आई, वैसा कुछ नीतीश ने नहीं किया। उन्होंने बेहद चतुराई से इसे बिहारी अस्मिता और स्वाभिमान से जोड़ा और मोदी को 50 लाख बिहारियों के डीएनए सैंपल भेजने वाले अभियान की नींव रखी। चुनावी माहौल में हर बयान पर तीखी क्रिया-प्रतिक्रिया स्वभाविक है, लेकिन नीतीश इस बार थोड़ा संभलते हुए बोल रहे हैं। इसे आम आदमी पार्टी से उनकी नजदीकियों का परिणाम भी कहा जा सकता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अरविंद केजरीवाल पर लगातार हमले बोले, मगर आम आदमी पार्टी सकारात्मक प्रचार की राह पर आगे बढ़ती रही। जिसे जनता ने हाथों-हाथ लिया। नीतीश को लगता है कि संयमित वाणी बिहार को दिल्ली बना सकती है। हालांकि इसकी संभावना बेहद कम है। ये बात सही है कि आजकल के मतदाता साफ-सुथरी राजनीति के हिमायती है, लेकिन उत्तर प्रदेश और उसके जैसे दूसरे राज्यों की तरह बिहार में भी जातीय समीकरण हार-जीत तय करते हैं। बौद्धिक रूप से संपन्न होने के बावजूद, बिहार में जात-पात का प्रभाव कायम है और चुनाव में इसके असर से इंकार नहीं किया जा सकता। बिहार में पिछड़ी जाति और दलित वोटबैंक का खासा दबदबा है, इसके साथ ही अल्पसंख्यक समुदाय भी बदलाव की ताकत रखता है। दलित मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा के पास रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी जैसे चेहरे हैं। गया मांझी का इलाका है और यहां प्रधानमंत्री की रैली उन 28 प्रतिशत दलित मतदाताओं को लुभाने की कोशिश थी, जो कहीं भी जा सकते हैं। इसी तरह राज्यपाल के रूप में रामनाथ कोविद की नियुक्ति को दलितों पर पकड़ बनाने की भाजपा की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। कोविद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शुमार हैं। हालांकि राज्यपाल की नियुक्ति संवैधानिक होती है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले फैसला होने से सवाल उठना लाजमी है।

पार्टी अल्पसंख्यक वोटों में भी शहनवाज हुसैन के माध्यम से सेंध लगाने में जुटी है। किशनगंज, पूर्णिया, अररिया और कटिहार जिलों में अल्पसंख्यक मतदाता बड़ी संख्य़ा में हैं। अकेले किशनगंज में ही इनकी आबादी 70 फीसदी के आसपास है। जेडीयू, कांग्रेस और राजद भी इसी को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। वैसे तो अल्पसंख्यक समुदाय कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता है, मगर लोकसभा चुनाव ने इसamit-modi धारणा को काफी हद तक बदल दिया है। राज्य में जेडीयू और राजद अल्पसंख्यकों को रिझाने की अच्छी स्थिति में हैं। जेडीयू ने अल्पसंख्यक वोटों की खातिर ही लोकसभा चुनाव से पूर्व भाजपा से नाता तोड़ लिया था। हालांकि, ये बात अलग है कि उसे इसका कोई खास फायदा नहीं हुआ, लेकिन अगर विधानसभा चुनाव में थोड़ा बहुत फायदा भी पार्टी को होता तो भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। गुपचुप तरीके से कुछ सियासी पार्टियां आतंकवादी याकूब मेमन की फांसी को भी भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल कर रही हैं। भले ही प्रत्येक अल्पसंख्यक मतदाता याकूब को फांसी दिए जाने के विरोध में न हो, लेकिन ऐसे लोगों की तादाद कम भी नहीं है। अब तक के परिदृश्य को देखकर तो यही कहा जा सकता है कि बिहार चुनाव में विकास इस बार मुद्दा नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्रों के प्रस्तावित मॉडल, बिहारियों का पलायन सहित कई ऐसे गंभीर मुद्दे हैं, जिन पर बात होनी चाहिए थी, लेकिन सियासी दल अपनी कमजोरियां छिपाने के लिए एक-दूसरे पर उंगली उठा रहे हैं। जनता नेताओं के इस रुख को किस तरह स्वीकार करती है, ये अक्तूबर में ही पता चलेगा।

मुश्किल न बन जाएं मांझी

इस बार के चुनाव में नीतीश के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक चुके जीतन राम मांझी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। नीतीश खुद इस बात को मानते हैं कि मुख्यमंत्री बनने से मांझी का कद बढ़ गया है और इसका असर जेडीयू के महादलित वोटों पर भी पड़ेगा। उनके गठजोड़ को ये वोट केवल स्थानीय परिस्थितियों और उम्मीदवार के हिसाब से वोट मिलेंगे। राजनीति पंडित मानते हैं कि मंझी महादलितों को लुभा सकते हैं।  हालांकि मुसहरों की अपनी ताकत बिहार में केवल तीन से चार फीसदी के आसपास है। महादलितों की अन्य सामाजिक श्रेणियों में आने वाले वोटर किस हद तक उन्हें अपना नेता मानेंगे यह अभी तय होना बाकी है। वहीं, गया और बिहार के पूर्वी क्षेत्र में मुसहरों और भूमिहारों की बड़ी आबादी है, जो इस बार भाजपा का साथ दे सकते हैं। वैसे, मांझी का बढ़ा कद भाजपा के लिए मुश्किलें भी पैदा कर सकता है। मांझी की महत्वकांक्षाएं जगजाहिर हैं। फिलहाल उनके साथ 20 विधायक हैं, जो भाजपा से मोलभाव करने के लिए काफी हैं। संभावित खतरे को देखते हुए भाजपा के रणनीतिकार चाहते हैं कि इन विधायकों में से सात-आठ को भाजपा में लाया जाए। लेकिन ये काम इतना आसान नहीं होगा।

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