मिस्ड कॉल देने से क्या नदियां बचेंगी?

मिस्ड कॉल देने से क्या नदियां बचेंगी?

नीरज नैयर

दम तोड़ रहीं नदियों को बचाने के लिए बीते दिनों एक नए तरह का अभियान छेड़ा गया. नया इसलिए कि आप मिस्ड कॉल के ज़रिए या नीले कपड़े पहनकर भी इस अभियान से जुड़ सकते थे और नदियों को बचाने की अपनी प्रतिबद्धता को दर्शा सकते थे. हर रोज़ सैंकड़ों लोग इस मुहिम में शरीक हुए और अभियान की समाप्ति से पहले तो सोशल मीडिया पर इससे जुड़ने संबंधी संदेशों की बाढ़ आ गई. इस अभियान का ख़ाका ईशा फाउंडेशन ने तैयार किया है और इसकी कमान आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव के हाथों में है. उन्होंने स्वयं कन्याकुमारी से हिमालय तक रैली निकालकर लोगों को जागरुक किया. अभियान को मिले भारी समर्थन को लेकर गुरूजी खुश हैं, और मिस्ड कॉल देने वाले या नीले कपड़े पहनने वाले भी संतुष्टि का अनुभव कर रहे हैं कि उन्होंने प्रकृति के लिए कुछ तो किया. लेकिन क्या वास्तव में उन्होंने प्रकृति के लिए कुछ किया है? क्या मिस्ड कॉल देने, यात्रा निकालने या नीले वस्त्र धारण करने से नदियों को बचाया जा सकता है? अब इसे समझ कि कमी कहें या कुछ और कि हम अपनी अकर्मण्यता को छुपाने के लिए ऐसे अभियानों में शामिल होकर स्वयं अपनी पीठ थपथपा लेते हैं, जहां हमें कुछ नहीं करना होता. यदि मिस्ड कॉल देने या रैलियां निकालने से समस्या सुलझती, तो आज हमारा देश समस्या विहीन हो गया होता, क्योंकि रैलियां निकालना हमारे यहां फैशन बन गया है और इस फैशन की आड़ में कई लोग अपनी दुकान चला रहे हैं. जब वासुदेव महाराज गाड़ी में सवार होकर जागरूकता फैला रहे थे, तब गणेशोत्सव और दुर्गापूजा के दौरान आस्था के नाम पर नदियों को दूषित किया जा रहा था और ऐसा करने वालों में वो लोग भी शामिल रहे होंगे, जो मिस्ड कॉल देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर चुके थे.

गलत दिशा, गलत कदम
इस अभियान का समर्थन करने वाले अधिकतर लोगों का तर्क है कि ‘कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है’. बात बिल्कुल सही भी है, यदि हम कदम ही नहीं बढ़ाएंगे, तो मंजिल तक पहुंचेंगे कैसे. मगर क्या गलत दिशा में कदम आगे बढ़ाकर मंजिल तक पहुंचा जा सकता है? अगर नदियों को बचाने की पहल करनी ही है, तो पहले उन्हें प्रदूषित न करने का प्रण लीजिए. ऐसा नहीं हो सकता कि आप नदियों को कूड़ाघर बनाते रहें और उम्मीद करें कि सरकार आपके मिस्ड कॉल पर उन्हें साफ़ करने के लिए विवश हो जाए. कुछ समय पहले हुए एक अध्धयन के मुताबिक अकेले दिल्ली स्थित धार्मिक स्थलों से ही तकरीबन 20,000 किलोग्राम फूल रोजाना निकलते हैं और उनका 80 प्रतिशित हिस्सा यमुना में बहा दिया जाता है. देश की छोटी-बड़ी हर नदी आस्था के इस अन्धविश्वास की कीमत चुका रही है. अकेले गंगा में ही प्रतिदिन 2 करोड़ 90 लाख लीटर से ज्यादा कचरा गिरता है, जिसमें आस्था के नाम पर बहाई जाने वाली सामग्री भी शामिल है. इतना ही नहीं लंदन की टेम्स नदी भी कुछ वक्त पहले तक भारतियों की आस्था की आग में जल रही थी. हालांकि सरकार की कड़ाई और लोगों की इच्छाशक्ति से अब वहां के हालात सुधारने लगे हैं. सद्गुरु जग्गी वासुदेव और उनके अनुयायियों का मानना है कि जागरुकता फैलाकर नदियों को नष्ट होने से रोका जा सकता है. लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि हालात अब जागरुकता के दायरे से बाहर निकल गए हैं. लोग जागरुक भी उन मुद्दों के प्रति होना चाहते हैं, जहां उन पर कोई रोक-टोक न हो. आज के वक़्त में जागरुकता से कुछ होने वाला नहीं है. सरकार और पुलिस से लेकर तमाम संस्थाएँ यातायात नियमों के पालन के लिए जागरुकता फैलाते रहते हैं, लेकिन फिर भी उनका उल्लंघन सबसे ज्यादा होता है. जबकि यह मुद्दा प्रत्यक्ष तौर पर लोगों के जीवन और मौत से जुड़ा है. जब लोग अपने जीवन के लिए जागरुक नहीं होना चाहते तो उनसे नदियों को बचाने के लिए जागरुक होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है.

जानते हैं, मानते नहीं
ऐसा नहीं है कि लोग नदियों में कचरा फेंकने के दुष्प्रभाव से परिचित नहीं हैं, वे सब जानते हैं, लेकिन मानना नहीं चाहते. ऐसी स्थिति में जागरुकता फैलाने की नहीं बल्कि जबरन जागरुक किए जाने की ज़रूरत है. जिस तरह चौराहे पर पुलिसकर्मी को देखकर चालान से डर से नियम मानने की आदत विकसित हो जाती है, ठीक वैसे ही यदि नदियों में आस्था के नाम पर कचरा फेंकने वालों को भारी जुर्माने का भय दिखाया जाए तो थैलियां लेकर घाटों पर जाने वालों की संख्या अपने आप कम हो जाएगी. इसलिए मिस्ड कॉल देकर, रैलियां निकालकर और नीले वस्त्र धारण करके अगर आप समझते हैं कि लोग जागरुक हो जाएंगे और सरकार मुस्तैद, तो आप पूरी तरह गलत हैं. नदियों को स्वांग की नहीं काम की ज़रूरत है, जितनी जल्दी हम यह समझ लें उतना ही अच्छा है.

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One Comment

  • Good article. I hope citizens get the important message this article has conveyed and do something tangible to save the rivers .

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