सालों तक चाकरी की, अब कैसे करेंगे दूसरा काम?

  • सीआरबी के आदेश से कुछ रेलकर्मी परेशान….

रेलवे बोर्ड चेयरमैन (CRB) अश्विन लोहानी के आदेश के बाद अफसरों के घरों में चाकरी कर रहे रेल कर्मचारियों को उनके मूल काम पर लौटाया जा रहा है. इस आदेश से जहां कुछ कर्मचारी खुश हैं, तो वहीं कुछ की परेशानियां बढ़ गई हैं. अपने सेवाकाल का आधे से ज्यादा समय चाकरी में गुजारने वाले कर्मी सबसे ज्यादा परेशान हैं, क्योंकि उनके लिए अब मैदान में उतरकर मोर्चा संभालना आसान नहीं होगा. हाल ही में जब पुणे मंडल के एक ही डिपो के 38 कर्मचारियों को अफसरों के घर से बाहर निकाला गया, तो कुछ ने साफ़ तौर पर अपनी नाराज़गी बयां की. कुछ महिला कर्मियों के कहा, “हम सालों से अफसरों के घरों में काम कर रहे हैं और अब हमसे गैंगमैन का काम करने को कहा जा रहा है. आप ही बताएं हम यह कैसे कर सकते हैं”?

तो पहले क्यों भेजा?
एक महिला कर्मचारी ने कहा, “हमसे पहले अफसरों के यहां काम क्यों करवाया गया, ये सवाल हमारी विभाग प्रमुख से पूछा जाना चाहिए. सालों से हम नौकर का काम कर रहे हैं, क्या अब हमारा शरीर गैंगमैन जैसा भारी-भरकम काम कर पाएगा”?

अब वापस नहीं जाएंगे
एक अन्य कर्मी ने कहा, “हमने अधिकारियों से साफ़ कह दिया है कि अगर हमसे वापस चाकरी करवाई गई, तो हम सीधे सीआरबी से शिकायत करेंगे. आखिरी अधिकारियों ने हमें समझ क्या रखा है, जब चाहा, जैसे चाहा काम पर लगा दिया. पहले हमसे सालों तक नौकरों जैसा काम करवाया गया, और अब जब हम अपना मूल काम भूल चुके हैं, तो हमसे वही करने को कहा जा रहा है. इस तरह का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जाएगा”.

अफसरों की चाकरी से मिली आज़ादी!

सीआरबी की सख्ती दिखा रही रंग: पुणे मंडल के एक ही डिपो से 38 रेलकर्मी मूल काम पर लौटे

रेलवे बोर्ड के चेयरमैन (सीआरबी) अश्विन लोहानी की सख्ती रंग दिखाने लगी है. सालों तक अधिकारियों के घरों में नौकर बनकर रहे रेलकर्मी अब अपनी यूनिटों में वापस लौट रहे हैं. पुणे मंडल से भी काफी कर्मचारियों को उनकी सही जगह पहुंचाया गया है. सूत्रों के अनुसार मंडल के एक ही डिपो से तकरीबन 38 कर्मी अपने मूल काम पर वापस लौटे हैं. पीडब्लूआई के इन कर्मचारियों में गैंगमैन के साथ-साथ समूह डी के अन्य कर्मी भी शामिल हैं. हालांकि अभी भी कई विभागों से कर्मचारियों का बाहर आना बाकी है. एक वरिष्ठ अधिकारी की मानें तो सीआरबी के आदेश पर पुणे मंडल में 50 फीसदी ही अमल हुआ है.

एक अधिकारी-6 कर्मचारी
एक अनुमान के मुताबिक पुणे मंडल में क्लास 4 अधिकारियों की तादाद 4000 के आसपास है. सूत्र बताते हैं कि एक वरिष्ठ अधिकारी के घर पर 5 से 6 रेलकर्मियों को काम पर लगाया जाता है. इस लिहाज से देखें, तो रेल स्टाफ का एक बड़ा हिस्सा मूल काम के बजाए अफसरों की चाकरी करने में लगा हुआ है. यह दास प्रथा कमर्शियल, पर्सनल, इलेक्ट्रिकल, इंजीनियरिंग, मैकेनिकल, एसएनटी, लोको और आरपीएफ से लेकर रेलवे के हर विभाग में मौजूद है.

राजपाट खोने का डर
मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, एक ही डिपो से 38 कर्मचारियों का बाहर आना दर्शाता है कि कितनी बड़ी तादाद में रेल कर्मियों को नौकर बनाकर रखा गया है. वैसे अभी भी 40-50 फीसदी कर्मचारियों को ही चाकरी से मुक्त किया गया है. आप संगम पार्क जाकर देखें असलियत अपने आप सामने आ जाएगी. अगर सभी कर्मचारी अपने मूल काम पर लौट गए तो अफसरों का राजपाट कैसे चलेगा, शायद इसीलिए वापसी की रफ़्तार धीमी है.

तो हो कार्रवाई
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष हर्षा शाह ने कहा, कर्मचारियों से नौकरों की तरह काम कराने का अधिकार अफसरों को किसने दिया? जो अधिकारी सीआरबी के आदेश के बावजूद नहीं सुधर रहे हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. गैंगमैन या सुरक्षा से जुड़े दूसरे कर्मचारियों को यदि पहले ही उनके मूल काम पर भेज दिया गया होता, तो शायद कई हादसों को रोका जा सकता था.

हर्षा शाह: रेलवे के नाम की जिंदगी

  • रेलमंत्री ने भी काम को सराहा

जून में पुणे और मुंबई के बीच दौड़ने वाली डेक्कन एक्सप्रेस का जन्मदिन मनाया गया. यूं तो हर साल ही इस मौके पर केक काटकर ख़ुशी बयां की जाती है, लेकिन इस बार का जन्मदिन कुछ ख़ास रहा, ख़ास इस लिहाज़ से कि पहली बार किसी रेलमंत्री ने न सिर्फ आयोजन को सराहा बल्कि उस हस्ती के सम्मान में कुछ शब्द भी कहे, जो असल मायनों में इस परंपरा की जननी है. 70 वर्षीय हर्षा शाह पिछले कई सालों से डेक्कन क्वीन का जन्मदिन मानती आ रही हैं, विशेष बात यह है कि इस आयोजन के सभी इंतजाम वो स्वयं करती हैं, मसलन, केक की व्यवस्था करना, अतिथियों को निमंत्रण भेजना. शुरुआत में यह आयोजन महज कुछ यात्रियों की मौजूदगी में केक काटने भर तक ही सीमित था, लेकिन अब पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर जैसी सम्मानित हस्तियां इसका हिस्सा बन रही हैं. वैसे बात केवल जन्मदिन मनाने की ही नहीं है, हर्षा का जीवन पूरी तरह से रेलवे के लिए समर्पित है. चाहे बात यात्रियों की शिकायत की हो, रेलकर्मियों की परेशानी की या फिर रेलवे में सुधार की, वो हर पल मुस्तैद रहती हैं. हर्षा की लोकप्रियता का आलम यह है कि उन्हें न केवल पुणे बल्कि सेंट्रल रेलवे का हर छोटा-बड़ा अधिकारी जानता है. स्थानीय मीडिया में वो ‘रेलवे वाली आंटी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं.

हर्षा का रेलवे से रिश्ता दशकों को पुराना है. बचपन में वो अपने पिता के साथ अक्सर पुणे-मुंबई के बीच अप-डाउन किया करती थीं. उस दौर के अनुभवों ने उनके मन में रेलवे के प्रति प्रेम जागृत किया, जो अब तक कायम है. हर्षा रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष और एकमात्र सदस्य भी हैं, इस ग्रुप की स्थापना उन्होंने ही की थी. यह ग्रुप न सिर्फ यात्रियों की आवाज़ बुलंद करता है, बल्कि रेल कर्मियों की समस्याओं से भी उच्च अधिकारियों को अवगत कराता है. उम्र के इस पड़ाव में भी हर्षा हर रोज़ पुणे रेलवे स्टेशन का एक चक्कर लगाना नहीं भूलतीं फिर चाहे आंधी आए या तूफान. शायद यही वजह है कि रेलकर्मियों में उनके प्रति सम्मान भी है और भय भी. भय इसलिए कि यदि उनका कोई गलत काम हर्षा की नज़र में आ गया, तो फिर बचना मुश्किल है.

अपने खर्चे पर सेवा
वैसे तो रेलवे में सुधार के नाम पर कई प्रवासों ग्रुप अस्तित्व में हैं, लेकिन यह हर्षा की निस्वार्थ सेवा ही है कि रेलमंत्री रहते हुए सुरेश प्रभु ने अपने वीडियो संदेश में उनकी सराहना की. रेलवे प्रवासी ग्रुप को किसी तरह की वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं होती, हर्षा अपने खर्चे से ही इसे चला रही हैं. रेल बजट के दिनों में हर्षा की सक्रियता काफी बढ़ जाती है. पुणे को नई ट्रेन दिलवाने या किसी ट्रेन के फेरे बढ़वाने के लिए हर्षा दिल्ली के चक्कर लगाने से भी गुरेज नहीं करतीं.

आवारा कुत्तों को दिया आसरा
वैसे हर्षा का प्यार केवल रेलवे तक ही सीमित नहीं है, उनके दिल में बेजुबान जानवरों के लिए भी अथाह प्यार है. उन्होंने अपने घर में 6 आवारा कुत्तों को आसरा दिया हुआ है, जिनकी वो अपने बच्चों की तरह देखभाल करती हैं. हर्षा को अगर सड़क पर कोई घायल जानवर दिख जाए तो उसका इलाज कराए बिना वो आगे नहीं बढ़तीं. उन्होंने रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स के डॉग स्क्वायड की बेहतरी के लिए भी काफी काम किया है. वो इस संबंध में अधिकारियों से लगातार बात करती रहती हैं. उनका कहना है कि काम के हिसाब से स्क्वायड में कुत्तों की संख्या कम है, और जब तक यह संतुलन बन नहीं जाता वो प्रयास करती रहेंगी.

 

1,2500 CCTV will not help to curb traffic menace!

Different Angle by Anuj Ismail, Canada.

With the commencement of 1,250 CCCTV in place to take down the traffic violators in the city of Pune and PCMC, the question is will this make the road safe for the citizens? Merely 35 traffic police officials are watching more than 30 Lakh vehicles plying on road is that sufficient enough to monitor the traffic menace in the city and catch hold of the traffic violator?

Traffic law enforcement has been one of the major hurdles for the city traffic police department for a decade, with the increasing number of driving license issued and new vehicle registration (add how many vehicle and license are registered everyday). With the new e-chalan system wherein the traffic offender is sent a sms along with the picture of the traffic rules been violated.

On an average around 3,000 e-chalan are been issued everyday with the number of repeat offenders since March 2017 traffic police department has served more then 3,13,538 number of e-chalan to repeat offender and the repeat offenders for more than five offence will now be facing court if they do not pay their fine on time.
The most essential this is that the city drivers have to change their attitude toward driving, it has to come from every individual. No one bothers give the right of way to ambulance and fire brigade which are the emergency services. Everyone is in a hurry to reach their respective destination but no one care that the patient in the ambulance is in critical condition and need immediate medical attention.

In Canada every emergency vehicle is given the right of way, commuters stop and gives way to the emergency vehicle like ambulance, fire truck and police cars. Besides introducing the new CCTV and e-chalan someone has to work on the mindset of the commuters. Instead of sending court notice to the repeat traffic offenders, send them a warning letter and suspend the driving license, any offender that has more than three traffic violation offence in 3 months should undergo a refresher course for safe driving.

It is about time that India should implement driver safety rating program with the rating system that will determine how safe the driver is to drive on the road. There has to be a rating system for the number of offence and severity of the offence. City traffic police department along with the Regional Transport office should also introduce driving license fees and vehicle premium (insurance). The number of offence will result in paying more premiums each month.  Driver’s license should be renewed once in 12 months along with the vehicle insurance, this will refrain reckless drivers and force them to drive with caution and force them to obey the law. It is essential that driver should have sense of fear in their mind that someone is watching me I have to drive safe.

ट्रेनिंग के बजाए करवाते थे अफसरों की चाकरी, रेलकर्मी की मौत!

पुणे: दास प्रथा भले ही गुज़रे जमाने की बात हो गई हो, लेकिन रेलवे में यह अब भी मौजूद है. यहां कर्मचारियों को वो सब करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसका उनके ड्यूटी मैन्युअल से कोई नाता नहीं. अगर कोई कर्मचारी इसके खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है. हाल ही में इस प्रथा के चलते ब्रिजेश कुमार नामक रेलकर्मी की मौत हो गई. आरोपों के मुताबिक ट्रेनिग पर आए ब्रिजेश से मंडल रेल अधिकारी (डीआरएम) के बंगले की चाकरी करवाई जा रही थी.

मूलरूप से बिहार निवासी ब्रिजेश ट्रैक मैन की ट्रेनिंग के लिए पुणे आया था. लेकिन ट्रेनिंग के अलावा उससे दूसरे काम ज्यादा करवाए जाते थे, मृतक ने अपने परिजनों से कई बार इसका जिक्र भी किया था. ब्रिजेश की प्रताड़ना का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि वो नौकरी छोड़ने का मन भी बना चुका था, मगर पारिवारिक मज़बूरियों के चलते ऐसा नहीं कर सका.

खाना भी नहीं खाने दिया
जानकारी के मुताबिक 29 मार्च को ब्रिजेश सहित कुछ कर्मचारियों को संगम पार्क स्थित डीआरएम आवास लाया गया. यहां उनसे मोटी-मोटी लकड़ियों को दीवार के दूसरी तरफ फेंकने आदि काम करवाए जा रहे थे, तभी ब्रिजेश की तबीयत ख़राब हो गई. साथी कर्मचारी उसे रेलवे अस्पताल लेकर गए, जहां से दवाइयां देकर उसे वापस काम पर भेज दिया गया. हालांकि ब्रिजेश की तबीयत सुधरने के बजाए बिगड़ती गई और उसने 13 अप्रैल को हड़पसर स्थित नोबल अस्पताल में दम तोड़ दिया.   ब्रिजेश के एक सहकर्मी ने बताया कि उन्हें ट्रेनिंग के तुरंत बाद काम पर लगा दिया गया था, ब्रिजेश को तो खाना खाने का समय भी नहीं मिला था. पीड़ित पक्ष का कहना है कि डॉक्टरों ने मौत की वजह भूखे पेट अत्यधिक भारी काम करना बताई थी, हालांकि नोबल अस्पताल के अनुसार, मौत एक्यूट पैन्क्रियाटाइटिस और कई मल्टी ऑर्गन फेलियर से हुई. बहरहाल मौत की वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इतना साफ़ है कि ब्रिजेश और अन्य कर्मचारियों को नियम विरुद्ध काम करवाकर प्रताड़ित किया जा रहा था.

‘काम तो करना ही होगा’
ट्रेनिंग पर आने वालों को सीमेंट के बोरे ढोने से लेकर हर तरह से छोटे-बड़े काम करवाए जाते हैं, अधिकांश कर्मचारी ख़ामोशी से इसके लिए तैयार भी हो जाते हैं, क्योंकि वे अपनी नौकरी से हाथ धोना नहीं चाहते. ब्रिजेश के साथ ट्रेनिंग ले रहे एक कर्मचारी के मुताबिक, “वरिष्ठ अधिकारियों के स्पष्ट निर्देश हैं कि जो कहा जाएगा करना होगा. हमसे नौकरों की तरह काम करवाया जाता है. अधिकारी अपनी ज़रूरतों के हिसाब से हमारा इस्तेमाल करते हैं.”

रेलवे का इंकार
पुणे मंडल के जनसंपर्क अधिकारी मनोज झवर ने आरोपों से इंकार करते हुए कहा, “किसी भी कर्मचारी से इस तरह काम नहीं कराया जा सकता. जहां तक बात ब्रिजेश कुमार की है, तो उसे डीआरएम निवास लाया ही नहीं गया.”

पर पुख्ता हैं सबूत
रेलवे भले ही पूरे मामले से पल्ला झाड़ रहा हो, लेकिन कई कर्मचारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि ब्रिजेश और अन्य कर्मियों को घटना वाले दिन डीआरएम आवास पर काम करवाने लाया गया था. आज का खबरी के पास इस बातचीत की रिकॉर्डिंग भी मौजूद है. कर्मचारियों का यहां तक कहना है कि इंकार करने पर उन्हें न सिर्फ धमकी दी गई बल्कि यह भी कहा गया कि ये तो महज़ शुरुआत है.

सब जानते हैं अफसर
पुणे रेल मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि रेलवे में बड़े पैमाने पर कर्मचारियों का शोषण हो रहा है. खासकर निचले स्तर के कर्मचारियों को अफसरों के घरों में नौकर की तरह काम करवाया जाता है. कागजों पर कुछ दर्शाया जाता है और हकीकत कुछ और होती है. दिल्ली-मुंबई में बैठे वरिष्ठ अधिकारी भी इस दास प्रथा से वाकिफ हैं, लेकिन कुछ नहीं करते क्योंकि वे खुद भी किसी न किसी रूप में इसका हिस्सा हैं.

कैसे चलेगा घर?
ब्रिजेश घर में एकलौता कमाने वाला था, उसकी मौत के बाद परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया है. ब्रिजेश के दो छोटे भाई हैं. बेटे की मौत के बाद से मां सदमे में है और भाइयों का रो-रोकर बुरा हाल है. वैसे तो नियमानुसार ब्रिजेश के भाई को नौकरी मिलनी चाहिए, लेकिन वो  प्रशिक्षण अवधि में था, इसलिए इस पर संशय बना हुआ है. हालांकि इस संबंध में मनोज झवर ने कहा, ब्रिजेश की मौत ऑन ड्यूटी नहीं हुई है, फिर भी रेलवे उसके परिवार की सहायता के लिए हर संभव प्रयास करेगा.

कैसे सुरक्षित होगा सफ़र?
एक तरफ रेलमंत्री सफ़र को सुरक्षित बनाने पर जोर दे रहे हैं और दूसरी तरफ उन कर्मचारियों से वरिष्ठ अधिकारियों के घर की चाकरी करवाई जा रही है, जिन पर सफ़र को सुरक्षित बनाने की ज़िम्मेदारी है. ब्रिजेश ट्रैक मैन की ट्रेनिंग के लिए पुणे आया था. ट्रैक मैन सुरक्षित रेल सफ़र की महत्वपूर्ण कड़ी है, क्योंकि ट्रैक की देखरेख का ज़िम्मा उसी पर होता है. ऐसे में सवाल उठाना लाज़मी है कि क्या रेलवे वास्तव में सुरक्षित सफ़र के प्रति गंभीर है? यदि सरकार रेलवे में बदलाव चाहती है, तो उसे सबसे पहले इस दास प्रथा को ख़त्म करना होगा.

होनी चाहिए जांच
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष हर्षा शाह ने इस संबंध में कहा, अगर आरोप सही हैं, तो यह बेहद गंभीर मामला है. सेंट्रल रेलवे को इसकी निष्पक्ष जांच करवानी चाहिए. डीआरएम हो या कोई अन्य अधिकारी किसी को भी इस तरह कर्मचारियों से काम करवाने का अधिकार नहीं है.

बदली-बदली नज़र आ रही हैं सड़कें

  • यातायात व्यवस्था: नए-नए प्रयोग कर रहा चर्तुःश्रृंगी ट्रैफिक डिवीज़न

पुणे में ट्रैफिक की समस्या आम है और इससे निपटने के लिए पुलिस नए-नए प्रयोग करती रहती है. कभी किसी मार्ग को वन-वे कर दिया जाता है, तो कभी वन-वे में ढील दे दी जाती है. चर्तुःश्रृंगी डिवीज़न भी बीते कुछ समय से अपने क्षेत्र की यातायात व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए नित नए कदम उठा रहा है. हाल ही में यहां प्रमुख सड़कों को नया रूप दिया गया है, साथ ही कई जगहों पर डिवाइडर भी बनाए गए हैं. ख़ास बात यह है कि सीमेंट के मोटे डिवाइडरों के बजाए प्लास्टिक के पतले डिवाइडरों को तवज्जो दी गई है. जिसके चलते बेवजह का जाम नहीं लगता. कुछ वक़्त पहले यूनिवर्सिटी रोड पर लेन सिस्टम निर्धारित किया गया था. हालांकि बीआरटी की वजह, फ़िलहाल वहां के हाल ख़राब हैं.

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चमकीं सड़कें
चर्तुःश्रृंगी डिवीज़न के तहत आने वालीं कई सड़कों पर लेन पेंट की गईं हैं. ताकि चौराहों पर वाहनों की बेवजह होने वाली भगदड़ को कम किया जा सके. पुलिस का कहना है कि इससे वाहन चालकों में अनुशासन बनाए रखने में भी मदद मिलेगी. एसबी रोड, पत्रकार नगर, बाणेर फटा सहित कई मार्गों पर लेन पेंट की गई हैं. ख़ास बात ये है कि पुलिस के इस कदम को न केवल सराहना मिल रही है बल्कि काफी हद तक वाहन चालक इसका पालन भी कर रहे हैं.

जाम से मुक्ति
औंध रोड पर ब्रेमेन चौक से वाकड जाने वाला मार्ग काफी व्यस्त है. यहां अक्सर जाम जैसे हालात पैदा हो जाते थे. इसकी वजह थी सांगवी और औंध को जोड़ने वाली सड़क से आने वाला ट्रैफिक. दरअसल सांगवी के ब्रिज पर जाम होने की स्थिति में वाहन चालक कनेक्टिंग रोड से सीधे यहां पहुंचते थे और आगे बढ़ने की जल्दबाजी में जाम लग जाता था. जब से इस मार्ग पर डिवाइडर लगाए गए हैं, तब से हालात काफी हद तक सुधार गए हैं.

क्या कहते हैं लोग

आईटी कर्मी अनुज कुलकर्णी ने कहा, डिवाइडर बनने से काफी राहत है. पहले स्थिति ये थी कि कभी भी जाम लग जाता था. मेरी पुलिस से गुजारिश है कि इस पूरी रोड पर जहां तक संभव हो डिवाइडर लगाए जाने चाहिए. डिवाइडर से एक तो बेवजह का जाम नहीं लगता, दूसरा एक दूसरे से आगे निकलने की जल्दबाजी से होने वाले एक्सीडेंट में भी कमी आती है.

बैंक कर्मी अतुल परमार ने कहा, टू-व्हीलर के लिए जिस तरह का लेन सिस्टम यूनिवर्सिटी रोड पर बनाया गया था, उसे बाकी जगहों पर भी अमल में लाया जाना चाहिए. इसके अलावा पुलिस को उन चालकों के खिलाफ कार्रवाई भी करनी चाहिए जो इसका उल्लंघन करते हैं.

प्राइवेट कर्मचारी अर्पणा सिंह ने कहा, लेन पेंट करना अच्छा कदम है. अगर हम सभी इसका पालन करें तो ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति पैदा ही नहीं होगी. यूनिवर्सिटी रोड के बारे में कहना चाहूंगी कि ट्रैफिक सिग्नल काम न करने की स्थिति में पुलिसकर्मी काफी देर तक एक साइड का ट्रैफिक रोक लेते हैं, जिसकी वजह से दूर तक जाम लग जाता है. कभी-कभी तो 10-10 मिनट तक ट्रैफिक रोका जाता है. अधिकारियों को इस पर भी ध्यान देना चाहिए.

VIDEO: पलक झपकते ही आ गई मौत

तेज़ रफ़्तार कार ने पुणे के बाणेर कई लोगों को अपना निशाना बनाया. कार की रफ़्तार इतनी ज्यादा थी कि वो डिवाइडर पर खड़े लोगों को रौंदते हुए आगे निकल गई. देखें VIDEO:

टीसी ने यात्री को मारे थप्पड़!

  • पुणे रेलवे स्टेशन की घटना, TC के बचाव में उतरा रेलवे.
पुणे रेलवे स्टेशन पर एक टीसी द्वारा यात्री से मारपीट का मामला सामने आया है। ‘आज का खबरी’ के पास इस घटना का वीडियो में जिसमें साफ तौर पर नजर आ रहा है कि पहले एक युवा टीसी बिना उकसावे के यात्री को थप्पड़ मारता है उसके बाद वहां मौजूद आरपीएफ कर्मी भी उसके साथ मारपिटाई करता है। हालांकि रेलवे का कहना है कि उक्त यात्री ने पहले टीसी के साथ बदसलूकी की थी। जानकारी के मुताबिक एक फरवरी रात 12.30 बजे के आसपास टिकट चेकिंग स्टाफ ने यात्री को प्लेटफॉर्म नंबर 6 से पकड़ा। इसके बाद उसे डीसीटीआई कार्यालय लेकर लाया गया और यहां उसके साथ मारपीट की गई। जबकि, रेलवे का कहना है कि यात्री से जब टिकट दिखाने को कहा गया तो उसने न केवल गालीगलौच की बल्कि टीसी की शर्ट भी फाड़ दी।
गलती उसकी थी पर हाथ उठाना गलत
सीनियर डिविजनल कमर्शियल मैनेजर क्रिष्णनथ पाटिल ने कहा, “उक्त यात्री के पास मान्य टिकट नहीं थी, जब टीसी ने उसे जुर्माना भरने को कहा तो उसने गालियां देना शुरू कर दिया। इसके बाद उसे टीसी ऑफिस लाया गया, यहां भी उसने रेलवे स्टाफ के साथ बदसलूकी की। हालांकि बाद में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने लिखित माफी मांगी”। पाटिल का भी मानना है कि इस तरह टीसी का हाथ उठाना गलत है। उन्होंने कहा, हमने टीसी को इस बारे में हिदायत दे दी है।
आम हैं घटनाएं
एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, “पुणे स्टेशन पर इस तरह की घटनाएं आम हैं। खासकर देर रात यात्रा करने वालों के साथ रेलवे स्टाफ और पुलिसकर्मी सबसे ज्यादा बदसलूकी करते हैं। यात्रियों से मोबाइल दिखाने को कहा जाता है और गलती से उसमें कोई अश्लील वीडियो क्लिप मिल गई तो जबरन वसूली की जाती है। जो पैसे देने से इंकार करता है उसके साथ मारपीट होती है”।
छोड़ा क्यों, कार्रवाई करते
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्षा हर्षा शाह ने कहा, “अगर यात्री ने बदसलूकी की थी तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए थी, ताकि भविष्य में लोगों को सबक मिल सके। महज माफीनामा लेकर उसे छोड़ना समझ से परे है। जहां तक बात टीसी द्वारा हाथ उठाए जाने की है तो वो बिल्कुल गलत है। सरकारी अधिकारी को इस तरह अपना आपा नहीं खोना चाहिए”।

दम तोड़ रहा था बेजुबान… मिली नई जिंदगी

यूं तो बेजुबानों की मदद के लिए तमाम संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन अक्सर जरूरत के वक्त कोई काम नहीं आता। या तो ऐसी संस्थाएं खुद को अधिकार क्षेत्र की सीमा में बांध लेती हैं, या फिर उनके पास मदद न करने के तमाम बहाने होते हैं। तस्वीर में दिखाई दे रहा कुत्ता कुछ दिनों पहले आज का खबरी के एक सदस्य को बेहद बुरी अवस्था में मिला। उसकी एक आंख लगभग खराब हो चुकी थी और वो खड़े होने की स्थिति में भी नहीं था। पॉमेरियन नस्ल के इस कुत्ते को उसका मालिक यहां छोड़ गया था,   शायद इसकी वजह कुत्ते की बीमारी रही हो। कुत्ता इस कदर सदमें में था कि उसने भूखा होने के बावजूद कुछ नहीं खाया। इस बारे में एनीमल वेलफेयर के लिए काम करने वाली संस्था पीपुल्स फॉर एनीमल्स को जानकारी दी गई, लेकिन उसने खुद सहायता करने के बजाए रेस्क्यू नामक संस्था से संपर्क करने को कहा। पीएफए के पुणे प्रमुख को वॉट्सएप पर कुत्ते की तस्वीर भी भेजी गई, जिसे देखने के बाद शायद उस इंसान का दिल भी पसीज जाता जिसे जानवरों से कोई प्यार नहीं, लेकिन उन्होंने तस्वीर को भी अनदेखा कर दिया।

मिला सहारा
रेस्क्यू संस्था से सीधे संपर्क का कोई साधन नहीं, जब तक ऑनलाइन फॉर्म भरकर, घायल जानवर की फोटो अपलोड करके उन्हें नहीं भेजते, जब तक नहीं मिल सकती। फिर भले ही घायल दम क्यों न तोड़ दे। सब तरफ से निराशा हाथ लगने पर पिंपरी चिंचवड़ महानगरपालिका के प्राणी विभाग प्रमुख डॉ गोरे को पूरी स्थिति से अवगत कराया गया। उन्होंने तत्काल पशुसंवर्धन शेती व वन प्रकल्प विकास संस्था से बात की और थोड़ी ही देर में मदद पहुंच गई। कुत्ते को जब अस्पताल पहुंचाया गया तो डॉक्टर भी उसकी हालत देखकर सकते में आ गए।

घर में दिया आसरा
कुत्ते ने कई दिनों से कुछ खाया नहीं था। अगर एक दो दिन वो इसी अवस्था में रहता था, उसकी मौत निश्चित थी। सबसे पहले उसे सलाइन चढ़ाई गईं और फिर आगे का उपचार शुरू किया। लगातार एक हफ्ते देखभाल के बाद कुत्ता अपने पैरों पर खड़ा होने लगा है। उसकी सेहत में तेजी से सुधार आ रहा है। पशुसंवर्धन संस्था के पास कोई शेल्टर नहीं है, इस वजह से संस्था के सुनील और उनकी बहन जयश्री घायल जानवरों को अपने घर में आसरा देते हैं।

मदद की दरकार
पशुसंवर्धन संस्था को उस रेस्क्यू किए गए कुत्ते सहित बाकी जानवरों की देखभाल और इलाज के लिए मदद की दरकार है। आज का खबरी ने कुछ पशु प्रेमियों की मदद से इस दिशा में कदम आगे बढ़ाया है, लेकिन मदद के दायरे को विस्तृत करने की जरूरत है ताकि बेजुबान जानवरों को जिंदगी थोड़ी आसान बन सके।

खाली कुर्सियां बयां कर रहीं नोटबंदी का दर्द

नोटबंदी को 4 हफ्तों से ज्यादा का समय गुजर चुका है, लेकिन हालात अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। एटीएम के बाहर लोग अपने पैसे निकालने के लिए लाइन लगाकर खड़े हैं, वहीं बैंककर्मियों का ओवरटाइम भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। हाथ में notebandi1पैसा नहीं है, इसलिए खरीददारी कम हो रही है, जिसका उन छोटे विक्रेताओं पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है जिन्हें रोज की कमाई से ही घर चलाना होता है। आलम ये है कि पूरे साल गुलजार रहने वाली चौपाटियां भीड़ को तरस रही हैं और होटलों के धंधे भी मंदे पड़े हैं। नए साल के मौके पर पार्टियों से साल भर की कसर पूरी करने वाले आयोजकों को भी डर सता रहा है कि कहीं 2017 का आगाज उन्हें खाली जेब से न करना पड़े।

नोटबंदी के बाद से सरकार हालात सामान्य होने के दावे कर रही है। प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री तक का यही मानना है कि गाड़ी पटरी पर लौट आई है। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत है। आम जनता को न तो बैंक से पैसे मिल रहे हैं और न ही एटीएम से। बैंक ऑफ इंडिया जैसे कई सरकारी और निजी बैंकों के अधिकांश एटीएम स्थायी रूप से बंद पड़े हैं। जिन एटीएम में कैश होता भी है, वो चंद मिनटों में खाली हो जाते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को उठानी पड़ रही है जो कैशलैस सुविधा के साथ सहज नहीं है। इसमें वो छोटे विक्रेता भी शामिल हैं, जो ठेले आदि पर सामान बेचकर अपना घर चला रहे हैं।

बदल गए हालात
पुणे के पिंपरी चिंचवड़ स्थित जीजामाता उद्यान नोटबंदी से पहले तक हर रोज सैलानियों की भारी भीड़ का गवाह बनता था। इसकी एक वजह यहां मौजूद चौपाटी भी है, जहां लोगों को अपेक्षाकृत कम दाम में खाने की विभिन्न वैराइटी उपलब्ध हो जाती हैं। लेकिन 9 नवंबर से हालात यहां के हालात काफी हद तक बदल गए हैं। जो दुकानें रात 10 बजे तक खुली रहा करती थीं, उनके शटर अब 9 बजे से पहले ही गिर जाते हैं। वीकेंड पर भी पहले वाली भीड़ नजर नहीं आती। दुकानदार बताते हैं कि इतनी विकट स्थिति का notebandiसामना उन्होंने पहले कभी नहीं किया। इस चौपाटी से चंद कदम की दूरी पर ही भाजपा विधायक लक्ष्मण जगताप का आलीशान बंगला है। दुकानदार बंगले की चकाचौंध को देखते हैं और फिर मायूस होकर आगे बढ़ जाते हैं। एक दुकानदार ने कहा, एक महीना होने का आ गया, हमारा धंधा पहले की तरह होने का नाम ही नहीं ले रहा है। हर रोज इसी आस में दुकान खोलते हैं कि शायद अच्छी हो, लेकिन मायूसी ही हाथ लगती है। एक हफ्ते में जितनी बिक्री हो जाया करती थी, वो पिछले 23 दिनों में भी नहीं हो पाई है। समझ नहीं आ रहा कि किराया कैसे निकालें और घर का खर्चा कैसे चलाएं?

क्या वो परेशान हैं?
दुकान बंद करके जा रहे एक अन्य विक्रेता ने कहा, नेता कहते हैं कि नोट बंद होने से केवल वही लोग परेशान हैं, जिन्होंने गलत तरीके से पैसा कमाया है। क्या मुझे देखकर आपको ऐसा लगता है? पहले इतना काम रहता था कि मेरी पत्नी और बेटा भी दुकान पर आते थे, लेकिन अब एक व्यक्ति के लिए भी काम नहीं है। लोगों के पास पैसा ही नहीं है तो खर्च कैसे करेंगे। अगर ऐसा ही कुछ दिन और चला तो पता नहीं क्या होगा।

क्या नेताओं को फर्क पड़ा?
उद्यान बाहर छोटे बच्चों को घुमाने के लिए खिलौना कार की भी व्यवस्था की। आसपास के रहने वाले लोगों ने कुछ ऐसी कारें खरीदी हैं, जो शाम के वक्त उन्हें उद्यान लेकर पहुंच जाते हैं। पांच मिनट तक बच्चे को घुमाने के पांच रुपए शुल्क लेने वाले यह लोग भी नोटबंदी के चलते संकट में हैं। एक महिला ने कहा, पहले कुछ घंटों में ही 500 600 तक कमाई हो जाती थी, लेकिन अब 100 रुपए भी जुटाना मुश्किल हो गए हैं। लोग पार्क में अपने बच्चों को लेकर आते तो हैं, लेकिन कार में नहीं घुमवाते। हम अपनी मुश्किल जाकर किस से कहें। न नेताओं को कोई फर्क पड़ा है और न अमीरों को।