13 दिनों से नहीं मिली छुट्टी!

एटीएम के बाहर कतार में खड़े लोगों की निगाहें एटीएम में कैश भरने वालों पर टिकी थीं। 100-100 के नोटों की गड्डियों को एक एक करके ट्रे में भरा जा रहा था। आम दिनों में नोट भरने की इस प्रक्रिया को लोगों की निगाहों से बचकर अंजाम दिया जाता है। लेकिन अब इसे वक्त की नजाकत कहें या मजबूरी की सबकुछ खुलेआम हो रहा है। नोटबंदी के फैसले के बाद से अब तक कैश atmफिलिंग के काम में लगी कंपनियों के अधिकतर कर्मियों को एक छुट्टी भी नसीब नहीं हुई है। आलम ये है कि देर रात तक काम करने के बाद उन्हें अलसुबह फिर काम पर निकलना पड़ता है। उनके पास न तो ठीक से सोने का समय है और न ही अपने परिवार की खैर खबर लेने का वक्त।

बैठे-बैठे सो जाते हैं
पुणे में एसबीआई के एटीएम में कैश फिलिंग काम करने वाली कंपनी एसएसवी के एक कर्मचारी ने कहा, 9 नवंबर से हमें कोई छुट्टी नहीं मिली है। पहले पूरे दिन में जहां 3 से 4 फेरे होते थे, वहीं अब इनकी संख्या 10 से ज्यादा हो गई है। पिछले 13 दिनों में एक दिन भी ऐसा नहीं गया, जब ठीक से सोने का वक्त मिला हो। घर के जरूरी काम भी अटके पड़े हैं। थकान इतनी ज्यादा है कि गाड़ी में बैठे बैठे ही नींद आ जाती है। बाकी लोगों की तरह हम भी यही उम्मीद कर रहे हैं कि स्थिति जल्दी से सामान्य हो, ताकि हमें भी अपने घर परिवार के लिए वक्त मिल सके।

वो भी नसीब नहीं
atmएक अन्य कर्मी ने कहा, नोटबंदी के बाद से हमारा काम दोगुना हो गया है। हमें दिन में कई बार एटीएम में कैश भरना होता है। एक एटीएम से दूसरे एटीएम तक पहुंचने में जो समय लगता है, बस वही हमारा आराम का समय है। हालांकि ड्राइवर को तो वो भी नसीब नहीं होता। लगातार काम के चलते सब इतने थक गए हैं कि कई बार कैश फिलिंग के वक्त सुरक्षा गाइडलाइन को भी नजरअंदाज करना पड़ता है।

बहुत परेशानी
बैंक ऑफ महाराष्ट्र के एटीएम में कैश फिलिंग करने वाले एक कर्मचारी के मुताबिक, हालात ऐसे हैं कि इमरजेंसी में भी हम छुट्टी नहीं ले सकते। मेरे कुछ साथी हैं, जिनके बच्चे छोटे हैं और उनकी देखरेख के लिए घर में कोई नहीं। वो सबसे ज्यादा परेशानी में हैं। कम से कम जरूरतमंद कर्मियों को भी छुट्टी मिलनी चाहिए। नोटबंदी का फैसला अच्छा है या बुरा, इतनी समझ तो मुझमें नहीं है, मैं तो बस इतना जानता हूं कि हमारा काम बहुत बढ़ गया है।

मनमानी का हथियार
पीएनबी के एटीएम में कैश भरने वाली कंपनी के एक कर्मचारी ने कहा, हालत देखकर आपको हमारी थकान का अंदाजा हो गया होगा। देश के लिए हम 13 क्या 30 दिन भी लगातार काम करने के लिए तैयार हैं, लेकिन क्या हमारी परेशानियों पर गौर नहीं किया जाना चाहिए। कई ऐसे कर्मचारी हैं, जिन्हें पारिवारिक दायित्व निभाने के लिए छुट्टी चाहिए उन्हें भी देश का हवाला देकर चुप कराया जा रहा है। मोदीजी ने तो अच्छा ही निर्णय लिया है, बस कुछ लोग उसे मनमानी का हथियार बना रहे हैं।

मोदीजी, क्या पाई-पाई के लिए तरसना सम्मान है?

नोटबंदी पर संसद से सड़क तक सरकार अपने फैसले का समर्थन कर रही है। संसद में विपक्ष के तीखे हमलों का जवाब देते हुए सरकार ने कहा है कि देश में पहली बार ईमानदार को सम्मान और बेईमान को नुकसान हुआ है। सरकार की इस दलील से जहां कुछ लोग संतुष्ट हैं, वहीं कुछ का मानना है कि पीएम मोदी ने दूरदर्शिता नहीं दिखाई। 500 और 1000 के नोट बंद किए जाने के इतने दिनों बाद भी हालात सामान्य नहीं हो सके हैं। बैंक और एटीएम के बाहर अलसुबह ही लाइनें लग जाती हैं, जो देर शाम तक लगी atmsbiरहती हैं। एक तरफ बैंककर्मी काम के दबाव से त्रस्त हैं, तो दूसरी तरफ आम जनता कैश की किल्लत से परेशान है। लोग पीएम से जानना चाहते हैं कि क्या पाई पाई के लिए हाथ फैलाना ही सम्मान है?

वो क्या समझेंगे?
पुणे के सांगवी स्थित बैंक ऑफ महाराष्ट्र की ब्रांच के बाहर सुबह के 6 बजे से ही लोगों का जमावड़ा शुरू हो गया था, जो 9 बजते बजते लंबी लाइन में तब्दील हो गया। इस लाइन में बुजुर्ग भी थे, महिलाएं और पुरुष भी। सबकी बस एक ही मुराद थी कि इस बार उनका बैंक आना सार्थक हो जाए। कई लोग ऐसे थे, जो पिछले कई दिनों से कैश निकालने आ रहे हैं, लेकिन सफलता नहीं मिली। लाइन में लगी एक महिला ने कहा, “नोटबंदी का फैसला अच्छा है या नहीं मैं नहीं जानती, मुझे बस इतना पता है कि मेरे पास जरूरी सामान खरीदने के भी पैसे नहीं बचे हैं”। गार्ड से बार-बार बैंक खुलने का समय पूछ रहे एक बुजुर्ग ने कहा, “क्या पाई पाई के लिए हाथ फैलाना सम्मान है? पीएम बस इस बात का जवाब दें। हम जो परेशानी झेल रहे हैं, वो वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले नहीं समझ सकते”।

दिक्कत ही दिक्कत
शुक्रवार पेठ स्थित बैंक ऑफ इंडिया ब्रांच लगी भीड़ में कुछ लोग मोदी सरकार के फैसले से खुश थे, जबकि अधिकांश नाराज। उनकी नाराजगी केवल इस बात की थी कि सरकार ने फैसला लेने से पहले आम आदमी को होने वाली परेशानी के बारे में नहीं सोचा। एक व्यापारी ने कहा, “नोटबंदी से हमारा धंधा तो मंदा हो ही गया है, रोजमर्रा का खर्चा चलाने में भी दिक्कत हो रही है। बैंक और एटीएम दोनों में ही सीमित पैसा है, जिसके चलते कई बार खाली हाथ लौटना पड़ता है”। एक युवक ने कहा, “नोटबंदी का फैसला काफी अच्छा है, लेकिन पैसे नहीं मिलने से अब परेशानी बढ़ने लगी है। हम बस इंतजार ही कर सकते हैं कि जल्दी से स्थिति सामान्य हो जाए”।

बैंक कर रहे इंकार
पिंपले सौदागर स्थित एसबीआई एटीएम के बाहर खड़े एक युवक ने कहा, सरकार ने नोट बदलने और पैसा निकालने की जितनी लिमिट तय की है, उतना भी नहीं हो पा रहा है। एक तरफ आरबीआई की तरफ से कहा जा रहा है कि पैसे की कमी नहीं है, वहीं बैंक पैसों की कमी का हवाला देकर पूरा कैश देने में टालमटोल कर रहे हैं। बैंकों की मजबूरी तो समझ आती है, लेकिन आरबीआई व्यवस्था दुरुस्त करने के बजाए गलत दावे क्यों कर रहा है? सरकार को अब बयानबाजी छोड़कर आम जनता की परेशानी कम करने की कोशिश करनी चाहिए।

निजी यात्रा पर लुटाई रेलवे की कमाई!

-शिर्डी, भीमाशंकर दर्शन के लिए स्पेशल कोच लेकर पहुंचे रेलवे बोर्ड चेयरमैन 
-सरकारी खर्चों में कटौती की पीएम की पहल का उड़ाया मजाक
-दौरे को आधिकारिक नाम देने की कोशिश में जुटा रेलवे.
एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकारी खर्चे में कटौती की बात कर रहे हैं, ताकि देश के विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जा सके। वहीं रेल अधिकारी उनकी कोशिशों पर पलीता लगाने में जुटे हैं। हाल ही में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन (सीआरबी) एके मित्तल railनिजी यात्रा पर पुणे आए थे, लेकिन सरकारी सुख सुविधाओं का दोहन करने के लिए उसे आधिकारिक दौरे का रूप दिया गया। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, सीआरबी की यह यात्रा पूरी तरह से निजी थी। वे पहले शिर्डी गए फिर अष्टविनायक के दर्शन के लिए पुणे आए। उन्होंने न तो कोई निरीक्षण किया और न ही कोई बैठक ली। जबकि इस कवायद में रेलवे के लाखों रुपए जरूर खर्च हो गए। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है, रेल अधिकारी अक्सर अपनी निजी यात्राओं को आधिकारिक रूप देकर इसी तरह घाटे में चल रहे रेलवे की कमर तोड़ते रहते हैं।
ऐसा था कार्यक्रम 
सीआरबी आठ अक्टूबर को अपनी स्पेशल कोच ;सैलूनद्ध में सवार होकर दिल्ली से कोपरगांव के लिए निकले। उनकी कोच को 12628 एक्सप्रेस में अटैच किया गया था। कोपरगांव से वह सीधे शिर्डी दर्शन के लिए चले गए। 10 अक्टूबर को 12150 एक्सप्रेस से अपने सैलून में कोपरगांव से पुणे के लिए रवाना हुए। पुणे पहुंचने के बाद सीआरबी अपने काफिले के साथ सबसे पहले भीमाशंकर के दर्शन के लिए गए। दूसरे दिन उन्हें अष्टविनाक के दर्शन के लिए जाना था। लेकिन पारिवारिक कारणों के चलते उन्हें बीच में ही दिल्ली वापस लौटना पड़ा। इस छह दिनों के टूर को आधिकारिक बनाने के लिए आखिरी दिन पुणे में रेल अधिकारियों की बैठक बुलाई गई थी। तय कार्यक्रम के मुताबिक सीआरबी को 13 अक्टूबर को 12779 एक्सप्रेस से निजामुद्दीन लौटना था।
पानी की तरह बहाया पैसा
सीआरबी की निजी यात्रा पर रेलवे ने पानी की तरह पैसा बहाया। सूत्रों के मुताबिक, उन्हें भीमाशंकर ले जाने के लिए 10 गाडि़यों का काफिला मौजूद था। जिसमें कुछ किराए पर मंगाई गई थीं। जाहिर है इसका भुगतान रेलवे ने अपनी जेब से किया होगा। बात केवल किराए तक ही सीमित नहीं है, सीआरबी को खुश करने के लिए सभी स्टेशनों को चमकाया गया। जीएम स्तर के अधिकारी काम छोड़कर सीआरबी की आवभगत में लगे रहे। इतने सारे अधिकारियों के जमावड़े पर रेलवे का कितना खर्चा हुआ होगा इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चेयरमैन सैलून से आए, जिसका एक बार आने जाने का खर्चा ही लाखों में आता है।
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काम चलाऊ काम
पुणे रेल मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, सीआरबी के आने के 10 दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो गई थीं। उनकी गुड लिस्ट में शामिल होने के लिए विभाग प्रमुखों ने फंड डायवर्ड करके वो काम भी करवाए, जिनकी कोई जरूरत नहीं थी। अधिकारी के मुताबिक, ऐसे मौकों पर किए जाने वाले काम की कोई गुणवत्ता नहीं होती। प्रशासन बस यही चाहता है कि वरिष्ठ अधिकारियों के रुकने तक सबकुछ सही दिखे। आमतौर पर प्रशासनिक दौरे की जानकारी पहले से ही दे दी जाती है, लेकिन सीआरबी पुणे में क्या करने वाले हैं यह किसी को नहीं बताया गया था। केवल आखिरी दिन के शेड्यूल में बैठक का जिक्र था। अगर सीआरबी निजी यात्रा पर नहीं आए थे, तो फिर बाकी दिन उन्होंने क्या किया? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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प्रधानमंत्री से बड़े हैं सीआरबी?
कई रेल अधिकारी सवाल उठाते हैं कि जब प्रधानमंत्री मेट्रो में सफर करके यात्रियों का हालचाल जान सकते हैं, तो क्या सीआरबी उनसे भी बड़े हैं? स्पेशल कोच में बैठने के बजाए यदि चेयरमैन पैसेंजर गाड़ी में सवार होकर यात्रियों से रूबरू होते तो समस्याओं को ज्यादा करीब से समझ पाते। साथ ही यात्रियों में भी रेलवे के प्रति विश्वास पुख्ता होता। उनके मुताबिक, यदि सीआरबी ही अपनी सुख सुविधाओं पर रेलवे का पैसा बर्बाद करेंगे, तो फिर बाकी रेलकर्मियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?
मुझे कुछ नहीं पता
इस संबंध में पुणे रेल मंडल के जनसंपर्क अधिकारी ने कहा, मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, मैं उस समय छुट्टी पर था। लेकिन सीआरबी आधिकारिक दौर पर ही पुणे आए थे।
पीएम ने जताया था विश्वास
मित्तल पर प्रधानमंत्री ने विश्वास जातते हुए उन्हें दोबारा रेलवे बोर्ड चेयरमैन नियुक्त किया था। सीआरबी के पद से रिटायर्ड होने के बाद उन्हें दोबारा वही जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर रेल अधिकारियों मे ंनाराजगी थी, क्योंकि इस वजह से कई अधिकारियों के प्रमोशन रुक गए। वही मित्तल आज पीएम की कोशिशों को पलीता लगाने में जुटे हैं। ऐसे वक्त में जब रेलवे को घाटे से उबारने की कोशिशें जारी हैं, मित्तल को खर्चों में कटौती का उदाहरण पेश करना चाहिए था। लेकिन वो अपनी निजी यात्रा पर भी रेलवे की कमाई लुटा रहे हैं।
शिकायत करें भी किससे?
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष हर्षा शाह ने कहा, मुझे इस बारे में जानकारी मिली थी कि सीआरबी ने निजी यात्रा के harsha shahलिए भी सैलून का इस्तेमाल किया। अधिकांश अधिकारी इसी तरह से रेलवे की कमाई को पानी में बहाते हैं। इस संबंध में शिकायत करें भी तो किससे? पूरा का पूरा महकमा एक ही दिशा में चल रहा है। पीएम और रेलमंत्री जो प्रयास कर रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास अधिकारियों को करना चाहिए, लेकिन उन्हें सिर्फ अपनी सुख सुविधाओं का ख्याल है। सीआरबी यदि सैलून के बजाए पैसेंजर ट्रेन में सवार होकर आते तो बाकी अधिकारियों को भी एक सबक मिलता।
यहां भी वही हाल
कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में भी मुख्य यात्री परिवहन प्रबंधक जबलपुर से अपने बेटे को परीक्षा दिलवाने के लिए सैलून लेकर आए थे। वहां, भी निजी यात्रा को सरकारी बनाने की कोशिश की गई। जानकारी के मुताबिक, प्रबंधक राजेश पाठक के बेटे की आईईएस इंजीनियरिंग कॉलेज में परीक्षा थी, इसके लिए वो स्पेशल सैलून में सवार होकर हबीबगंज स्टेशन पहुंचे। पाठक ने भोपाल रेलवे स्टेशन का निरीक्षण तक नहीं किया, जो उनके प्रोग्राम में शामिल था। वो पूरे दिन सैलून में ही आराम फरमाते रहे।
10 दिन तक पूजा, फिर पैरों तले रौंदा!

  • विसर्जन घाटों पर गणेश प्रतिमाओं की बेकद्री

10 दिनों तक जिस बाप्पा की श्रद्धा भाव के साथ पूजा अर्चना की, विसर्जन के बाद उनकी प्रतिमाएं पैरों तले कुचली जा रही हैं। पुणे और पिंपरी चिंचवड़ के अधिकतर विसर्जन घाटों पर ऐसा ही नजारा देखने को मिला। महानगर पालिका की तरफ से ईको फ्रेंडली विसर्जन के लिए घाट किनारे जो हॉद बनाए गए थे, उनमें गणपति की प्रतिमाओं को कचरे की तरह भरा गया। जबकि ये हॉद केवल सांकेतिक विसर्जन के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। सांकेतिक विसर्जन के बाद प्रतिमाओं को किनारे रख दिया जाता है, जिसे बाद में मनपा कर्मचारी ले जाते हैं। लेकिन अपना काम कम करने के चक्कर में मनपाकर्मियों ने अधिकांश प्रतिमाओं को हॉद में ही डाल दिया। बात केवल इतनी ही नहीं है, कई प्रतिमाएं विसर्जन घाट पर बिखरी पड़ी थीं। आने जाने वाले अपने पैरों तले उन्हें रौंद रहे थे। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है, पिछले साल भी इस तरह की खबरें सामने आई थीं।

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अव्यवस्था का अंबार
मनपा की तरफ से दावा किया गया था पिछली बार की खामियों को इस बार नहीं दोहराया जाएगा, लेकिन हकीकत में ऐसा हुआ नहीं। विसर्जन घाटों पर अव्यवस्था देखने को मिली। लोगों का आरोप है कि कई जगह सांकेतिक विसर्जन करने के लिए कोई मनपाकर्मी मौजूद नहीं था। निर्माल्य कुंडों की कमी वजह से पूजा सामग्री सड़कों पर बिखरी पड़ी थी। इसके अलावा घाटों के आसपास पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थे, नतीजतन यातायात जाम जैसे हालात भी निर्मित हुए।

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क्या गणेश सिर्फ हमारे हैं?
मनपा द्वारा प्रतिमाओं के अनादर को लेकर स्थानीय लोगों में गुस्सा है। उनका कहना है कि यदि इसी तरह आस्था के साथ खिलवाड़ किया जाता है तो अगले साल से वो सांकेतिक विसर्जन को महत्व नहीं देंगे। उनकी मांग है कि महापौर इस संबंध में दोषी कर्मियों पर कार्रवाई करें। पिंपले गुरव निवासी दीपक जाधव ने कहा, गणेश प्रतिमाओं की बेकद्री को देखकर हम आहत भी हैं और आक्रोशित भी। क्या गणपति सिर्फ हमारे हैं, मनपाकर्मियों के नहीं। आखिर कैसे कोई मूर्तियों को पैरों तले कुचलने के लिए छोड़ सकता है।

‘अब हर दावे पर होगा शक’

  • कांस्टेबल दंपति के झूठ से पुणे पुलिस शर्मिंदा

एवरेस्ट फतेह का झूठा दावा करने वाले युगल के चलते पुणे पुलिस को शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। पुलिस कांस्टेबल दिनेश और तारकेश्वरी राठौड़ के दावे को नेपाल सरकार ने खारिज कर दिया है। साथ ही उन पर 10 साल का प्रतिबंध लगाया है। इस संबंध में पुणे पुलिस को पत्र भेजकर सूचना दी गई है। पुलिस कमिश्नर रश्मि शुक्ला खुद मानती हैं कि इस घटना से पुलिस की छवि खराब हुई है। दिनेश और तारकेश्वरी राठौड़ का झूठ सामने आने के बाद से ही दोनों फरार है। दोनों शिवाजीनगर पुलिस मुख्यालय में पदस्थ थे। मुख्यालय के पुलिसकर्मी इस बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहते, लेकिन वे इतना जरूर कहते हैं कि दिनेश और तारकेश्वरी ने पुलिस की छवि खराब की है।

policepuneहोता रहेगा शक
एक डीसीपी रैंक के अधिकारी ने कहा, महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए इतना बड़ झूठ बोलने वालों को पुलिस में रहने का अधिकार नहीं है। पुलिसकर्मी होने के नाते उनका अपराध और भी बड़ा हो जाता है। भविष्य में जब कोई पुलिसकर्मी कोई रिकॉर्ड बनाएगा तो पहली बार में उसे भी शक की निगाहों से देखा जाएगा। राठौड़ दंपति के कृत्य की जितनी निंदा की जाए कम है।

दुख और गुस्सा
दिनेश को करीब से जानने वाले एक कांस्टेबल ने कहा, हम कभी सोच भी नहीं सकते थे कि वो इतना बड़ा झूठ बोल सकता है। पूरा डिपार्टमेंट उसके झूठ को सच मान रहा था, हम सभी बेहद खुश थे। दिनेश झूठ बोलने वाला व्यक्ति नहीं था। वो अपने काम से काम रखता था। हमें इस घटना पर दुख भी है और गुस्सा भी। दोनों ने फरार होकर बहुत बड़ी गलती की है। उन्हें इसकी सजा जरूर मिलेगी।

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जाएगी नौकरी!
कमिश्नर शुक्ला ने कहा, दोनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। विभागीय जांच के बाद से ही दोनों फरार हैं। माना जा रहा है कि उच्च अधिकारियों ने कांस्टेबल दंपति की बर्खास्तगी की सिफारिश की है। क्योंकि इस मामले ने पुलिस को शर्मसार किया है, इसलिए अधिकारी चाहते हैं कि दंड इतना सख्त हो कि फिर कोई पुलिसकर्मी झूठ बोलने का साहस न दिखा पाए। अगर दोनों की नौकरी बच भी जाती है तो उनका डिमोशन और वार्षिक वेतन वृद्धि रुकना तय है।

क्या है मामला
दिनेश और तार्केशवरी ने 5 जून को एक संवाददाता सम्मेलन में घोषणा की थी कि उन्होंने 23 मई को एवरेस्ट फतेह किया था। पुणे पुलिस ने इसके लिए दोनों का सम्मान भी किया था। कांस्टेबल दंपति के इस दावे पर पर्वतरोहियों ने एक दल के आपत्ति जताई थी। जिसके बाद जांच शुरू हुई और नेपाल सरकार से संपर्क किया गया। अब नेपाल सरकार ने भी दिनेश के दावे को नकार दिया है।

अचानक चलने लगी पॉर्न क्लिप, लगा जाम

कर्वे रोड पर कुछ ऐसा हुआ, जिसके चलते महिलाओं को शर्मसार होना पड़ा और मर्दों की आंखें खुली की खुली रह गईं। दरअसल, pornयहां लगे एक बिलबोर्ड पर अचानक पॉर्न क्लिप चलने लगी। आसपास से गुजरने वाले जिस व्यक्ति की नजर बिलबोर्ड पर गई, वो कुछ देर के लिए वहीं जम गया। यहां तक ट्रैफिक भी जाम हो गया। शुक्रवार को रिमझिम बरसात के बीच कर्वे रोड पर ट्रैफिक धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था। तभी सड़क किनारे पर दुकान के बाहर लगे बिलबोर्ड पर पॉर्न फिल्म चलने लगी। कुछ ही देर में ट्रैफिक रुक गया और जाम जैसी स्थिति बन गई। दुकानदार को जैसे ही इस बात की जानकारी मिली उसने तुरंत बिलबोर्ड बंद करवाया। आसपास से गुजरने वाली महिलाओं और युवतियों को पॉर्न क्लिप के चलते शर्मंदगी उठानी पड़ी।

मुनाफे के लिए दांव पर यात्रियों की जान!

  • वर्मा ट्रैवल्स के खिलाफ उपभोक्ता फोरम जाने की तैयारी 
  • दोगुना किराया वसूलने के बाद भी नहीं दी सुविधाएं 
  • खराब बस से कराया यात्रियों को सफर

मुनाफा कमाने के चक्कर में निजी बस ऑपरेटर यात्रियों की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रहे हैं। सड़कों पर ऐसी बसें दौड़ाई जा रही हैं, जो कभी भी हादसे का सबब बन सकती हैं। खासकर त्यौहारी सीजन में अनफिट बसों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इतना ही नहीं परिवहन विभाग की स्पष्ट नीति नहीं होने के चलते निजी ऑपरेटर मनमाना किराया भी वसूलते हैं। 15 अगस्त को देखते vermaहुए पुणे से भोपाल जाने वाली अधिकतर बसों का किराया 2200 से 3000 के बीच था। जबकि सामान्य तौर पर यह 1500 से 2000 के बीच रहता है। दोगुना किराया चुकाने के बावजूद सतनाम वर्मा ट्रैवल्स से यात्रा करने वालों को न केवल मुश्किलों का सामना करना पड़, बल्कि पूरे रास्ते उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता भी सताती रही। दरअसल, 13 अगस्त को भोपाल के लिए निकली बस (एमपी 04 3571) बीच में ही खराब हो गई थी। बस से अचानक धुआं निकलने लगा। बावजूद इसके वैकल्पिक व्यवस्था कराने के बजाए यात्रियों को उसी बस में ले जाया गया। बस का एसी नहीं चलने से यात्री पूरे रास्ते करवटें बदलते रहे। उन्हें सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी। इसके अलावा बस से आ रहीं अजीबों गरीब आवाजों के चलते यात्रियों को इस बात का भी डर सताता रहा कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए।

जान की कीमत 200 रुपए
बस के भोपाल पहुंचने का समय सुबह साढ़े नौ है, लेकिन वह 14 अगस्त को दोपहर 12 बजे के आसपास भोपाल पहुंची। इसी से बस की दुरुस्तगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। यात्रियों के मुताबिक खराबी के चलते ड्राइवर काफी धीरे धीरे बस चला रहा था। जब कुछ यात्रियों ने वर्मा ट्रैवल्स से इस संबंध में शिकायत की तो क्षतिपूर्ती के तौर पर महज 200 रुपए वापसी की पेशकश की गई।

बहुत बुरे थे हाल
पुणे से भोपाल जानी वालीं स्वाति सुधा ने बताया कि बस को अंदर से देखकर ऐसा लग रहा था जैसे अभी वर्कशॉप से निकलकर आई हो। बिस्तर पर मिट्टी बिखरी हुई थी, सीट नंबर तक नहीं लगे थे। मोबाइल चार्जर भी काम नहीं कर रहा था। बस चलने के कुछ देर बाद ही अचानक पीछे से धुआं निकलने लगा। यात्रियों ने जब शोर मचाया तो ड्राइवर ने बस रोककर तुरंत सबको नीचे उतारा। बकौल स्वाति, हमें लग रहा था कि वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी, लेकिन थोड़ी देर रुकने के बाद हमें उसी बस में सवार होने को कहा गया। ड्राइवर को शायद अंदेशा था कि धुआं निकलने जैसी घटना फिर हो सकती है, इसलिए पूरी रात बस की लाइट जलाकर रखी गईं ताकि धुआं दिखाई दे सके।

कंज्यूमर फोरम जाएंगी
स्वाति के मुताबिक, धुआं निकलने के बाद बस का एसी बंद हो गया था। जिसकी वजह से घुटन महसूस हो रही थी। चूंकि बस वातानुकूलित थी, इसलिए खिड़की खोलने की गुंजाइश भी नहीं थी। पूरे रास्ते हमें घुटन महसूस होती रही। स्वाति का सवाल है कि जब बस ऑपरेटर दोगुना किराया वसूलते हैं, तो क्या उन्हें सुविधाएं मुहैया नहीं करानी चाहिए। स्वाति इस मुद्दे को कंज्यूमर फोरम में उठाने का मन बना चुकी हैं।

फिट नहीं थी बस
वर्मा ट्रैवल्स के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बस रिपेयरिंग के लिए गई हुई थी, यात्रियों की भीड़ को देखते हुए उसे बीच में ही वापस बुलाया गया। कुछ यात्रियों के मुताबिक, ड्राइवर ने बस खराब होने की सूचना देकर वैकल्पिक व्यवस्था करने को कहा था, लेकिन कंपनी ने साफ इंकार कर दिया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि निजी ऑपरेटर किस तरह अपनी जेब भरने के लिए यात्रियों की जिंदगी को दांव पर लगा रहे हैं।

रिमझिम बरसात के बीच स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट लॉन्च

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को रिमझिम बरसात के बीच पुणे में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट लॉन्च किया। इस मौके पर राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस, राज्यपाल विद्यासागर राव भी उपस्थिति थे। मोदी ने इस दौरान कहा, शहरीकरण को बना संकट माना जाता है, लेकिन मेरा सोचना अलग है। मैं समझता हूं कि शहरों में गरीबी पचाने की ताकत होती है। हमें इसमें अवसर की तलाश 07Narendra-Modiकरनी चाहिए। स्मार्ट सिटी चैलेंज कॉम्पिटीशन के पहले चरण के लिए चुने गए 20 शहरों में ये प्रोजेक्ट शुरू होंगे। मोदी ने आगे कहा, हमारे देश में ऐसा तो नहीं है कि पहले कोई काम नहीं होता था। ऐसा भी नहीं है कि सरकारें बजट खर्च नहीं करती थीं। इसके बावजूद भी दुनिया के कई देश हमारे बाद आजाद हुए। वे कंगाल थे, लेकिन आर्थिक बदहाली से बाहर आए। क्या वजह है कि कम समय में दुनिया के कई देश हमसे आगे निकल गए। अगर एक बार देश के सवा सौ करोड़ लोग अपनी ताकत को झोंक दे ंतो किसी भी सरकार की जरूरत नहीं होगी।

क्या है मोदी का मतलब?
इस मौके पर शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू ने कहा कि मोदी का मतलब है मेकिंग ऑफ डेवलपिंग इंडिया। देश की कई बेहतरीन योजनाओं की शुरुआत पुणे से हुई है। इसलिए हमने इसके लिए पुणे को चुना। तिलक के स्वराज से लेकर, तुकाराम, महात्मा फुले तक कई आंदोलन यहीं से हुए। यह शहरी विकास का ऐतिहासिक दिन है। प्रोजेक्ट आज से शुरू हो रहा है।

मदद के लिए रुके, मौत ने दबोचा

  • पुणे मुंबई एक्सप्रेस वे पर हादसा, 17 की मौत

पुणे मुंबई एक्सप्रेस पर रविवार तड़के हुए एक सड़क हादसे में 17 लोगों की मौत हो गई। जबकि 33 लोग घायल हुए हैं। सभी घायलों accidentको नवी मुंबई के एमजीएम अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस कंट्रोल रूम के मुताबिक, पुणे से मुंबई आ रही एक मारुति स्विफ्ट कार का टायर पनवेल के पास पंक्चर हो गया था। पीछे से आ रही इनोवा कार के यात्रियों की मदद के लिए वहां रुकी। जब लोग कार का टायर बदल रहे थे, तभी पीछे से एक प्राइवेट बस ने दोनों कारों को टक्कर मार दी। जिससे बस और इनोवा 20 फुट गहरी खाई में जा गिरीं। सुबह करीब सवा तीन बजे हुए इस हादसे में एक महीने के बच्चे, 10 महिलाओं और 6 पुरुषों सहित 17 लोगों की मौत हो गई। घटना की जानकारी मिलते ही नवी मुंबई पुलिस और हाईवे पुलिस की टीमों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर राहत कार्य शुरू किया। घायलों को मुंबई के अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां कुछ भी हालत गंभीर बताई जा रही है।

…ड्यूटी तो करनी है!

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चिलचिलाती धूप में जहां दो मिनट खड़े होना भी सजा जैसा लगता है, वहीं ये गार्ड पूरे दिन बीआरटी स्टॉप पर ट्रैफिक व्यवस्था संभालते हैं। चूंकि बस हर थोड़े अंतराल में आती रहती है, इसलिए छांव की तलाश करना भी इनके लिए मुमकिन नहीं हो पाता। लिहाजा अधिकतर गार्ड ने धूप से बचने के लिए कुछ न कुछ व्यवस्था कर रखी है। किसी ने बैनर या बोर्ड को छतरी बनाया हुआ है, तो कोई बाकायदा सिर पर छतरी रखे हुए है। पुणे के कई मार्गों पर बीआरटी शुरू हो गया है। बीआरटी रूट से पीएमपी बस के अलावा अन्य वाहन न गुजरें और स्टॉप के आसपास की ट्रैफिक व्यवस्था सुचारू रहे, इसलिए इन गार्ड्स की नियुक्ति की गई है। सुबह सात बजे से रात 11 बजे तक गार्ड अलग अलग शिफ्ट में यहां तैनात रहते हैं।

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