सावधान! आप पर है Ats की नजर

सबसे खतरनाक आतंकी संगठन के रूप में शुमार इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) के भारत में बढ़ते प्रभाव को देखते हुए एटीएस Demo pic, courtesy: googleअलर्ट हो गई है। एटीएस और पुलिस ने अब तक ऐसी 94 वेबसाइट्स को ब्लाक किया है, जो युवाओं को आईएस की विचारधारा से प्रभावित करने में लगी थीं। पुणे आए महाराष्ट्र एंटी टेरेरिज्म स्क्वॉड (Ats) के एडिशनल डायरेक्टर-जनरल विवेक फनसालकर ने बताया कि 10 से 12राज्यों में आईएस का प्रभाव साफ तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने कहा, आईएस इंटरनेट के माध्यम से युवाओं को प्रभावित कर रहा है, इसके मद्देनजर एटीएस ने अपनी रणनीति तैयार की है। हम सोशल मीडिया साइट्स पर नजर रख रहे हैं। जो वेबसाइट आईएस की विचारधारा को बढ़ावा देती पाई जाती है उसे हम ब्लॉक कर देते हैं। फनसालकर के मुताबिक, पुलिस और एटीएस की तरफ से राज्य के विभिन्न हिस्सों में ऑफलाइन प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं, ताकि युवाओं को आईएस के प्रभाव में जाने से रोका जा सके। एटीएस इंटरनेटर पर होने वाली हर गतिविधि पर बारीकी से नजर गड़ाए हुए है, इसके चलते अब तक कई युवाओं को आईएस के चंगुल में फंसने से बचाया जा चुका है। कुछ वक्त पहले पुणे एटीएस ने मुस्तैदी दिखाते हुए सही वक्त पर एक युवती को बचा लिया था।

धमकी से नहीं डरेंगे
आईएस के मंसूबों पर पानी फेरने में लगे पुणे एटीएस चीफ भानूप्रताप बर्गे को बीते दिनों अंजाम भुगतने की धमकी मिली थी। लेकिन बर्गे ने साफ कर दिया है कि वो इन धमकियों से डरने वाले नहीं है। बर्गे के मुताबिक, एटीएस अपना काम करती रहेगी। बर्गे के नेतृत्व में एटीएस ने शहर की एक युवती को आईएस के जाल में फंसने से बचा लिया था। इससे पहले भी एटीएस कई दफा दहशतगर्दों के नापाक इरादों को नेस्तनाबूद कर चुकी है। इसके चलते देश में सक्रिय आतंकी संगठन के सदस्य बौखलाए हुए हैं। एक पत्र के माध्यम से बर्गे को अंजाम भुगतने की धमकी दी गई थी।

बरतें सावधानी
आईएस की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि इंटरनेट के इस्तेमाल में सावधानी बरती जाए। नफरत फैलाने वाले याहशतगर्द policeविचारधारा का समर्थन करने वाले संदेशों पर किसी तरह का कमेंट करने से बचें। ऐसे संदेशों को भूलकर भी शेयर करने की गलती न करें। कई बार आपका कोई दोस्त अनचाहे संदेश या तस्वीर में आपको टैग कर देता है, इसलिए फेसबुक सेटिंग्स में जाकर टैङ्क्षगग को अपने अनुसार बदलें। ताकि कोई बिना आपकी इजाजत के आपको टैग न कर पाए। जिस व्यक्ति को आप नहीं जानते, उससे सोशल साइट्स पर ज्यादा बातचीत न करें। क्योंकि किसी के मन में क्या चल रहा है, यह आप पता नहीं लगा सकते। अंजान फ्रेंड रिक्वेस्ट को स्वीकार करने से पहले अच्छी तरह सोच लें। आतंकी संगठन के हैंडलर्स खूबसूरत युवतियों के नाम से प्रोफाइल बनाकर भी आपको फंसा सकते हैं।

सावधान! फर्जी वकील आपको ठग न ले

  • बकाया भुगतान के लिए इंटरनेट कंपनियां कर रहीं धोखाधड़ी

पुणे: इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली अधिकांश कंपनियों के दावे जितने खोखले होते हैं, उनका काम करने का तरीका उतना ही शातिर। ये कंपनियां उपभोक्ताओं को अपने जाल में फंसाने के लिए कई तरह के प्रलोभन देती हैं, लेकिन जब उपभोक्ता इनका साथ छोड़ना चाहता है तो उसे कानून  का डर दिखाया जाता है। कई कंपनियां तो बकाया भुगतान के लिए जालसाजी तक का सहारा ले रही हैं। इनकी तरफ से उन उपभोक्ताओं को फोन करवाया जाता है, जो या तो सेवा समाप्त कर चुके हैं या करने वाले हैं। फोन करने वाला खुद को दिल्ली सिविल हाईकोर्ट का वरिष्ठ वकील बताते हुए 30 मिनट के भीतर बकाया राशि से ज्यादा का भुगतान करने की चेतावनी देता है। संबंधित उपभोक्ता को धमकाया जाता है कि अगर उसने भुगतान नहीं किया तो उसका लाइसेंस, पासपोर्ट जब्त कर लिया जाएगा और उसे सुनवाई के लिए तत्काल दिल्ली आना होगा। कोर्ट-कचहरी से बचने के लिए उपभोक्ता भुगतान कर देता है और जब तक उसे अपने साथ हुई धोखाधड़ी का अहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

बना लिया शिकार
पिंपले-गुरव निवासी हर्ष शर्मा (परिवर्तित नाम) भी हाल ही में ऐसी धोखाधड़ी का शिकार हुए। हर्ष काफी वक्त से तिकोना नामक कंपनी की सेवाएं ले रहे थे। बार-बार शिकायतों के बावजूद भी जब उनकी समस्या दूर नहीं हुई तो उन्होंने कंपनी से सेवा समाप्त करने का अनुरोध किया। हर्ष ने 5 सितंबर को इस संबंध में कंपनी को सूचित किया, कंपनी की तरफ से 14 सितंबर को एक ईमेल आया जिसमें सेवा सुधारने की बात कही गई। लेकिन हर्ष अपने फैसले पर कायम रहे। इसके बाद कंपनी ने कनेक्शन बंद करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। हर्ष ने परेशानी से बचने के लिए कंपनी की नीति अनुसार अग्रिम भुगतान भी किया। इसके बावजूद उन्हें बिल भेजे जाते रहे। उन्हें आखिरी बिल 234.72 रुपए का मिला, जिसे 30 नवंबर से पहले भरने था। हर्ष ने तिकोना से इसकी वजह जाननी चाहिए, मगर कंपनी ने कोई उत्तर नहीं दिया।

ज्यादा की वसूली
पांच दिसंबर को हर्ष को एक महिला का फोन आया। जिसने अपना नाम एडवोकेट वर्षा बताते हुए कहा कि “मैं दिल्ली सिविल हाईकोर्ट से बोल रही हूं तिकोना ने आपके खिलाफ केस किया है। अगर आपने 30 मिनट में 550 रुपए नहीं भरे तो आपका ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, डेबिट-क्रेडिट कार्ड निष्क्रिय कर दिया जाएगा। आपको कल ही सुनवाई के लिए दिल्ली आना होगा”। उक्त महिला ने हर्ष से यह भी कि कहा कि “अगर कंपनी की गलती है तो मैं आपकी तरफ से तिकोना के खिलाफ केस लडूंगी, लेकिन उसके लिए पहले आपको भुगतान करना होगा”। घबराए हर्ष ने बिना ज्यादा सोच-विचारे तिकोना की वेबसाइट पर जाएगा 550 रुपए भर दिए। इसके बाद जब उन्होंने महिला को फोन लगाया तो कोई जवाब नहीं मिला। यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि हर्ष का आखिरी बिल 234 रुपए था, जिसका निर्धारित तिथि के बाद भुगतान पर 100 रुपए दंड भरना पड़ता। बावजूद इसके कंपनी ने हर्ष से 550 रुपए वसूले।

बातचीत की रिकॉर्ड
हर्ष ने आज का खबरी से कहा, “अग्रिम भुगतान करने के बाद भी मुझे बार-बार बिल भेजे जाते रहे। मैंने इसकी वजह जानने के लिए कंपनी को कई ईमेल किए, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। एक दिन अचानक ही एक महिला का फोन आया, जिसने तुरंत बिल न भरने पर लाइसेंस, पासपोर्ट आदि निष्क्रिय करने की धमकी दी। मैंने उस महिला को बताया कि मैं एडवांस भुगतान कर चुका हूं। यानी जिस अवधि में मैंने इंटरनेट इस्तेमाल ही नहीं किया उसका भी पैसा भरा है, लेकिन वो कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। कायदे में तो कंपनी को मुझे पैसे वापस करने चाहिए थे”। हर्ष ने कुछ वक्त बाद उस नंबर पर दोबारा कॉल किया और पूरी बातचीत रिकॉर्ड कर ली। रिकॉर्डिंग सुनने के बाद साफ पता चल जाता है कि कॉल करने वाली महिला फर्जी वकील है। इंटरनेट पर भी तिकोना के संबंध में ऐसी शिकायतों का अंबार है। कंपनी ने हर्ष ही नहीं, बल्कि कई उपभोक्ताओं को इस तरह के कॉल करवाए हैं।

हो सकती है कार्रवाई
asimइस बारे में वरिष्ठ अधिवक्ता असीम सरोदे ने कहा, “पहली बात तो कोई भी वकील धमकी भरे लहजे में बात नहीं कर सकता। वो केवल समझाइश दे सकता है। अगर कंपनी ने किसी उपभोक्ता के खिलाफ केस किया भी है, तो उसे पहले नोटिस भेजा जाना चाहिए। दूसरी बात अगर कॉल करने वाला फर्जी वकील है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। बार काउंसिल को भी इस मामले पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि यदि कोई वकील बनकर लोगों को धमका रहा है तो इससे वकालत का पेश बदनाम होता है”।

  • “आज का खबरी” ने इस संबंध में कंपनी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन बात नहीं हो सकी।
कमथान ने बदली थी Station की सूरत

पिछले कई सालों से पुणे स्टेशन की जिम्मेदारी संभाल रहे स्टेशन सुप्रीटेंडेंट सुनील कमथान का तबादला हो गया है। उनकी जगह राजपत्रित अधिकारी की नियुक्ति की गई है। हालांकि अभी यह तय नहीं हो सका है कि कमथान को कहां भेजा जाएगा। कमथान के कार्यकाल में स्टेशन परिसर में कई kmthanअमूलचूक बदलाव हुए। उनकी छवि एक ऐसे रेल अधिकारी की रही, जिसने हमेशा यात्री सुविधा को तवज्जो दी। Station की सूरत चमकाने में भी कमथान का काफी योगदान रहा, स्वच्छता अभियान की अगुवाई वे खुद किया करते थे। पिछले साल गांधी जयंती के मौके पर स्टेशन परिसर में साफ-सफाई के साथ-साथ लोगों की मानसिकता बदलने का अभियान भी छेड़ा गया। इसके तहत राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों के साथ सैंकड़ों बच्चों को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने अपने विचारों को रंगों की मदद से दीवारों पर उकेरा।  इस अभियान को सफल बनाने में सुनील कमथान की भूमिका को हर स्तर पर सराहा गया। उन्होंने ही गैर सरकारी संस्था डीजीपीएस और कलाकारों को अभियान में शामिल का न्यौता दिया था।  रेल कर्मियों के साथ-साथ यात्री भी यह मानते हैं कि पिछले कुछ सालों में स्टेशन की स्थिति में काफी सुधार देखने को मिला है।
दिलाई मुक्ति
पुणे स्टेशन की पहचान पहले भिखारियों और नशे के शिकार बच्चों के ठिकाने के रूप में होती थी। स्टेशन परिसर में शाम ढलते ही असमाजिक तत्वों का जमावड़ा लग जाता था। अनधिकृत तौर पर कई खाद्य विक्रेता परिसर से ही अपनी दुकान चलाते थे। कमथान ने इन सब से स्टेशन को आजाद करवाया। उनके प्रयासों की बदौलत साथी नामक संस्था ने नशा पीडि़त बच्चों के पुनर्वसन की शुरुआत की, बाद में रेलवे बोर्ड ने भी उसे अधिकृत कर दिया। यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से यह काफी बड़ा कदम था। कमथान के कार्यकाल में ही  49 साल बाद पुणे को बेस्ट स्टेशन का अवॉर्ड मिला था।
मदद के लिए हमेशा आगे
स्टेशन सुप्रीटेंडेंट के तौर पर सुनील कमथान यात्रियों की मदद के लिए हमेशा आगे रहते थे। उन्होंने कई बार ऐसे यात्रियों को उनके घर भेजने में मदद की, जिनका सबकुछ चोरी हो गया था। कमथान के साथ काम करने के अपने अनुभव को बताते हुए एक रेलकर्मी ने कहा, “वो एक अच्छे अधिकारी के साथ-साथ अच्छे इंसान भी हैं। कुछ वक्त पहले की बात है, मैं कमथान साहब के साथ स्टेशन का मुआयना करके लौट रहा था। तभी उनकी नजर अपने कार्यालय के बाहर बैठे एक शख्स पर गई जो काफी परेशान था। उन्होंने मुझसे कहा कि उसे अंदर बुलाकर लाओ। उस व्यक्ति ने बताया कि उसका बैग चोरी हो गया है और उसके पास इतने पैसे भी नहीं है कि वापस जाने की टिकट दोबारा खरीद सके। इस पर कमथान साहब ने न केवल अपनी जेब से पैसे निकालकर उसे दिए, बल्कि उसके खाने-पीने की व्यवस्था भी कराई। “
खुद लेते थे जायजा
कमथान हर शिकायत पर खुद जायजा लेते थे। कुछ वक्त पहले की बात है, पुणे-गोरखपुर एक्सप्रेस में एक युवक के साथ कुछ पुलिसकर्मियों ने मारपीट करते हुए उसका पर्स छीन लिया था। जब पीडि़त ने स्टेशन पर मौजूद रेल अधिकारियों से इसकी शिकायत की तो उन्होंने अपना पल्ला झाड़ते हुए जीआरपी से संपर्क करने को कहा। कमथान को जैसे ही इस घटना का पता चला, उन्होंने पीडि़त युवक को साथ लेकर ट्रेन की हर बोगी की जांच की ताकी आरोपियों की पहचान की जा सके। हालांकि तब तक आरोपी फरार हो चुके थे।
क्या कहते हैं यात्री
  1. पुणे-मुंबई के बीच सफर करने वाले प्रवीण चव्हाण ने कहा, पुणे स्टेशन पर पिछले कुछ वक्त में काफी सुधार देखने को मिला है। पहले ट्रेनों का अनाउसमेंट भी ठीक से नहीं होता था, कई बार तो आखिरी तक पता ही नहीं चलता था कि ट्रेन किस प्लेटफार्म पर आएगी। अब हालात काफी अच्छे हैं। हालांकि साफ-सफाई पर रेल प्रशासन को थोड़ा ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
  2. लोकल से सफर करने वालीं प्रिया कुमार कहती हैं, पहले एक नंबर छोडक़र बाकी प्लेटफॉर्म की हालात बहुत खराब थी, लेकिन अब स्थिति सुधर रही है। मुख्य द्वारा की तरफ दीवारों पर जो पेंटिंग की गई है, उसे देखकर अच्छा लगता है। इस तरह के प्रयास रेल प्रशासन को वक्त-वक्त पर करते रहने चाहिए।
LPG: बीमा है पर बताते नहीं

LPG गैस सिलेंडर से होने वाली दुर्घटनाओं में इजाफे के बावजूद अधिकतर उपभोक्ता इस बात से अंजान हैं कि हादसे की स्थिति में वो मुआवजे के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसकी वजह है गैस कंपनियों और डिस्ट्रीब्यूटर स्तर पर होने वाली लापरवाही। सालाना करोड़ों रुपए प्रीमियम का lpgभुगतान करने के बाद भी कंपनियां इस बारे में उपभोक्ता को जानकारी देना मुनासिब नहीं समझतीं। पुणे जिले में 140 के आसपास गैस एजेंसियां हैं और उपभोक्ताओं की संख्या 24 लाख से ज्यादा है। बीते कुछ सालों में जिले में कई दुर्घटनाएं भी हुईं, लेकिन एक भी उपभोक्ता ने अब तक मुआवजे के लिए आवेदन नहीं किया। अधिकारी स्वयं इस बात की पुष्टि करते हैं। कंपनी और डिस्ट्रीब्यूटर दोनों की तरफ से अधिकृत उपभोक्ताओं को बीमा कवर दिया जाता है। कंपनियों की वेबसाइट पर सिटीजन चार्टर के तहत जानकारी भी दी गई है, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर इसे स्वीकारने में दोनों ही कतराते हैं। इस संबंध में जब डिस्ट्रीब्यूटरों से बात की गई तो उन्होंने इसे कंपनी की पॉलिसी करार दिया और कंपनी अधिकारी बीमे को डीलरों की जिम्मेदारी ठहराते रहे।

कहीं जिक्र नहीं
गैस कंपनियों की तरफ से अधिकृत उपभोक्ताओं को ग्राहक पुस्तिका दी जाती है, जिस पर सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश होते हैं। इस पुस्तिका में भी बीमा कवर के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इतना ही नहीं सिलेंडर की डिलेवरी के दौरान मिलने वाली रसीद पर भी बीमे का जिक्र नहीं रहता।

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सबसे ज्यादा ताज्जुब की बात तो ये है कि बीमे की राशि को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। कंपनी अधिकारियों से लेकर डीलर और यहां तक कि महाराष्ट्र गैस डीलर एसोसिएशन के पास भी इसका कोई सीधा जवाब नहीं मिला। हालांकि इंडेन के एक अधिकारी ने इतना जरूर कहा कि डिस्ट्रीब्यूटर की तरफ से 10 लाख का बीमा करवाया जाता है, लेकिन जब उनसे कंपनी के बीमा कवर के बारे पूछा गया तो वो खामोश हो गए।

नियमों का उल्लंघन
जानकारी के मुताबिक कंपनियों के अलावा डीलर स्तर पर भी उपभोक्ताओं का थर्ड पार्टी बीमा कराया जाता है। लेकिन वो भी इस संबंध में उपभोक्ता को कुछ बताना जरूरी नहीं समझते। जबकि नियमानुसार उन्हें डिस्प्ले बोर्ड के माध्यम से इसकी जानकारी देना आवश्यक है। शहर के अधिकांश डिस्ट्रीब्यूटर इस नियम की खुलेआम अवेहलना कर रहे हैं।

काली ही रही Diwali

एक तरफ जहां पूरा देश दिपावली की खुशियों में डूबा है, वहीं शरतचंद्र रॉय के लिए यह Diwali भी काली ही रहने वाली है। अपने बेटे को इंसाफ दिलाने की उनकी कोशिशें पुणे पुलिस की असंवेदनशीलता के चलते परवान नहीं चढ़ पाई हैं। 1 जून, 2013 को शरतचंद्र रॉय के बेटे अभिषेक की उसके abhiवाघोली स्थिति फ्लैट में चाकूओं से गोदकर हत्या कर दी गई थी। तब से अब तक रॉय लोनीकंद पुलिस स्टेशन से सैंकड़ों चक्कर लगा चुके हैं, मगर हर बार उन्हें मायूस होकर ही लौटना पड़ा। इस मामले में पुलिस जांच चल रही है से ज्यादा कुछ भी बताने को तैयार नहीं होती। रॉय ने इंसाफ के लिए तत्कालीन ग्रामीण पुलिस अधीक्षक मनोज लोहिया कमिश्नर सतीश माथुर, राज्य के पूर्व गृहमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक से गुहार लगाई, लेकिन किसी ने भी दुखी पिता की फरियाद नहीं सुनी। आज का खबरी से बातचीत में रॉय ने कहा, “मेरे लिए दीवाली का कोई मतलब नहीं। जब मेरे घर का चिराग ही बुझ गया तो हम किसके लिए दीये जलाएं। जब पुलिस मेरे बेटे के हत्यारों को सलाखों के पीछे पहुंचाएगी, मैं उसी दिन दीवाली मनाऊंगा”। रॉय का कहना है कि लोकनीकंद पुलिस ने कभी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया, वो शुरुआत से ही इसे चोरी के दौरान हुई हत्या मानकर चलती रही। जबकि तथ्य चिल्ला चिल्लाकर कह रहे थे मेरे बेटे को सुनियोजित तरीके से मौत के घाट उतारा गया है। मैंने हर वो दरवाजा खटखटाया, जहां मदद मिलने की उम्मीद थी, लेकिन किसी को एक बाप के आंसू नहीं दिखे। मूलत: भोपाल निवासी अभिषेक  मैकेनिकल इंजीनियर था और नौकरी के सिलसिले में पुणे आया था, लेकिन इससे पहले कि वो अपने नए जीवन की शुरुआत कर पाता उसकी हत्या कर दी गई।

संदेह में पुलिस की भूमिका
इस हत्याकांड में पुलिस की भूमिका शुरुआत से ही संदेह के घेरे में है। पुलिस की जांच महज इस थ्योरी पर केंद्रित है कि घर में चोरी के इरादे से घुसे अज्ञात बदमाशों को पकड़ने के दौरान अभिषेक की हत्या हुई। इसलिए उसने मृतक के मोबाइल फोन तक खंगालना जरूरी नहीं समझा। पीड़ित परिवार ने खुद मोबाइल पुलिस के हवाले किए ताकि कोई सुराग मिल सके। आज का खबरी से बातचीत में शरदचंद्र राय ने कहा, अभिषेक की हत्या के बाद पुलिस ने खुद उसके मोबाइल फोन की मांग नहीं की, हमने ही जाकर उसे मोबाइल सौंपे। इसके अलावा पुलिस ने ये तक जानने की कोशिश नहीं की कि अभिषेक की किसी से दुश्मनी आदि तो नहीं थी।forsite

वो चार लडक़े कहां हैं?
शरदचंद्र राय के मुताबिक, अभिषेक वाघोली स्थित जिस मकाने में अपने दो दोस्तों के साथ किराए पर रहता था, वहां पास में चार अन्य लडक़े भी रहते थे। पुलिस उनके बारे में कुछ भी बताने को तैयार नहीं है। पहले कहा गया था कि उनके बयान दर्ज कर लिए गए हैं, अब पुलिस निरीक्षक चंद्रकांत जाधव इस सवाल का कोई जवाब नहीं देते। राय ने कहा, उन लड़कों को मेरे बेटे की हत्या के बारे में कुछ पता है या नहीं ये जानने का मुझे अधिकार है। अगर सबकुछ ठीक है तो पुलिस उनके बारे में बताने से क्यों कतरा रही है।

संघर्ष का निशान तक नहीं
मृतक की मां ने कहा, अभिषेक बहुत तेज और चुस्त लडक़ा था। वो दो-तीन लोगों को आसानी से संभाल लेता था। इसलिए ये मानना हमारे लिए मुश्किल है कि दो चोर उसे आसानी से मारकर चले गए। अभिषेक के दिल के पास चाकू मारा गया, इसके अलावा उसके शरीर पर ऐसा कोई निशान नहीं है जिससे ये साफ होता हो कि उसने संघर्ष करने की कोशिश की। अगर वो चोरों को पकडऩे की कोशिश कर रहा था तो उसके हाथ-पैर पर चोट का कोई न कोई निशान तो होना चाहिए था।

चीखा नहीं या चीख नहीं सुनी?
हत्याकांड वाले दिन अभिषेक अपने दोस्त सिद्धार्थ जैन धमासिया के साथ फ्लैट में था, जबकि कृष्ण कुमार नौकरी पर गया हुआ था। अगर उसे कोई अंज्ञान व्यक्ति नजर आया तो उसने सिद्धार्थ को उठाया क्यों नहीं। आमतौर पर ऐसे मामलों में लोग सबसे पहले चिल्लाते हैं, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। सिद्धार्थ को अभिषेक की आवाज तब सुनाई दी, जब हमलावर उसे चाकू मार चुके थे। अभिषेक के दिल के पास चाकू मारा गया।

Pune के युवाओं में डॉन बनने की सनक

Pune के युवाओं में आजकल डॉन बनने की हसरत घर करती जा रही है। अपना दबदबा कायम करने के लिए ये युवा सरेआम लोगों की पिटाई और वाहनों में तोडफ़ोड़ से भी गुरेज नहीं करते। चिकली, आकुर्डी और चिंचवड में बीते दिनों ऐसे ही कुछ युवाओं ने उत्पात मचाया था। हालांकि ज्यादा दिनों attackतक वो पुलिस ने बच नहीं सके। निगड़ी पुलिस की पूछताछ में आरोपियों ने कुबूल किया कि उन्होंने लोगों में खौफ पैदा करने और मजे के लिए ऐसा किया था। सभी आरोपियों की चाह थी कि लोग उन्हें भाई के रूप में पहचानें। पकड़े गए आरोपियों में 8 नाबलिग हैं, जिन्हें सुधार गृह भेज दिया गया है। चंद रोज पहले रात के अंधेरे में आरोपियों ने तकरीबन 35 वाहनों में तोडफ़ोड़ की थी। इतना ही नहीं पास से गुजर रहे एक दुकानदार को भी बेवजह मारा था। निगड़ी पुलिस थाने के निरीक्षक संजय नाइक-पाटिल ने बताया, रहवासी इतने दहशत में थे कि उन्होंने आरोपियों को पकडऩे की कोशिश भी नहीं की। घर लौटते वक्त सहायक निरीक्षक राजेंद्र निकालजे ने जब आरोपियों को हंगामा करते हुए देख तो उन्होंने उनका पीछा किया और एक आरोपी को दबोच लिया। मोटरसाइकिलों पर आए 14 आरोपियों ने तकरीबन 18 मिनट तक चिंचवड़, आकुर्डी और चिखली में उत्पात मचाया। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है, कोथरूड में तो यह आम बात हो गई है। आए दिन वहां से गाडिय़ों में तोडफ़ोन के मामले सामने आते रहते हैं। कुछ वक्त पहले तो अज्ञात आरोपियों ने कई गाडिय़ों को आग के हवाले भी कर दिया था।

Ganeshotsav में मिली मायूसी

गणेशोत्सव के दौरान पुणे में इस बार नदियों के बजाए टैंकों में विसर्जन को प्राथमिकता दी गई। पर्यावरण के प्रति गणेश भक्तों के इस उत्साह से जहां प्रशासन के 20150927_182902चेहरे पर खुशी दिखाई दी, वहीं कुछ चेहरों की खुशी मायूसी में भी बदल गई। विसर्जन में गणेश भक्तों की मदद करने वाले जितनी कमाई की उम्मीद लगाकर बैठे थे, उसका आधा भी उनके हाथ में नहीं आया। दरअसल, घाटों के आसपास रहने वाले तैराक कुछ पैसों के ऐवज में भक्तों से प्रतिमाएं लेकर उन्हें नदियों में विसर्जित करते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार बाकायदा बाप्पा की प्रतिमा को तीन डुबकियां लगवाई जाती हैं और फिर भक्तों को दिखाकर उसे बहते पानी में छोड़ दिया जाता है। इस चंद मिनट के काम के लिए स्थानीय तैराक को एक भक्त से 100 से 200 रुपए तक मिल जाते हैं। इस लिहाज से पूरे दिन में कमाई का आंकड़ा काफी अच्छा पहुंच जाता है। इस काम में बड़ों से लेकर बच्चे तक शामिल रहते हैं। विसर्जन के दौरान ज्यादा कमाई की आस में ये लोग बाकी काम-धंधा छोडक़र घाटों तक ही सीमित होकर रह जाते हैं, लेकिन ईको-फ्रेंडली Ganeshotsav के चलते इस बार उनकी उम्मीदें पूरी तरह से पानी में बह गईं। पुणे में बड़े पैमाने पर प्रतिमाओं को महानगर पालिका द्वारा बनाए गए टैंकों में विसर्जित किया गया। ये टैंक विसर्जन घाटों पर ही बनाए गए थे।
भलेराव पिंपरी-चिंचवड़ के पिंपले-गुरव स्थित एक घाट पर पिछले काफी सालों से प्रतिमाओं को नदियों में विसर्जित करते आ रहे हैं। लेकिन उनके लिए इस बार जैसे हालात पहले कभी नहीं रहे। वो कहते हैं, गणेशोत्सव के दसवें दिन सबसे ज्यादा लोग विसर्जन के लिए आते हैं, इसलिए कमाई भी ज्यादा होती है। मैं और मेरे कुछ साथी काफी समय से ये काम करते आ रहे हैं, मगर इतनी कम कमाई कभी नहीं हुई। घाटों पर आने वाले अधिकतर लोगों ने या तो गणेश प्रतिमाएं दान दीं या उन्हें टैंकों में विसर्जित किया। आखिरी दिन मैं सिर्फ 4-6 प्रतिमाओं को ही नदी में विसर्जित कर पाया। मैं एक दुकान पर काम करता हूं। गणेशोत्सव के लिए हर बार कुछ दिनों की छुट्टी लेता हूं, ताकि ज्यादा कमाई हो सके। मगर इस बार सिर्फ निराशा ही हाथ लगी।
हुआ कुछ और
पिंपरी-चिंचवड़ के ही एक अन्य घाट पर प्रतिमा को विसर्जित कर नदी से बाहर निकले रवि तुपे ने कहा, सुबह से ये मेरा पांचवां चक्कर है, इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। खासकर अंतिम दिन तो मैं 20 से 30 विसर्जन करवा दिया करता था। पता नहीं इस बार लोगों को क्या हुआ, जिससे पूछो वो टैंक में ही विसर्जन की बात कह रहा है। धार्मिक माहौल में लोग मूर्ति विसर्जित करने के 150-200 रुपए देने से भी मना नहीं करते। इसलिए मैं विसर्जन के समय दिन-रात घाट पर रहता हूं। सोचा था इस बार अच्छी कमाई हो जाएगी तो दिवाली पर बच्चों के लिए कुछ नए कपड़े खरीद लेंगे, लेकिन हुआ कुछ और। मैं इसके लिए किसी को दोष नहीं दे सकता, जो बाप्पा चाहेंगे, वही होगा।