भारत के Top Five सुंदर पिचाई

सुंदर पिचाई के गूगल की कमान संभालने के साथ ही भारतवंशियों की प्रतिभा का झंडा एक बार फिर बुलंद हो गया है। वैसे, पिचाई अकेले नहीं है, इस फेहरिस्त में कई नाम शामिल हैं। भारतीय मूल के कई सीईओ आज दुनिया की जानी-मानी कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं। इसमें सत्या मंडेला, इंदिरा नूई, विक्रम पंडित और निकेश अरोड़ा आदि का नाम शामिल है। आइए, इनके बारे में कुछ जानते हैं।
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सत्या नडेला
माइक्रोसॉफ्ट की कमान संभालने वाले सत्या नडेला ने भारतीयों को बड़े लक्ष्य निर्धारित करने और उन तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया। हैदराबाद में पैदा हुए नडेला ने मनिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका की शिकागो यूनिवर्सिटी के साथ ही यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कांसिन में आगे की पढ़ाई की। तेलगूभाषी नडेला के पास इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री है। वे लंबे वक्त तक माइक्रोसॉफ्ट और पिछले साल उन्हें कंपनी का सीईओ नियुक्त किया गया।

विक्रम पंडित
मूलरूप से महाराष्ट्र के नागपुर निवासी पंडित ने सिटीग्रुप की कमान संभालकर इतिहास रच दिया था। वे 2007 से 2012 तक सिटीग्रुप के सीईओ रहे, लेकिन कुछ कारणों के चलते उन्हें 2012 में अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। मराठी परिवार में जन्मे पंडित ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की है और फिलहाल तो अमेरिकी नागरिक के तौर पर जिंदगी गुजार रहे हैं।

इंदिरा नूई
पेप्सिको की सीईओ का पदभार ग्रहण करने वालीं इंदिरा नूई दुनिया की 100 ताकतवर महिलाओं में शुमार हैं। उन्होंने मद्रास क्रिश्चयन कॉलेज और आईआईएम कोलकाता से पढ़ाई करने के साथ ही येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट से डिग्री हासिल की है। नूई ने 1994 में पेप्सिको में कार्य करना आरंभ किया था, 2001 में उन्हें मुख्य वित्तीय अधिकार नियुक्त किया गया। 2011 में इंदिरा नूई ने बतौर सीईओ कार्यभार संभाला। अगले दस सालों तक वो कंपनी के कार्यक्रमों की अगुवाई करेंगी।

निकेश अरोड़ा
गूगल में लंबे वक्त तक सेवाएं देने वाले निकेश मौजूदा वक्त में सॉफ्टबैंक के मुख्य ऑपरेटिंग अधिकारी की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। बनारस आईआईटी से पढ़ाई पूरी करने वाले निकेश ने अमेरिका के प्रसिद्ध बोस्टन और नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से डिग्री हासिल की। निकेश ने पिछले साल गूगल से मुख्य बिजनेस अधिकारी के पद से इस्तीफा देकर सॉफ्टबैंक ज्वाइन किया।

सुंदर पिचाई
गूगल में बतौर सीईओ की जिम्मेदारी संभालने वाले पिचाई मूलरूप से तमिलनाडु से हैं। उन्होंने आईआईटी खडग़पुर से मेटलर्जी इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमएस की पढ़ाई की और फिर वार्टन स्कूल से एमबीए किया। 2004 से गूगल में रहे पिचाई ने कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम किया। उनकी पहचान एक तेजतर्रार और मृदुभाषी व्यक्ति के तौर पर होती है।

सुखविंदर से Radhe Maa बनने की कहानी

सनी लियोनी के बाद आजकल राधे मां इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली शख्सियत बन गई हैं। संयोग देखिए कि आध्यात्मिक चोला ओढऩे वालीं राधे मां कभी पॉर्न स्टार रहीं सनी की फैन भी हैं। हालांकि इस वक्त उनकी चर्चा किसी दूसरी वजह को लेकर हो रही है। उन पर दहेज उत्पीडऩ और अश्लीलता फैलाने जैसे कई आरोप हैं। दरअसल, कुछ वक्त पहले राधे मां की स्कर्ट पहनें कुछ तस्वीरें सामने आईं, जिसके बाद उनके आध्यात्म के चोले पर सवाल उठने लगे। मुंबई की एक महिला वकील द्वारा केस दर्ज कराने के बाद तो राधे मां मीडिया की सुर्खियों में आ radhe-maaगईं। यहीं से उनकी पुलिस स्टेशन और अदालतों तक चक्कर लगाने की प्रक्रिया शुरू हुई। वैसे, राधे मां कानून के खौफ के बीच ज्यादा दिनों तक रह पाएंगी इसकी संभावना बेहद कम है, क्योंकि उनके खिलाफ आरोप इतने पुख्ता भी नहीं हैं। दूसरे साधू-संतों की तरह राधे मां के पीछे भी भक्तों की लंबी-चौड़ी फौज है, जो किसी हाल में उन्हें गलत समझने को तैयार नहीं। मुंबई में राधे मां के दो आश्रम हैं, और दोनों ही जगह आलीशान गाडिय़ों में आने वाले उनके भक्त आज भी उनके प्रति पूरी श्रद्धा और आस्था रखते हैं। गुरदासपुर जिले के दोरांगला गांव में जहां राधे मां का जन्म हुआ, वहां तो  उन्हें भगवान की तरह पूजा जाता है। हर गली-चौराहे पर राधे मां की तस्वीर दिखाई देती है। आस्था और अंधविश्वास का ये संगम केवल राधे मां तक ही सीमित नहीं हैं, आसाराम बापू के भक्त भी उन्हें भगवान से कम नहीं समझते। जबकि बापू बलात्कार के आरोप में जेल में दिन गुजार रहे हैं। खुद को देवी मां का अवतार कहलवाने वालीं Radhe Maa को कुछ साल पहले तक सुखविंदर कौर के रूप में पहचाना जाता था। एक सामान्य ग्रहणी, जिसने अपने पति का हाथ बंटाने के लिए सिलाई शुरू की, और देखते ही देखते विख्यात बन गई। पंजाब के होशियारपुर जिले के मुकेरियान गांव में सुखविंदर ऊर्फ राधे मां अपने पति सरदार मोहन सिंह के साथ रहती थीं।

पति की मिठाई की दुकान से जो कमाई होती, उसमें घर तो चल जाता, लेकिन परेशानियों के साथ। इसके चलते सुखविंदर ने सिलाई करना शुरू किया, मगर उसकी अपेक्षाएं इससे भी संतुष्ट नहीं हुई। कुछ साल तक सबकुछ ऐसे ही चलता रहा। फिर एक दिन सुखविंदर के पति की दुबई में नौकरी लग गई। परिवार के लिए ये खुशी का पल था, मगर कोई नहीं जानता था कि यहीं से सुखविंदर के एक नए जीवन की शुरुआत होगी। समय काटने के लिए सुखविंदर ने कुछ सहेलियों की सलाह पर परमहंस डेरा जाना शुरू कर दिया। सत्संग सुनते-सुनते सुखविंदर उसमें इतनी रम गई कि, अपने बच्चों को भी जिंदगी से अलग कर दिया। खुद को साध्वी के रूप में स्थापित करने के लिए उसने पहले माता की चौकियां करना शुरू किया, फिर धीरे-धीरे खुद सत्संग देने लगी। उन्होंने डेरा प्रमुख रामदीन दास के साथ भी कई सत्संगों में हिस्सा लिया। हालांकि अब तक राधे मां का दायरा केवल पंजाब तक ही सीमित था, लेकिन एक घटना के बाद उन्हें देशभर में पहचाना जाने लगा। 2004 में जब सुखविंदर ने खुद को देवी का अवतार करार दिया तो कुछ हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया। जिसके बाद उन्हें पंजाब छोडक़र मुंबई आना पड़ा। देश की आर्थिक राजधानी में राधे मां को बिजनेसमैन संजीव गुप्ता का साथ मिला।

आज भी मुंबई में Radhe Maa जहां आश्रम चलाती हैं, वो जगह गुप्ता की ही है। सही मायने में देखा जाए तो सुखविंदर को राधे मां के रूप में लोगों की जुबान पर चढ़ाने में गुप्ता की भूमिका सबसे अहम रही। गुप्ता एक एडवरटाइजिंग कंपनी के मालिक हैं और मुंबई में जगह-जगह राधे मां के होर्डिंग्स, बैनर, पोस्टर लगाकर उन्होंने लोगों को एक नई साध्वी के उदय का अहसास कराया। मुंबई में कारोबार जमने के बाद राधे मां ने पंजाब जाना कम कर दिया। हालांकि, मुकेरिया गांव के खानपुर में राधे मां का एक मंदिर आज भी है, जिसे कोई और नहीं बल्कि उनकी बहन चलाती हैं। यहां वो राधे मां की तरह ही लोगों की परेशानियां दूर करने का दावा करती हैं।

पुणे में बच्चों की हैं फैक्टरियां

सुखविंदर कौन ने अपने भगवा चोला ओढऩे की धुन में अपने बच्चों को खुद से अलग कर दिया था। हालांकि बाद में जब वो मुंबई बस गईं तो उनके बच्चे और पति उनके साथ ही रहने लगे। राधे मां के भक्त कहते हैं कि वो अपने पति और बच्चों को केवल भक्तों की नजर से देखती हैं। राधे मां के दो लडक़े हैं और दोनों पुणे में अपनी-अपनी फैक्टरियां चला रहे हैं। कहने वाले यहां तक कहते हैं कि राधे मां ने आध्यात्म की आड़ में जो कमाया उससे अपने बेटों का जीवन सुधार किया। हालांकि, राधे मां और उनके भक्त इन आरोपों से इत्तेफाक नहीं रखते। राधे मां के बेटे और पति ने भी अब उन्हें गुरु कहना शुरू कर दिया है।

प्रसाद देने का तरीका

राधे मां गले लगाकर अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं, फिर चाहे वो कोई पुरुष हो या महिला। हाल ही में जब महाराष्ट्र के औरंगाबाद में पत्रकारों के सवाल सुनकर उन्हें बेहोशी छा गई थी तो एक पुरुष भक्त ने ही उन्हें गोद में उठाकर कार तक पहुंचाया था। वो अपने भक्तों की गोदी में सवार होने के भी मशहूर हैं। एक बात जो बहुत कम लोगों को पता है, वो ये कि राधे मां का प्रसाद देने का तरीका बेहद गंदा है। भक्तों के अलावा अगर कोई और उसे देख ले तो शायद उल्टी कर जाए। राधे मां के दरबार में ज्यादातर खीर का प्रसाद दिया जाता है। पहले वो खीर खुद मुंह में डालती हैं और चंद सेकेंड बाद उसे एक भक्त के हाथ पर निकाल देती हैं। फिर सभी भक्त उसमें से थोड़ा-थोड़ा खा लेते हैं। अगर कोई भक्त प्रसाद चढ़ाता है तो उसके साथ भी ऐसा ही किया जाता है।

बॉलीवुड में भी कद्रदान

राधे मां की छोटे कपड़ों में सामने आईं कुछ तस्वीरों को लेकर बॉलीवुड में भी अलग-अलग राय है। एक तरफ जहां सुभाष घई और राखी सावंत जैसी हस्तियां राधे मां का बचाव में हैं, वहीं ऋषि कपूर और विशाल ददलानी चुटकियां लेने से पीछे नहीं हटते। ऋषि कपूर ने राधे मां के साथ कुछ अन्य धर्मगुरुओं की फोटो ट्वीट कर कहा कि ऐसे लोगों को रोकना चाहिए जो अंधविश्वास फैलाते हैं। हालांकि, सुभाष घई इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उन्होंने प्रेस को दिए एक बयान में कहा कि मैं और मेरी पत्नी राधे मां के भक्त हैं और उनके आश्रम भी जाते हैं, लेकिन हमें वहां कभी कोई आपत्तिजनक गतिविधि नहीं दिखी। उन्होंने आगे कहा, मैं जानता हूं कि राधे मां के अवतार अलावा वो एक आम लडक़ी भी हैं, जिन्हें शॉपिंग करना, घूमना, डांस करना पसंद है। घई की तरह पुणे स्थित फिल्म इंस्टीट्यूट के विवादास्पद निदेशक गजेंद्र चौहान को भी लगता है कि राधे मां सही हैं। सोशल मीडिया पर उनकी एक तस्वीर भी सर्कुलेट हो रही है, जिसमें वो राधे मां से आशीर्वाद लेते नजर आ रहे हैं। इसी तरह राखी सावंत और डॉली बिंद्रा में राधे मां के पक्ष में खड़ी हैं। बिंद्रा राधे मां की छोटे कपड़ों वाली तस्वीर पर कहती हैं, अच्छे कपड़ों में तस्वीर खिंचवाना में क्या गलत है। सावंत कहती हैं कि राधे मां के पास सकारात्मक शक्ति है, वो गलत नहीं हो सकतीं।

ये हैं व्यापम घोटाला उजागर करने वाले

मध्यप्रदेश के बहुचर्चित व्यापम (व्यवसायिक परीक्षा मंडल) घोटाले को उजागर करने वाले आप और हम जैसे साधारण लोग ही हैं, लेकिन गलतvyapam1 को गलत करार देने की जिद आज उन्हें एक अलग पहचान दिला दी है। हालांकि इस पहचान के लिए उन्हें काफी कुछ कुर्बान करना पड़ा, अपना सुख और शांति भी। 25 वर्षीय आशीष चतुर्वेदी ग्वालियर की जीवाजी यूनिवर्सिटी से मास्टर इन सोशल वर्क (एमएसडब्लू) कर रहे हैं। आशीष को घोटाले की बू 2009 में आई, जब उन्हें अपनी मां के कैंसर के बारे में पता चला। इस सिलसिले में वो कई विशेषज्ञों से मिले। बड़ी-बड़ी डिग्रियों वाले डॉक्टरों के कई जवाबों ने आशीष के जहन में इस कौतूहल को जन्म दिया कि आखिर ऐसे लोग डॉक्टर कैसे बन जाते हैं। इसके बाद वो अपने स्तर पर परीक्षा से लेकर डॉक्टर बनने तक की प्रक्रिया की पड़ताल में जुट गए।

2010 में आशीष की पड़ताल को तब रफ्तार मिली, जब चिकित्सा शिक्षा निदेशक ने उनकी शिकायत पर कमेटी गठित की जिसने 115 स्टूडेंट्स को धोखाधड़ी का दोषी पाया। 2011 में आशीष ने व्यापम में काउंसलिंग फ्रॉड को लेकर एफआईआर दर्ज की। तब से लेकर अब तक आशीष इस संबंध में जांच एजेंसियों को हर संभव मदद करते आ रहे हैं। उन पर कई बार हमला भी किया जा चुका है, लेकिन फिर भी पीछे हटने को तैयार नहीं। इंदौर निवासी 34 वर्षीय फॉरेंसिक एक्सपर्ट प्रशांत पांडे राज्य सरकार की नींद उड़ाने वाले दूसरे शख्स हैं। प्रशांत के बारे में लोगों को पता तब लगा, जब उन्हें पिछले साल मई में भोपाल पुलिस ने गिरफ्तार किया। पुलिस का आरोप था कि व्यापम कार्यालय से जब्त की गई हार्डडिस्क में से संवेदनशील जानकारी प्रशांत ने लीक की। दरअसल, प्रशांत कई मामलों मेंं फॉरेंसिक एक्सपर्ट होने के नाते पुलिस की मदद कर चुके हैं, इसलिए पुलिस से उनकी पुराना रिश्ता है।

इस साल मार्च में प्रशांत ने मध्यप्रदेश के चीफ सेक्रेटरी, डीआईजी और एसटीएफ प्रमुख को अपनी गिरफ्तारी को लेकर हाईकोर्ट में घसीटा। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि उनके पास एमपीएसईबी घोटाले से जुड़ी कुछ अहम जानकारियां हैं, जिसके चलते उनकी जान को खतरा बना हुआ है। इस कड़ी में तीसरा नाम है 38 वर्षीय आनंद राय का। एक अध्यापिका के बेटे आनंद ने अपनी मां से मिले आदर्शों को आधार बनाते हुए गलत का खुलकर विरोध किया। व्यापम का जिन्न बाहर निकलने से पहले तक आनंद इंदौर में गर्वनमेंट मेडिकल ऑफिसर थे, इसके बाद उन्हें धार जिले में ट्रांसफर कर दिया गया।

अनइथिकल क्लिीनिकल ट्रायल के खिलाफ आरटीआई दायर को लेकर 2010 में उन्हें अलग-अलग आरोपों का हवाला देते हुए भोपाल अस्पताल से बर्खास्त कर दिया गया। उस वक्त आनंद को यह अहसास हुआ कि कमजोर शैक्षणिक योग्यता वाले अमीर परिवारों के बच्चे भी मेडिकल प्रवेश परीक्षा के टॉपर बन गए। वो इस मामले में अपने स्तर पर पड़ताल करते रहे और 2011 में आनंद ने निर्दलीय विधायक पारस सखलेचा की मदद से इस मुद्दे को विधानसभा में उठवाया। इसके बाद घोटाले की कई परतें उजागर हुईं। आनंद ने व्यापम के संबंध में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में जनहित याचिकाएं दायर कीं।