Christmas celebration in Canadian way

By Anuj Ismail

It is that time of the year again where we meet our near and dear ones, celebrate the joy of Christmas with our family, exchange gifts and cherish the old memories of Christmas. It is indeed the most wonderful time of the year wherein people call over their friends and family to celebrate the joy of the season.

Christmas in Canada is celebrate with great enthusiasm, Canadians start preparing for Christmas about a month in advance, due to severe weather condition in December where most of the province is enveloped midst snow coupled with severe winds. However that does not dampen the spirit of Christmas most of the inhabitants are done with external decoration by the first week of November.

Shopping malls are overcrowded with people who want to get done with their shopping list and start utilizing the weekend by calling over friends and family for dinner, So that they can spend the Christmas Eve and the day of Christmas with their close member of the family and prepare traditional Christmas meal which often consist of turkey, potatoes, cranberry sauce and pudding for desert.

People who attend church regularly attend the midnight mass on the Christmas Eve, and majority of the people attend the regular Christmas service on the 25. People share their greetings with the members of the church followed by lunch for the church members.

“I still haven’t done my Christmas shopping, I was caught up at work I hope to get it done by the weekend, I do work on Christmas Eve but that does not dampen my spirit it is the most wonderful time of the year.” Says Robert Walker

“It’s been a hectic month I am finally done with my shopping list and this week will be full of family dinner and get tighter with my near and dear ones. I hope I do not fall sick as it will -25 on the day of Christmas.” Says Nicole Alano

जब बाजुओं में दम था-सब दीवाने थे, जब उम्र बढ़ी-अकेला छोड़ गए!

किसी ज़माने में अपने बाजुओं की ताकत से विश्व विख्यात बॉक्सर मोहम्मद अली को टक्कर देने वाले कौर सिंह (kaur singh) आज दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं. आलम ये है कि उन्हें अपने इलाज के लिए प्राइवेट फाइनेंसर से 2 लाख रुपए उधार लेने पड़े हैं. कौर सिंह एकमात्र ऐसी बॉक्सर हैं, जिन्हें 1980 में एक एग्बिज़ीशन मैच के दौरान मोहम्मद अली से लड़ने मौका मिला. इतना ही नहीं 1982 के एशियाई खेलों में उन्होंने भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता था. इस उपलब्धि के लिए सरकार ने कौर को पहले अर्जुन अवॉर्ड और 1983 में पद्मश्री से सम्मानित किया. 1984 में कौर सिंह ने लॉस एंजलिस ओलिंपिक में लगातार को बाउट जीतकर सबको चौंका दिया था.

सेना का वीर
कौर सिंह का सफ़र 1971 में सेना में हवलदार के रूप में शुरू हुआ. ये वही दौर था जब भारत और पाकिस्तान जंग के मैदान में आमने-सामने थे. सिंह ने इस युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया था, जिसके लिए सेना ने उन्हें बहादुरी सम्मान से नवाजा. रिटायर्ड होने के बाद वे पंजाब स्थित अपने गाँव वापस आ गए. गुज़रते वक्त के साथ-साथ कौर सिंह गुमनामी के अंधेरे में खोते गए. न तो सरकार ने और न ही किसी चाहने वाले ने उनकी सुध ली.
देर से सही पर मदद आई
उन्हें दिल की बीमारी के इलाज के लिए पैसे उधार लेने पड़े. हालांकि सेना ने 3 लाख रुपए की मदद ज़रूर की, लेकिन ये रकम इलाज के लिए काफी नहीं थी. कौर सिंह का मामला जब सुर्ख़ियों में आया तब कहीं जाकर केंद्र सरकार की नींद खुली और खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने नेशनल वेलफ़ेयर फंड फॉर स्पोर्ट्स पर्सन्स से कौर सिंह को 5 लाख रुपये देने की घोषणा की है. सरकार के इस कदम की सराहना हुई, लेकिन सवाल भी ज़रूर उठे कि क्या देश का नाम रौशन करने वालों के प्रति सरकारी उदासीनता कब समाप्त होगी?

मिस्ड कॉल देने से क्या नदियां बचेंगी?

नीरज नैयर

दम तोड़ रहीं नदियों को बचाने के लिए बीते दिनों एक नए तरह का अभियान छेड़ा गया. नया इसलिए कि आप मिस्ड कॉल के ज़रिए या नीले कपड़े पहनकर भी इस अभियान से जुड़ सकते थे और नदियों को बचाने की अपनी प्रतिबद्धता को दर्शा सकते थे. हर रोज़ सैंकड़ों लोग इस मुहिम में शरीक हुए और अभियान की समाप्ति से पहले तो सोशल मीडिया पर इससे जुड़ने संबंधी संदेशों की बाढ़ आ गई. इस अभियान का ख़ाका ईशा फाउंडेशन ने तैयार किया है और इसकी कमान आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव के हाथों में है. उन्होंने स्वयं कन्याकुमारी से हिमालय तक रैली निकालकर लोगों को जागरुक किया. अभियान को मिले भारी समर्थन को लेकर गुरूजी खुश हैं, और मिस्ड कॉल देने वाले या नीले कपड़े पहनने वाले भी संतुष्टि का अनुभव कर रहे हैं कि उन्होंने प्रकृति के लिए कुछ तो किया. लेकिन क्या वास्तव में उन्होंने प्रकृति के लिए कुछ किया है? क्या मिस्ड कॉल देने, यात्रा निकालने या नीले वस्त्र धारण करने से नदियों को बचाया जा सकता है? अब इसे समझ कि कमी कहें या कुछ और कि हम अपनी अकर्मण्यता को छुपाने के लिए ऐसे अभियानों में शामिल होकर स्वयं अपनी पीठ थपथपा लेते हैं, जहां हमें कुछ नहीं करना होता. यदि मिस्ड कॉल देने या रैलियां निकालने से समस्या सुलझती, तो आज हमारा देश समस्या विहीन हो गया होता, क्योंकि रैलियां निकालना हमारे यहां फैशन बन गया है और इस फैशन की आड़ में कई लोग अपनी दुकान चला रहे हैं. जब वासुदेव महाराज गाड़ी में सवार होकर जागरूकता फैला रहे थे, तब गणेशोत्सव और दुर्गापूजा के दौरान आस्था के नाम पर नदियों को दूषित किया जा रहा था और ऐसा करने वालों में वो लोग भी शामिल रहे होंगे, जो मिस्ड कॉल देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर चुके थे.

गलत दिशा, गलत कदम
इस अभियान का समर्थन करने वाले अधिकतर लोगों का तर्क है कि ‘कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है’. बात बिल्कुल सही भी है, यदि हम कदम ही नहीं बढ़ाएंगे, तो मंजिल तक पहुंचेंगे कैसे. मगर क्या गलत दिशा में कदम आगे बढ़ाकर मंजिल तक पहुंचा जा सकता है? अगर नदियों को बचाने की पहल करनी ही है, तो पहले उन्हें प्रदूषित न करने का प्रण लीजिए. ऐसा नहीं हो सकता कि आप नदियों को कूड़ाघर बनाते रहें और उम्मीद करें कि सरकार आपके मिस्ड कॉल पर उन्हें साफ़ करने के लिए विवश हो जाए. कुछ समय पहले हुए एक अध्धयन के मुताबिक अकेले दिल्ली स्थित धार्मिक स्थलों से ही तकरीबन 20,000 किलोग्राम फूल रोजाना निकलते हैं और उनका 80 प्रतिशित हिस्सा यमुना में बहा दिया जाता है. देश की छोटी-बड़ी हर नदी आस्था के इस अन्धविश्वास की कीमत चुका रही है. अकेले गंगा में ही प्रतिदिन 2 करोड़ 90 लाख लीटर से ज्यादा कचरा गिरता है, जिसमें आस्था के नाम पर बहाई जाने वाली सामग्री भी शामिल है. इतना ही नहीं लंदन की टेम्स नदी भी कुछ वक्त पहले तक भारतियों की आस्था की आग में जल रही थी. हालांकि सरकार की कड़ाई और लोगों की इच्छाशक्ति से अब वहां के हालात सुधारने लगे हैं. सद्गुरु जग्गी वासुदेव और उनके अनुयायियों का मानना है कि जागरुकता फैलाकर नदियों को नष्ट होने से रोका जा सकता है. लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि हालात अब जागरुकता के दायरे से बाहर निकल गए हैं. लोग जागरुक भी उन मुद्दों के प्रति होना चाहते हैं, जहां उन पर कोई रोक-टोक न हो. आज के वक़्त में जागरुकता से कुछ होने वाला नहीं है. सरकार और पुलिस से लेकर तमाम संस्थाएँ यातायात नियमों के पालन के लिए जागरुकता फैलाते रहते हैं, लेकिन फिर भी उनका उल्लंघन सबसे ज्यादा होता है. जबकि यह मुद्दा प्रत्यक्ष तौर पर लोगों के जीवन और मौत से जुड़ा है. जब लोग अपने जीवन के लिए जागरुक नहीं होना चाहते तो उनसे नदियों को बचाने के लिए जागरुक होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है.

जानते हैं, मानते नहीं
ऐसा नहीं है कि लोग नदियों में कचरा फेंकने के दुष्प्रभाव से परिचित नहीं हैं, वे सब जानते हैं, लेकिन मानना नहीं चाहते. ऐसी स्थिति में जागरुकता फैलाने की नहीं बल्कि जबरन जागरुक किए जाने की ज़रूरत है. जिस तरह चौराहे पर पुलिसकर्मी को देखकर चालान से डर से नियम मानने की आदत विकसित हो जाती है, ठीक वैसे ही यदि नदियों में आस्था के नाम पर कचरा फेंकने वालों को भारी जुर्माने का भय दिखाया जाए तो थैलियां लेकर घाटों पर जाने वालों की संख्या अपने आप कम हो जाएगी. इसलिए मिस्ड कॉल देकर, रैलियां निकालकर और नीले वस्त्र धारण करके अगर आप समझते हैं कि लोग जागरुक हो जाएंगे और सरकार मुस्तैद, तो आप पूरी तरह गलत हैं. नदियों को स्वांग की नहीं काम की ज़रूरत है, जितनी जल्दी हम यह समझ लें उतना ही अच्छा है.

SHIRDI: एयरपोर्ट से ज्यादा लोकल ट्रांसर्पोटेशन सुधारने की जरूरत थी

तीर्थस्थलों में शिरडी (SHIRDI) का अपना एक अलग ही महत्व है, और ये महत्व पिछले थोड़े से वक्त में ही काफी बढ़ गया है। हर रोज तकरीबन 50 से 60 हजार श्रद्धालु सांईबाबा के दर्शन को आते हैं। मुख्य मंदिर के अंदर और बाहर काफी अच्छी व्यवस्थाएं की गई हैं, श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए भी बेहतर इंतजाम है। बाबा के दर्शन के साथ-साथ शिरडी में देखने वाला कुछ है तो वो है बोर्ड द्वारा तैयार किया गया नवीन प्रसादालय (डाइनिंग हॉल)। एशिया के इस सबसे बड़े डाइनिंग हॉल में एक बार में 5500 लोग बैठकर खाना खा सकते हैं। एक दिन में यहां 100,000 लोगों को भोजन कराने की व्यवस्था है। 7.5 एकड़ में फैले प्रसादालय को 240 मिलियन रुपए की लागत से तैयार किया गया है। शिरडी बोर्ड सालाना तकरीबन 190 मिलियन खाने पर ही खर्च करता है। डाइनिंग हॉल की एक और जो सबसे बड़ी खासियत है वो है साफ-सफाई। सफाई का आलम यहां ये है कि आपको एक मक्खी तक नजर नहीं आएगी। सेवाकार्य में लगे कर्मचारी भी साफ-सुथरे कपड़ों के साथ हाथों में दस्ताने पहनकर प्रसाद वितरित करते हैं। प्रसादालय तक जाने के लिए बोर्ड की तरफ से बस भी चलाई जाती है, लेकिन रास्ता इतनी लंबा भी नहीं है कि बस की जरूरत पड़े। श्रद्धालु अगर चाहें तो पैदल भी जा सकते हैं। थोड़ी बहुत लूट-खसोट जो दूसरे तीर्थस्थलों पर होती है वो यहां भी है, मगर यहां दूसरी जगहों की अपेक्षा व्यवस्थाएं काफी बेहतर हैं सिवाए मंदिर तक पहुंचने के। कोपरगांव स्टेशन से शिरडी तक पहुंचना अपने आप में टेढ़ी खीर है, और ये खीर और भी टेढ़ी हो जाती है अगर आप समूह में नहीं हैं। स्टेशन से शिरडी जाने के लिए मैजिक (बड़े टैम्पो) चलते हैं, जिसका किराया प्रति व्यक्ति 40-50 रुपए है।

इसके साथ ही प्राइवेट टैक्सियां और ऑटो भी हैं, जो वक्त और सवारी देखकर अपने किराए का मीटर भगाते रहते हैं। शिरडी आने वाले ज़्यादातर लोग मैजिक से जाना ही पसंद करते हैं, जायज है एक तो ये सस्ता पड़ता है और दूसरा हर कोई बमुश्किल 30 मिनट के रास्ते के 300-400 रुपए नहीं खर्च नहीं कर सकता। मगर इस सस्ते सफर की सबसे बड़े परेशानी ये है कि एक अकेले व्यक्ति को इसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। मतलब अगर आप संख्या में एक या दो हैं तो मैजिक वाले आपको कोई घास नहीं डालेंगे आपको ही उनके पीछे-पीछे भागना होगा। हो सकता है कि आपको बैठाने के बाद नीचे उतार दिया जाए। मसलन, यदि मैजिक वाले को दो सवारी की जरूरत है और उसे तीन इकट्ठी मिल गईं तो अकेले व्यक्ति को उतरना ही होगा। टांसर्पोटेशन के काम में लगे ज़्यादातर लोग मराठी हैं। और इस मराठी लॉबी में काफी एकता है, इसलिए बहसबाजी या बात बढ़ाने से अच्छा उतरना ही होता है। वैसे अकेले सवारी ढूंढने में वक्त बर्बाद करने से भला होगा कि कुछ दूसरे लोगों को जो अकेले हों साथ लेकर चार-पांच सदस्यों का एक ग्रुप बनाया जाए, इसके बाद शायद आपको उतना परेशान न होना पड़े। अहम सवाल बस यहीं से शुरू होता है। शिरडी बोर्ड कमाई के मामले में तिरुपति बालाजी की राह पर है। बोर्ड की सालाना कमाई तकरीबन 200 करोड़ के आसपास है।

बीते दिनों बोर्ड की पहल पर यहां हवाई सेवा की शुरुआत हुई. इसके लिए 2010 में बोर्ड ने एयरपोर्ट निर्माण के लिए राज्य सरकार को 100 करोड़ रुपए की मदद की थी। बोर्ड के इस फैसले का चौतरफा विरोध भी हुआ था, बोर्ड के ट्रस्टी और पूर्व राज्यपरिवहन मंत्री के इस कदम पर खुद उनके पिता और भूतपूर्व सांसद बालासाहब ने एतराज जताया था। श्रद्धालुओं के एक तबके ने भी इसकी आलोचना की, उनका कहना था कि एयरपोर्ट के लिए 100 करोड़ देने के बजाए बोर्ड इस रकम को गरीबों के उत्थान के लिए खर्च करता। हालांकि बोर्ड का तर्क था कि एयरपोर्ट बनने से शिरडी तक का आवागमन काफी आसान हो जाएगा। ये बात बिल्कुल सही भी है, लेकिन इसका सबसे ज्यादा फायदा किसे मिलेगा इस पर भी गौर करने की जरूरत है। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हवाई जहाज से चलने की हैसीयत नहीं रखता, और शिरड़ी पहुंचाने वाले अधिकांश लोग इसी हिस्से से ताल्लुकात रखते हैं।

एयरपोर्ट से केवल एलीट क्लास को सहूलियत होगी, बोर्ड को अगर आवागमन सुगम बनाना ही था तो पहले उसे कोपरगांव से शिरड़ी तक के लोकल ट्रांसर्पोटेशन को दुरुस्त करने के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए थे। इसके लिए जैन समुदाय के तीर्थस्थल महावीरजी का उदाहरण लिया जा सकता है। स्टेशन से मुख्यमंदिर तक के लिए बोर्ड ने बसें संचालित कर रखी हैं। इसके लिए श्रद्धालुओं से कोई किराया भी नहीं लिया जाता, श्रद्धा स्वरूप अगर कोई कुछ दान देना चाहे तो बात अलग है। वैष्णो देवी की ही बात करें तो वहां हेलीकॉप्टर सेवा शुरू होने से पहले दूसरे जरूरी इंतजामों पर ध्यान दिया गया था। ये बात अलग है कि आज वहां व्यवसायिकरण कुछ यादा ही हो गया है। 100 करोड एयरपोर्ट के लिए देने के बजाए अगर बोर्ड कुछ बसें चलवा देता तो शायद उसे आलोचनाओं के बजाए तारीफें मिल रही होतीं। शिरडी बोर्ड को सबसे पहले आम श्रद्धालुओं के बारे में सोचना चाहिए था, वो अगर चाहता तो कुछ किराया भी निर्धारित कर सकता था। अब जब हवाई अड्डा तैयार है और सेवा शुरू हो चुकी है, यही उम्मीद की जा सकती है कि बोर्ड या राज्य सरकार आम श्रद्धालुओं की सुविधा के बारे में भी जल्द ही कोई फैसला लेगी.

म्यांमार पर मोदी की ख़ामोशी जायज

नीरज नैयर
आजकल रोहिंग्या मुसलमानों (Rohingya Muslim) का मुद्दा सुर्ख़ियों में है. यूं तो इसका प्रत्यक्ष तौर पर भारत से कोई नाता नहीं है, लेकिन सीमा पार से आ रहे शरणार्थियों ने इसे नई दिल्ली के लिए भी अहम् मुद्दा बना दिया है. दरअसल म्यांमार में अल्पसंख्यक माने जाने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का माहौल है, जिसके चलते वो दूसरे मुल्कों का रुख करने को विवश हैं. इस विवशता ने भारत सहित कई अन्य देशों के सामने शरणार्थियों की समस्या को जन्म दिया है और आने वाले दिनों में इस समस्या के गंभीर होने की आशंका है. क्योंकि इस तरह की घटनाएं चेन रिएक्शन जैसी होती हैं. रोहिंग्या मुसलमान अकेले म्यांमार (Myanmar) में ही नहीं हैं, श्रीलंका में भी वो अल्पसंख्यक जीवन व्यतीत कर रहे हैं. इसके अलावा चीन में भी जब-तब उइगुर मुस्लिमों के शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद होती रहती है. कुछ साल पहले वहां के हालात म्यांमार जैसे हो गए थे. माना जाता है कि रोहिंग्या मुसलमान 1400 ई. के आस-पास बर्मा (म्यांमार) में आकार बसे. उन पर अत्याचार का सिलसिला उस दौर से ही जारी है, जिसकी वजह से इस समुदाय का एक बड़ा तबका बांग्लादेश में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा है. रोहिंग्या मुस्लिमों को म्यांमार की नागरिकता भी प्राप्त नहीं है. संयुक्त राष्ट्र सहित कई देश म्यांमार के हालात पर चिंता जाहिर कर चुके हैं और इसके लिए सीधे तौर पर आंग सान सू ची की सरकार को दोषी ठहराया जा रहा है. इसके अलावा इन मुस्लिमों को पनाह देने की मांग भी लगातार उठ रही है.

बेमतलब के तर्क
भारत के अंदर भी बड़े पैमाने पर यह माना जा रहा है कि संकट की इस घड़ी में हमें रोहिंग्या का साथ देना चाहिए, हालांकि मोदी सरकार इसके लिए तैयार नज़र नहीं आती. प्रधानमंत्री मोदी जब बीते दिनों म्यांमार की यात्रा पर गए, तो संपूर्ण विश्व टकटकी लगाए देख रहा था कि वे रोहिंग्या समस्या पर वहां के शासकों से क्या बात करते हैं. इसलिए जब मोदी ने इस मुद्दे को अपने एजेंडे से बिल्कुल अलग रखा, तो उन पर सवाल खड़े किए जाने लगे. सिद्धार्थ वरदराजन जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने तो रोहिंग्या की मदद के लिए आगे न आने को मोदी और भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे से जोड़ डाला. ये बेहद दुःख की बात है कि बुद्धिजीवी कहा जाने वाला तबका भी आम लोगों की तरह हर मुद्दे को एक ही नज़रिए से देखने की मानसिकता से ग्रस्त है. इसमें कोई दोराय नहीं कि पिछले कुछ वक़्त में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के मामले बढ़े हैं, और इसके लिए हिंदूवादी एजेंडे को कुसूरवार माना जा रहा है. लेकिन रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या को क्या इसी चश्मे से देखना नासमझी नहीं?

हैं कुछ मजबूरियां
भारत सरकार यदि रोहिंग्या मुस्लिमों से दूरी बनाए हुए है, तो उसके कई वाजिब कारण हैं. यह मसला अगर देश की सीमा के भीतर का होता तो इस दूरी को जायज ठहराया जा सकता था, लेकिन यहां सरकार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने कूटनीतिक और आर्थिक हितों को भी ध्यान में रखना है. म्यांमार में प्राकृतिक ऊर्जा का भंडार है, जो भारत की उर्जा ज़रूरतों को बड़े पैमाने पर पूरा कर सकता है. इसके अलावा उत्तरपूर्वी राज्यों में सक्रिय उन आतंकियों के खिलाफ भी भारत को म्यांमार के साथ की ज़रूरत रहती है, जो छुप-छुप पर देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देते हैं. भारत की सबसे बड़ी समस्या चीन और म्यांमार के बीच बढ़ती नजदीकी भी है. चीन म्यांमार के सबसे बड़े समर्थक के रूप में उभरकर सामने आ रहा है. नोबल पुरस्कार विजेता मलाला ने जब रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार के लिए बर्मा सरकार को कोसा, तो उनका विरोध करने वालों में चीन पहले नंबर पर था. 2006 में जब म्यांमार पर प्रतिबंध लगाने के लिए सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पेश किया गया था, तो चीन और रूस ने ही उसे वीटो किया था. 1993 में जब भारत ने आंग सान सू ची को नेहरू सम्मान से नवाज़ा था, तो बर्मा सरकार ने हमारे बागियों से शिकंजा ढीला कर लिया. इसी तरह 2001 में भारत के इस आरोप के जवाब में कि अल कायदा से जुड़े परमाणु वैज्ञानिक म्यांमार में छुपे हैं, वहां की सरकार ने तकरीबन 200 आतंकियों को मुक्त कर दिया था.

पहले विचार करें
म्यांमार के साथ भारत की सीमा 1300 किमी लंबी है. हमारा समस्याग्रस्त पूर्वोत्तर क्षेत्र म्यांमार से लगा हुआ है, ऐसे में यदि हमारा कोई कदम वहां की हुकूमत को नाराज़ करता है, तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं. वैसे गौर करने वाली बात यह भी है कि मानवाधिकारों की मूरत कही जाने वालीं आंग सान सू ची सत्ता में होने के बावजूद खामोश हैं. जो अत्याचार संपूर्ण विश्व को नज़र आ रहा है, वो उन्हें क्यों नहीं? राष्ट्रपति की कुर्सी पर भले ही वे विराजमान न हों, लेकिन सब जानते हैं कि सत्ता की बागडोर उन्हीं के हाथ है. ठीक वैसे ही जैसे कभी मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया गांधी सत्ता संभाल रहीं थीं. ऐसे में भारत रोहिंग्या मुसलमानों को पनाह देकर या उनके समर्थन में आवाज़ उठाकर बेवजह म्यांमार से दुश्मनी मोल क्यों ले? इस मुद्दे पर नई दिल्ली की ख़ामोशी पूरी तरह जायज है, क्योंकि राष्ट्रीय हितों की कुर्बानी देकर वैचारिक लकीर का फ़कीर बनने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है.

हजरत ने तो नहीं कहा, कुर्बानी चाहिए !

नीरज नैयर
बीते दिनों ऐसे ही सड़क से गुजरते हुए कुछ लोग दिखाई दिए, उन्होंने अपनी बाइक के पिछले हिस्से में एक डंडा फंसाया हुआ था, जिसके दोनों तरफ मुर्गियों को बेतरतीबी से लटकाया गया था. मुर्गियां फड़फड़ा रही थीं, लटके-लटके उनकी आवाज ने भी शायद उनका साथ छोड़ दिया था. चंद पलों के लिए उनकी तड़पन दिखाई देती और फिर ऐसे खामोश हो जातीं जैसे कभी जान थी ही नहीं. थोड़ी ही देर में वो बाइक आंखों से ओझल हो गई, और एक आत्मग्लानी मन में लिए करोड़ों हिंदुस्तानियों की तरह मैं भी आगे बढ़ निकला. ऐसी दुर्दशा तो उस आलू-भिंडी-टमाटर की भी नहीं होती, जिसमें कोई जान नहीं होती। पर शायद मांस का व्यापार करने और खाने वालों की नजर में ये जीवित प्राणी निर्जीव वस्तु से भी गया गुजरा स्थान रखते हैं.

क्रूरता के कई मायने हैं और वो कई रूप में हमारे सामने आती है, लेकिन इस क्रूरता को क्या नाम दिया जाए ये मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं. इस वाकये ने कुछ साल पहले एक अखबार में छपी उन तस्वीरों की याद ताजा कर दी है, जिसकी भयावहता आज भी मेरे बदन में सिरहन पैदा कर देती है. वो तस्वीरें ईद के बाद प्रकाशित हुईं थीं. हाथों में धारधार हथियार लिए मुस्लिम समुदाय के लोग एक ऊंट पर प्रहार कर रहे थे, ऊंट के गले से खून की धारा बह रही थी और उसकी आंखों में दर्द का सैलाब उमड़ आया था. वो चीख रहा था, मगर उसकी कद्रन कर देने वाली चीख उल्लास के शोर में दब गई थी. उन तस्वीरों को देखकर मेरे मुंह से सबसे पहले बस यही निकला था, आखिर ये कैसा त्योहार? कुर्बानी और बलि के नाम पर बेजुबानों को बे-मौत मारा जाता है. मारने वालों के पास अपने बचाव की तमाम दलीलें है, कोई इसे परवरदिगार का पैगाम कहता है, तो कोई देवी का संदेश. लेकिन क्या इन दलीलों की प्रमाणिकता सिद्ध की जा सकती है? जो मुस्लिम समुदाय कुर्बानी की बातें करता है वो हजरत मुहम्मद के जीवन से कुछ सीख क्यों नहीं लेता. हजरत साहब ने तो कभी किसी पशु-पक्षी को कष्ट पहुंचाने तक के बारे में भी नहीं सोचा.

बात करीब पंद्रह सौ साल पहले की है, अरब के रेगिस्तान से एक काफिला गुजर रहा था. कुछ दूर चलने के बाद काफिले के सरदार ने उचित स्थान का चुनाव कर रात में पड़ाव डालने का फैसला लिया. काफिले वालों ने ऊंटों पर लदा अपना-अपना सामान उतारा. कुछ देर के आराम के बाद उन्होंने नमाज अता की और खाना पकाने के लिए चूल्हे जलाना शुरू कर दिए. काफिले के सरदार एक चूल्हे के पास पड़े पत्थर पर बैठकर जलती हुई आग को निहारने लगे. अचानक ही उनकी निगाह चूल्हे के नजदीक बने चीटियों के बिल पर गई, जो आग की तपिश से व्याकुल होकर यहां यहां-वहां भागने के लिए रास्ता तलाश रहीं थीं. चीटियों की इस व्याकुलता ने सरदार को भी व्याकुल कर दिया. वो अपनी जगह से उठे और चीखकर बोले, आग बुझाओ-आग बुझाओ. उनके साथियों ने बिना कोई सवाल-जवाब किए तुरंत आग बुझा दी, सरदार ने पानी का छिड़काव कर चूल्हे को ठंडा किया, ताकि चीटिंयों को राहत मिल सके। काफिले वालों ने अपना सामान उठाया और दूसरे स्थान की ओर चल निकले. उन चीटिंयों के लिए जिन्हें शायद हमने कभी जीवित की श्रेणी में रखा ही नहीं, चूल्हे बुझवाने वाले सरदार थे हजरत मुहम्मद. हजरत साहब ने हमेशा प्रेम और शांति का पाठ पढ़ाया. उन्होंने स्वयं कहा कि तुम समस्त जीव-जंतुओं पर दया करो, परमात्मा तुम पर दया करेगा.

सहाबी जाबिर बिन अब्दुल्ला को हजरत मोहम्मद का साथी माना जाता है. उन्होंने कहा है, एक बार हजरत साहब के पास से एक गधा गुजरा, जिसके चेहरे को बुरी तरह दागा गया था और उसके नथुनों से बह रहा खून उसके साथ हुई क्रूरता की कहानी बयां कर रहा था. गधे का दर्द देखकर हजरत साहब दुख और क्रोध में डूब गए, उन्होंने कहा, जिसने भी मूक जानवर को इस अवस्था में पहुंचाया है उस पर धिक्कार है. इस घटना के बाद हजरत मोहम्मद ने घोषणा की कि न तो पशुओं के चेहरे को दागा जाए और न ही उन्हें मारा जाए. याहया इब्ने ने भी हजरत मोहम्मद की करुणा और प्रेमभाव का उल्लेख किया है. उन्होंने लिखा है कि एक दिन मैं मोहम्मद साहब के पास बैठा था, तभी एक ऊंट दौड़ता हुआ आया और साहब के सामने आकर बैठ गया. उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे. मोहम्मद साहब ने तुरंत मुझसे कहा, जाओ देखो ये किसका ऊंट है और इसके साथ क्या हुआ है. मैं किसी तरह ऊंट के मालिक को खोजकर ले आया, मोहम्मद साहब ने उससे पूछा, क्या ये ऊंट तुम्हारा है? उसने कहा, हम पहले इसे पानी ढोने के काम में इस्तेमाल किया करता था, पर अब ये बूढ़ा हो चुका है और काम करने लायक नहीं है. इसलिए हम सब ने मिलकर फैसला लिया है कि इसे काटकर गोश्त बांट लेंगे.

हजरत साहब ने कहा, इसे मत काटो या तो इसे बेच दो या मुझे ऐसे ही दे दो. इसपर उस व्यक्ति ने कहा, जनाब आप इसे बगैर कीमत के ही रख लीजिए. मोहम्मद साहब ने उस ऊंट पर सरकारी निशान लगाया और उसे सरकारी जानवरों में शामिल कर लिया. हजरत ने उस व्यक्ति के लिए धिक्कार कहा है जो किसी जीव को निशाना बनाए. उन्होंने फरमाया है कि अगर कोई व्यक्ति गौंरेया को बेकार मारेगा तो कयामत के दिन वह अल्लाह को फरियाद करेगी कि इसने मुझे कत्ल किया था. हजरत मोहम्मद ने जानवरों से उनकी शक्ति से अधिक काम लेने को भी गलत बताया है. एक बार की बात है हजरत साहब ने देखा कि एक काफिला जाने की तैयारी कर रहा है. काफिले में शामिल एक ऊंट पर इतना बोझ लादा गया कि वो भार के बोझ तले दबा जा रहा था. हजरत साहब ने तुरंत उसका बोझ कम करने को कहा.

इस्लाम में एक चींटी की अकारण हत्या को भी पाप बताया गया है, बावजूद इसके कुर्बानी के नाम पर बेजुबानों को निर्दयीता से मौत के घाट उतार दिया जाता है. हजरत साहब ने कहा था, जिसके मन में दयाभाव नहीं, वह अच्छा मनुष्य नहीं हो सकता. इसलिए दया और सहानुभूति एक सच्चे मुसलमान के लिए जरूरी हैं. बात सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित नहीं है, हिंदू धर्म में भी अंधी आस्था के नाम पर देवी-देवताओं को बलि चढ़ाई जाती है. आस्था और अंधविश्वास के बीच बहुत बड़ा फासला होता है, लेकिन अफसोस की लोग इसे समझना नहीं चाहते. आखिर खून का भोग लगाकर उसे कैसे प्रसन्न किया जा सकता है, जो खुद दूसरों को जीवन देता है. जब तक ये बात लोगों को समझ में नही आती, खौफनाक वाकये यूं ही आखों के सामने से गुजरते रहेंगे और हम यूं ही आत्मग्लानी मन में लिए आगे बढ़ते चले जाएंगे.
(प्रदीप शर्मा लेख से लिए सज्ञान के मुताबिक )

क्या मनमोहन काल में लिखी गई थी बाबा के जेल जाने की कहानी?

राम रहीम को सजा सुनाए जाने के बाद, जहां इसका क्रेडिट लेने की अप्रत्यक्ष जंग चल रही है वहीं पूर्व सीबीआई अधिकारी के खुलासे ने कांग्रेस को खुश होने का एक मौका दिया है. तत्कालीन जांच अधिकारी एम. नारायणन का कहना है कि डेरा प्रमुख के खिलाफ जांच करते समय उन्हें पूर्व प्रधनामंत्री मनमोहन सिंह का पूरा सहयोग मिला, जिसके बिना आगे बढ़ना संभव नहीं था. नारायणन के मुताबिक, हरियाणा और पंजाब के नेताओं द्वारा राम रहीम के प्रति नरमी बरतने का दबाव डाला जा रहा था. इस बारे में जब मनमोहन सिंह से बात की, तो उन्होंने राजनीतिक दबाव को दरकिनार करते हुए सीबीआई को काम करने की पूरी आज़ादी दी.

नारायणन कहते हैं, मामला 2002 में एक गुमनाम चिट्टी के ज़रिये सामने आया, लेकिन 2007 तक कोई कार्रवाई नहीं की गई. इसके बाद हरियाणा-पंजाब हाईकोर्ट ने तत्कालीन सीबीआई चीफ विजय शंकर को तलब करके 57 दिनों में जांच पूरी करने के निर्देश दिए. बकौल नारायणन यह काम इतना आसान नहीं थी. जब हम जांच करने पहुंचे तो पता लगा कि 1999 से 2002 के बीच 200 से ज्यादा यौन उत्पीड़न की शिकार साध्वियां डेरा छोड़कर चली गईं थीं. भरपूर कोशिशों के बावजूद हम 10 साध्वियों तक पहुंचने में कामयाब रहे, लेकिन सबकी शादी हो चुकी थी और कोई भी आगे आना नहीं चाहती थी. किसी तरह हमने दो साध्वियों को रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए राजी किया और 56वें दिन अदालत में चार्जशीट दाखिल हो सकी.

2009 में रिटायर्ड हुए नारायणन का कहना है कि रणजीत सिंह बाबा का समर्पित सेवादार था, पर जब उसे अपनी बहन के साथ बलात्कार के बारे में पता चला तो वो बहन को लेकर सिरसा से दूर चला गया. इसके कुछ दिनों बाद ही बाबा से जुड़ी एक गुमनाम चिट्टी प्रधानमंत्री और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट पहुंची. बाबा के समर्थकों को शक था कि इस चिट्टी के पीछे रंजीत का हाथ है, जिसके चलते उसकी हत्या करवा दी गई. ये साबित हो चुका है कि जिस रिवाल्वर से रंजीत ही हत्या हुई, वो डेरा के मैनेजर की ही थी. इसके अलावा अपराध स्थल पर डेरा का वॉकी-टॉकी भी मिला था.

ये हैं दुनिया के सबसे कंजूस अरबपति

दुनिया भर में अरबपति अपने शाही अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं. लक्ष्मी मित्तल की बेटी की शादी में हुआ खर्चा आपको याद ही होगा. ज्यादा दूर न जाएं तो मुकेश अंबानी का घर ही देख लीजिए, जिसकी चर्चा पूरी दुनिया में होती है. लेकिन कुछ अरबपति ऐसे भी हैं, जो एक-एक पाई खर्च करने से पहले भी सौ बार सोचते हैं. अब आप इसे उनकी सादगी कहें या कंजूसी कि वे सालों से एक ही कार में चल रहे हैं.

जे. पॉल गेटी
अमेरिकी बिजनेसमैन जे. पॉल गेटी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके किस्से आज भी मशहूर हैं. गेटी के घर में लगा टेलीफोन अगर उनके परिवार का कोई दूसरा सदस्य इस्तेमाल करता था, तो उसे पैसे भरने होते थे. इतना ही नहीं गेटी ने अपने पोते के किडनैपरों को फिरौती की रकम देने से भी इंकार कर दिया था.

इंग्वार कैम्पमर्ड
कैम्पमर्ड प्रसिद्ध स्वीडिश कंपनी आईकिया के मालिक हैं. इनकी संपत्ति 6 अरब डॉलर है, लेकिन वो अभी भी अपनी सेकंड हैंड कार से ही चलते हैं. उन्होंने कोई ड्राइवर भी नहीं रखा है. जब बात हवाई सफ़र की आती है, तो कैम्पमर्ड इकोनॉमी क्लास को ही चुनते हैं. अपने इस हट के अंदाज़ के चलते ही उनके गांव में लोग उन्हें कंजूस अंकल के नाम से बुलाते हैं.

गैरी हार्वी
हार्वी ऑस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध बिजनेसमैन हैं. उनकी संपत्ति 87 करोड़ डॉलर है पर कंजूसी ऐसी कि छोटी से छोटी वस्तु खरीदने में भी सौ बार सोचते हैं. हार्वी को उनके साथी भी कंजूस मानते हैं, हालांकि हार्वी इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते. उनका कहना है कि पैसा सोच समझकर खर्च करने के लिए होता है.

वॉरेन बफे
दुनिया के सबसे मशहूर निवेशकों में शुमार बफे दुनिया के चौथे सबसे रईस व्यक्ति हैं. उनकी संपत्ति 60 अरब डॉलर है. इस लिहाज से तो उनकी लाइफस्टाइल काफी शाही होने चाहिए थी, मगर हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. बफे कभी नई कार नहीं खरीदते, उन्हें पुरानी कारें ही ज्यादा भाती हैं. उनके पास कोई ड्राइवर भी नहीं है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि वॉरेन बफे ने 1958 में जो घर खरीदा था, आज भी वो उसी में रहते हैं. वैसे चैरिटी के मामले में वॉरेन बफे काफी आगे रहते हैं.

जॉन कैडवेल
मशहूर ब्रिटिश व्यवसायी कैडवेल की संपत्ति 2.4 अरब डॉलर है. वे आज भी 17 किमी दूर अपने ऑफिस का सफ़र साइकिल से तय करते हैं. इतना ही नहीं कैडवेल अपने बाल खुद काटते हैं. हालांकि इसके पीछे उनका तर्क है कि समय कि बचत होती है. शॉपिंग करते वक़्त कैडवेल ऐसे कपड़े ही खरीदना पसंद करते हैं, जिन पर कुछ न कुछ डिस्काउंट हो.

बाबा की ‘बेटी’ भी कम नहीं!

बलात्कारी बाबा गुरमीत राम रहीम के जेल जाने के बाद अब सबकी नज़रें उनकी कथित बेटी हनीप्रीत इंसान पर टिक गईं हैं, क्योंकि उन्हें ही बाबा के साम्राज्य की सबसे प्रबल वारिस के तौर पर देखा जा रहा हैं. हालांकि बाबा का बेटा भी इस दौड़ में है, लेकिन हनीप्रीत का पलड़ा थोड़ा भारी है. इसकी वजह है बाबा से उसका जुड़ाव. हनीप्रीत बाबा के साथ साये की तरह चलती थी. यहां तक कि अदालत के फैसले के बाद उन्हें बाबा के साथ सरकारी हेलिकॉप्टर में भी देखा गया था.

बड़े-बड़े दावे
बाबा की ऑन स्क्रीन बेटी के जलवे बाबा से कम नहीं हैं. फेसबुक पर हनीप्रीत को पांच लाख लोग फॉलो करते हैं. उनकी अपनी एक वेबसाइट हैं, जो बड़े-बड़े दावे करती है. वेबसाइट के मुताबिक हनीप्रीत बाबा की तरह लोगों की हर संभव मदद करती हैं. इसके लिए वो शहरों से लेकर जंगलों तक में जाने से नहीं झिझकतीं. वेबसाइट कहती है कि हनीप्रीत ने भले ही किसी तरह की पेशेवर ट्रेनिंग नहीं ली, लेकिन वह पेशेवर अभिनेत्रियों जैसी एक्टिंग करने में सक्षम हैं और ऐसा राम रहीम के चलते संभव हो सका.

बाबा अपने, पति पराया
बाबा और हनीप्रीत की करीबी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने तमाम भक्तों के साथ मिलकर राम रहीम को पद्म सम्मान से नवाजे जाने की मांग सरकार से की थी. हालांकि मोदी सरकार ने उसे ठुकरा दिया. हनीप्रीत को संगठन से युवाओं को जोड़ने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. हनीप्रीत ने बाबा के फेर में पति को ठुकरा दिया था. जब विश्वास गुप्ता ने बाबा पर हनीप्रीत को उससे दूर करने का आरोप लगाया तो बाबा की इस बेटी ने अपने पति पर दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज करा दिया. इसके बाद ही वह डेरा मुख्यालय में रह रही हैं.

नाम में बहुत कुछ रखा है जनाब, जरा ये देखिए!

नाम में क्या रखा है? ये महज कहने की बात है. अगर नाम अच्छा न हो तो कई बार शर्मिंदगी का सामना भी करना पड़ता है. कभी-कभी माता-पिता अपने बच्चों के ऐसे नाम रख देते हैं, जिनकी कीमत बच्चों को ताउम्र चुकानी पड़ती है. अब इन नामों को ही देख लीजिए…

Valentine Mirchi