2017 की ये तस्वीरें बताती हैं कि इंसानियत अभी जिंदा है

ऐसे वक़्त में आपकी सौहार्द और भाईचारा राजनीतिक साजिशों की भेंट चढ़ रहा है 2017 की कुछ तस्वीरें बताती हैं कि दुनिया में इंसानियत अभी भी जिंदा है. आइए तस्वीरों के माध्यम से जानते हैं कुछ ऐसे ही लोगों के बारे में जिन्होंने अपनी परवाह किए बिना दूसरों की जिंदगी बचाई..

रोक दिया राष्ट्रपति का काफिला
ऐसे मामले कम ही सुनने में आते हैं जब किसी सामान्य व्यक्ति की जान बचाने के लिए वीवीआईपी को इंतज़ार करवाया जाए. बेंगलुरु ट्रैफिक पुलिस के सब इंस्पेक्टर एमएल निजालिंगप्पा को जब पता चला कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के काफिले की वजह से एक एम्बुलेंस फंसी हुई है, तो उन्होंने राष्ट्रपति के काफिले को रोककर एम्बुलेंस को रास्ता दिया.

मुश्किल वक़्त में मिली मदद
बारिश के दौर में कभी न थमने वाले मुंबई की रफ़्तार भी मंद पड़ जाती है. इस साल जब ऐसा हुआ तो मुंबईवासियों ने बारिश में फंसे लोगों के लिए मदद के दरवाजे खोल दिए. उन्हें खाना-पानी से लेकर ज़रूरत का हर समान मुहैया करवाया गया. पीड़ितों के लिए फ़रिश्ता बनकर आने वालों में कई मुस्लिम परिवार भी शामिल थे. दादर स्थित गुरुद्वारे में 750 लोगों को आसरा दिया गया था.

मिलती है मुफ्त की सवारी
ऑटो वालों पर अक्सर ज़रूरत से ज्यादा पैसे वसूलने के आरोप लगते हैं, लेकिन कर्नाटक निवासी मंजुनाथ निगप्पा ज़रुरतमंदों को मुफ्त में सफ़र करवाते हैं. दिन में मंजुनाथ आम इंसान की तरह नौकरी करते हैं और रात को लोगों की मदद. दिन ढलते ही उनका ऑटो एम्बुलेंस बन जाता है, कोई भी बस एक कॉल पर उनसे सहायता मांग सकता है. इतना ही नहीं अपनी कमाई का कुछ हिस्सा को एक संस्था को दान भी करते हैं.

जवान बने हॉकर का सहारा
उत्तर प्रदेश में जब एक हॉकर की साइकिल चोर ले भागे, तो पुलिसकर्मियों ने मदद का हाथ आगे बढ़ाया. उत्तर प्रदेश पुलिस के डायरेक्टर जनरल के कार्यालय से ट्विटर पर यह स्टोरी पोस्ट की गई थी. पुलिसकर्मियों ने हॉकर को नई साइकिल खरीद के दी, ताकि उसे पैदल न भटकना पड़े.

वीडियो नहीं बनाया, बचाया
टेक्सास में जब एक गाड़ी में डूबने लगी और कोई सहायता नहीं आई, तो आसपास मौजूद लोगों ने इंसानियत का परिचय दिया. लोगों ने मानव श्रृंखला बनाकर कार में फंसे आदमी को सुरक्षित बाहर निकाला. आजकल इस तरह के नज़ारे कम ही देखने को मिलते हैं, क्योंकि लोग किसी की मदद करने के बजाए वीडियो बनाना ज्यादा पसंद करते हैं.

उतर गया 80 फीट गहरे कुंए में
दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जो जानवरों के प्रति भी संवेदना रखते हैं. राजस्थान के अलवर में जब एक आवारा कुत्ता 80 फीट गहरे कुएं में गिर गया तो एक शख्स अपनी जान दांव पर लगाकर उसकी जान बचाई. स्थानीय एनजीओ की मदद से वो शख्स रस्सी के सहारे कुएं में उतरा और कुत्ते को बाहर निकालकर लाया.

ऑटो वाला बना मिसाल
वरिजाश्री वेनुगोपाल को वीजा इंटरव्यू के लिए 5 हजार की ज़रूरत थी, लेकिन किसी भी एटीएम से पैसे नहीं निकल रहे थे. ऐसे मुश्किल वक़्त में एक ऑटो ड्राइवर ने उनकी सहायता की. उस ड्राइवर ने अपने पास से पांच हजार रुपए वरिजाश्री को दिए. हालांकि वरिजाश्री को सिर्फ एक सवारी के रूप में ही जानते थे, फिर भी वो मदद के लिए तैयार हो गए. सोशल मीडिया पर यह स्टोरी काफी वायरल हुई थी.

दोस्त हो तो ऐसा! इस अभिनेता ने अपने दोस्तों को दिए एक-एक मिलियन डॉलर

दोस्ती के किस्से तो आपने बहुत सुने होंगे, लेकिन ये सबसे अलग है. हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता जॉर्ज क्लूनी (George Clooney) ने अपने 14 सबसे करीबी दोस्तों को एक-एक मिलियन डॉलर उपहार के तौर पर दिए हैं. क्लूनी के दोस्त रानडे गेरबेर ने इस बात का खुलासा किया है. गेरबेर के मुताबिक 2013 में क्लूनी ने अपने घर पर एक डिनर रखा था, जिसमें उनके अलावा 13 अन्य दोस्तों को आमंत्रित किया गया था. जब सभी दोस्त आए, तो क्लूनी ने उनसे कुर्सियों पर रखे 14 सूटकेस खोलने को कहा. जैसे कि उन्होंने सूटकेस खोला, उनकी आँखें खुली रह गईं. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, क्लूनी ने कहा, “मैं आप लोगों को बताना चाहता हूँ कि मेरे जीवन में आप क्या मायने रखते हैं. जब मैं लॉस एंजिल्स आया, तो मैंने सड़कों पर रातें गुजरीं. मैं खुद को भाग्यशाली समझता हूँ कि उस मुश्किल वक़्त में आप सभी मेरा साथ देने के लिए मौजूद थे. अगर आप न होते थे मैं कभी इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता”.

टैक्स भी भरा
क्लूनी ने आगे कहा, “यह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था, आज भी जब हम एक साथ हैं, तो मैं आपको कुछ वापस देना चाहता हूँ”. गेरबेर के मुताबिक, सूटकेस में पैसों के साथ एक-एक रसीद भी रखी हुई थी, जब हमने उसे देखा तो पता चला कि क्लूनी ने टैक्स भी खुद भी भर दिया था, ताकि सभी दोस्त पूरी राशि घर ले जा सकें.

कोई चिंता नहीं
क्लूनी ने अपने दोस्तों से कहा, “अब आपको अपने बच्चों की पढ़ाई की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, आपको अपने कर्ज को लेकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. इतना ही नहीं मैंने सभी का टैक्स भी भर दिया है, अब यह एक मिलियन आपके हैं”. गेरबेर मशहूर मॉडल सिंडी क्रॉफोर्ड के पति हैं और क्लूनी के बिज़नेस पार्टनर भी. पहले उन्होंने एक मिलियन डॉलर लेने से इंकार किया, लेकिन जब क्लूनी ने जोर दिया तो मना नहीं कर सके. हालांकि गेरबेर का कहना है कि वे इस राशि को दान कर देंगे.

मिलिए चीन के जय और वीरू से

शोले के जय और वीरू को तो आप जानते होंगे, लेकिन आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं चीन के दो ऐसे दोस्तों से जो सालों से न केवल एक दूसरे का सहारा बने हुए हैं बल्कि तमाम मुश्किलों के बावजूद प्रकृति के प्रति अपने दायित्त्व को निभा रहे हैं. इन दोस्तों को यदि चीन के जय और वीरू कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा. Jia Haixia और Jia Wenqi हर रोज़ पेड़ लगाते हैं ताकि अपने गांव को बाढ़ से बचाया जा सके. ख़ास बात यह है कि Wenqi के दोनों हाथ नहीं हैं और Haixia नेत्रहीन हैं. पिछले 13 सालों से दोनों के दूसरे की आंख और हाथ बने हुए हैं.

दोनों रोजाना हथौड़ा और लोहे की रॉड लेकर जंगल की ओर निकल जाते हैं. Wenqi आगे-आगे चलते हैं और Haixia उनकी शर्ट पकड़कर पीछे-पीछे. जब बात नदी पार करने की आती है, तो Haixia, Wenqi की पीठ पर चढ़ जाते हैं, ताकि तेज़ बहाव उन्हें गिरा न दे. वैसे तो दोनों बचपन के साथी हैं, लेकिन स्कूल के बाद उनके रास्ते जुदा हो गए पर शायद किस्मत में दोबारा मिलना लिखा था. Haixia को बचपन से एक आंख से दिखाई नहीं देता था और साल 2000 में हुए फैक्ट्री हादसे ने उन्हें पूरी तरह से नेत्रहीन बना दिया. Wenqi जब महज 3 साल के थे, तब हाई वोल्टेज बिजली की तार की चपेट में आने से उनके हाथ चले गए.

13 साल पहले जब दोनों फिर से मिले तो उन्होंने एक साथ रहना तय किया. दोनों को पेड़ पौधों का शौक है. इसलिए सरकारी 8 एकड़ ज़मीन पर पर वो पौधे लगाते हैं और उनकी देखरेख करते हैं. Haixia के मुताबिक, हमारे लिए ये काम मुश्किल नहीं. शुरुआत में गांव वालों ने साथ नहीं दिया, लेकिन अब सब हमारे साथ हैं. वन विभाग की तरफ से इस काम के लिए दोनों को कुछ पैसे दिए जाते हैं, जिससे उनका घर चल जाता है. Haixia और Wenqi पूर्वी चीन में दोस्ती की मिसाल बन चुके हैं.

इन महिलाओं से भिड़े तो हड्डियां टूटना तय

आमिर खान की दंगल तो आपको याद होगी फिल्म में जिस तरह फोगाट बहनें बड़े बड़े पहलवानों को धूल चटाती हैं, कुछ वैसा ही केरल की मीनाक्षी अम्मा (Amma) करती हैं। फर्क बस इतना है कि मिनाक्षी की उम्र उनसे कहीं ज्यादा है। केरल के वाटकरा में रहने वालीं 76 Meenakshiammaवर्षीय मीनाक्षी मार्शल आर्ट में अपने से आधी उम्र के पुरुषों को भी चित कर देती हैं। वे प्रचीन भारतीय मार्शल आर्ट फॉर्म कलरीपायट्टू की ट्रेनिंग देकर अपना घर चलाती हैं। पिछले दिनों उनके करतब का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ। वीडियो में वह साड़ी पहने गजब की फुर्ती से लाठी चलाती हुईं नजर आ रही हैं। अम्मा का मानना है कि लोगों को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए और इसके लिए मार्शल आर्ट जैसी कला में निपुण होना जरूरी है।

इनका भी मुकाबला नहीं
चीन निवासी 94 वर्षीय झांग हेक्सिन भी मार्शल आर्ट में माहिर हैं। इस बुजुर्ग महिला की बहादुरी के किस्से आए दिन चीनी मीडिया में सुर्खियां बटोरते रहते हैं। पहली नजर में आम महिला नजर आने वालीं हेक्सिन जब मार्शल आर्ट दिखाती हैं तो लोगों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता है। वो पलक झपकते ही बड़े बड़ों को चित कर सकती हैं। मार्शल आर्ट एक्स्पर्ट हेक्सिन को प्यार से कुंग फू ग्रैंडमा भी कहते हैं। उन्होंने चार साल की उम्र से ही मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ली थी।

कमाल की कंपनीः बोनस में बांटे कार, फ्लैट

गुजरात के एक हीरा व्यापारी ने अपने कर्मचारियों को दिवाली का जो बोनस दिया है, उसे सुनने के बाद शायद आप अपनी कंपनी को कोसें। सूरत के अरबपति व्यवसायी सावजी ढोलकिया ने बोनस के तौर पर अपने कर्मियों को 400 फ्लैट और 1,260 कारें दी हैं। मंगलवार को कर्मचारियों की अनौपचारिक बैठक में इसका ऐलान किया गया। ढोलकिया की डायमंड फर्म हरे कृष्ण एक्सपोर्ट ने diamond-merchantअपनी गोल्डन जुबली के मौके पर इस दिवाली 51 करोड़ रुपए कर्मचारियों के बोनस पर खर्च किए हैं। ढोलकिया 2011 से हर दिवाली इस तरह का बोनस देते आ रहे हैं। पिछले साल उनकी कंपनी ने बोनस के तौर पर 491 कार और 200 फ्लैट बांटे थे। 2014 में भी कंपनी ने कर्मचारियों में बतौर इंसेटिव 50 करोड़ रुपए बांटे थे।

सादगी पसंद
सावजी ढोलकिया अमरेली जिले के दुधाला गांव के रहने वाले हैं। एक जमाने में उन्होंने अपने चाचा से कर्ज लेकर हीरा कारोबार शुरू किया था। अरबपति होने के बावजूद ढोलकिया बेहद सादगी पसंद इंसान हैं। अपने बेटे को पैसे की अहमियत सिखाने के लिए उन्होंने सिर्फ सात हजार रुपए के साथ उसे कोची शहर में रोजी रोटी कमाने भेजा था। ढोलकिया का मानना है कि जब तक इंसान अपने बल पर कुछ हासिल नहीं करता, वो पैसे की अहमियत नहीं समझ सकता।

सेना के जवानों को जाबांज बनाती है यह ‘शेरनी’

क्या आप जानते हैं कि भारतीय सेना के जाबांजो को युद्ध कला में पारंगत करने वालों में एक महिला भी शामिल हैं। डॉ सीमा राव seemaभारत की इकलौती महिला कमांडो ट्रेनर हैं। सीमा पिछले 20 सालों से एनएसजी, पैरा स्पेशल फोर्स, मारकोस मरीन, गरुड़ कमांडो और पुलिस के जवानों को ट्रेनिंग देती आ रही हैं। खास बात ये है कि इसके लिए सीमा ने अब तक कोई फीस नहीं ली है। सीमा डॉक्टर हैं और उन्होंने क्राइसिस मैनेजमेंट में एमबीए की डिग्री भी ली है। मार्शल आटर््स से सीमा का परिचय उनके पति मेजर दीपक राव ने कराया था। ट्रेनिंग के दौरान उन्हें कई गंभीर चोटें आईं, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे।

नहीं मानी हार
सीमा को मिलिट्री में 7 डिग्री ब्लैक बेल्ट मिली हुई है। साथ ही उन्हें शूटिंग, फायर फाइटिंग और स्कूबा डाइविंग में भी महारथ हासिल है। इतना ही नहीं सीमा ने माउंटेनेयररिंग और रॉक क्लाइमिंग में भी कई पुरस्कार हासिल किए है। ट्रेनिंग के दौरान सीमा को एक बार इतनी गंभीर चोट लगी थी कि कुछ वक्त के लिए उनकी याददाश्त चली गई। लंबे इलाज के बाद जब सीमा ठीक हुईं, तो उन्होंने फिर से ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया।

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कई सम्मान
सीमा के पति दीपक राव को 2011 में प्रेसीडेंट ऑफ इंडिया रैंक अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। सीमा को भी अब तक कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है। उन्हें वर्ल्ड पीस अवॉर्ड और प्रेसीडेंट वॉलंटीयर सर्विस अवॉर्ड मिला है। सीमा मार्शल आटर््स पर बनी देश की पहली फिल्म हाथापाई की प्रोड्यूसर डायरेक्टर तो हैं ही, साथ ही उन्होंने फिल्म में रोल भी किया है।

दर्द को नहीं बनने दिया लाचारी

गोल्ड मेडल की जो उम्मीद रियो ओलंपिक में पूरी नहीं हो सकी, उसे मारियप्पन थंगवेलु ने पैरालंपिक खेलों में पूरा कर दिखाया। बीते दिनों उन्होंने पुरुषों के टी 42 ऊंची कूद मुकाबले में 1 89 मीटर की छलांग लगाकर इतिहास रच दिया था। मारियप्पन की इस उपलब्धि को पूरे देश ने सराहा। तमिलनाडु के मारियप्पन के गोल्ड मेडल तक पहुंचने का सफर संघर्षों से भरा रहा। सेलम जिले के mariyappanछोटे से गांव पेरिया वडखनपट्टी के रहने वाले मारियप्पन जब सिर्फ पांच साल के थे, तब सड़क हादसे में उनका दायां पांच कुचल गया। कुली का काम करने वाले पिता और सब्जी बेचने वाली मां के लिए बेटे का इलाज करना आसान नहीं था। काफी प्रसासों के बावजूद माता पिता अपने बच्चे के इलाज के लिए पर्याप्त धन नहीं जुटा सके, नतीजतन मारियप्पन के पैर के घुटने के नीचे का हिस्सा लगभग बेकार हो गया। सब मान चुके थे कि मारियप्पन के लिए जिंदगी में अब कुछ भी बाकी नहीं रहा।

शिक्षक ने पहचाना
मापा पिता अपने बच्चे को इस स्थिति में देखकर पूरी तरह टूट गए थे, लेकिन मारियप्पन ने दर्द को लाचारी नहीं बनने दिया। गांव के एक शिक्षक ने मारियप्पन के अंदर की क्षमता को पहचाना और उन्हें खिलाड़ी बनने के लिए प्रेरित किया। ऊंची कूद में कमाल के प्रदर्शन ने मारियप्पन को 2013 में सुर्खियों में लाया। इसके बाद उनकी नजरें पैरालंपिक खेलों पर जम गईं। इन खेलों से पहले तक चंद लोग ही मारियप्पन को पहचानते थे, लेकिन अब पूरा देश उनकी वाह वाह कर रहा है।

सीखः मारियप्पन की कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किलों के आगे हार मानकर बैठ जाते हैं। तमिलनाडु के इस लाल ने साबित कर दिया है कि यदि दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो आसमां सरीखी बाधाएं भी कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।

देश में नहीं मिला एडमिशन, यूएस ने पहचानी प्रतिभा

ज्ञान किसी प्रमाणपत्र का मोहताज नहीं होता, मुंबई निवासी मालविका जोशी ने इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है। मालविका को अमेरिका के प्रतिष्ठित संस्थान मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) ने दाखिला मिल गया है। mumbaigirlदिलचस्प बात यह है कि मालविका के पास न तो 10वीं सर्टिफिकेट है और न 12वीं का। बावजूद इसके एमआईटी ने अपने दरवाजे उनके लिए खोल दिए हैं। यह सबकुछ कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में मालविका के ज्ञान की बदौलत संभव हो सका। यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि 12वीं पास नहीं होने के चलते मालविका को देश के आला दर्जे के आईआईटी संस्थानों में प्रवेश नहीं मिल रहा था। दरअसल, मालविका ने इंटरनेशनल ओलिंपियाड ऑफ इंफॉरमैटिक्स (IOI) में तीन बार मेडल जीते थे। जिसके चलते एमआईटी ने उन्हें स्कॉलरशिप प्रदान की है।
मेहनत सफल
एमआईटी में विभिन्न ओलिंपियाड के मेडल विजेताओं को प्रवेश देने का नियम है। मालविका अब अपने मेडल की बदौलत अपने सपने को पूरा कर सकेंगी। वो कंप्यूटर प्रोग्रामिंग पर रिसर्च करना चाहती हैं। चार साल पहले मालविका की मां सुप्रिया ने उन्हें स्कूल से निकाल लिया था। स्कूल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के बावजूद मां के इस फैसले से मालविका भी अचरज में थीं, लेकिन उन्होंने अपनी मां पर भरोसा बनाए रखा। सुप्रिया कहती हैं, मेरे पति राज शुरुआत में मेरे निर्णय से सहमत नहीं थे। मैंने एनजीओ की नौकरी छोड़कर स्कूल जैसे पाठ्यक्रम मालविका के लिए तैयार किए। मैंने घर पर ही क्लासरूम जैसा माहौल बनाया था। मैं अपनी बेटी को किताबी ज्ञान से ज्याद देना चाहती थी, आज लगता है मैं उसमें सफल हुई।


मिसाल: चाय वाले ने स्कूल को दान दी जमीन

अगर आप समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं तो जेब नहीं, दिल बड़ा होना चाहिए। झारखंड में एक चाय वाले ने इस बात को सही साबित कर दिखाया है। schoolधीरन मंडल ने अपनी जमीन School को सिर्फ इसलिए दान दे दी, क्योंकि उन्हें बच्चों का खुले आसमान के नीचे पढऩा गंवारा नहीं था। उत्क्रमित मध्य विद्यालय उदबली के पास खुद की कोई जमीन नहीं है। पहले जब ये प्राथमिक स्कूल था, तब इसके पास दो कमरे थे, जो अब पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं। स्कूल को 2006 में प्राथमिक से मध्य विद्यालय घोषित किया गया था। उस वक्त अतिरिक्त भवन निर्माण के लिए राशि आवंटित हुई थी, मगर जमीन नहीं होने के चलते भवन नहीं बन सका। नतीजतन बच्चों को खुले में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है। इस बारे में धीरन ने कहा, मैं बच्चों को ऐसे पढ़ते नहीं देख सकता था। इसलिए मैंने अपनी जमीन दान देने का फैसला लिया। धीरन मंडल को इस फैसले के लिए रिश्तेदारों का विरोध भी झेलना पड़ा। हालांकि बाद में वे सभी विरोधियों को शिक्षा का महत्व समझाने में सफल रहे। धीरन उसी गांव में चाय बेचते हैं, जहां स्कूल है।

शुरू हुआ काम
जमीन मिलते ही शिक्षा विभाग ने नए सिरे से स्कूल का निर्माण शुरू कर दिया है। धीरन के इस फैसले से पूरे गांव में खुशी का माहौल है। बच्चे इस बात को लेकर खुश हैं कि अब उन्हें गर्मी या बारिश में खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ाई नहीं करनी होगी। शिक्षा विभाग ने धीरन का धन्यवाद करते हुए कहा है कि लोगों को उनसे सीख लेनी चाहिए।

इनके रक्त में है रक्तदान

अब तक 87 बार Blood Donate कर चुके हैं श्रीधर

ऐसे वक्त में जब खून के रिश्ते भी दगा दे जाते हैं, एनआर श्रीधर अपने खून से उन लोगों की जिंदगी संवार रहे हैं, जिनसे मानवता के अलावा उनका कोई जुड़ाव नहीं। आगरा निवासी श्रीधर अब तक 87 बार रक्तदान कर चुके हैं, ये आंकड़ा केवल आगरा ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा है। Sridharरक्तदान महादान को सही मायनों में चरितार्थ करने वाले श्रीधर के अथक प्रयासों के चलते करीब 200 लोगों को नई जिंदगी मिली है। भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी)में बतौर हायर ग्रेड असिस्टेंट कार्यरत श्रीधर की पहचान आगरा में रक्त दानवीर के तौर पर होती है। Blood Donation के प्रति श्रीधर की दीवानगी का आलम ये है कि जरूरतमंद के बारे में पता चलते ही वे सारे काम छोडक़र मदद को निकल जाते हैं। शहर के तकरीबन हर अस्पताल, ब्लड बैंक के पास श्रीधर का फोन नंबर है। जब भी किसी को बी निगेटिव की आवश्यकता होती है, सबसे पहला फोन श्रीधर को ही लगाया जाता है। मानवता की सेवा के लिए श्रीधर को कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है।
लोगों को जीवन देने के श्रीधर के इस सफर की शुरुआत 19 साल पहले यानी 1989 में तब हुई जब अखबार के पन्ने पलटते-पलटते उनकी नजर एक सूचना पर गई। जिसमें बी निगेटिव ब्लड की आवश्यकता का जिक्र था। श्रीधर बताए गए पते पर तुरंत पहुंचे और खून देकर उस महिला की जान बचाई। तब से अब तक वे 87 बार रक्तदान कर चुके हैं। श्रीधर कहते हैं, जब मुझे पता चला कि मेरे खून देने के चलते उस महिला की जान बच सकी, तो एक अजीब सी खुशी हुई। आज भी जब रक्तदान करके आता हूं, खुद को बेहद हल्का महसूस करता हूं। इस बात की खुशी रहती है कि मानव जीवन को सार्थक बनाने के लिए मैं कुछ कर रहा हूं।

ऐसे आया ख्याल
श्रीधर बताते हैं कि रक्तदान का बीज उनके मन में स्कूलिंग के दौरान पड़ा। श्रीधर ने आगरा के प्रसिद्ध कॉन्वेंट स्कूल सेंट पीटर्स से पढ़ाई की है। MP S.P Singh Baghel giving award to Sridharएक दिन वे स्कूल की तरफ से एसएन मेडिकल कॉलेज में चल रही तीन दिवसीय प्रदर्शनी देखने गए। जहां हेल्थ कार्ड बनाए बनाने के लिए उनका ब्लड टेस्ट किया गया। डॉक्टर ने श्रीधर को बताया कि उनका ब्लड ग्रुप बी निगेटिव है, जो काफी दुलर्भ होता है और इससे कई लोगों की जान बचाई जा सकती है। उसी वक्त उन्होंने फैसला कर लिया था कि वो बल्ड डोनेशन करके लोगों की मदद करेंगे।

पत्नी भी उनकी राह पर
श्रीधर की पत्नी अनुराधा भी उनकी राह पर चल रही हैं। वो भी अब तक चार बार रक्तदान कर चुकी हैं। इस बारे में श्रीधर ने कहा, मेरी पत्नी भी रक्तदान का महत्व जानती है। एक दिन उसने आकर मुझसे रक्तदान की इच्छा दशाई, तो काफी अच्छा लगा। श्रीधर अपने दोस्तों सहित हर मिलने-जुलने वाले को ब्लड डोनेट करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। उनकी बदौलत ही एलआईसी में एक ग्रुप स्थापित हो सका, जो जरूरमंदों को रक्तदान करता है।