हारने वाले खिलाड़ी को क्या सजा देता है उत्तर कोरिया?

उत्तर कोरिया (North Korea) के अजीबो-गरीब नियम-कायदों के बारे में तो आपने सुना होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ओलंपिक जैसी प्रतियोगिताओं में हारने वाले कोरियाई खिलाड़ियों के साथ क्या सलूक किया जाता है? ओलंपिक में जीत दर्ज करने वाले खिलाड़ियों पर तोहफों की बरसात होती है, उन्हें रोल मॉडल के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन हारते ही खिलाड़ी के प्रति सरकार का नजरिया बदल जाता है. यह हार तब और भी ज्यादा दर्दनाक बन जाती है, जब वह किसी दुश्मन देश के हाथों मिली हो, जैसे कि जापान, दक्षिण कोरिया या अमेरिका.

इस साल फरवरी में होने वाले ओलंपिक खेलों में उत्तर कोरिया भाग ले सकता है. ख़ास बात यह है कि ये आयोजन दक्षिण कोरिया के शहर प्योंगचांग में होने जा रहा है. उत्तर कोरिया ने अब तक 56 पदक जीते हैं, जिनमें से 16 गोल्ड है. इस देश में आमतौर पर खेलों के आयोजन को बाद में टेलीकास्ट किया जाता है. यानी उत्तर कोरियावाली लाइव टेलीकास्ट नहीं देख सकते. ऐसा इसलिए कि अगर खिलाड़ी हार जाए तो उस मैच को हमेशा के लिए दफन क्र दिया जाए.

2014 के एशियाई खेलों में उत्तर कोरिया की फुटबॉल टीम को फाइनल में दक्षिण कोरिया से हार का सामना करना पड़ा था. इस मैच को उत्तर कोरिया में कभी प्रसारित किया ही नहीं गया. 1990 में बीजिंग एशियाई खेलों में जब एक जूडो खिलाड़ी को हार नसीब हुई, तो उसे कोयले की खदान में भेज दिया गया. हालांकि ये बात अलग है कि इसका कोई प्रमाण नहीं मिला. यह भी कहा जाता है कि हारने वाले खिलाड़ियों को जेल में डाल दिया जाता है. अगर हार किसी दुश्मन देश से मिली हो तो सजा और भी कड़ी हो जाती है.

अमेरिका में धूम मचा रहा ये बिहारी

पटना में जन्मे प्रभाकर शरण इन दिनों अमेरिका में काफी लोकप्रिय हैं. उनकी पहली स्पैनिश फिल्म फिल्म ‘एनरेडाडोस: ला कंफ्यूजन (इनटेंगल्ड: द कंफ्यूजन)’ को लैटिन अमेरिका में अच्छा रिस्पांस मिला. कहा जा रहा है कि यह पहली ऐसी अमेरिकी फिल्म है जिसे बॉलीवुड स्टाइल में बनाया गया है. इस फिल्म में हिंदी फिल्मों की तरह गाने भी हैं. इसकी शूटिंग कोस्टा रिका, मुंबई और पनामा में हुई है. प्रभाकर के साथ इस फिल्म में मुख्य किरदार में नैन्सी डोबल्स हैं. वो यहां की टीवी होस्टेस हैं. प्रभाकर की योजना अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को हिंदी, अंग्रेजी और भोजपुरी में ‘एक चोर, दो मस्तीखोर’ के नाम से रिलीज करने की है.

यह फिल्म पिछले साल फरवरी में कोस्टा रिका, पनामा, निकारागुआ, होंडुरास, ग्वाटेमाला और सान सल्वाडोर में रिलीज हुई थी. प्रभाकर का कहना है कि यह फिल्म लैटिन अमेरिकी फिल्म उद्योग में मील का पत्थर बन चुकी है. 2000 में प्रभाकर कोस्टा रिका पढ़ाई के लिए गए थे और पढ़ाई के बाद कपड़े और रेस्तरां के कारोबार से जुड़ गए. साल 2006 से वह बॉलीवुड फिल्मों को कोस्टा रिका लेकर आने लगे. पहली बार उनकी ही कंपनी मध्य अमेरिका में बॉलीवुड फिल्मों को कारोबार के लिए लेकर आई थी.

आधा खाना किसके लिए छोड़ता है ये डॉग?

अगर आप कुत्तों से प्यार करते हैं, तो ये खबर आपके लिए है. हालांकि इसे पढ़कर आपकी आंखें ज़रूर नम हो जाएंगी. यह खबर एक ट्वीट के ज़रिये दुनिया के सामने आई, और देखते ही देखते इसने लोगों को भावुक कर दिया. दरअसल @_EasyBreasy_ नामक यूजर ने कुछ दिनों पहले ट्विटर पर अपने डॉग्स स्टिच, कुकी और उनके खाने के बर्तन की तस्वीरें साझा कीं. उस बर्तन में आधा खाना बचा हुआ था. यूजर कैप्शन में लिखा है कि उनके घर में सिर्फ एक ही बर्तन था, जिसमें  स्टिच और कुकी खाना खाते थे. कुकी पहले आधा खाना खाकर आधा अपने साथी स्टिच के लिए छोड़ देता था. स्टिच बाद में उसे खाती थी, लेकिन दुःख की बात यह है कि स्टिच अब इस दुनिया में नहीं है. कुछ समय पहले ही उसकी मौत हो गई, लेकिन कुकी अभी भी उसके लिए बर्तन में आधा खाना छोड़ता है.

करता है इंतज़ार
यूजर के मुताबिक कुकी कितना भी भूखा हो, वो आधा खाना ही खाता है. उसे इंतज़ार रहता है कि स्टिच अपना आधा खाना खाने आएगी. हमें लगा था कि कुकी धीरे-धीरे नॉर्मल हो जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. वो अब तक स्टिच को नहीं भूल पाया है. हर रोज़ वो आधा खाना बर्तन में ही छोड़ देता है. इस ट्वीट को 41 हज़ार से ज्यादा लाइक मिल चुके हैं, और तकरीबन 19,500 बार री-ट्वीट किया जा चुका है.

सच में एक-दूसरे का खून पीता है ये कपल!

आपने अक्सर पति-पत्नी को एक-दूसरे से कहते सुना होगा कि ‘मेरा खून मत पीओ’, लेकिन आप यह जानकर चौंक जाएंगे कि एक जोड़ा असल में ऐसा कर भी रहा है. टेक्सास निवासी लीया और टिम वास्तविक जीवन के वैम्पायर हैं. जो अपनी सेक्स लाइफ को रोमांचक बनाने के लिए एक-दूसरे का खून पीते हैं. इस अनोखे जोड़े की मुलाकात दो साल पहले एक वैम्पायर फेस्टिवल में हुई. तब से लेकर अब तक दोनों एक साथ रह रहे हैं और अगले साल वैम्पायर थीम वाले समारोह में दोनों शादी भी करने जा रहे हैं.

गहरा हुआ प्यार
लीया के मुताबिक, जब टिम पहली बार मेरे पास आया तो उसने कहा कि वो मुझे जानना और समझना चाहता है. मैं टिम के आकर्षक व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित थी, इसलिए मैंने तुरंत हां कर दी. इसके बाद हम लोग फेसबुक पर दोस्त बने और हमारा प्यार गहरा होता गया. बकौल लीया, शुरू में हमारी सेक्स लाइफ सामान्य थी, हमने महसूस किया कि इसे और भी बेहतर बनाया जा सकता है. लिहाजा बाद में हम एक दूसरे का खून पीने को राजी हो गए.

सामान्य बात
टिम और लीया हर रोज़ एक दूसरे का खून पीते हैं, दोनों के लिए यह बेहद सामान्य है. दोनों कहते हैं कि खून पीना एक अनुभव है, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. हालांकि टिम और लीया जानते हैं कि इससे खतरनाक बीमारियों का खतरा हो सकता है, इसलिए दोनों नियमित रूप से अपनी जांच करवाते रहते हैं.

सोर्स: द सन  

अजब राष्ट्रपति की गज़ब प्रेमकहानी

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की प्रेम कहानी ऐसी है, जिस पर पहली बार में शायद आप भी विश्वास न करें. 39 साल के मैक्रों की पत्नी ब्रिजेट 64 साल की हैं, यानी दोनों के बीच 24 बरस का फासला है. इस प्रेम कहानी की शुरुआत तब हुई जब मैक्रों उत्तरी फ्रांस के जेसुएट स्कूल नामक स्कूल में पढ़ रहे थे. मैक्रों की गिनती उन दिनों भी जीनियस छात्रों में होती थी, उन्हें खेलने-कूदने के बजाए किताबों में डूबे रहना पसंद था. उसी स्कूल में ब्रिजेट की बेटी लॉरेंस भी पढ़ती थी, मैक्रों और ब्रिजेट के प्यार की शुरुआत में लॉरेंस की भूमिका सबसे अहम् रही. उसने ही इमैनुएल मैक्रों की इतनी तारीफ की कि ब्रिजेट उनसे मिलने को मजबूर हो गईं.

प्यार नहीं हुआ कम
उस समय ब्रिजेट की उम्र 40 साल थी और वो लॉरेंस के ही स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थीं. ब्रिजेट के पति एक बैंकर थे. पहली बार स्कूल की नाटक मंडली में हुई मुलाकात के बाद ब्रिजेट और मैक्रों एक-दूसरे के करीब आते गए. हालांकि इस प्यार को समाज की अग्निपरीक्षा से अभी गुज़ारना बाकी था. जब मैक्रों के घरवालों को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने ब्रिजेट को दो टूक शब्दों में अपने बेटे से दूर रहने की हिदायत दे डाली. ये बात अलग है कि ब्रिजेट पर इसका कोई असर नहीं हुआ.

दो साल बड़ा बेटा
मैक्रों के माता-पिता ने उन्हें पेरिस भेजने का फैसला लिया, लेकिन ये दूरी भी मैक्रों और ब्रिजेट को एक-दूसरे से दूर नहीं कर पाई. दोनों घंटों फ़ोन पर बातें किया करते थे. मैक्रों ने  17 साल की उम्र में यह फैसला कर लिया था कि उन्हें ब्रिजेट से ही शादी करनी है. 2006 में ब्रिजेट ने अपने पहले पति से तलाक लिया और 2007 में ब्रिजेट और मैक्रों ने शादी रचा ली. वैसे तो ब्रिजेट और मैक्रों की कोई संतान नहीं है, लेकिन इमैनुएल ब्रिजेट के तीन बच्चों के पिता हैं और ब्रिजेट के बेटे की उम्र उनसे 2 साल बड़ी है. यानी इमैनुएल का बेटा उनसे 2 साल बड़ा है.

इस जज के फैसले सुनकर उड़ जाएंगे आपके होश!

  • अजीबोगरीब सजा सुनाने के लिए प्रसिद्ध हैं माइकल

यूं तो ऐतिहासिक फैसले सुनाने के लिए दुनिया के कई जज मशहूर हैं, लेकिन माइकल सिकोनेती (Michael Cicconetti) का नाम सबसे पहले आता है. ऐसा इसलिए नहीं कि उन्होंने बड़े-बड़े मामलों में फैसला सुनाया है, बल्कि इसलिए कि उनके फैसले सबसे हट के होते हैं. अमेरिका के ओहियों स्थित न्यायालय के जज माइकल 21 सालों से “क्रिएटिव जस्टिस” की परिभाषा गढ़ते आ रहे हैं. माइकल की अदालत में दाखिल होने वाले अपराधियों को अंत तक पता नहीं होता कि उन्हें किस तरह की सजा से गुज़रना होगा. एक तरह से कहें तो माइकल के फैसले कुछ हद तक “आंख के बदले आंख” के सिद्धांत पर आधारित होते हैं. अपने क्रिएटिव फैसलों के चलते माइकल 1994 से लगातार नियुक्त होते आ रहे हैं. उनकी एक खासियत यह है कि वो अभियुक्त को खुद अपनी सजा चुनने का मौका देते हैं. जिसमें जेल से लेकर उनकी अनोखी सजा तक का विकल्प मौजूद होता है. आइए उनके कुछ सबसे अलग फैसलों पर नज़र डालते हैं:

पार्क में सेक्स की सजा
सार्वजनिक पार्क में सेक्स करने की सजा क्या होती है? आप कहेंगे कि जो भी कानून में निर्धारित हो, लेकिन माइकल ने कुछ अलग ही किया. उन्होंने दोषियों से पार्क साफ़ करने को कहा, जिसमें ख़ास तौर पर इस्तेमाल किए गए कंडोम हटाने का जिक्र था. इतना ही नहीं दोषियों को अख़बार में विज्ञापन देकर पूरे शहर से माफ़ी मांगने को भी कहा गया.

बिल्लियों को छोड़ने की सजा
एक महिला ने सर्दी के मौसम में बिल्ली के 35 बच्चों को मरने के लिए जंगल में छोड़ दिया था. जज माइकल ने उस पर जुर्माना तो लगाया ही साथ ही जिंदगी भर का सबक देने के लिए नवंबर की कड़कड़ाती ठंड में बिना खाना-पानी के जंगल में रात गुजरने की सजा भी सुनाई. महिला से टेंट में रहने को कहा गया, हालांकि ठंड को देखते हुए उसे अलाव जलाने की अनुमति ज़रूर प्रदान की गई.

पुलिस से बदतमीजी की सजा
एक आदमी ने पुलिसकर्मी को सूअर कहा, तो जज माइकल ने 170 किलो के सूअर के साथ सड़क के किनारे हाथ में तख्ती लेकर खड़ा रहने की सजा सुनाई, जिस पर लिखा था “यह पुलिस अफसर नहीं है”.

ड्रंक एंड ड्राइविंग
ड्रंक एंड ड्राइविंग के मामलों में अक्सर लोग जुर्माना भरकर आज़ाद हो जाते हैं, लेकिन जज माइकल महज जुर्माने तक सीमित नहीं रहे. उन्होंने आरोपी को पास के मुर्दाघर भेजा, जहां उसे जबरन ड्रंक एंड ड्राइव के शिकार दो युवकों के शव दिखाए गए.

किराया नहीं चुकाया तो…
एक महिला ने टैक्सी का किराया नहीं चुकाया, क्या आप उसकी सजा का अनुमान लगा सकते हैं? उसे टैक्सी से तय की गई दूरी यानी 48 किलोमीटर तक पैदल चलने की सजा सुनाई गई.

चोरी की सजा
बेसहारा लोगों की मदद के लिए रखी गई दानपेटी चुराने वाले को एक दिन बेसहारा की तरह सड़क पर गुज़ारना पड़ा. जज माइकल का कहना था कि आरोपी को यह अहसाह होना चाहिए कि उसने किसका हिस्सा हड़पा है.

बच्चों के लिए…
कुछ छात्रों द्वारा स्कूल बस का टायर पंक्चर करने के चलते स्कूल प्रशासन को एक ख़ास क्लास का समय बदलना पड़ा. दोषियों को सबक सिखाने के लिए जज माइकल ने उन्हें सभी पीड़ित बच्चों को पिकनिक पर ले जाने का आदेश दिया, इस पर होने वाला सारा खर्चा आरोपी छात्रों को ही करना था.

जज माइकल के मुताबिक इस तरह की अनोखी सजा पाने वाले 90% लोगों को दोबारा किसी मामले में गिरफ्तार नहीं किया गया. है, ना कमाल की बात?

अगर जज माइकल की “क्रिएटिव जस्टिस” आपको प्रभावित करती है, तो इस पोस्ट को शेयर करना न भूलें!

यहां घर का बल्ब बदलना भी है गैरकानूनी

हर देश के अपने अलग-अलग कानून होते हैं और उनका पालन करना हर नागरिक का कर्तव्य. लेकिन ऑस्ट्रेलिया के कुछ कानून ऐसे हैं, जिनके बारे में जानने के बाद आप सोच में पड़ जाएंगे कि क्या इनका भी पालन करना होगा? आइए जानते हैं कुछ अजीबोगरीब कानूनों के बारे में:

ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया शहर में रहने वालों को अपने घर का बल्ब खुद बदलने की आज़ादी नहीं है. हालांकि ऐसा सुरक्षा की दृष्टि से किया गया है. अगर किसी के घर का बल्ब फ्यूज हो जाता है तो उसे किसी लाइसेंसी इलेक्ट्रीशियन को बुलाना होगा. दरअसल यहां हाई वोल्टेज लाइट से आसानी से करंट लग सकता है, इसके देखते हुए ही ऐसा कानून बनाया गया है.

ऑस्ट्रेलिया में बैटमैन जैसी ड्रेस पहनना गैरकानूनी है और ऐसा करने वाले को जुर्माना भी भरना पड़ सकता है. इतना ही नहीं, यहां के गोल्ड कोस्ट में महिलाएं 6 स्वेयर इंच से बड़ी बिकनी नहीं पहन सकतीं.

ऑस्ट्रेलिया में सड़क के दाई ओर चलना गैरकानूनी है, यदि आप ऐसा करते पाए गए तो जुर्माना भरने के लिए तैयार रहें. कहीं-कहीं तो फुटपाथ पर भी आप दायीं तरफ नहीं छाल सकते.

इस आइलैंड से कोई जिंदा नहीं आता!

अगर आप इंटरनेट पर नार्थ सेंटिनल आइलैंड (North Sentinel Island) की तस्वीरें देखेंगे तो आपका मन करेगा कि इस खूबसूरत नज़ारे को अपनी आंखों में कैद कर लिया जाए. लेकिन ये आइलैंड जितना खूबसूरत है उससे कहीं ज्यादा खतरनाक भी. यहां जाने का मतलब है मौत को दावत north-sentinel-islandदेना. बंगाल की खाड़ी में स्थित भारत के अधिकार क्षेत्र में आने वाला इस आइलैंड को मौत का आइलैंड कहा जाता है. दरअसल पर नार्थ सेंटिनल आइलैंड पर रहने वाले लोगों का आधुनिक जीवन से कोई लेना देना नहीं है.  सेंटिनल जनजाति के लोगों ने यहां अपनी एक अलग ही दुनिया बसाई हुई है, जिसमें वो दूसरों की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करते. इसलिए कहा जाता है कि जो लोग इस आइलैंड पर गए उनकी हत्या कर दी गई.

अच्छी रही किस्मत
रिपोर्टों के मुताबिक कुछ लोगों ने इस जनजाति को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की और उन तक पहुंचने का प्रयास किया, लेकिन स्थानीय लोगों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया. कई साल पहले एक नाव भटककर इस आइलैंड के करीब पहुंच गई थी, उसमें सवार एक यात्री ने बताया था कि किनारे पर लोग तीर कमान लेकर खड़े थे. अगर वो वहां से निकलने में सफल नहीं होते तो मार दिए जाते.
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बोला हमला
2004 में आए भूकंप और सुनामी के बाद सरकार ने इस आइलैंड की खबर लेने के लिए सेना के हेलीकाप्टर भेजा था, लेकिन यहां के लोगों द्वारा उस पर भी हमला बोलने की खबर थी. लोगों की आक्रमकता को देखते हुए भारत सरकार ने भी अब प्रयास करना छोड़ दिया है. सरकार ने इस इलाके को एक्सक्लूसिव जोन घोषित करके यहां बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी है. हवाई तस्वीर से यह साफ़ होता है कि यहां के लोग खेती नहीं करते, इसलिए पूरे इलाके में घने जंगल हैं. यानी सेंटिनल जनजाति पूरी तरह से शिकार पर निर्भर है.

इस देश में कोई सड़क पर नहीं सोता

भारत से लेकर ब्रिटेन तक आपको सड़कों पर रात गुजारते लोग नज़र आ जाएंगे. अपने देश में तो बेघरों की समस्या काफी विकट है. तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद सड़कों को अपना आशियाना बनाकर रहने वालों की संख्या में ख़ास कमी नहीं आई है. इसके उलट फ़िनलैंड एक ऐसा देश है जहां यह समस्या ख़त्म हो चुकी है. वैसे यूरोपीय यूनियन में फ़िनलैंड ही एकमात्र ऐसा देश है, जिसने बेघरों को छत मुहैया कराई है. जबकि बाकी देशों में बेहतर वेलफेयर सिस्टम होने के बावजूद लोग खुले में जीवन रहने को मजबूर हैं.

ब्रिटेन की एक संसदीय जांच में यह बात सामने आई है कि इंग्लैंड में 2014 से 2015 के बीच सड़क पर सोने वालों की तादाद में 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. इसी तरह डेनमार्क में बेघरों की संख्या 75 फीसदी बढ़ी है, ग्रीस की राजधानी एंथेस में हर 70 में से एक शख्स सड़क पर सोता है.

क्या किया फ़िनलैंड ने?
फ़िनलैंड ने दूसरे देशों की सरकारों के इतर बेघरों के प्रति बहुत उदार रवैया अपनाया. ऐसे लोगों के लिए अपार्टमेंट की व्यवस्था की जाती है, इसके साथ ही सामाजिक कार्यकर्ताओं को उनका जीवन स्तर सुधारने के काम में लगाया जाता है. साथ ही ऐसे लोगों के लिए रोज़गार की व्यवस्था भी की जाती है. सरकार की इस पहल में गैर सरकारी संगठन भी अहम् भूमिका निभा रहे हैं. वाई फाउंडेशन ने 16300 बेघरों को घर उपलब्ध कराएं हैं.

स्थायी समाधान
फाउंडेशन के मैनेजर जुहा काकिनेन कहते हैं, हमने ऐसे लोगों को एक अनुबंध के तहत अपार्टमेंट देना शुरू कर दिया है. इन्हें किसी भी किरायदार की तरह पूरा हक़ मिला है. य्स्दी इन्हें और समर्थन की ज़रूरत होती है तो हम वो भी मुहैया कराते हैं. जुहा के मुताबिक, इस कदम से बेघरों को स्थायी समाधान मिल रहा है, जबकि दूसरे देशों में बेघरों को अस्थायी पनाह दी जाती है.