योगी राज में उत्तर प्रदेश (UP) पुलिस बिना किसी सियासी खौफ़ के काम कर रही है…इसकी एक बानगी उस वक़्त देखने को मिली जब अपने समर्थकों को छुड़ाने थाने पहुंचीं  सपा महिला नेता को SSP मंजिल सैनी ने खूब फटकार लगाई. आप भी देखिये यह VIDEO:

गाय यूपी में माता तो असम में क्यों नहीं?

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी के बाद से गौ संरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सुर्ख़ियों में है. योगी जहां अवैध बूचड़खानों पर ताले लटका रहे हैं, वहीं उनकी देखा-देखी अन्य भाजपाई मुख्यमंत्रियों ने भी इस दिशा में कदम उठाना शुरू कर दिया है. गुजरात में तो गौ हत्या पर आजीवन कैद का प्रावधान किया गया है. हिंदू धर्म में गाय को पूजा जाता है, इसलिए योगी और बाकी मुख्यमंत्रियों के फैसलों की बड़े पैमाने पर सराहना हो रही है. लेकिन एक सवाल भी उठ रहा है कि आखिर असम में ऐसी कोई हलचल क्यों दिखाई नहीं दे रही? असम में फ़िलहाल भाजपा सरकार है और एक हिंदू पार्टी होने के लिहाज से भाजपा गौ संरक्षण की cowहिमायती रही है. लिहाजा गाय को जिस नज़र से यूपी या दूसरे भाजपा शासित राज्यों में देखा जा रहा है उसी नज़र से असम में भी देखा जाना चाहिए. ये सब जानते हैं कि गायों की असम के रास्ते बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर तस्करी होती है, साथ ही वहां कई अवैध बूचड़खाने भी संचालित हैं जहां हर रोज़ गायों को कटा जाता है.

55 हजार से एक लाख तक
असम के शिवसागर और करीमगंज जैसे इलाकों से गायों को ट्रक में लादकर अंतर्राष्ट्रीय सीमा तक ले जाया जाता है और वहां से उनकी बांग्लादेश में एंट्री होती है. इंडिया टुडे के मुताबिक, असम में एक स्वस्थ गाय को औसतन 55,000 रुपए में बेचा जाता है. जबकि बांग्लादेश में बीफ की ज़बर्दस्त मांग के चलते इसकी कीमत दो गुनी हो जाती है. यानी एक गाय एक लाख से ज्यादा की बिकती है.

मुनाफे की मिलीभगत
गायों को सड़क या नदी के रस्ते असम से बांग्लादेश ले जाया जाता है. जायज सी बात है कि ये काम बिना सरकारी मशीनरी की मिलीभगत के मुमकिन नहीं हो सकता. गायों की तस्करी का ये रैकेट कितना बड़ा है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पैसों का लेन-देन हवाला के ज़रिये होता है. इंडिया टुडे ने अपने ख़ास अभियान में इसका खुलासा भी किया था.

एक गाय = 200 किलो मांस
एक ट्रक में 20 से 25 गायों को भरकर असम से बांग्लादेश ले जाया जाता है और वहां महंगे दामों में बेचा जाता है. एक गाय से औसतन 200 किलो मांस मिलता है. बांग्लादेश में गाय के मांस की काफी डिमांड है, इस डिमांड को पूरा करने के लिए भारत के अलग-अलग राज्यों से तस्कर गायों को पहले असम लेकर आते हैं और फिर वहां से अगरतला के रस्ते पड़ोसी मुल्क में भेज दिया जाता है.

असम पर चोट ज़रूरी
जानकार मानते हैं कि अगर गायों की अवैध तस्करी को रोकना है तो असम पर चोट करना ज़रूरी है. यूपी या दूसरे राज्यों में गाय को नहीं काटा जाएगा, लेकिन उन्हें असम तो भेजा ही जा सकता है. तस्करों की पुलिस से घनिष्टता किसी से छुपी नहीं है, ऐसे में उनके लिए गायों की तस्करी मुश्किल ज़रूर होगी लेकिन असंभव नहीं. अगर असम में इस पर पूरी तरह रोक लगाई जाती है तो तस्करों की कमर टूट जाएगी. राज्य और केंद्र दोनों में भाजपा की सरकार है, और यदि वो चाहे तो उसके लिए यह मुमकिन है

बेहतर वेतन और नई श्रमिक एवं निवेश नीतियों के विरोध में ट्रेड यूनियन आज हड़ताल पर हैं। इस हड़ताल के चलते पूरा देश एक तरह से थम गया है। कई हिस्सों में हड़ताल का व्यापक असर नजर आ रहा है। बैंकिंग, टेलीकॉम सहित अन्य क्षेत्रों के लाखों कर्मचारियों के काम बंद करने से आम जनता के साथ साथ सरकारों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। आइए नजर डालते हैं इस महाबंद से जुड़ी 10 बातों परः

  1. Strikeबैंक, सरकारी कार्यालय और फैक्टरियां भी बंद में शामिल हैं। हालांकि कई बैंकों की ऑफिसर यूनियन ने इस हड़ताल से दूरी बनाए रखी है। महाबंद में कुछ राज्यों के स्थानीय संगठनों के शामिल होने से सार्वजनिक परिवहन पर व्यापक असर पड़ा है।
  2. रेडियोलॉजिस्ट और सरकारी अस्पतालों की नर्सें भी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की घोषणा कर चुकी हैं। इसके मद्देनजर अस्पतालों में व्यवस्था चरमराने की आशंका है।
  3. कोल इंडिया के कर्मचारियों से इस हड़ताल में भाग लेने से सरकार मुश्किल में पड़ गई है। हालांकि उसका दावा है कि अगले 50 से 60 दिनों का स्टॉक होने से पावर प्लांट प्रभावित नहीं होंगे।
  4. हड़ताल में शामिल संगठन बीमा और रक्षा जैसे क्षेत्रों में विदेशी निवेश के नियमों को शिथिल किए जाने का विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों को बंद करने के सरकारी फैसले पर भी इन्हें आपत्ति है।
  5. मौजूदा वित्तीय वर्ष में सरकार ने निजीकरण और कुछ कंपनियों को बंद करके 55,907 करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य रखा है। सरकार द्वारा संचालित 77 कंपनियों का घाटा बढ़कर 26, 700 करोड़ रुपए पहुंच गया है। ऐसे में सरकार इन्हें बंद करने का मन बना चुकी है।
  6. हड़ताल खत्म करने की कोशिशों के तहत वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को कहा था कि सरकार अपने कर्मचारियों को पिछले दो साल का बोनस जारी करेगी। मगर ट्रेड यूनियनों को वित्तमंत्री का यह आश्वासन पसंद नहीं आया।
  7. कुछ दिन पहले सरकार ने अकुशल मजदूरों का भत्ता 246 से बढ़ाकर 350 रुपए करने का ऐलान किया था। सरकार ने दावा किया था कि ये प्रस्ताव मिनिमम वेज एडवाइजरी बोर्ड की उस बैठक में पेश किया गया था, जिसका हिस्सा ट्रेड यूनियन भी हैं। हालांकि यूनियनों का कहना है कि बैठक में ऐसे किसी प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हुई। उनकी मांग अब भी 692 रुपए रोजाना है। इस 279 रुपए के अंतर के चलते ही हड़ताल को इतना भारी समर्थन मिल रहा है।
  8. ट्रेड यूनियनों का कहना है कि वो सरकारी पेंशन फंड और स्टॉक मार्केट में अधिक पैसा लगाने के सरकार के दिशा निर्देशों का भी लगातार विरोध करती रहेंगी।
  9. हड़ताल की वजह से कई राज्यों में सरकारी और निजी स्कूल एवं कॉलेज भी पूरी तरह बंद रहे। सार्वजनिक यातायात प्रभावित होने से लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचने में खासी परेशानी का सामना करना पड़ा।
  10. इस महाहड़ताल में संघ से संम्बद्ध भारतीय मजदूर संघ शामिल नहीं है। उसने पहले ही खुद को इससे दूर रखने का ऐलान कर दिया था।

parking'अगर आप पुणे स्टेशन की निर्धारित पार्किंग में वाहन लगाकर सोच रहे हैं कि वो सुरक्षित है तो सावधान हो जाइए। हो सकता है कि आपके खून-पसीने की कमाई से खरीदी गई गाड़ी को कोई दूसरा लेकर चलता बने और पार्किंग ठेकेदार उसे रोकने की जहमत भी न उठाए। पार्किंग के लिए टू-व्हीलर से 20 और फोर व्हीलर से 40 रुपए वसूले जाते हैं, बावजूद इसके गाडिय़ों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। मारपीट पर उतारू रहने वाले ठेकेदार के कर्मचारियों का ध्यान महज इस बात पर रहता है कि किस तरह नो-पार्किंग में खड़ी गाडिय़ों से भी पैसे उगाहे जाएं। ताज्जुब की बात तो ये है कि सबकुछ जानते हुए भी रेल प्रशासन इस अंधेरगर्दी पर आंखें मूंदें बैठा है।

एक स्टिंग ऑपरेशन में पाया गया कि पार्किंग में गाडिय़ों की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह की सतर्कता नहीं बरती जाती। ठेकेदार के कर्मचारी न तो वाहन का नंबर देखते हैं और न ही वापसी पर स्लिप (पर्ची) की मांग करते हैं। ऐसे में कोई भी किसी का वाहन महज 20 या 40 रुपए में लेकर चंपत हो सकता है। लगातार मिल रहीं शिकायतों के बाद टीम को पड़ताल के लिए स्टेशन पहुंची। एक प्रतिनिधि ने जीआरपी कार्यालय के सामने से दाखिल होते हुए पार्किंग में बाइक लगाई। इसके लिए बाकायदा दूसरे राज्य के नंबर वाली बाइक का इस्तेमाल किया गया ताकि वो आसानी से पहचान में आ जाए। इस दौरान प्रतिनिधि ने जानबूझकर कर्मचारियों से बातचीत की, लेकिन गाड़ी लगाने तक किसी ने भी नंबर देखकर पर्ची देने की जहमत नहीं उठाई। वापसी में एक कर्मचारी ने पूछा गाड़ी का नंबर क्या है और पर्ची पर लिखकर दे दिया। जो नंबर बताया गया, वो असली था भी या नहीं ये जांचने की उसने कोशिश तक नहीं की।

कुछ देर बाद दूसरा प्रतिनिधि बिना पर्ची के वही बाइक लेेने पहुंचा। वो काफी देर तक गाड़ी खोलने की कोशिश करता रहा, लेकिन किसी ने उससे सवाल नहीं किया। इतना ही नहीं बाहर निकलते वक्त उससे 20 रुपए शुल्क मांगने वाले ने ये तक जानना जरूरी नहीं समझा कि जो गाड़ी वो ले जा रहा है वो उसकी है भी या नहीं। प्रतिनिधि ने जानबूझकर उसे खुले पैसा नहीं दिए, ताकि उसे पर्ची लेने की याद आ जाए। मगर लापरवाही की आदत उसकी याददाश्त पर भारी पड़ी। कर्मचारी ने बिना पर्ची देखे ही गाड़ी को जाने दिया। इससे साफ होता है कि पुणे स्टेशन की पार्किंग में अपना कीमती वाहन लगाना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। गाड़ी चोरी होने पर पार्किंग ठेकेदार पुलिस में शिकायत कराने की सलाह देक अपना पल्ला झाड़ लेगा।
नो-पार्किंग में पार्किंग का भी पैसा
पुणे स्टेशन पर पुराने डीआरएम कार्यालय के बाहर के हिस्से को नो-पार्किंग जोन बनाया गया है, लेकिन इस नियम की हर रोज धज्जिया उड़ती हैं। ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी में वाहन चालक वहां गाडियां लगा जाते हैं और लौटने पर उन्हें पार्किंग ठेकेदार के कर्मचारियों की बदतमीजी का सामना करना पड़ता है। अगर कोई वाहन चालक पैसे देने से इंकार करता है तो कर्मचारी उसके साथ हाथापाई करने से भी नहीं चूकते। सोमवार को पुराने डीआरएम कार्यालय के ठीक सामने एक चालक अपनी कार खड़ी कर गया। ठेकेदार के कर्मचारी भी उस वक्त वहां मौजूद थे, लेकिन उन्होंने निर्धारित पार्किंग में कार लगाने की उसे सलाह नहीं दी। जब वो लौटा तो कर्मचारी ने 40 रुपए की मांग की, इस पर संबंधित चालक ने नो-पार्किंग का हवाला देते हुए पैसे देने से इंकार कर दिया। इस बात पर कर्मचारी इतना आग-बबूला हुआ कि कार के आगे आकर गाली-गलौच करने लगा। काफी देर तक विवाद चलता रहा, मगर थोड़ी दूरी पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने सुध लेना जरूरी नहीं समझा।

एक अन्य घटना में जीआरपी कार्यालय के सामने एक बाइक चालक नो-पार्किंग में बाइक लगाकर चला गया। वापसी पर जैसे ही उसने बाइक स्र्टाट की, पार्किंग ठेकेदार कर्मचारी उससे वसूली के आ धमका। यहां भी इंकार करने पर उसे गालियां देते हुए पुलिस में चलने की धमकी देना शुरू कर दिया। काफी देर के बाद भी जब कर्मचारी की उग्रता में कोई कमी नहीं आई तो पीडि़त चालक को मजबूरन उसे 20 रुपए देने पड़े। सूत्र बताते हैं कि पुलिस की छत्रछाया में ही कर्मचारियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं।

क्या सो रहा है प्रशासन
पार्किंग कर्मचारियों की उदंडता के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं, बावजूद इसके रेल प्रशासन द्वारा कड़ी कार्रवाई नहीं की जा रही। जब कोई वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री आता है तो सारी व्यवस्थाएं सुधर जाती हैं, लेकिन कुछ ही देर बार सबकुछ पहले जैसा हो जाता है। आखिर आम यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के बारे में रेलवे की कोई जिम्मेदारी बनती भी है या नहीं। स्टेशन पर मौजूद ट्रैफिक पुलिसकर्मी भी महज बातों के अलावा कभी मुस्तैदी से अपना काम करते नजर नहीं आते।