Video: Congress MLA Asha Kumari Slaps Woman Constable, Gets Slapped Back

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में हार की समीक्षा करने के लिए शिमला पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अब इस बात की भी समीक्षा करनी चाहिए कि अपने नेताओं के मिजाज को किस तरह ठंडा रखा जाए. एक महिला कांस्टेबल ने जब कांग्रेस विधायक आशा रानी को बैठक में जाने से रोका तो उन्होंने उसे थप्पड़ रसीद कर दिया, हालांकि ये बात अलग है चंद ही सेकंड में उनके गाल भी लाल हो गए. देखिये पूरा video….

फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से क्यों डर रहे हैं नेता?

आपराधिक मामलों का सामना कर रहे नेता इन दिनों खौफ में हैं. इस खौफ की वजह मोदी सरकार का वह हलफनामा जिसमें उसने आपराधिक मामलों में शामिल सांसद और विधायकों के मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालत बनाने की बात कही थी. नेताओं की बेचैनी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने राज्यसभा में इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया. उन्होंने इस संबंध में संविधान की धारा 15 का उल्लेख करते हुए कहा, जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता. मैं सांसद और विधायक को अलग जाति मानता हूँ. तो फिर किस आधार पर सरकार सांसदों और विधायकों के लिए अलग अदालत बना सकती है?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय का मानना है कि जब नेताओं को स्पेशल स्टेटस चाहिए, तो फिर स्पेशल कोर्ट क्यों नहीं? उनके मुताबिक, देश में सांसद-विधायकों पर 1500 से ज्यादा आपराधिक मामले चल रहे हैं. यही वजह है कि उपाध्याय ने कोर्ट से गुहार लगायी है कि ऐसे मामलों के निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट बनाया जाए.

महाराष्ट्र सबसे आगे
एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) के अनुसार 2014 में लोकसभा में चुनकर आए 542 सांसदों में से 185 आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो देश के 34 फीसदी सांसद आपराधिक रिकॉर्ड वाले हैं. 2009 की लोकसभा में यह आंकड़ा 158 था. राज्यों के हिसाब से देखा जाए तो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसद हैं. दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश और फिर बिहार का नंबर आता है.

Gujarat: इस जीत में छिपी हैं चिंताएं!

गुजरात (Gujarat) में भाजपा ने लगातार छठवीं बार सत्ता पर कब्ज़ा ज़रूर कर लिए है, लेकिन इस जीत में कई चिंताएं भी छुपी हैं. जिस तरह के प्रचंड बहुमत की उम्मीद नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह कर रहे थे, वोट का आंकड़ा उससे काफी दूर रहा. भाजपा यहां 100 के फेर में ही उलझ गई, जबकि पिछली बार यानी 2012 के विधानसभा चुनाव में उसने 115 सीटें हासिल की थी. इस बात में कोई दोराय नहीं कि जो जीता, वही सिकंदर, लेकिन गिरता वोट प्रतिशत कहीं न कहीं दर्शाता है कि गुजरात की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के कामकाज से खुश नहीं था. जहाँ तक बात हिमाचल की है, तो वहां नरेंद्र मोदी लहर पूरी तरह नज़र आई. राज्य की जनता ने कांग्रेस को काफी गंभीर चोटें दी हैं. हिमाचल में एक तरह से यह साफ़ हो गया था कि जनता सत्ता परिवर्तन चाहती है. क्योंकि कांग्रेस उसकी उम्मीदों के अनुरूप शासन देने में नाकाम रही. पार्टी नेता जनता की सुध लेने के बजाए अपने लड़ाई-झगड़े सुलझाने में ही लगे रहे.

फायदे में कांग्रेस
गुजरात के नतीजे भाजपा के पक्ष में ज़रूर हैं, मगर कांग्रेस राज्य में मज़बूत होती दिखाई दे रही है. अगर पिछले चुनाव से तुलना की जाए, तो पार्टी का रिकॉर्ड सुधरा है. 2012 में कांग्रेस को 61 सीटें मिलीं थीं और इस बार वो 80 के आंकड़े को पार कर गई है. उसे 20 से ज्यादा सीटों का फायदा मिला है. सौराष्ट्र में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा हुआ है. जबकि भाजपा को अपने गढ़ में उम्मीद माफिक परिणाम नहीं मिले हैं. इसके अलावा पटेल बहुल इलाकों में भी भाजपा को नुकसान झेलना पड़ा है.

भाजपा को नुकसान
गुजरात भाजपा को इस बार सीधे तौर पर 19 से 20 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है. 182 सीटों वाले राज्य में 20 सीटों पर हार काफी मायने रखती है. हालांकि इसके पीछे हार्दिक पटेल फैक्टर ने भी काम किया है. भाजपा यदि पटेल को अपने पाले में करने में कामयाब रहती तो जिस प्रचंड जीत के दावे पीएम मोदी और शाह कर रहे थे उसे हासिल किया जा सकता था.

नहीं संभले तो….
गुजरात के नतीजे इशारा कर रहे हैं कि लोगों में भाजपा को लेकर सोच बदल रही है. आलाकमान को ख़ुशी मानाने के साथ ही मंथन भी करना होगा, अन्यथा आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है. भाजपा की जीत के एक बड़ी वजह यह भी रही कि लोग राहुल गांधी को उतना परिपक्व नहीं मानते हैं. कांग्रेस पर भरोसा करने के उनके पास वाजिब कारण नहीं हैं. ये स्थिति काफी हद तक बिल्कुल वैसी ही है, जैसी 2014 से पहले भाजपा की थी. लेकिन समय बदला और भाजपा ने सारे समीकरण बदल दिए. इसलिए भाजपा को भी इसी नज़रिए से सोचना होगा.

Gujarat: विकास पर क्यों खामोश रहे मोदी?

अपने हर भाषण में विकास की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Gujarat चुनाव में विकास से बचते नजर आए. अपनी चुनावी रैलियों में उनका पूरा जोर कांग्रेस खासकर राहुल गांधी की कमजोरियों को रेखांकित करने पर ही केन्द्रित रहा. मोदी में आए इस बदलाव से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गुजरात में इस बार भाजपा को नुकसान होने जा रहा है. कांग्रेस नेता मणिशंकर के “नीच” वाले बयान के बाद जिस तरह से मोदी ने अपने लिए इस्तेमाल हुए शब्दों की दुहाई दी और जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के तार पाकिस्तान से जोड़े, उससे इन कयासों को बल मिलता है. जीएसटी आदि कई ऐसे मुद्दे रहे जिन्होंने गुजरात में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया और हार्दिक पटेल ने इस हवा की गति बढ़ाने का काम किया. बावजूद इसके भाजपा का पलड़ा कुछ हद तक भारी समझा जा रहा था, लेकिन पार्टी नेता और खासकर नरेंद्र मोदी के हावभाव देखकर अब यह लगने लगा है कि कांग्रेस की वर्षों की मुराद पूरी हो सकती है.

नयापन नदारद
गुजरात में मोदी के भाषण कांग्रेस की बुराई और राष्ट्रवाद, सेना, चीन, पाकिस्तान, भ्रष्टाचार और गुजराती अस्मिता के इर्द-गिर्द रहे. उन्होंने गुजरात में विकास की बात छेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और न ही बेरोजगारी, निवेश में कमी, लघु एवं मध्यम उपक्रमों की बर्बादी, स्थिर निर्यात एवं मूल्यवृद्धि जैसे मुद्दों पर बात की. कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा बार-बार विकास पर बात करने की चुनौती को भी मोदी ने नहीं स्वीकारा. मोदी के भाषण इस बार पारंपरिक राजनीति तक ही सिमटकर रह गए, उनमें कुछ नयापन नजर नहीं आया. उन्होंने खुद को गुजरात के बेटे के रूप में प्रोजेक्ट कर भावनात्मक आधार पर वोट मांगे. राजनीति का यह अंदाज़ 2014 के नरेंद्र मोदी के अंदाज़ से बिल्कुल अलग है. जो कहीं न कहीं यही इशारा करता है कि गुजरात के लिए भाजपा के पास कोई विकास मॉडल नहीं है.

बदली रणनीति
मोदी यह समझ गए हैं कि इस बार समीकरण अलग हैं. अच्छे दिनों के जो सपने उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान दिखाए थे, वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं. इसलिए विकास की बातों से बात बनने वाली नहीं है. शुरुआती मौकों पर जब स्वयं मोदी और अमित शाह की सभाओं से भीड़ कम होती चली गई और रैलियों में भाजपा के खिलाफ हुटिंग हुई, तभी पार्टी ने अपनी रणनीति को जाति-धर्म से जोड़ दिया. कभी अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, तो कभी राहुल गांधी के धर्म का. हालांकि सभाओं में पहले जैसी भीड़ फिर भी न खिंच सकी. हालांकि जनता का फैसला आना अभी बाकी है, इसके बात ही तय होगा कि उसे भाजपा पसंद है या कांग्रेस.

बदलते गए नारे
अगर 2007 से अब तक की बात करें, जो 2017 के चुनाव में भाजपा किसी खास स्लोगन के साथ मैदान में नहीं आई है.

  • 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी का मुख्य नारा था आतंकवाद विरुद्ध राष्ट्रवाद. ये चुनाव गुजरात दंगों के कुछ महीने बाद ही हुए थे. सांप्रदायिक हिंसा के साये में एक भव्य गौरव यात्रा का आयोजन किया गया था, जिसमें गुजरात की गरिमा और सम्मान को चुनाव का केंद्र बिंदु बनाया गया था.
  • 2007 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ‘जीतेगा गुजरात’ नाम से स्लोगन जारी किया था. इस चुनाव में विकास के प्रति झुकाव देखा गया. कांग्रेस के लिए सोनिया गांधी का मौत के सौदागर वाला बयान नुकसानदायक साबित हुआ था.
  • 2012 में भाजपा ने एकमत गुजरात का नारा केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार की तरफ से गुजरात की गई अनदेखी के खिलाफ एकजुट होने के लिए बनाया गया।

रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं. उनके नाम की चर्चा उनकी काबिलियत से ज्यादा इस बात को लेकर थी कि वो दलित हैं. भाजपा की देखादेखी कांग्रेस ने भी दलित कार्ड खेलते हुए मीरा कुमार को मैदान में उतारा था, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली. कोविंद की जीत पर उनके गांव और दलित समुदाय में ख़ुशी की लहर है, लेकिन क्या यह ख़ुशी किसी तरह के लाभ में परिवर्तित हो सकती है? हमारे संविधान में राष्ट्रपति को जो अधिकार प्राप्त हैं, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि दलित राष्ट्रपति से दलितों का कुछ भला होने वाला नहीं है. हां, इतना ज़रूर है कि इससे भाजपा के दलित वोट बैंक में इजाफा ज़रूर हो सकता है.

संविधान के अनुसार राष्ट्रपति केवल सरकार को मशविरा दे सकते हैं और पुनर्विचार के लिए कह सकते हैं, अगर सरकार इंकार कर दे तो उनके पास सहमति देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह जाता. देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद इस पीड़ा को समझते थे. उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि हमें आंख बंद करके ब्रिटेन के पदचिन्हों पर नहीं चलना चाहिए, राष्ट्रपति के अपने कुछ अधिकार होने चाहिए. उस दौर में जवाहरलाल नेहरु और प्रसाद के बीच मतभेद जगजाहिर थे, नेहरू ने राजेन्द्र प्रसाद के 10 साल के कार्यकाल में उनकी कोई बात नहीं मानी.

वैसे भी ज्यादा सलाह-मशविरा देने वाले राष्ट्रपति सरकार को पसंद नहीं आते. अब्दुल कलाम तकरीबन हर बिल पर सरकार को सलाह देते थे. इसी वजह से बेहद लोकप्रिय होने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें दूसरी बार रायसीना हिल्स भेजना मुनासिव नहीं समझा. उनकी जगह कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बना दिया. हमारे राष्ट्रपति की स्थिति इंग्लैंड की महारानी जैसी होती है, जिसके पास कोई ख़ास अधिकार नहीं होते. लिहाजा राष्ट्रपति की कुर्सी पर चाहे दलित बैठे या कोई और होगा वही जो सरकार चाहेगी.

क्या अमित शाह का गणित कमज़ोर है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्राओं को लेकर खासे चर्चा में रहते हैं. एक दौरा ख़त्म होता नहीं कि दूसरे की तैयारी हो जाती है. 2014 में पद संभालने के बाद से मोदी 56 विदेश यात्राएं कर चुके हैं. जिस रफ़्तार से मोदी विदेशों की सैर कर रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि कार्यकाल ख़त्म होते-होते वो इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को काफी पीछे छोड़ देंगे. हालांकि, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को लगता है कि मोदी ने मनमोहन सिंह के मुकाबले कम विदेश यात्राएं की हैं. अब शाह ने किस गणित के आधार पर यह बयान दिया समझना मुश्किल है, क्योंकि आंकडें को कुछ और ही हकीकत बयां कर रहे हैं.

विदेश मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, मोदी ने 3 सालों में 56 विदेशी दौरे किए हैं और कुल 132 विदेशों में गुज़ारे हैं. अब मनमोहन सिंह की बात करें तो अपने 10 सालों के कार्यकाल में उन्होंने 80 विदेश यात्राएं की और 305 विदेशों में रहें. इस हिसाब से देखा जाए तो पूर्व प्रधानमंत्री ने हर साल औसतन 8 विदेशी दौरे किए, जबकि मोदी ने 18. अब सोचने वाली बात यह है कि संख्या में 8 बड़ा होता या 18?

सेंचुरी तय
अमित शाह शायद पीएम मोदी के तीन सालों की तुलना मनमोहन सिंह के 10 सालों के कार्यकाल से कर रहे हैं. अगर ऐसा है भी तो, आने वाले 2 सालों में नरेंद्र मोदी विदेश यात्राओं की सेंचुरी पूरी अवश्य कर लेंगे, क्योंकि उनकी रफ़्तार पहले से ही काफी तेज़ है.

साजिश का शिकार तो नहीं हो रही ‘आप’?

अरविंद केजरीवाल इस वक़्त बुरे दौर से गुज़र रहे हैं. पहले चुनावों में शिकस्त और अब भ्रष्टाचार के आरोप. इन आरोपों की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि इन्हें लगाने वाले विपक्षी नहीं बल्कि केजरीवाल के अपने हैं. और यही वजह है कि हर तरफ से केजरीवाल पर सवालों की बौछार हो रही है. लोग यह जानना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार की खिलाफत पर राजनीतिक पार्टी की नींव रखने वाला एक करिश्माई नेता क्या खुद भ्रष्टाचार में डूब गया है? आम आदमी पार्टी के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि इस बार चोट सीधे उसकी जड़ों पर हुई है. और जब जड़ें कमज़ोर पड़ने लगें तो फिर पेड़ का गिरना स्वभाविक हो जाता है.
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यहां से केजरीवाल के लिए यह साबित करना बेहद मुश्किल होगा कि जो आरोप उनपर लगाएं गए हैं वो बेबुनियाद हैं. और बिना यह साबित करे वो शायद उस विश्वास को पुन: हासिल न कर पाएं, जो इस खुलासे से कुछ हद तक खो गया है. दिल्ली के पूर्व मंत्री और आप से बर्खास्त नेता कपिल मिश्रा का कहना है कि केजरीवाल ने 2 करोड़ की रिश्वत ली, इसके अलावा पार्टी के चंदे को लेकर भी सरकार को अँधेरे पर रखा गया. कपिल के आरोपों को यदि एक ऐसे व्यक्ति की प्रतिक्रिया के तौर पर स्वीकार भी लिया जाए, जो भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता, तब भी बहुत कुछ ऐसा है जो यह संदेह पैदा करता है कि आम आदमी पार्टी राजनीतिक साजिश का शिकार हो रही है. केंद्र  में सत्ता परिवर्तन के बाद से जिस तरह से एक के बाद एक आप नेता नकारात्मक कारणों से सुर्खियां बंटोर रहे हैं, क्या वो महज़ इत्तेफ़ाक है?

पिछले दो-ढाई सालों में तकरीबन रोज़ किसी न किसी आप नेता पर कोई न कोई आरोप लगा. आरोपों की यह रफ़्तार तो पश्चिम बंगाल में भी देखने को नहीं मिली जहां तृणमूल कांग्रेस और वामदल एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं. कल तक सुशिक्षित और साफ़-सुथरी छवि वाले नेताओं की पार्टी आज एक ऐसी पार्टी बन गई है, जिसके अधिकांश नेता कठघरे में खड़े हैं. क्या ये संभव है? एक-दो नेताओं के आचरण या कार्यशैली सवालों के घेरे में हो सकती है, लेकिन जब पूरी की पूरी पार्टी को एक ही नज़रिए से देखा जाए तो सवाल उठाना लाज़मी है. दरअसल आप ने भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ जिस नई राजनीति की शुरुआत की, यह उसका ही परिणाम है. जब आप कुछ अलग करने की कोशिश करते हैं, तो आपको आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है. और जब आप अपनी कोशिशों में सफल हो जाते हैं तो आलोचनाएं हितों का टकराव बन जाती हैं. आप के साथ भी कुछ ऐसा ही होता नज़र आ रहा है.

kapilआम आदमी पार्टी ने एक ऐसे राजनीतिक परिदृश्य का निर्माण किया, जिसका इंतजार लोगों को लंबे वक़्त से था. एक ऐसा परिदृश्य जहां वादे महज़ वोट हासिल करने का हथियार नहीं थे, बल्कि जनता के दरकते विश्वास को मज़बूत करने का साधन थे. महज़ दिल्ली ही नहीं वीआईपी संस्कृति से मुक्त इस नई सोच की पूरे देश में सराहना हुई. थोड़े ही वक़्त में आप ने इतनी ख्याति अर्जित कर ली कि मंझे हुए राजनीतिज्ञों के मंच तक हिलने लगे. क्या ये वजह आप के खिलाफ साजिश के लिए काफी नहीं है? क्या केंद्रीय एजेंसियों का बार-बार आप पर घेरा कसना साजिश के संदेह को गहरा नहीं करता? सवाल कई हैं, जिनके जवाब खोजे जाने चाहिए और इसके लिए केजरीवाल को भी आगे आना होगा. जिस तरह से उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों पर सीधा जवाब देने के बजाय ईवीएम का मुद्दा उठाया उससे यह संदेश गया कि केजरीवाल कुछ छुपा रहे हैं फिर भले ही उनकी मंशा इसे तूल न देने की रही हो. स्थिति पहली जितनी सरल नहीं है, अब ख़ामोशी का अर्थ होगा स्वीकृति. इसलिए केजरीवाल और उनकी टीम को काउंटर अटैक के साथ ही सेल्फ डिफेन्स का प्रदर्शन भी करना होगा, वरना साजिशों के बादल और घने होते जाएंगे.

आखिर क्यों हार रहे हैं केजरीवाल?

दिल्ली नगर निगम चुनावों में आप आदमी पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसे ही इशारे कर रहे थे. इस हार के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या आम आदमी पार्टी अपने शुरूआती बिंदु पर पहुंचने वाली है? क्या अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक करियर ख़त्म हो गया है? इन सवालों पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि हार और जीत केवल राजनीति ही नहीं बल्कि हर मुकाबले की हकीकत है. और यह ज़रूरी नहीं कि हारने वाला फिर से खड़े होने का साहस न जुटा पाए. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आज जिस दौर से गुज़र रही हैं, भाजपा भी उस दौर से गुज़र चुकी है. इसलिए अरविंद केजरीवाल के पास भी वापसी का मौका है और आगे भी रहेगा, जब तक कि वो खुद अपनी पारी समाप्ति की घोषणा नहीं करते. दिल्ली नगर निगम पर इससे पहले भी भाजपा का कब्ज़ा था, इसलिए यदि वो हारती तो उसे आप से ज्यादा आघात लगता. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह शिकस्त केजरीवाल और उनकी पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. क्योंकि इससे यह प्रत्यक्ष तौर पर नज़र आता है कि जनता आम आदमी पार्टी से मुंह मोड़ रही है. लेकिन इसकी क्या वजह है? क्या केजरीवाल ने अपने वादे पूरे नहीं किए? क्या आप के विधायक और कार्यकर्ताओं ने वैसी ही दबंगई दिखाई, जैसी आजकल यूपी में भाजपाई या उससे पहले सपा और बसपा कार्यकर्ता दिखाते थे? अगर नहीं, तो फिर केजरीवाल में विश्वास दिखाने वाली दिल्ली की जनता एकाएक से उनके खिलाफ कैसे हो गई?
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सूरत तो बदली है
इससे शायाद ही कोई इंकार करे कि केजरीवाल राज में दिल्ली का विकास हुआ है. जिन सरकारी स्कूलों को हिकारत की नज़रों से देखा जाता था, वहां की स्थिति न केवल सुधरी है, बल्कि नई संभावनाएं भी वहां जन्म ले रही हैं. मोहल्ला क्लीनिक के रूप में लोगों को एक ऐसा डॉक्टर मिल गया है, जो बेवजह के चक्कर नहीं लगवाता और ना ही बेवजह जेब ढीली करने पर जोर देता है. सड़कों पर रात गुजरने वालों को भी अच्छे शेल्टर नसीब हो रहे हैं. ख़ास बात यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जो सबसे ज़रूरी और अहम् है. आमतौर पर शिक्षक भी सरकारी ढर्रे में शामिल हो जाते हैं और बच्चों की नैया राम भरोसे आगे बढ़ती रहती है. जैसे कि देश के अधिकांश सरकारी स्कूलों में हो रहा है. दिल्ली के लोग इस बदलाव को महसूस भी कर रहे हैं, लेकिन ये अहसाह अगर वोट में तब्दील नहीं हो सका तो इसकी वजह काफी हद तक आम आदमी पार्टी की कलह और केजरीवाल खुद हैं.

ऐसी पार्टी क्यों चुनें?
दिल्ली में ताजपोशी के बाद से ही लगभग हर सुबह आम आदमी पार्टी से किसी की विदाई का संदेश लेकर आई. गोपाल राय, योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण से लेकर अलग-अलग इकाई के छोटे-बड़े कई नेता पार्टी से अलग होते गए. पिछले कुछ वक़्त से तो पार्टी धधकते माहौल से गुज़र रही है, जिसका धमाका नगर निगम में मिली हार के साथ ही हो गया है. केजरीवाल के सबसे ख़ास कहे जाने वाले कुमार विश्वास भी अपने कवि अंदाज़ में भाजपा को निशाना बनाते-बनाते पार्टी मुखिया पर तीर दाग रहे हैं. और आशुतोष जैसे दूसरे नेताओं के साथ केजरीवाल के संबंधों में भी खिंचाव है. सीधे शब्दों में कहें तो पार्टी बिखराव के रस्ते पर चल निकली है और ऐसी स्थिति में उसके लिए जीत हासिल करना लगभग नामुमकिन है. जनता एक ऐसी पार्टी से अपनी समस्याएं सुलझाने की उम्मीद कैसे कर सकती है, जो खुद के झगड़े ही नहीं सुलझा पा रही है. जिसके नेता अपनी ही पार्टी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. फिर भले ही विरोधी पार्टियां उससे कमतर क्यों न हों. मुंबई हमले के वक़्त देश में कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा था, महंगाई पहले से ही यूपीए सरकार की नींव कमज़ोर कर रही थी, बावजूद इसके जनता ने भाजपा को नकारते हुए कांग्रेस को दोबारा चुना. इसकी वजह महज इतनी ही थी कि भाजपा में आंतरिक कलह अपने चरम पर थी और लाख बुराइयों के बावजूद कांग्रेस एक अनुशासन वाली पार्टी बनी हुई थी.

इतने नकारात्मक क्यों?
इसके अलावा अरविंद केजरीवाल की नकारात्मक राजनीति भी जनता की नज़रों में आप की चमक को फीका करने में लगी है. सुधारों की बात करने वाले केजरीवाल अब राजनीति के कमाल खान बनते जा रहे हैं, जिन्हें हर मुद्दे पर हवा का रुख विरोधी पार्टियों की ओर मोड़ना है. चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो या नोटबंदी केजरीवाल प्रत्यक्ष तौर पर नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते रहे, ये जानते हुए भी कि देश नोटबंदी के फैसले का समर्थन कर रहा है. बुलेट ट्रेन को भी केजरीवाल ने बेकार साबित करने में देर नहीं लगाई, और गोवा एवं पंजाब विधानसभा चुनावों में हार के लिए ईवीएम पर उंगली उठाना शुरू कर दिया. नगर निगम चुनाव में शिकस्त को भी वो इसी नज़रिए से देख रहे हैं. केजरीवाल की बातों में सच्चाई है या नहीं, विषय अब यह नहीं रह गया है, बल्कि यह हो गया है कि आखिर केजरी इतने नकारात्मक क्यों हैं? आप सोशल मीडिया पर देख लीजिये, लोग यही सवाल केजरीवाल से कर रहे हैं. ये वही सोशल मीडिया है, जिसने दिल्ली में आप की जीत में अहम् किरदार निभाया था. नगर निगम हार आम आदमी पार्टी के लिए एक सबक है, और यदि उसने इससे भी कुछ नहीं सीखा, तो परिणाम ज्यादा घातक होंगे.

राष्ट्र विरोधी ‘आधार’ आज राष्ट्रहित बन गया है!

सरकार ने आधार कार्ड को पैन से लिंक करवाना अनिवार्य किया है, बैंक खातों के संबंध में भी ये बात लागू होती है. इसके अलावा सरकार कुछ दूसरी योजनाओं को भी इस दायरे में लाने पर गंभीरता से विचार कर रही है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि कुछ वक़्त पहले तक यही आधार कार्ड देश की सुरक्षा के लिए खतरा था. विपक्ष में रहने के दौरान भाजपा और नरेंद्र मोदी ने केवल आधार ही नहीं यूपीए सरकार के कई फैसलों पर सवाल खड़े किए थे, और आज उन्ही को अमल में लाकर वाहवाही लूट रहे हैं. ऐसे में सवाल उठाना लाजमी है कि पार्टी विद डिफ़रेंस का नारा देने वाली भाजपा दूसरों से अलग कैसे है? अपने अब तक के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई पॉलिटिकल यू-टर्न लेकर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कल तक जो फैसले दोषपूर्ण, तर्कहीन, और जनविरोधी थे, वो आज एकदम से त्रुटीरहित, तर्कसंगत, और जनहितैषी कैसे हो गए?

आधार कार्ड (AADHAAR)
तब: आधार कार्ड शुरू से भाजपा के निशाने पर रहा था. आधार कार्ड के माध्यम से गैस सब्सिडी बैंक खाते में जमा कराने का पार्टी ने जबर्दस्त विरोध किया था. 30 जनवरी को दिए अपने एक बयान में भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने कहा था, “आधार का कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि इसे संसद ने नहीं बनाया. सरकारी योजनाओं का लाभ देने के लिए विशिष्ट पहचान संख्या को अनिवार्य नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सवाल उठाया है.” इसी तरह चुनाव के दौरान पार्टी नेता अनंत कुमार ने कहा था, “आधार कार्ड बंद किया जाएगा.”

और अब: सरकार आधार कार्ड को बढ़ावा दे रही है. टैक्स रिटर्न फाइल करने के लिए आधार को पैन कार्ड से लिंक करना अनिवार्य किया गया है. इसके अलावा कई और योजनाओं के लिए भी इसे ज़रूरी किया जा रहा है. गैस सब्सिडी भी सीधे बैंक खाते में ही जमा हो रही है.

एफडीआई (FDI)
तब: भाजपा ने बाकी दलों के साथ मिलकर एफडीआई का कड़ा विरोध किया था. नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कांग्रेस देश को विदेशियों के हाथों में सौंप रही है. पार्टी ने 2012 में इस मुद्दे पर सरकार को पीछे धकेलने के लिए महाबंद भी बुलाया था. उस दौरान नितिन गडकरी ने कहा था, “ ये एक शुरुआत है हम तब तक संघर्ष करेंगे जब तक सरकार कदम वापस नहीं खींच लेती.”

और अब: सरकार का कहना है कि एफडीआई से विकास के रस्ते खुलेंगे. प्रधानमंत्री का कहना है कि भारत अब दुनिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए सबसे खुली अर्थव्यवस्था है. मोदी अब 49  प्रतिशत के कैप को भी भूल चुके हैं.

नोटबंदी (Demonetization)
तब: मोदी सरकार नोटबंदी को कालेधन के खिलाफ अपनी सबसे बड़ी जीत करार देती नहीं थक रही है, लेकिन यूपीए सरकार ने जब ऐसा ही कुछ करने का प्रयास किया था तो भाजपा को रास नहीं आया था. आरबीआई ने जब तक 2005 से पहले के नोट बंद करने की बात कही थी, तो भाजपा ने इसे गरीब विरोधी कदम बताते हुए कहा था कि इसका कालेधन से कोई लेना देना नहीं है. उस वक़्त भाजपा प्रवक्ता रहीं मिनाक्षी लेखी ने कहा था, “यह काले धन के मुद्दे से ध्यान हटाने की साजिश है. सरकार गरीब और ऐसे लोगों को निशाना बना रही है जिनके पास बैंक खाता नहीं है.”

और अब: 1000 और 500 ने नोटों को चलन से बाहर कर दिया गया है. मोदी और भाजपा का कहना है कि इस कदम ने कालाधन जमा करने वालों के साथ-साथ टेरर फंडिंग पर भी चोट की है. पार्टी के जो नेता पहले नोटबंदी शब्द सुनते ही हल्ला करने लगते थे अब वही इसे देशहित करार देने में लगे हैं.

कालाधन (Black Money)
तब: भाजपा कालेधन को लेकर अपने बड़े-बड़े वायदों के बल पर सत्ता में आई. चुनावी रैलियों में पार्टी की तरफ से कहा गया कि सरकार  बनने के 100 दिनों के भीतर कालाधन वापस लेकर आएंगे. इतना ही नहीं विपक्ष में रहते हुए मोदी ने कालेधन वालों के नाम उजागर न करने को लेकर यूपीए सरकार की मंशा पर शक जाहिर किया था.

और अब: सत्ता में आते ही भाजपा 100 दिन संबंधी वायदे को भूल गई, ये कहना ज्यादा बेहतर होगा कि उसने ऐसे किसी वायदे से ही इंकार कर दिया. इसके अलावा नाम उजागर करने को लेकर भी सरकार यूपीए की रह पर है. भाजपा सरकार ने भी कालेधन वालों के नाम बताने से इंकार कर दिया है.

भूमि सौदा (Land swipe deal)
तब: जब यूपीए सरकार ने बांग्लादेश के साथ ज़मीनों की अदला-बदली पर बात आगे बढ़ाई थी, तो भाजपा ने ममता बनर्जी के साथ मिलकर खूब हंगामा मचाया था. लेकिन सरकार बनते ही भाजपा और मोदी को इस सौदे में अच्छाई नज़र आने लगी.

और अब: सरकार इसे ऐतिहासिक समझौता करार दे रही है. मोदी ने 6 जून के अपने ट्वीट में कहा, “भूमि समझौते को मंजूरी प्रदान करने के दस्तावेजों के आदान-प्रदान से इतिहास रच गया है.”

रेल किराया (Rail fare hike)
तब: यूपीए सरकार के कार्यकाल में रेल यात्री किराए में हर बढ़ोत्तरी का भाजपा ने जमकर विरोध किया. उस दौरान उसे ऐसे तर्क तर्कहीन लगते थे कि रेलवे को पटरी पर लाने के लिए किराया बढ़ाना ज़रूरी है. तब सरकार द्वारा किराए में 2 रुपए के इजाफे का भाजपा ने रेल रोको आंदोलन चलाकर विरोध जताया था.

और अब:  सरकार में आते ही मोदी सरकार ने रेल यात्री और भाड़ा दोनों किरायों में वृद्धि कर दी. इस पर सफाई देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था, “रेलवे तभी जीवित रह सकती है जब यात्री मिलने वाली  सुविधाओं के लिए भुगतान करें, ये कठिन लेकिन सही फैसला है.” प्रत्यक्ष तौर पर ही नहीं सरकार ने पिछले दरवाज़ों से भी यात्रियों की जेब ढीली करने के कई उपाय निकाल लिए हैं. प्रीमियम तत्काल के नाम पर रेलवे यात्रियों से जमकर वसूली कर रहा है.

सार: अगर आप किसी विषय की इस हद तक खिलाफत करते हैं कि वो आपकी नज़र में राष्ट्र विरोधी बन जाता है, तो फिर आप खुद उसकी हिमायत कैसे कर सकते हैं?
“If you oppose something how can you defend it”

अपने ही कर रहे योगी की अनदेखी!

महीनों के सूखे के बाद जब बारिश की बूंदें धरती पर पड़ती हैं, तो दम तोड़ रहे शरीर में भी एक नई चेतना जग जाती है. उत्तर प्रदेश में भी आजकल कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिल रहा है, हालांकि चेतना का रूप थोड़ा जुदा है. लंबे इंतज़ार के बाद सत्ता का स्वाद चख रहे भाजपाई इतने मदमस्त हो गए हैं कि खुद मुख्यमंत्री की हिदायतों को नज़रंदाज़ कर रहे हैं. यूपी में कानून व्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा है और इसी को आधार बनाकर भाजपा सत्ता में आई है. कुर्सी संभालने के पहले दिन से ही योगी आदित्यनाथ ने साफ़ कर दिया था कि अराजकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी, लेकिन कुछ भाजपा नेताओं पर इसका कोई असर नहीं है या फिर शायद वे अपने कृत्यों को अराजकता की श्रेणी से बाहर समझते हैं. मेरठ में बीते दिनों पार्टी नेता संजय त्यागी और उनके समर्थकों ने पुलिस थाने पर जमकर हंगामा किया, ये हंगामा अगर किसी पीड़ित को न्याय दिलाने को लेकर होता तो समझा जा सकता था. मगर नेताजी ने कानून तोड़ने वाले अपने बेटे के पक्ष में पूरा थाना सिरपर उठा लिया.

yogiरोका तो दी धमकी
आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि नेता और उनके समर्थकों ने कुछ पुलिस कर्मियों के साथ मारपीट भी की. पुलिस की गलती बस इतनी थी कि उसने सख्त मुख्यमंत्री के राज में सख्ती बरतते हुए गाड़ी पर काली फिल्म और हूटर लगाने के लिए नेताजी के बेटे का चालान काट दिया. मेरठ के नगर पुलिस अधीक्षक आलोक प्रियदर्शी के मुताबिक जब पुलिसकर्मियों ने गाड़ी रोकी तो नेता का बेटा धमकी देने लगा. जब उसे थाने चलने को कहा तो उसने फ़ोन करने अपने पिता को बुला लिया.

कुछ नहीं सुना
गोरखपुर में हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने चर्च में प्रार्थना को यह कहकर रुकवा दिया कि वहां धर्मांतरण हो रहा है. पुलिस के ऐसी किसी घटना से इंकार करने के बावजूद कार्यकर्ताओं ने प्रार्थना नहीं होने दी. इसके अलावा कई जगहों पर पुलिस और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच झड़प भी देखने को मिली. गौर करने वाली बात यह है कि सरकार में होने के बावजूद कुछ भाजपा नेता पुलिस पर पुरानी सरकार का हमदर्द होने का आरोप लगाकर उससे उलझ रहे हैं.

क्या फर्क रह जाएगा
समाजवादी पार्टी भाजपा पर कानून व्यवस्था दुरुस्त करने में नाकाम होने का आरोप लगा रही है, लेकिन इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी. नई सरकार को व्यवस्था समझने और उसे अपने हिसाब से पटरी पर लाने में वक़्त लगता है और योगी को तो अभी एक महीना भी नहीं हुआ है. हालांकि भगवा चोले में कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वालों पर लगाम लगाने के लिए योगी को कुछ ज़रूर करना होगा. यदि भाजपा नेता और कार्यकर्ता ऐसे ही बवाल मचाते रहेंगे तो फिर सपा और पार्टी विद द डिफरेंस कहलाने वाली भाजपा में क्या फर्क रह जाएगा.

ये तस्वीर बदलनी है
सपा सरकार के दौरान पार्टी नेता ने एक पुलिसकर्मी को सरेआम महज इसलिए थप्पड़ मार दिया था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहा था. अदालत ने ताजमहल के एक निश्चित दायरे से आगे वाहन ले जाने पर पाबंदी लगाई हुई है. जब नेताजी अपनी गाड़ी लेकर आगे जाने लगे तो पुलिसकर्मी ने उन्हें कोर्ट के आदेश का हवाला दिया, इस पर नेताजी इतने भड़क गए कि उन्होंने पुलिसकर्मी हो थप्पड़ रसीद कर डाला. योगी सरकार पर इस तस्वीर को बदलने की ज़िम्मेदारी है, अब देखने वाली बात ये है कि क्या वो ऐसा कर पाते हैं?