यूपी को पसंद आ रहे योगी के तेवर

मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस तरह से योगी आदित्यनाथ एक के बाद एक ताबड़तोड़ फैसले ले रहे हैं, उससे यूपी (UP) की जनता खुश है. जनता को विश्वास है कि योगी पांच सालों में प्रदेश का कायाकल्प करने में सफल होंगे. योगी के एजेंडे में कानून व्यवस्था और अवैध बूचड़खाने सबसे ऊपर हैं. कुर्सी पर बैठने के मात्र चंद घंटों में ही उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया है. एक अच्छी बात तो अब तक नज़र आ रही है वो यह है कि योगी अफसरों के ट्रांसफर पर जोर नहीं दे रहे हैं, जैसा कि पूर्व के मुख्यमंत्री करते आए हैं. आज का खबरी ने उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में लोगों से बात की और अधिकांश का यही कहना है कि योगी ने जिस तरह से आगाज़ किया है उससे वो खुश हैं.
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अब नया अभियान
योगी ने अवैध बूचड़खानों पर लगाम कसने के बाद लड़कियों को परेशान करने वाले रोमियों के खिलाफ अभियान का आगाज़ किया और अब खुले में शराब पीने वालों पर भी पुलिस का कहर टूट रहा है. प्रदेश के अलग-अलग शहरों में वो पुलिस घूम-घूमकर सड़कों पर जाम छलकाने वालों को सलाखों के पीछे पहुंचा रही है, जिस पर कभी सोते रहने के आरोप लगा करते थे. गौरतलब है कि अपराध में इजाफे की एक बड़ी वजह खुलेआम शराब का सेवन भी है.

गायब हुए अपराधी
यूपी में योगी का सख्त अंदाज़ देखकर ज़्यादातर अपराधी अंडरग्राउंड हो गए हैं. एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक, कुछ वक़्त पहले तक सक्रीय गिरोह के बारे में अब कोई सूचना नहीं है. अपराधियों को डर सता रहा है कि जिस तरह योगी फैसले ले रहे हैं, उससे उनकी जान आफत में पड़ सकती है. सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि अन्य सियासी दलों ने भी अपने कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह की गड़बड़ न करने के आदेश दिए हैं.

क्या कहते हैं लोग
आज का खबरी से बातचीत में लोगों के कहा, यूपी को जिस धमाकेदार मुख्यमंत्री की तलाश थी, वो पूरी हो गई है. प्रदेश में सबसे बड़ी समस्या लचर कानून व्यवस्था है, जिस तरह से योगी ने सख्ती दिखाई है उससे तो यही लगता है कि बढ़ते अपराधों पर लगाम लगेगी. लोगों के माना कि एंटी-रोमियो अभियान से कुछ परेशानी हो सकती है, पर यह आवश्यक कदम था. कुछ राजनीतिक दलों के छोटे-मोटे कार्यकर्ता ही छेड़छाड़ को बढ़ावा देते थे, लेकिन अब उन्हें भी खामोश बैठने पड़ेगा. सीएम से लोगों की यही अपील है कि जो सख्ती वो दिखा रहे हैं वो आगे भी कायम रहे तभी सुधार संभव होगा. बूचड़खाने के मामले पर लोगों की राय कुछ हद तक बंटी हुई है, समुदाय विशेष के कुछ लोगों को जहां लगता है कि इसकी आड़ में उन्हें बेवजह परेशान होना पड़ेगा बाकियों का मानना है कि यह अच्छा कदम है.

‘सिंगल’ जीत रहे सिसायत का खेल

सियासत में आजकल सिंगल ही मिंगल कर रहे हैं. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विवादित भाषणों पर चर्चा छोड़कर यदि भाजपा के दिलचस्प पहलू पर नज़र डाली जाए, तो यह पता चलता है कि पार्टी में वही नेता ऊंचाइयों को छू रहा है जो अकेला है. अटल बिहारी वाजपेयी के बाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण नरेंद्र मोदी हैं, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी से होते हुए आज प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए हैं. भले ही उनकी शादी हुई थी, लेकिन राजनीति में पूरी तरह सक्रिय होने के बाद वे अकेले ही रह रहे हैं. इसी तरह आदित्यनाथ भी सिंगल हैं और मनोहर लाल खट्टर, सर्बानंद सोनेवाल भी.

सबसे बड़ा नाम
सोनेवाल इस समय असम के मुख्यमंत्री हैं और खट्टर हरियाणा के, इस हिसाब से देखें तो तीन राज्यों की कमान भाजपा के सिंगल नेताओं के हाथ है और देश ही मोदी के हाथ. वैसे अन्य पार्टियों के भी कई नेता हैं, तो अकेले रहकर सियासत के घोड़े को सरपट दौड़ा singleरहे हैं. इनमें ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शामिल हैं. अगर जयललिता जीवित होतीं, तो उन्हें भी इस लिस्ट में जगह मिलती.

माया से उमा तक
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती भी अब तक कुंवारी हैं. मौजूदा संकट को छोड़ दें तो वे लम्बे समय से राजनीति में अपना लोहा मनवाती रहीं हैं. केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी अब तक शादी नहीं की है. एक ज़माने में उमा भाजपा की फायर ब्रैंड नेता थीं और उनका कद पार्टी में बहुत बड़ा था. हालांकि विवादों के चलते भाजपा छोड़कर नई पार्टी बनाने के फैसले के चलते उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ा.

और राहुल भी कुंवारे
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अब तक कुंवारे हैं, उनकी शादी की बातें ज़रूर चलीं मगर मामला उनसे आगे नहीं बढ़ा. राहुल इसलिए शादी नहीं करना चाहते क्योंकि वो अभी राजनीति में अपना भविष्य संवारना चाहते हैं. हालांकि उत्तर प्रदेश में पार्टी की हार के बाद उनके सिंगल होने को लेकर भो सोशल मीडिया पर काफी जोक बन रहे हैं.

Video: योगी के बिगड़े बोल

योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चुना गया है. योगी अपने विवादित भाषणों के लिए मशहूर हैं, देखने वाली बात होगी कि एक साम्प्रदायिक नेता कैसा शासन चलाता है.

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.

कल के दुश्मन आज दोस्त बन गए

राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी भी नफे-नुकसान के आधार पर होती है. कल तक नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में थे तो कैप्टन अमरिंदर सिंह उनके सबसे बड़े दुश्मन थे, लेकिन आज वही उनके सबसे अज़ीज हो गए हैं. शपथ ग्रहण समारोह में सिद्धू ने सार्वजानिक रूप से कैप्टन के पैर छूकर यह साबित भी कर दिया. सिद्धू अब आम विधायक नहीं हैं वो मंत्री बन गए हैं, हालांकि उनका सपना डिप्टी सीएम बनने का था. वो ये बखूबी जानते हैं कि इस जीत के बाद कांग्रेस में कैप्टन का कद कहीं गुना ज्यादा बढ़ गया है और उनकी अनदेखी करके वो सरकार का हिस्सा बने नहीं रह पाएंगे. यही वजह है कि सिद्धू ने कैप्टन के पैर छूकर यह संदेश दे दिया कि वो अब कोई मनमुटाव नहीं रखना चाहते.

siddhuपुरानी तल्खी
सिद्धू और कैप्टन के रिश्ते काफी पहले से तल्ख़ रहे हैं. भाजपा का दामन छोड़ने के बाद आम आदमी पार्टी में जाने के कयासों के बीच जब सिद्धू ने कांग्रेस में विकल्प तलाशा तो कैप्टन ने इसका पुरजोर विरोध किया था. पंजाब कांग्रेस से जुड़े कुछ नेता इस बात को स्वीकारते हैं कि कैप्टन ने आलाकमान से सिद्धू को टिकट न देने की सिफारिश की थी. इतना ही नहीं उन्होंने राहुल गांधी को यह भी समझाने की कोशिश की थी कि सिद्धू को पार्टी में लाना फायदे के बजाए घाटे का सौदा हो सकता है, मगर राहुल ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया.

बंद करो लड़ाई
कांग्रेस से टिकट पक्का होने के बाद भी नवजोत सिंह सिद्धू कैप्टन पर तीर दागते रहे. एक सभा में उन्होंने कहा था कि “एक अकेला भी भाड़ फोड़ सकता है”, ये बयान कैप्टन के बयान का जवाब था. भाजपा में रहने के दौरन तो इस पूर्व क्रिकेटर ने कैप्टन पर कई आरोप लगाए थे. सूत्र बताते हैं कि चुनाव परिणाम सामने आने के बाद आलाकमान की तरफ से कैप्टन और सिद्धू को यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि पुरानी लड़ाई भुलाकर काम करें. हालांकि अब देखने वाली बात यह होगी कि नफे-नुकसान पर टिकी यह दोस्ती कितने दिन चल पाती है.

Punjab: हारकर भी जीत गई आप

Punjab is still new hope for Aam Aadmi Party.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अगर सबसे ज्यादा कुछ आश्चर्यजनक रहा, तो वो पंजाब और गोवा के नतीजे. दोनों ही राज्यों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे थे, लेकिन परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे. इस हार के बाद केजरीवाल की रणनीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं, इस बात पर चर्चा की जा रही है कि क्या आप का राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दस्तक देने का सपना टूट गया है? अगर हम उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा के जबरदस्त प्रदर्शन से बाहर निकलकर सोचने का प्रयास करें तो इस सवाल का जवाब निश्चित तौर पर ना punjabहोगा. ये बात सही है कि पार्टी को पंजाब में हार का सामना करना पड़ा और गोवा में वो खाता खोलने में भी असफल रही, लेकिन क्या इस तरह की चर्चाओं और टिप्पणियों से पहले आप के राजनीतिक अनुभव पर नज़र नहीं डालनी चाहिए? भाजपा या कांग्रेस से तुलना की जाए तो आम आदमी पार्टी उस युवा की तरह है, जो बचपन से निकलकर जवानी में कदम रख रहा है. और ऐसा युवा अगर धुरंधरों के सामने कुछ देर भी अपने कदम ज़माए रख पता है तो उसके भविष्य को लेकर सवाल खड़े नहीं किए जाते बल्कि संभावनाएं व्यक्त की जाती हैं. आप ने पहली बार दिल्ली से बाहर निकलकर पंजाब और गोवा में अपनी किस्मत आजमाई, पंजाब में उसे भाजपा और कांग्रेस के अलावा अकाली दल के वोट भी काटने थे. ये सभी पार्टियां सत्ता की राजनीति में लंबा अनुभव रखती हैं, इसलिए आम आदमी पार्टी ने जब अपने चुनावी अभियान को यहां से आगे बढ़ाने का ऐलान किया तो किसी के माथे पर ज्यादा सिलवटें देखने को नहीं मिलीं. अधिकतर नेता यह मानते रहे हैं कि सोशल मीडिया पर लड़ाई लड़ने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली के बाहर अपनी छाप नहीं छोड़ सकती. लेकिन जब आप की सभाओं में भीड़ जुटने लगी, केजरीवाल को सुनने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचने लगे तो सिसायत के मंझे हुए खिलाड़ियों के होश उड़ना शुरू हो गए. यहीं से एक हवा बनना शुरू हुई कि आम आदमी पार्टी पंजाब में झाड़ू लगा सकती है. केवल केजरीवाल या आप कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि विरोधी दलों को भी अपनी हार की आशंका होने लगी थी.

भाजपा को मात

हालांकि परिणाम कुछ और रहे, मगर फिर भी आप अप्रत्यक्ष तौर पर उस भाजपा को मात देने में कामयाब रही, जिसने मोदी लहर पर सवार होकर यूपी और उत्तराखंड में न सिर्फ भगवा झंडा फहराया बल्कि कई रिकॉर्ड भी ध्वस्त कर दिए. बादल की काली छाया भी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को अपने आगोश में नहीं ले सकी. पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं, उसमें आम आदमी पार्टी ने 20 पर जीत हासिल की, जबकि को भाजपा को महज 3 सीटों पैर जीत मिली और उसकी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल महज 15 पर सिमट गई. कांग्रेस को सबसे ज्यादा 77 सीटें मिलीं. अब यदि 2012 के चुनाव परिणाम देखें तो अकाली दल को 56 और भाजपा को 12 पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस के 46 उम्मीदवार ही जीत पाए थे. आम आदमी पार्टी ने पहली बार पहली बार चुनाव लड़ा और सत्ताधारी पार्टियों से ज्यादा वोट प्रतिशत प्राप्त किया, क्या ये किसी जीत से कम है? क्या इसका सीधा सा मतलब ये नहीं है कि जनता भाजपा और अकाली दल के स्थान पर आम आदमी पार्टी को देखना चाहती है?

punjabबस एक चूक

पंजाब में आम आदमी के प्रदर्शन को निराशाजनक नहीं बल्कि उम्मीदों के अनुरूप न होना कहा जा सकता है. पार्टी यहां जनता के सामने एक मजबूत स्थानीय नेतृत्व रखने में चूक गई, और यही शायद उसके कम वोटों का कारण रहा. भगवंत मान और एचएस फुल्का से पार्टी को भले ही फायदा मिला हो, लेकिन यह स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरा साबित नहीं हो सकते थे. इसके अलावा केजरीवाल का पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की अफवाह ने भी पार्टी के खिलाफ काम किया. इससे आप आयात किए हुए नेताओं की पार्टी महसूस होने लगी. लोगों को लगने लगा कि बिना पंजाब को जाने-समझे कोई व्यक्ति कैसे राज्य की बागडोर संभाल सकता है? इसलिए अमरिंदर सिंह की छवि केजरीवाल पर भारी पड़ी. यदि आप मजबूत स्थानीय नेतृत्व पेश करती तो निश्चित तौर पर उसकी झोली में ज्यादा सीटें आतीं.

अब भी मौका

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी चुनाव ज़रूर हारी है, लेकिन विपक्ष की कुर्सी पर उसी का कब्ज़ा है. अगर वो अपनी इस भूमिका को सही ढंग से निभा पाती है, तो अगले चुनाव तक वो जनता के बीच खुद को अच्छी तरह से स्थापित करने में कामयाब होगी. जिन मुद्दों को पार्टी ने चुनाव के दौरान उठाया था उन्हें अब वो विधानसभा में उठा सकती है. यह सब जानते हैं कि अमरिंदर सिंह को लगभग खाली खजाने से जनता की उम्मीदों को पूरा करना होगा, ऐसे में आम आदमी पार्टी को कई मौके मिलेंगे जब वो खुद को बेहतर साबित कर सकती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो आप ने पंजाब में हार कर भी काफी कुछ पाया है, ज़रूरत है उसे समझने और आगे की तैयारी करने की. जहां तक बात गोवा की है तो परिणाम दुःख देने वाले हैं, लेकिन पार्टी का ये पहला प्रयोग था और प्रयोग सफल – असफल होते रहते हैं.

यूपी को सिर्फ मोदी पसंद हैं

उत्तर प्रदेश (UP) की जनता ने साफ़ कर दिया है कि उसे अखिलेश और राहुल का साथ नहीं बल्कि मोदी पसंद हैं. अब तक के रुझानों के आधार पर यूपी में भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया है. यानी उसे सरकार बनाने के लिए किसी के साथ की ज़रूरत नहीं है. UPभाजपा ने पिछले चुनाव के मुकाबले ऐतिहासिक वोट प्राप्त किए हैं. इसके साथ ही यह भी साफ हो गया है कि नोटबंदी को लेकर जनता में केंद्र सरकार के प्रति किसी तरह गुस्सा नहीं है. वहीं इस चुनाव ने मायावती को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है, बसपा 30-25 सीटों पर ही सिमटकर रह गई है. सपा और कांग्रेस के हाल भी काफी बुरा रहा है, दोनों पार्टियों को जनता ने पूरी तरह नकार दिया है. यूपी में कुल 404 सीटें हैं और बहुमत के लिए 202 सीटों की ज़रूरत है, और भाजपा इस आंकड़े से काफी आगे निकल गई है.

उत्तराखंड में भी भाजपा

उत्तर प्रदेश की तरह ही उत्तराखंड में भी भाजपा जीत की तरफ बढ़ रही है. अब तक के रुझानों के आधार भाजपा को 54 सीटें मिल रही हैं और कांग्रेस महज 9 सीटों पर सिमटकर रह गई है. वहीं पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनाती दिख रही है और गोवा में भी कांग्रेस आगे है. इन दोनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी को करार झटका लगा है. माना जा रहा था कि यहां आप की सरकार बन सकती है.

Survey: साइकिल का पंक्चर होना तय!

  • Survey conducted by Aaj Ka Khabri, shows that SP may lose its shine.

यादव कुनबे में मचे घमासान के चलते समाजवादी पार्टी को विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है। सपा की स्थिति बिल्कुल वैसी हो गई है, जैसी कुछ साल पहले भाजपा की थी। आंतरिक कलह की वजह से भाजपा को लोकसभा सहित विधानसभा चुनावों में भी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। सपा में सुलह के अब तक जितने भी फॉर्मूले निकाले गए हैं, सब नाकाम रहे हैं। इस बात की संभावना बेहद कम है कि पिता पुत्र की लड़ाई जल्द थम जाए, और यदि थमती भी है तो भी पार्टी को नुकसान तो उठाना ही पड़ेगा। यूपी की जनता एक ऐसी पार्टी को पुनः सत्ता में आने का मौका शायद न दे, जो अपने घर के झगड़े ही नहीं सुलझा पा रही है। जनता का मिजाज परखने के लिए आज का खबरी द्वारा कराए गए संक्षिप्त सर्वेक्षण में काफी हद तक यह साफ नजर surveyआ रहा है कि सपा के मतदाता इस बार छिटककर दूसरे खेमे में जाएंगे। इतना ही नहीं हर सूरत में अपनी जीत का दावा करने वाली पार्टी के नेता भी मानते हैं कि हालात इस बार बेहद विपरीत हैं।

जनता को आशंका
आज का खबरी ने अपने वन टू वन सर्वेक्षण में लोगों से जानना चाहा कि क्या मौजूदा परिदृश्य में वो सपा के साथ जाना चाहेंगे? मुलायम सिंह और अखिलेश यादव में से पार्टी का नेतृत्व कौन बेहतर ढंग से कर सकता है? सर्वे में शामिल अधिकतर लोगों ने माना कि सपा में मचे घमासान को देखते हुए वो दूसरा विकल्प तलाश रहे हैं। लोगों का तर्क था कि जो पार्टी घर के झगड़ों को नहीं सुलझा पा रही है, वो उनकी समस्याओं को क्या दूर करेगी। जनता में इस बात को लेकर भी आशंका है कि यदि वो सपा को पुनः सत्ता में लाती है, तो क्या वो स्थायी और मजबूत शासन दे पाएगी?

भरोसा नहीं
आगरा, लखनऊ सहित समाजवादी पार्टी के गढ़ समझे जाने वाले मैनपुरी, इटावा, आजमगढ़, सैफई और तमाम अन्य क्षेत्रों के मतदाताओं की सोच में परिवर्तन देखा जा रहा है। यहां तक की सपा का वोटबैंक समझे जाने वाला मुस्लिम समुदाय भी उससे दूर हो सकता है। इसका फायदा कुछ कांग्रेस को होने की उम्मीद है, क्योंकि यूपी में मुस्लिम समुदाय का वोट भाजपा के खेमे में कम ही जाता है। मतदाता मानते हैं कि सपा कई घड़ों में विभाजित हो चुकी है। भले ही आज सब एकजुट हो जाएं, लेकिन कल फिर भी कलह का मटका फूट सकता है।

अखिलेश बेहतर
मुलायम सिंह और अखिलेश यादव में से पार्टी का नेतृत्व कौन बेहतर ढंग से कर सकता है? इस सवाल के जवाब में अधिकतर लोगों ने अखिलेश की पैरवी की। हालांकि कुछ यह भी मानते हैं कि नेतृत्व बदलने से खास असर नहीं होगा पार्टी की सोच बदलने की जरूरत है। सर्वे की खास बात ये रही कि युवाओं के साथ साथ बुजुर्गों ने भी माना कि अखिलेश ज्यादा बेहतर ढंग से पार्टी को आगे ले जा सकते हैं। उनके मुताबिक, पिछले चुनाव में जनता ने सपा के नाम पर नहीं बल्कि अखिलेश के नाम पर वोट दिए थे, लिहाजा पार्टी को उनके फैसलों को तवज्जो देनी चाहिए।

अपनों को भी डर
पार्टी नेताओं को भी लग रहा है कि इस बार चुनाव में सपा का प्रदर्शन काफी खराब रह सकता है। एक युवा नेता ने कहा, इस लड़ाई में जीत किसी की भी हो, पार्टी की हार होगी। पिछले चुनावों में हम भाजपा की आंतरिक कलह का हवाला देकर जनता को समझाया करते थे कि जो पार्टी अपना घर नहीं संभाल पा रही, वो आपको क्या संभालेगी। आज हम खुद उस स्थिति में पहुंच गए हैं। चुनाव से ऐन पहले विवाद का इस तरह सार्वजनिक होना पार्टी के लिए नुकसानदायक है। हम ऊपरी तौर पर भले ही कुछ भी कहें, लेकिन अंदर से सब डरे हैं।

पर्रिकर के GOA में भाजपा से नाराज हैं लोग!

अब जब गोवा (GOA) सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान हो गया है, तो ये बात काफी मायने रखती है कि मनोहर पर्रिकर के गोवा में भाजपा को लेकर गुस्सा है। संभव है कि 4 फरवरी को होने वाले मतदान में यह गुस्सा किसी बड़े उलटफेर की कहानी लिख जाए। गोवा की आधे से ज्यादा आबादी पर्यटन पर निर्भर है और नोटबंदी के चलते उसकी आमदनी पर करारी चोट हुई है। भाजपा के लिए मुसीबत यह है कि नोटबंदी के साइड इफेक्ट समाप्त होने से पहले ही राज्य में चुनावी बिगुल बज गया है। कुछ स्थानीय नेता मानते हैं कि यदि चुनाव साल के अंत तक होते तो ज्यादा बेहतर होता।

गड़बड़ाएगा गणित
नोटबंदी को केंद्रीय स्तर पर भले ही बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा हो, लेकिन राज्य में जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ता अच्छे से जानते हैं कि जनता को परेशानी तो हुई है। और इस परेशानी का बदला लेने का मौका उसे कुछ जल्दी मिल गया GOAहै। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 40 में से 22 सीटें अपने नाम की थी और इस जीत में उत्तरी गोवा का काफी योगदान था, लेकिन इस बार उसका गणित गड़बड़ा सकता है। क्योंकि यहां भाजपा को लेकर असंतोष का माहौल है। आज का खबरी ने जब गोवा वासियों का दिल टटोलने की कोशिश तो एक बड़े वर्ग में भगवा पार्टी के प्रति गुस्सा साफ तौर पर नजर आया। फिर भले ही वे पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग हों, मछुआरे या फिर टैक्सी ड्राइवर।

कुछ असर तो होना चाहिए
कैंडोलियम निवासी जॉर्ज भाजपा समर्थक रहे हैं, उनके घर के वोट कभी किसी दूसरी पार्टी को नहीं गए, मगर इस बार वो आम आदमी पार्टी का साथ देने का मन बना चुके हैं। जॉर्ज कहते हैं, बात केवल डिमॉनिटाइज़ेशन की नहीं है, कई मुद्दे पर जिन पर मौजूदा सरकार नाकामयाब रही। लिहाजा इस बार दूसरे विकल्प को आजमाना मैं बेहतर समझूंगा। जॉर्ज की तरह रफीक भी भाजपा से नाराज हैं, हालांकि उनकी नाराजगी पूरी तरह से नोटबंदी तक सीमित है। पर्यटन क्षेत्र से जुड़े रफीक कहते हैं, नोटबंदी का जितना असर हम पर हुआ है, उसका कुछ प्रतिशत तो भाजपा पर होना ही चाहिए। मेरा वोट भाजपा को नहीं जाएगा, ये पक्का है। जॉर्ज और रफीक की तरह उत्तरी गोवा में अनगिनत लोग हैं, जिनका भाजपा से मोहभंग हो चुका है।

कई और भी हैं वजह
पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग जहां नोटबंदी जैसे फैसलों के चलते भाजपा से नाराज हैं, तो आम जनता राज्य सरकार की वादाखिलाफी से नाराज है। इसमें सबसे प्रमुख है मंडोवी नदी पर तैरते कैसीनो, सत्ता में आने से पहले भाजपा ने कहा था कि वो इन्हें यहां से दूर ले जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अंग्रेजी की अपेक्षा स्थानीय भाषाओं को तवज्जो न देने को लेकर भी पार्टी की आलोचना हो रही है।

सास-बहू के झगड़े में बिखरी सपा!

सास-बहू के झगड़े पारिवारिक शांति के दुश्मन को होते ही हैं, लेकिन अगर यह अपने चरम पर पहुंच जाएं तो राजपाट भी तबाह होते देर नहीं लगती। उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी सपा में आजकल इसी झगड़े के चलते घमासान मचा हुआ है। हालात ये हो चले हैं कि न पिता मुलायम सिंह यादव को बेटे अखिलेश की सूरत भा रही है और न अखिलेश को मुलायम की। घर का ये झगड़ा अब सार्वजनिक तौर पर सामने आ गया है। सूत्र बताते हैं कि मुलायम की दूसरी पत्नी साधना और अखिलेश की पत्नी डिंपल के बीच spविवाद चल रहा है। कुछ दिनों पहले यह विवाद तीखी कहासुनी में तब्दील हुआ और इसका प्रभाव पार्टी एवं सरकारी स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों में देखने को मिला। यूपी समाजवादी पार्टी के एक नेता के मुताबिक, साधना अपने बेटे प्रतीक के लिए राजनीति में आगे लाना चाहती हैं। उनकी चाह है कि प्रतीक को इस बार के विधानसभा चुनाव में बड़े रूप में पेश किया जाए। इसी मुद्दे को लेकर सास बहू में कहासुनी हुई और विवाद आग की तरह भड़क उठा।

गायब हुआ प्यार
अखिलेश और मुलायम के बीच का प्यार अब गायब हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक घर की चारदीवारी में दोनों के बीच यदि संवाद होता है तो बस आरोप प्रत्यारोप के लिए। इस पूरे खेल में अमर सिंह की भूमिका बेहद खास बताई जा रही है। अमर अपने अपमान का बदला लेने और अपना खोया रुतबा वापस पाने के लिए फूट डालो, राजनीति करो की भूमिका अपना रहे हैं। खुद अखिलेश यादव भी मानते हैं कि पारिवारिक कलह के पीछे अमर सिंह का हाथ है। दूसरी तरफ शिवपाल भी साधना के बेटे प्रतीत का साथ दे रहे हैं। इस वजह से विवाद और भी तेज हो गया है।

चुनावी मजबूरी
सूत्रों के अनुसार, मुलायम सिंह अखिलेश को पार्टी से बाहर करने का मन बना चुके हैं। लेकिन राजनीतिक मजबूरी के चलते वह फैसला नहीं ले पा रहे। यदि अभी अखिलेश को हटाया जाता है, तो इसका असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। वैसे एक बात यह है कि यदि सपा विधानसभा चुनाव जीतती है तो अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं सौंपी जाएगी।