निजी यात्रा पर लुटाई रेलवे की कमाई!

-शिर्डी, भीमाशंकर दर्शन के लिए स्पेशल कोच लेकर पहुंचे रेलवे बोर्ड चेयरमैन 
-सरकारी खर्चों में कटौती की पीएम की पहल का उड़ाया मजाक
-दौरे को आधिकारिक नाम देने की कोशिश में जुटा रेलवे.
एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकारी खर्चे में कटौती की बात कर रहे हैं, ताकि देश के विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जा सके। वहीं रेल अधिकारी उनकी कोशिशों पर पलीता लगाने में जुटे हैं। हाल ही में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन (सीआरबी) एके मित्तल railनिजी यात्रा पर पुणे आए थे, लेकिन सरकारी सुख सुविधाओं का दोहन करने के लिए उसे आधिकारिक दौरे का रूप दिया गया। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, सीआरबी की यह यात्रा पूरी तरह से निजी थी। वे पहले शिर्डी गए फिर अष्टविनायक के दर्शन के लिए पुणे आए। उन्होंने न तो कोई निरीक्षण किया और न ही कोई बैठक ली। जबकि इस कवायद में रेलवे के लाखों रुपए जरूर खर्च हो गए। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है, रेल अधिकारी अक्सर अपनी निजी यात्राओं को आधिकारिक रूप देकर इसी तरह घाटे में चल रहे रेलवे की कमर तोड़ते रहते हैं।
ऐसा था कार्यक्रम 
सीआरबी आठ अक्टूबर को अपनी स्पेशल कोच (सैलून) में सवार होकर दिल्ली से कोपरगांव के लिए निकले। उनकी कोच को 12628 एक्सप्रेस में अटैच किया गया था। कोपरगांव से वह सीधे शिर्डी दर्शन के लिए चले गए। 10 अक्टूबर को 12150 एक्सप्रेस से अपने सैलून में कोपरगांव से पुणे के लिए रवाना हुए। पुणे पहुंचने के बाद सीआरबी अपने काफिले के साथ सबसे पहले भीमाशंकर के दर्शन के लिए गए। दूसरे दिन उन्हें अष्टविनाक के दर्शन के लिए जाना था। लेकिन पारिवारिक कारणों के चलते उन्हें बीच में ही दिल्ली वापस लौटना पड़ा। इस छह दिनों के टूर को आधिकारिक बनाने के लिए आखिरी दिन पुणे में रेल अधिकारियों की बैठक बुलाई गई थी। तय कार्यक्रम के मुताबिक सीआरबी को 13 अक्टूबर को 12779 एक्सप्रेस से निजामुद्दीन लौटना था।
पानी की तरह बहाया पैसा
सीआरबी की निजी यात्रा पर रेलवे ने पानी की तरह पैसा बहाया। सूत्रों के मुताबिक, उन्हें भीमाशंकर ले जाने के लिए 10 गाडि़यों का काफिला मौजूद था। जिसमें कुछ किराए पर मंगाई गई थीं। जाहिर है इसका भुगतान रेलवे ने अपनी जेब से किया होगा। बात केवल किराए तक ही सीमित नहीं है, सीआरबी को खुश करने के लिए सभी स्टेशनों को चमकाया गया। जीएम स्तर के अधिकारी काम छोड़कर सीआरबी की आवभगत में लगे रहे। इतने सारे अधिकारियों के जमावड़े पर रेलवे का कितना खर्चा हुआ होगा इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चेयरमैन सैलून से आए, जिसका एक बार आने जाने का खर्चा ही लाखों में आता है।
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काम चलाऊ काम
पुणे रेल मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, सीआरबी के आने के 10 दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो गई थीं। उनकी गुड लिस्ट में शामिल होने के लिए विभाग प्रमुखों ने फंड डायवर्ड करके वो काम भी करवाए, जिनकी कोई जरूरत नहीं थी। अधिकारी के मुताबिक, ऐसे मौकों पर किए जाने वाले काम की कोई गुणवत्ता नहीं होती। प्रशासन बस यही चाहता है कि वरिष्ठ अधिकारियों के रुकने तक सबकुछ सही दिखे। आमतौर पर प्रशासनिक दौरे की जानकारी पहले से ही दे दी जाती है, लेकिन सीआरबी पुणे में क्या करने वाले हैं यह किसी को नहीं बताया गया था। केवल आखिरी दिन के शेड्यूल में बैठक का जिक्र था। अगर सीआरबी निजी यात्रा पर नहीं आए थे, तो फिर बाकी दिन उन्होंने क्या किया? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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प्रधानमंत्री से बड़े हैं सीआरबी?
कई रेल अधिकारी सवाल उठाते हैं कि जब प्रधानमंत्री मेट्रो में सफर करके यात्रियों का हालचाल जान सकते हैं, तो क्या सीआरबी उनसे भी बड़े हैं? स्पेशल कोच में बैठने के बजाए यदि चेयरमैन पैसेंजर गाड़ी में सवार होकर यात्रियों से रूबरू होते तो समस्याओं को ज्यादा करीब से समझ पाते। साथ ही यात्रियों में भी रेलवे के प्रति विश्वास पुख्ता होता। उनके मुताबिक, यदि सीआरबी ही अपनी सुख सुविधाओं पर रेलवे का पैसा बर्बाद करेंगे, तो फिर बाकी रेलकर्मियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?
मुझे कुछ नहीं पता
इस संबंध में पुणे रेल मंडल के जनसंपर्क अधिकारी ने कहा, मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, मैं उस समय छुट्टी पर था। लेकिन सीआरबी आधिकारिक दौर पर ही पुणे आए थे।
पीएम ने जताया था विश्वास
मित्तल पर प्रधानमंत्री ने विश्वास जातते हुए उन्हें दोबारा रेलवे बोर्ड चेयरमैन नियुक्त किया था। सीआरबी के पद से रिटायर्ड होने के बाद उन्हें दोबारा वही जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर रेल अधिकारियों मे ंनाराजगी थी, क्योंकि इस वजह से कई अधिकारियों के प्रमोशन रुक गए। वही मित्तल आज पीएम की कोशिशों को पलीता लगाने में जुटे हैं। ऐसे वक्त में जब रेलवे को घाटे से उबारने की कोशिशें जारी हैं, मित्तल को खर्चों में कटौती का उदाहरण पेश करना चाहिए था। लेकिन वो अपनी निजी यात्रा पर भी रेलवे की कमाई लुटा रहे हैं।
शिकायत करें भी किससे?
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष हर्षा शाह ने कहा, मुझे इस बारे में जानकारी मिली थी कि सीआरबी ने निजी यात्रा के harsha shahलिए भी सैलून का इस्तेमाल किया। अधिकांश अधिकारी इसी तरह से रेलवे की कमाई को पानी में बहाते हैं। इस संबंध में शिकायत करें भी तो किससे? पूरा का पूरा महकमा एक ही दिशा में चल रहा है। पीएम और रेलमंत्री जो प्रयास कर रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास अधिकारियों को करना चाहिए, लेकिन उन्हें सिर्फ अपनी सुख सुविधाओं का ख्याल है। सीआरबी यदि सैलून के बजाए पैसेंजर ट्रेन में सवार होकर आते तो बाकी अधिकारियों को भी एक सबक मिलता।
यहां भी वही हाल
कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में भी मुख्य यात्री परिवहन प्रबंधक जबलपुर से अपने बेटे को परीक्षा दिलवाने के लिए सैलून लेकर आए थे। वहां, भी निजी यात्रा को सरकारी बनाने की कोशिश की गई। जानकारी के मुताबिक, प्रबंधक राजेश पाठक के बेटे की आईईएस इंजीनियरिंग कॉलेज में परीक्षा थी, इसके लिए वो स्पेशल सैलून में सवार होकर हबीबगंज स्टेशन पहुंचे। पाठक ने भोपाल रेलवे स्टेशन का निरीक्षण तक नहीं किया, जो उनके प्रोग्राम में शामिल था। वो पूरे दिन सैलून में ही आराम फरमाते रहे।

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