गुंडा बना हीरो -Sex worker को परिवार से मिलाया

बॉलीवुड में ऐसी अनगिनत फिल्में बनी हैं, जिसमें हीरो को वेश्या (sex worker ) का किरदार निभा रही हिरोइन से प्यार हो जाता है और वो उसे जिस्म फरोशी के दलदल से बाहर निकालने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देता है। संजय दत्त और सलमान खान जैसे sexwबड़े सितारे भी ऐसी फिल्मों का हिस्सा बन चुके हैं। हाल ही में इस तरह की एक और कहानी सामने आई, हालांकि ये कहानी बॉलीवुड के किसी स्क्रिप्ट राइटर ने नहीं बल्कि असल जिंदगी में पैदा हुए हालातों ने लिखी। मुहब्बत की नगरी कहे जाने वाले आगरा के रेड लाइट एरिया कश्मीरी बाजार में इस कहानी का जन्म हुआ। शमिता (काल्पनिक नाम) कश्मीरी बाजार की तंग गलियों और दबड़े नुमा कमरे को ही अपनी जिंदगी मान चुकी थी। हर रोज उसके जिस्म की नुमाइश लगती, सौदा होता और खरीददार अपनी हसरतों को पूरा कर आगे बढ़ जाता। शमिता के ग्राहकों में पंकज (काल्पनिक नाम) भी शामिल था, जिसकी पहचान स्थानीय गुंडे के तौर पर थी। शुरुआत में पंकज भी अन्य ग्राहकों की तरह आता, कीमत वसूलता और चला जाता। लेकिन जैसे-जैसे मुलाकातें बढ़ती गईं, पंकज के दिल में शमिता के लिए जगह बनने लगी। एक दिन बातों ही बातों में जब शमिता को पता चला कि पंकज मुंबई में भी कुछ वक्त गुजार चुका है तो वो खुद को अपने अतीत के पन्ने पलटने से रोक न सकी। शमिता ने पंकज को बताया कि उसका बचपन काफी हद तक नवी मुंबई में गुजरा था। 12 साल की उम्र में घर के बाहर खेलते वक्त एक महिला ने उसे कुछ खाने को दिया, और इसके बाद जब आंख खुली तो उसने खुद को अंधेरी कोठरी में पाया। शमिता ने अपनी दुनिया में वापस लौटने का कई बार सोचा, लेकिन पिंजरे में बंद पक्षी की तरह छटपटाने के अलावा वो कुछ नहीं कर पाई। शमिता की आपबीती ने कठोर दिल वाले पंकज को भी पिघला दिया, उसने शमिता को हर हाल में इस दलदल से बाहर निकालने का फैसला किया। हालांकि ये काम इतना आसान नहीं था। एक कोठे पर वेश्या के वेष में सिर्फ मजबूर लड़कियां ही नहीं रहतीं, तमाम गुंडे भी रहते हैं जो उडऩे से पहले ही चिडिय़ा के पर काट देते हैं। पंकज को भी इस बात का आभास था कि वो जोर-जबरदस्ती से शमिता को यहां से नहीं निकाल सकता। इसलिए उसने ठीक वही तरकीब अपनाई, जो संजय दत्त और सलमान ने अपनी फिल्मों में आजमाई थी। पंकज शमिता को घुमाने के बहाने कश्मीरी बाजार से बाहर ले आया। चूंकि पंकज खुद स्थानीय गुंडा था, इसलिए कोठा संचालिका को इस पर किसी तरह का शक नहीं हुआ। इसके बाद दोनों ट्रेन में सवार होकर सीधे मुंबई पहुंच गए। शमिता मुंबई वापस आकर खुश तो थी, लेकिन समझ नहीं पा रही थी कि अपने परिवार को कैसे खोजे। इतने सालों की यातनाओं वो यह भी भूल चुकी थी कि उसका घर आखिर है कहां। पंकज एक बार फिर उसके लिए फरिश्ता बनकर सामने आया। पंकज ने सोचा कि अगर शमिता का अपहरण हुआ था तो इसका रिपोर्ट पुलिस में जरूर दर्ज होगी। वो शमिता को लेकर सीधे नेरुल पुलिस स्टेशन पहुंचा। जहां से उसे शमिता के परिवार के बारे में जानकारी मिली। शमिता अब अपने परिवार के साथ है। हालांकि उस पर जान छिडऩे वाले उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, मां और भाई को भी विश्वास नहीं हो रहा है कि सालों पहले जुदा हुई उनकी नन्ही परी आज उनके साथ है।

ऑपरेशन स्माइल
शमिता से पुलिस को पता चला कि आगरा के कश्मीरी बाजार में मराठी भाषी कई और लड़कियां भी हैं। इसके आधार पर पुलिस ने कमिश्नर प्रभात रंजन के मार्गदर्शन में ऑपरेशन स्माइल का खाका तैयार किया। नवी मुंबई पुलिस के 16 सदस्य क्राइम ब्रांच के साथ ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए बिना वक्त गंवाए आगरा के लिए रवाना हो गए। आमतौर पर इस तरह के मामलों में स्थानीय पुलिस की भूमिका संदेह के घेरे में रहती है, इसलिए मुंबई पुलिस ने सिर्फ आगरा के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (आईजीपी) आर.के मिश्रा को इस ऑपरेशन के बारे में जानकारी दी थी। कश्मीरी बाजार की तंग गलियों में पहुंचने के लिए पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी। तकरीबन एक किलोमीटर पुलिस टीम ने अपनी गाडिय़ां खड़ी की और पैदल की टारगेट पॉइंट पहुंची।

सिर्फ 15 मिनट थे
आईजीपी की तरफ से पुलिस टीम को महज 15 मिनट में अभियान खत्म करने को कहा गया था, ताकि इलाके में ज्यादा तनाव पैदा न हो। टीम ने शमिता द्वारा बताए गए कोठों पर छापा मारकर कई युवतियों को मुक्त कराया, जिनमें से 21 अकेले महाराष्ट्र की थीं। आगरा के रेड लाइट एरिया में देश के विभिन्न हिस्सों से लड़कियों को लाया जाता है। इसमें महाराष्ट्र के साथ-साथ बंगाल और नेपाल की युवतियां सबसे ज्यादा होती हैं।

Leave a Reply