हर्षा शाह: रेलवे के नाम की जिंदगी

हर्षा शाह: रेलवे के नाम की जिंदगी

  • रेलमंत्री ने भी काम को सराहा

जून में पुणे और मुंबई के बीच दौड़ने वाली डेक्कन एक्सप्रेस का जन्मदिन मनाया गया. यूं तो हर साल ही इस मौके पर केक काटकर ख़ुशी बयां की जाती है, लेकिन इस बार का जन्मदिन कुछ ख़ास रहा, ख़ास इस लिहाज़ से कि पहली बार किसी रेलमंत्री ने न सिर्फ आयोजन को सराहा बल्कि उस हस्ती के सम्मान में कुछ शब्द भी कहे, जो असल मायनों में इस परंपरा की जननी है. 70 वर्षीय हर्षा शाह पिछले कई सालों से डेक्कन क्वीन का जन्मदिन मानती आ रही हैं, विशेष बात यह है कि इस आयोजन के सभी इंतजाम वो स्वयं करती हैं, मसलन, केक की व्यवस्था करना, अतिथियों को निमंत्रण भेजना. शुरुआत में यह आयोजन महज कुछ यात्रियों की मौजूदगी में केक काटने भर तक ही सीमित था, लेकिन अब पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर जैसी सम्मानित हस्तियां इसका हिस्सा बन रही हैं. वैसे बात केवल जन्मदिन मनाने की ही नहीं है, हर्षा का जीवन पूरी तरह से रेलवे के लिए समर्पित है. चाहे बात यात्रियों की शिकायत की हो, रेलकर्मियों की परेशानी की या फिर रेलवे में सुधार की, वो हर पल मुस्तैद रहती हैं. हर्षा की लोकप्रियता का आलम यह है कि उन्हें न केवल पुणे बल्कि सेंट्रल रेलवे का हर छोटा-बड़ा अधिकारी जानता है. स्थानीय मीडिया में वो ‘रेलवे वाली आंटी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं.

हर्षा का रेलवे से रिश्ता दशकों को पुराना है. बचपन में वो अपने पिता के साथ अक्सर पुणे-मुंबई के बीच अप-डाउन किया करती थीं. उस दौर के अनुभवों ने उनके मन में रेलवे के प्रति प्रेम जागृत किया, जो अब तक कायम है. हर्षा रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष और एकमात्र सदस्य भी हैं, इस ग्रुप की स्थापना उन्होंने ही की थी. यह ग्रुप न सिर्फ यात्रियों की आवाज़ बुलंद करता है, बल्कि रेल कर्मियों की समस्याओं से भी उच्च अधिकारियों को अवगत कराता है. उम्र के इस पड़ाव में भी हर्षा हर रोज़ पुणे रेलवे स्टेशन का एक चक्कर लगाना नहीं भूलतीं फिर चाहे आंधी आए या तूफान. शायद यही वजह है कि रेलकर्मियों में उनके प्रति सम्मान भी है और भय भी. भय इसलिए कि यदि उनका कोई गलत काम हर्षा की नज़र में आ गया, तो फिर बचना मुश्किल है.

अपने खर्चे पर सेवा
वैसे तो रेलवे में सुधार के नाम पर कई प्रवासों ग्रुप अस्तित्व में हैं, लेकिन यह हर्षा की निस्वार्थ सेवा ही है कि रेलमंत्री रहते हुए सुरेश प्रभु ने अपने वीडियो संदेश में उनकी सराहना की. रेलवे प्रवासी ग्रुप को किसी तरह की वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं होती, हर्षा अपने खर्चे से ही इसे चला रही हैं. रेल बजट के दिनों में हर्षा की सक्रियता काफी बढ़ जाती है. पुणे को नई ट्रेन दिलवाने या किसी ट्रेन के फेरे बढ़वाने के लिए हर्षा दिल्ली के चक्कर लगाने से भी गुरेज नहीं करतीं.

आवारा कुत्तों को दिया आसरा
वैसे हर्षा का प्यार केवल रेलवे तक ही सीमित नहीं है, उनके दिल में बेजुबान जानवरों के लिए भी अथाह प्यार है. उन्होंने अपने घर में 6 आवारा कुत्तों को आसरा दिया हुआ है, जिनकी वो अपने बच्चों की तरह देखभाल करती हैं. हर्षा को अगर सड़क पर कोई घायल जानवर दिख जाए तो उसका इलाज कराए बिना वो आगे नहीं बढ़तीं. उन्होंने रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स के डॉग स्क्वायड की बेहतरी के लिए भी काफी काम किया है. वो इस संबंध में अधिकारियों से लगातार बात करती रहती हैं. उनका कहना है कि काम के हिसाब से स्क्वायड में कुत्तों की संख्या कम है, और जब तक यह संतुलन बन नहीं जाता वो प्रयास करती रहेंगी.

 

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