ऐसे अस्तित्व में आया तिरंगा

देश की आन, बान, शान तिरंगे के अस्तित्व में आने की कहानी बेहद रोचक रही है। 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच इसे भारतीय राष्ट्र ध्वज के रूप में अपनाया गया। आइए इतिहास के पन्ने पलटकर तिरंगे की यात्रा के बारे में जानते हैंः

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महात्मा गांधी ने सबसे पहले 1921 में राष्ट्रीय ध्वज की जरूरत की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने केसरिया और हरा दो रंगों वाला ध्वज तैयार करने की जिम्मा मछलीपट्टनम निवासी पिंगली वैंकेयानंद को सौंपा। केसरिया रंग को हिंदू और हरे रंग को मुस्लिम समुदाय का प्रतीक माना गया। लाला हंसराज ने झंडे के बीच में चरखा जोड़ने का सुझाव दिया था, ताकि यह प्रमाणित हो सके कि झंडा स्वदेशी कपड़े से बनाया गया है।

गांधी जी 1921 के कांग्रेस सेशन में इस ध्वज को प्रस्तुत करना चाहते थे, लेकिन झंडा उस समय तैयार नहीं हो सका था। बाद में गांधी ने कहा था अच्छा ही हुआ कि झंडा तैयार नहीं था, इस बहाने यह सोचने का अवसर मिल गया कि झंडा केवल 2 धर्मों का ही प्रतिनिधित्व नहीं करता। इस तरह ध्वज में तीसरे रंग के रूप में सफेद रंग शामिल किया गया। 1929 में गांधी जी ने तिरंगे की व्याख्या इस तरह की केसरिया रंग लोगों के बलिदान के लिए, सफेद रंग पवित्रता के लिए और हरा रंग उम्मीद के लिए।

स्वतंत्रता आंदोलन के समय खिलाफत अंदोलन में तीन रंग वाले स्वराज झंडे का प्रयोग किया गया था। 1931 में कांग्रेस ने स्वराज झंडे को राष्ट्रीय ध्वज की स्वीकृति प्रदान की। देश आजाद होने के बाद संविधान सभा में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 22 जुलाई 1947 में तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय ध्वज घोषित किया। ध्वज में सफेद रंग की पट्टी में नीले रंग से बना अशोक चक्र बना था। जिसमें 24 तीलियां थीं, जो धर्म और कानून का प्रतिनिधित्व करती हैं। राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का वही स्वरूप आज मौजूद है।

तिरंगे के नियम कानून फ्लैग कोड ऑफ इंडिया द्वारा बनाए गए, जिसमें यह निर्धारित किया गया कि खादी के इस झंडे का प्रयोग केवल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर ही किया जाएगा। नवीन जिंदल ने 2002 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अन्य मौकों पर भी झंडा फहराया जा सकता है। 2005 में इस संबंध में कुछ अन्य सुधार किए गए।

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