JNU: लड़ाई देश की या वर्चस्व की?

JNU कैंपस से उठे विवाद ने कई सवालों को जन्म दिया है। मसलन, क्या देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में देश विरोधी सोच विकसित हो रही है। या जो कुछ दिखाया या सुनाया जा रहा है, उसके राजनीतिक निहितार्थ हैं। इस मामले में अब तक दो वीडियो और कुछ पोस्टर सामने आ चुके हैं। वैसे, जेएनयू इससे पहले भी नक्सलवादी विचारधारा के समर्थन को लेकर सुर्खियों में रहा है, लेकिन बात इतनी आगे कभी नहीं बढ़ी। आखिर क्या वजह रही कि ये मुद्दा एकदम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया? क्या सरकार ने हालात परखने में भूल की? या फिर विरोध-प्रदर्शन उसकी वाजिब कार्रवाई का परिणाम रहे, जैसा कि अक्सर होता है? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए आज का खबरी ने अलग-अलग क्षेत्रों के जानकारों से बात की।

JNU

सरकार ने ठीक किया
वरिष्ठ पत्रकार और प्रोफेसर अंजनी कुमार झा को नहीं लगता कि इस पूरे मामले में सरकार की कोई गलती है। वे कहते हैं, “मोदी सरकार ने वही किया जो किसी अन्य देश की सरकार करती। देश तोडऩे की बातें करना, आतंकियों का समर्थन करना क्या कहीं भी स्वीकार्य है? यह सब जानते हैं JNUकि जेएनयू वामपंथियों का गढ़ है। यहां नक्सलवादी सोच पूरी तरह से हावी है, कई मौकों पर इसका प्रत्यक्ष रूप भी हमारे सामने आ चुका है। इस लिहाज से देखें तो पिछली सरकारों को काफी पहले ही कड़े कदम उठाने चाहिए थे, लेकिन वोट बैंक की खातिर ऐसा नहीं किया गया”। झा आगे कहते हैं, “जेएनयू में भारतीय संस्कृति खासकर हिंदू संस्कृति का अपमान करना, गरीबी-भुखमरी के नाम पर देश विरोधी भावना पैदा करने का माहौल विकसित हो चुका है। मैं समझ नहीं पा रहा हूं यह पूरा मामला भाजपा बनाम बाकी दल क्यों हो गया है। क्या कांग्रेस जैसी पार्टियों के लिए देशद्रोह के मायने अलग हैं? वीडियो में साफ तौर पर नजर आ रहा है कि छात्र खुलेआम पाकिस्तान जिंदाबाद, भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे लगा रहे हैं, इसके बावजूद आरोपियों को हीरो के तौर पर प्रोजेक्ट करना दर्शाता है कि हमारे देश में राष्ट्रहित जैसे मुद्दे भी सियासी तराजू में तोले जाते हैं”।  कांग्रेस के जेएनयू विवाद को विचारधारा की लड़ाई करार देने के जवाब में झा कहते हैं, “अगर देशद्रोह किसी की विचारधारा है तो भारत का हर नागरिक इस लड़ाई को जायज ठहराएगा। मेरा मानना है कि इस तरह के मुद्दे पर राजनीति करने के बजाए सभी दलों को मिल बैठकर यह विचार करना चाहिए कि आखिर देश का युवा राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की तरफ क्यों आकर्षित हो रहा है। आखिरकार हम पहले भारतीय हैं, बाद में कुछ और”।

यह विचारधारा की लड़ाई
साहित्यकार महेंद्र गगन का मानना है कि जेएनयू विवाद विचारधारा की लड़ाई से ज्यादा कुछ नहीं। वे कहते हैं, “भाजपा जेएनयू में चली आ रही JNUकम्यूनिस्ट विचारधारा को समाप्त कर वहां अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहती है। तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) जेएनयू में कुछ खास नहीं कर सकी है, संभव है ताजा विवाद को हवा देकर उसे आगे बढ़ाने के लिए एक मंच तैयार किया जा रहा है”। गगन आगे कहते हैं, “अगर वैसा कुछ हुआ है, जैसा सरकार दावा कर रही है तो भी छात्रों के साथ बर्बरता को क्या जायज ठहराया जा सकता है? जेएनयू विवाद विश्वविद्यालयों में बढ़ रही राजनीति का एक उदाहरण है, हर राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से यहां वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। देश हित में इस प्रवृत्ति को रोकना बेहद जरूरी है, वरना भारत की अखंडता-संप्रभुता के साथ-साथ छात्रों के भविष्य से भी खिलवाड़ होता रहेगा”।

विफल रही सरकार

समाचार 4 मीडिया के एडिटोरियल हेड अभिषेक मेहरोत्रा को लगता है कि सरकार ने इस मामले में अतिसक्रियता दिखाई। वे कहते हैं, “सरकार को संयम से काम लेना चाहिए था। इस तरह के संवेदनशील मुद्दे बातचीत से हल किए जा सकते हैं। वीडियो की प्रमाणिकता जांचे बिना सरकार ने JNUजो कार्रवाई की, उसका उल्टा असर हुआ। जो मुद्दा घर की चार दीवारी में सुलझाया जा सकता था, वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई देने लगा”। महरोत्रा आगे कहते हैं, “सरकार का काम ही है विवाद का शांतिपूर्ण निपटारा। लेकिन इतने दिनों बाद भी वो कोई समाधान नहीं खोज पाई है। इससे सरकार की विफलता साफ झलकती है। मेरा मानना है कि अगर कुछ युवा भटक गए है, तो हमें उन्हें सही रास्ते पर लाने का प्रयास करना चाहिए और ये सिर्फ बातचीत के जरिए ही हो सकता है”।

  अभिषेक कहते हैं, “सरकार जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों से बातचीत को तैयार हो जाती है, नक्सलवादियों से बातचीत को तैयार हो जाती है तो ये छात्र तो अपने है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि राजद्रोहियों को बख्शा नहीं जाएगा। राजद्रोह तो एक तरह से अलगाववादी और नक्सलवादी भी कर रहे हैं, मगर सरकार जानती है कि आखिर में उनसे बात करनी पड़ती है। मैं यह कहना चाहता हूं कि जो बात आखिरी में होनी है, उसे पहले ही कर लेना चाहिए था। सरकार एक प्रतिनिधि मंडल गठित करती तो छात्रों से बात करता”। महरोत्रा इस मामले में मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े करते हैं। वे कहते हैं, “जेएनयू प्रकरण में मीडिया ने दिखा दिया कि उसके लिए राजद्रोह-देशद्रोह कुछ नहीं है, उसे सिर्फ टीआरपी से मतलब है। मीडिया को कम से कम ऐसी संवेदनशील मामलों में तो संयम से काम लेना चाहिए”।

कम्युनिस्ट सोच मिटाना चाहते हैं मोदी
पुणे कांग्रेस नेता रमेश धर्मावत मानते हैं कि सरकार ने जेएनयू विवाद को सोची-समझी रणनीति के तहत हवा दी। वे कहते हैं, “इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला जो स्पष्ट तौर पर नजर आता है वो ये कि सरकार अपनी नाकामयाबी से जनता का ध्यान हटाना चाहती थी। और दूसरा यह कि JNUजेएनयू जैसे संस्थानों पर अपना अधिपत्य स्थापित करना उसके एजेंडे में है। मोदी सरकार सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट सोच को ही जड़ से उखाडऩा चाहती है, इसलिए उसने जेएनयू से शुरुआत की। क्योंकि यहां अब तक भाजपा दाखिल नहीं हो सकी थी। धर्मावत आगे कहते हैं, पूरा विवाद विचारधारा का है, सरकार हर उसे विचारधारा को खत्म करना चाहती है जो उससे मेल नहीं खाती। एफटीआईआई में हुए आंदोलन के वक्त भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला था। भाजपा केंद्र सरकार के जरिए अपनी सोच दूसरों पर थोपने की कोशिश कर रही है। हाल ही में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने सभी विश्वविद्यालयों में तिरंगा लगाना अनिवार्य किया। हम तिरंगे का सम्मान करते हैं, लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि इसकी शुरुआत भाजपा या संघ ने खुद से क्यों नहीं की। क्या आरएसएस की शाखाओं पर तिरंगा फहराया जाता है”?     धर्मावत को लगता है कि जेएनयू विवाद को जिस तरह उछाला गया उससे पूरे विश्वविद्यालय की छवि खराब हुई। वे कहते हैं, “अगर कुछ छात्र या प्रोफेसर दोषी हैं तो उनके खिलाफ व्यक्तिगत मामले दर्ज किए जाने चाहिए, यूं पूरी यूनिवर्सिटी पर सवाल उठाना कहां तक जायज है। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि सरकार के खिलाफ असंतोष जाहिर करना गुनाह नहीं। उनके मुताबिक, अगर आजादी के इतने सालों बाद में किसी के गांव में बिजली नहीं है, उसे मूलभूत जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है तो उसे अपनी आवाज बुलंद करने का हक है। सरकार उसे सीधे तौर पर नक्सली करार नहीं दे सकती”।

ये अभिव्यक्ति की आजादी कैसे?
प्रोफेसर आरती कुमार भी मानती हैं कि सरकार ने जो किया ठीक किया। वे कहती हैं, “अभिव्यक्ति की आजादी हमें कुछ भी बोलने की इजाजत नहीं देती। आतंकवादियों का समर्थन करना, देश विरोधी नारे लगाना अभिव्यक्ति की आजादी कैसे हो सकता है? जेएनयू की घटना ने पूरे देश को शर्मसारJNU किया है, बावजूद इसके जो लोग आरोपियों पर कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं उन्हें भारतीय कहलाने का कोई हक नहीं”। कुमार इस पूरे मामले में जेएनयू प्रशासन पर भी सवाल खड़े करती हैं। उनका कहना है, “जेएनयू देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में शुमार है, अगर वहां इस तरह की गतिविधियां होती हैं तो प्रशासन को खुद आगे बढ़कर आरोपियों पर कार्रवाई करनी चाहिए। क्या देश की एकता-अखंडता को बनाए रखना सिर्फ और सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है? केवल भारत ही नहीं दुनिया के किसी भी देश यदि ऐसा होगा, तो परिणाम यही होंगे। क्या अमेरिका अपनी सरजमीं पर तालिबान परस्त नारों को हजम कर पाएगा”? कुमार की नजर में मीडिया की अतिसक्रियता भी कई बार हालात बेकाबू कर देती है। वे कहती हैं, “मीडिया ने इस मामले को ऐसे पेश किया जैसे सरकार और पुलिस बेवजह छात्रों पर कार्रवाई कर रही है। अगर मीडिया संयम दिखाता, तो शायद बात इतनी आगे बढ़ती ही नहीं”।

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