Molestation Case: अच्छा हुआ सस्पेंड हुए

युवती से छेड़छाड़ और मारपीट की एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले तीन पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है। पुलिस कमिश्नर रश्मि शुक्ला के आदेश पर कोंडवा पुलिस स्टेशन के एक सब इंस्पेक्टर और दो कांस्टेबल के खिलाफ यह कार्रवाई की गई।

File Photo.
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अधिकतर पुलिसकर्मी इस कार्रवाई को सही मानते हैं। उनका कहना है कि इससे पुलिस में अनुशासन बनाने और उसकी छवि सुधारने में मदद मिलेगी। Kondhwa थाने के एक पुलिसकर्मी ने कहा, “उन्हें सस्पेंड तो होना ही था। आला अधिकारियों से स्पष्ट निर्देश हैं कि महिलाओं से जुड़े मामलों में खासतौर पर गंभीरता बरती जाए, इसके बावजूद रिपोर्ट दर्ज न करना सीधे तौर पर निर्देशों का उल्लंघन है”।

       थाने के ही एक अन्य अधिकारी ने कहा, “बार-बार सबको यह बताया जाता है कि शिकायत के आधार पर एफआईआर तुरंत दर्ज करनी चाहिए। इसके बाद भी अगर कोई नहीं समझता तो फिर सजा लाजमी है। वैसे भी यह मामला काफी संवेदनशील था, पुलिसकर्मियों को तुरंत हरकत में आना चाहिए था। कुछ लोगों की वजह से पूरे विभाग का नाम खराब होता है’। गौरतलब है कि 1 मई को लुल्लानगर रोड पर कुछ लड़कों ने एक युवती से छेड़छाड़ करते हुए उसके दोस्तों के साथ मारपीट की थी। इस मामले में जब पीडि़ता ने कोंडवा पुलिस चौकी में रिपोर्ट दर्ज करवानी चाही तो पुलिस टालमटोली करती रही।

सही फैसला
क्राइम ब्रांच से जुड़े एक अधिकारी ने कहा, “प्रारंभिक जांच पड़ताल के बाद ही सस्पेंड करने का फैसला लिया जाता है। लिहाजा इसमें कोई शक नहीं कि पुलिसकर्मियों पर जो आरोप लगाए गए हैं, उनमें सच्चाई है। गलत करने वाले को सजा मिलनी ही चाहिए, फिर भले ही वो किसी भी रैंक का हो”।

आम हैं घटनाएं
सब इंस्पेक्टर रैंक की एक महिला अधिकारी ने कहा, ‘चौकी स्तर पर इस तरह की घटनाएं आम हैं। चौकी में कुछ ही पुलिसकर्मी होते हैं, इसलिए कई बार वो मनमानी कर जाते हैं। मेरी लोगों की यही गुजारिश है कि यदि चौकी में उनकी बात नहीं सुनी जा रही तो उन्हें तुरंत पुलिस स्टेशन जाना चाहिए। पुलिस का पहला काम है पीडि़त की बात सुनकर रिपोर्ट दर्ज करना और आरोपियों पर कार्रवाई करना। जो पुलिसकर्मी इसमें असफल रहता है, उसे सजा जरूर मिलनी चाहिए”।

समर्थन भी
हालांकि कुछ पुलिसकर्मी ऐसे भी हैं, जो मानते हैं कि निलंबन की कार्रवाई सही नहीं। एक कान्स्टेबल ने कहा, “कई बार हम सोचते हैं कि दोनों पक्षों को समझाकर मामला निपटा दिया जाए। इसलिए एफआईआर दर्ज करने में थोड़ी देरी हो जाती है। कहीं कहीं वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश होते हैं कि एफआईआर दर्ज करने से पहले उन्हें अवगत कराया जाए, इस प्रक्रिया के चलते भी बात अटक जाती है”।

लेन देन का चक्कर?
एक रिटायर्ड वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, “पुलिस की तरफ से एफआईआर दर्ज करने में लापरवाही की जाती है, इसमें कोई दोराय नहीं। कई बार देरी के वाजिब कारण होते हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में व्यक्तिगत हितों के चलते ऐसा किया जाता है। भ्रष्ट पुलिसकर्मी जानबूझकर तब तक केस दर्ज नहीं करते, जब तक दूसरे पक्ष के साथ उनका कोई समझौता नहीं हो जाता। पुलिस फोर्स अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोगों से भरी हुई है”।

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