राष्ट्र विरोधी ‘आधार’ आज राष्ट्रहित बन गया है!

सरकार ने आधार कार्ड को पैन से लिंक करवाना अनिवार्य किया है, बैंक खातों के संबंध में भी ये बात लागू होती है. इसके अलावा सरकार कुछ दूसरी योजनाओं को भी इस दायरे में लाने पर गंभीरता से विचार कर रही है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि कुछ वक़्त पहले तक यही आधार कार्ड देश की सुरक्षा के लिए खतरा था. विपक्ष में रहने के दौरान भाजपा और नरेंद्र मोदी ने केवल आधार ही नहीं यूपीए सरकार के कई फैसलों पर सवाल खड़े किए थे, और आज उन्ही को अमल में लाकर वाहवाही लूट रहे हैं. ऐसे में सवाल उठाना लाजमी है कि पार्टी विद डिफ़रेंस का नारा देने वाली भाजपा दूसरों से अलग कैसे है? अपने अब तक के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई पॉलिटिकल यू-टर्न लेकर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कल तक जो फैसले दोषपूर्ण, तर्कहीन, और जनविरोधी थे, वो आज एकदम से त्रुटीरहित, तर्कसंगत, और जनहितैषी कैसे हो गए?

आधार कार्ड (AADHAAR)
तब: आधार कार्ड शुरू से भाजपा के निशाने पर रहा था. आधार कार्ड के माध्यम से गैस सब्सिडी बैंक खाते में जमा कराने का पार्टी ने जबर्दस्त विरोध किया था. 30 जनवरी को दिए अपने एक बयान में भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने कहा था, “आधार का कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि इसे संसद ने नहीं बनाया. सरकारी योजनाओं का लाभ देने के लिए विशिष्ट पहचान संख्या को अनिवार्य नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सवाल उठाया है.” इसी तरह चुनाव के दौरान पार्टी नेता अनंत कुमार ने कहा था, “आधार कार्ड बंद किया जाएगा.”

और अब: सरकार आधार कार्ड को बढ़ावा दे रही है. टैक्स रिटर्न फाइल करने के लिए आधार को पैन कार्ड से लिंक करना अनिवार्य किया गया है. इसके अलावा कई और योजनाओं के लिए भी इसे ज़रूरी किया जा रहा है. गैस सब्सिडी भी सीधे बैंक खाते में ही जमा हो रही है.

एफडीआई (FDI)
तब: भाजपा ने बाकी दलों के साथ मिलकर एफडीआई का कड़ा विरोध किया था. नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कांग्रेस देश को विदेशियों के हाथों में सौंप रही है. पार्टी ने 2012 में इस मुद्दे पर सरकार को पीछे धकेलने के लिए महाबंद भी बुलाया था. उस दौरान नितिन गडकरी ने कहा था, “ ये एक शुरुआत है हम तब तक संघर्ष करेंगे जब तक सरकार कदम वापस नहीं खींच लेती.”

और अब: सरकार का कहना है कि एफडीआई से विकास के रस्ते खुलेंगे. प्रधानमंत्री का कहना है कि भारत अब दुनिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए सबसे खुली अर्थव्यवस्था है. मोदी अब 49  प्रतिशत के कैप को भी भूल चुके हैं.

नोटबंदी (Demonetization)
तब: मोदी सरकार नोटबंदी को कालेधन के खिलाफ अपनी सबसे बड़ी जीत करार देती नहीं थक रही है, लेकिन यूपीए सरकार ने जब ऐसा ही कुछ करने का प्रयास किया था तो भाजपा को रास नहीं आया था. आरबीआई ने जब तक 2005 से पहले के नोट बंद करने की बात कही थी, तो भाजपा ने इसे गरीब विरोधी कदम बताते हुए कहा था कि इसका कालेधन से कोई लेना देना नहीं है. उस वक़्त भाजपा प्रवक्ता रहीं मिनाक्षी लेखी ने कहा था, “यह काले धन के मुद्दे से ध्यान हटाने की साजिश है. सरकार गरीब और ऐसे लोगों को निशाना बना रही है जिनके पास बैंक खाता नहीं है.”

और अब: 1000 और 500 ने नोटों को चलन से बाहर कर दिया गया है. मोदी और भाजपा का कहना है कि इस कदम ने कालाधन जमा करने वालों के साथ-साथ टेरर फंडिंग पर भी चोट की है. पार्टी के जो नेता पहले नोटबंदी शब्द सुनते ही हल्ला करने लगते थे अब वही इसे देशहित करार देने में लगे हैं.

कालाधन (Black Money)
तब: भाजपा कालेधन को लेकर अपने बड़े-बड़े वायदों के बल पर सत्ता में आई. चुनावी रैलियों में पार्टी की तरफ से कहा गया कि सरकार  बनने के 100 दिनों के भीतर कालाधन वापस लेकर आएंगे. इतना ही नहीं विपक्ष में रहते हुए मोदी ने कालेधन वालों के नाम उजागर न करने को लेकर यूपीए सरकार की मंशा पर शक जाहिर किया था.

और अब: सत्ता में आते ही भाजपा 100 दिन संबंधी वायदे को भूल गई, ये कहना ज्यादा बेहतर होगा कि उसने ऐसे किसी वायदे से ही इंकार कर दिया. इसके अलावा नाम उजागर करने को लेकर भी सरकार यूपीए की रह पर है. भाजपा सरकार ने भी कालेधन वालों के नाम बताने से इंकार कर दिया है.

भूमि सौदा (Land swipe deal)
तब: जब यूपीए सरकार ने बांग्लादेश के साथ ज़मीनों की अदला-बदली पर बात आगे बढ़ाई थी, तो भाजपा ने ममता बनर्जी के साथ मिलकर खूब हंगामा मचाया था. लेकिन सरकार बनते ही भाजपा और मोदी को इस सौदे में अच्छाई नज़र आने लगी.

और अब: सरकार इसे ऐतिहासिक समझौता करार दे रही है. मोदी ने 6 जून के अपने ट्वीट में कहा, “भूमि समझौते को मंजूरी प्रदान करने के दस्तावेजों के आदान-प्रदान से इतिहास रच गया है.”

रेल किराया (Rail fare hike)
तब: यूपीए सरकार के कार्यकाल में रेल यात्री किराए में हर बढ़ोत्तरी का भाजपा ने जमकर विरोध किया. उस दौरान उसे ऐसे तर्क तर्कहीन लगते थे कि रेलवे को पटरी पर लाने के लिए किराया बढ़ाना ज़रूरी है. तब सरकार द्वारा किराए में 2 रुपए के इजाफे का भाजपा ने रेल रोको आंदोलन चलाकर विरोध जताया था.

और अब:  सरकार में आते ही मोदी सरकार ने रेल यात्री और भाड़ा दोनों किरायों में वृद्धि कर दी. इस पर सफाई देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था, “रेलवे तभी जीवित रह सकती है जब यात्री मिलने वाली  सुविधाओं के लिए भुगतान करें, ये कठिन लेकिन सही फैसला है.” प्रत्यक्ष तौर पर ही नहीं सरकार ने पिछले दरवाज़ों से भी यात्रियों की जेब ढीली करने के कई उपाय निकाल लिए हैं. प्रीमियम तत्काल के नाम पर रेलवे यात्रियों से जमकर वसूली कर रहा है.

सार: अगर आप किसी विषय की इस हद तक खिलाफत करते हैं कि वो आपकी नज़र में राष्ट्र विरोधी बन जाता है, तो फिर आप खुद उसकी हिमायत कैसे कर सकते हैं?
“If you oppose something how can you defend it”

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