13 दिनों से नहीं मिली छुट्टी!

एटीएम के बाहर कतार में खड़े लोगों की निगाहें एटीएम में कैश भरने वालों पर टिकी थीं। 100-100 के नोटों की गड्डियों को एक एक करके ट्रे में भरा जा रहा था। आम दिनों में नोट भरने की इस प्रक्रिया को लोगों की निगाहों से बचकर अंजाम दिया जाता है। लेकिन अब इसे वक्त की नजाकत कहें या मजबूरी की सबकुछ खुलेआम हो रहा है। नोटबंदी के फैसले के बाद से अब तक कैश atmफिलिंग के काम में लगी कंपनियों के अधिकतर कर्मियों को एक छुट्टी भी नसीब नहीं हुई है। आलम ये है कि देर रात तक काम करने के बाद उन्हें अलसुबह फिर काम पर निकलना पड़ता है। उनके पास न तो ठीक से सोने का समय है और न ही अपने परिवार की खैर खबर लेने का वक्त।

बैठे-बैठे सो जाते हैं
पुणे में एसबीआई के एटीएम में कैश फिलिंग काम करने वाली कंपनी एसएसवी के एक कर्मचारी ने कहा, 9 नवंबर से हमें कोई छुट्टी नहीं मिली है। पहले पूरे दिन में जहां 3 से 4 फेरे होते थे, वहीं अब इनकी संख्या 10 से ज्यादा हो गई है। पिछले 13 दिनों में एक दिन भी ऐसा नहीं गया, जब ठीक से सोने का वक्त मिला हो। घर के जरूरी काम भी अटके पड़े हैं। थकान इतनी ज्यादा है कि गाड़ी में बैठे बैठे ही नींद आ जाती है। बाकी लोगों की तरह हम भी यही उम्मीद कर रहे हैं कि स्थिति जल्दी से सामान्य हो, ताकि हमें भी अपने घर परिवार के लिए वक्त मिल सके।

वो भी नसीब नहीं
atmएक अन्य कर्मी ने कहा, नोटबंदी के बाद से हमारा काम दोगुना हो गया है। हमें दिन में कई बार एटीएम में कैश भरना होता है। एक एटीएम से दूसरे एटीएम तक पहुंचने में जो समय लगता है, बस वही हमारा आराम का समय है। हालांकि ड्राइवर को तो वो भी नसीब नहीं होता। लगातार काम के चलते सब इतने थक गए हैं कि कई बार कैश फिलिंग के वक्त सुरक्षा गाइडलाइन को भी नजरअंदाज करना पड़ता है।

बहुत परेशानी
बैंक ऑफ महाराष्ट्र के एटीएम में कैश फिलिंग करने वाले एक कर्मचारी के मुताबिक, हालात ऐसे हैं कि इमरजेंसी में भी हम छुट्टी नहीं ले सकते। मेरे कुछ साथी हैं, जिनके बच्चे छोटे हैं और उनकी देखरेख के लिए घर में कोई नहीं। वो सबसे ज्यादा परेशानी में हैं। कम से कम जरूरतमंद कर्मियों को भी छुट्टी मिलनी चाहिए। नोटबंदी का फैसला अच्छा है या बुरा, इतनी समझ तो मुझमें नहीं है, मैं तो बस इतना जानता हूं कि हमारा काम बहुत बढ़ गया है।

मनमानी का हथियार
पीएनबी के एटीएम में कैश भरने वाली कंपनी के एक कर्मचारी ने कहा, हालत देखकर आपको हमारी थकान का अंदाजा हो गया होगा। देश के लिए हम 13 क्या 30 दिन भी लगातार काम करने के लिए तैयार हैं, लेकिन क्या हमारी परेशानियों पर गौर नहीं किया जाना चाहिए। कई ऐसे कर्मचारी हैं, जिन्हें पारिवारिक दायित्व निभाने के लिए छुट्टी चाहिए उन्हें भी देश का हवाला देकर चुप कराया जा रहा है। मोदीजी ने तो अच्छा ही निर्णय लिया है, बस कुछ लोग उसे मनमानी का हथियार बना रहे हैं।

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