खाली कुर्सियां बयां कर रहीं नोटबंदी का दर्द

नोटबंदी को 4 हफ्तों से ज्यादा का समय गुजर चुका है, लेकिन हालात अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। एटीएम के बाहर लोग अपने पैसे निकालने के लिए लाइन लगाकर खड़े हैं, वहीं बैंककर्मियों का ओवरटाइम भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। हाथ में notebandi1पैसा नहीं है, इसलिए खरीददारी कम हो रही है, जिसका उन छोटे विक्रेताओं पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है जिन्हें रोज की कमाई से ही घर चलाना होता है। आलम ये है कि पूरे साल गुलजार रहने वाली चौपाटियां भीड़ को तरस रही हैं और होटलों के धंधे भी मंदे पड़े हैं। नए साल के मौके पर पार्टियों से साल भर की कसर पूरी करने वाले आयोजकों को भी डर सता रहा है कि कहीं 2017 का आगाज उन्हें खाली जेब से न करना पड़े।

नोटबंदी के बाद से सरकार हालात सामान्य होने के दावे कर रही है। प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री तक का यही मानना है कि गाड़ी पटरी पर लौट आई है। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत है। आम जनता को न तो बैंक से पैसे मिल रहे हैं और न ही एटीएम से। बैंक ऑफ इंडिया जैसे कई सरकारी और निजी बैंकों के अधिकांश एटीएम स्थायी रूप से बंद पड़े हैं। जिन एटीएम में कैश होता भी है, वो चंद मिनटों में खाली हो जाते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को उठानी पड़ रही है जो कैशलैस सुविधा के साथ सहज नहीं है। इसमें वो छोटे विक्रेता भी शामिल हैं, जो ठेले आदि पर सामान बेचकर अपना घर चला रहे हैं।

बदल गए हालात
पुणे के पिंपरी चिंचवड़ स्थित जीजामाता उद्यान नोटबंदी से पहले तक हर रोज सैलानियों की भारी भीड़ का गवाह बनता था। इसकी एक वजह यहां मौजूद चौपाटी भी है, जहां लोगों को अपेक्षाकृत कम दाम में खाने की विभिन्न वैराइटी उपलब्ध हो जाती हैं। लेकिन 9 नवंबर से हालात यहां के हालात काफी हद तक बदल गए हैं। जो दुकानें रात 10 बजे तक खुली रहा करती थीं, उनके शटर अब 9 बजे से पहले ही गिर जाते हैं। वीकेंड पर भी पहले वाली भीड़ नजर नहीं आती। दुकानदार बताते हैं कि इतनी विकट स्थिति का notebandiसामना उन्होंने पहले कभी नहीं किया। इस चौपाटी से चंद कदम की दूरी पर ही भाजपा विधायक लक्ष्मण जगताप का आलीशान बंगला है। दुकानदार बंगले की चकाचौंध को देखते हैं और फिर मायूस होकर आगे बढ़ जाते हैं। एक दुकानदार ने कहा, एक महीना होने का आ गया, हमारा धंधा पहले की तरह होने का नाम ही नहीं ले रहा है। हर रोज इसी आस में दुकान खोलते हैं कि शायद अच्छी हो, लेकिन मायूसी ही हाथ लगती है। एक हफ्ते में जितनी बिक्री हो जाया करती थी, वो पिछले 23 दिनों में भी नहीं हो पाई है। समझ नहीं आ रहा कि किराया कैसे निकालें और घर का खर्चा कैसे चलाएं?

क्या वो परेशान हैं?
दुकान बंद करके जा रहे एक अन्य विक्रेता ने कहा, नेता कहते हैं कि नोट बंद होने से केवल वही लोग परेशान हैं, जिन्होंने गलत तरीके से पैसा कमाया है। क्या मुझे देखकर आपको ऐसा लगता है? पहले इतना काम रहता था कि मेरी पत्नी और बेटा भी दुकान पर आते थे, लेकिन अब एक व्यक्ति के लिए भी काम नहीं है। लोगों के पास पैसा ही नहीं है तो खर्च कैसे करेंगे। अगर ऐसा ही कुछ दिन और चला तो पता नहीं क्या होगा।

क्या नेताओं को फर्क पड़ा?
उद्यान बाहर छोटे बच्चों को घुमाने के लिए खिलौना कार की भी व्यवस्था की। आसपास के रहने वाले लोगों ने कुछ ऐसी कारें खरीदी हैं, जो शाम के वक्त उन्हें उद्यान लेकर पहुंच जाते हैं। पांच मिनट तक बच्चे को घुमाने के पांच रुपए शुल्क लेने वाले यह लोग भी नोटबंदी के चलते संकट में हैं। एक महिला ने कहा, पहले कुछ घंटों में ही 500 600 तक कमाई हो जाती थी, लेकिन अब 100 रुपए भी जुटाना मुश्किल हो गए हैं। लोग पार्क में अपने बच्चों को लेकर आते तो हैं, लेकिन कार में नहीं घुमवाते। हम अपनी मुश्किल जाकर किस से कहें। न नेताओं को कोई फर्क पड़ा है और न अमीरों को।

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