क्या परेश रावल ने कुछ गलत कहा?

अरुंधति रॉय को लेकर परेश रावल के बयान पर बवाल मचा हुआ है. उनके पक्ष में जितने लोग हैं, उतनी ही संख्या विरोधियों की भी नज़र आ रही है. परेश अब केवल अभिनेता नहीं बल्कि भाजपा सांसद भी हैं, इसलिए विरोध के स्वर ज्यादा ऊंचे हो गए हैं. और शायद यही एकमात्र वजह है कि उनके शब्दों के चयन पर सवाल उठाए जा सकते हैं. सम्मानित हस्तियों से हमारे देश में मर्यादा का धागा तोड़ने की अपेक्षा नहीं की जाती. वरना आम हिन्दुस्तानियों के मुंह से अरुंधति के लिए इस तरह के शब्द कोई नई बात नहीं है.

बुकर सम्मान मिलने के बाद से अरुंधति की ज़ुबान इतनी तल्ख़ हो गई है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और सेक्युलर लोगों को छोड़कर उसकी चुभन हर कोई महसूस कर रहा है. कभी वो कश्मीर पर भारत के अधिकार को नाजायज़ ठहराती हैं, तो कभी खून की होली खेलने वाले नक्सली उन्हें शोषित नज़र आते हैं. अरुंधति के लिए भारत सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना एक फैशन बन गया है. जब कैमरों की नज़र और खबरनवीसों की कलम उनसे दूर जाने लगती है, तो वो राष्ट्रविरोधी से दिखने वाले शब्दों में पिरोकर अपने बयान को उछाल देती हैं. इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अरुंधति अपने बयानों से आम देशवासियों की सहनशीलता को परखती रखती हैं. और जब कभी उनके खिलाफ कार्रवाई जैसी सुगबुगाहट शुरू होती है, तो वो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दे देती हैं.

विचारों का प्रवाह सरकार की नीतियों के अनुरूप हो, ये ज़रूरी नहीं. लेकिन जब विचार सीधे तौर पर देश की संप्रभुता से टकराने लगें, उसके असंख्य नागरिकों की भावनाओं को आहत करने लगें, तो उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में नहीं रखा जा सकता. कश्मीर को लेकर अरुंधति के बयान न केवल घाटी की हिंसा में घी का काम करते हैं, अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत के दावों पर सवाल भी उठाते हैं. इसलिए परेश रावल ने जो कहा वो महज़ क्रिया की प्रतिक्रिया है. जब चुभन हद से ज्यादा बढ़ जाए तो कभी-कभी मर्यादाओं की दीवार भी ढह जाती है…

अरुंधति के विवादित बोल

1. भारत 7 से साथ लाख सैनिक भी कश्मीर में तैनात कर दे, वो अपने उद्देश्यों में सफल होने वाला नहीं है (सबसे ताज़ा बयान)

2. कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा. यह एक ऐतिहासिक तथ्य है, जिससे सरकार भी परिचित है (2010 में दिया बयान).

3.मैंने कश्मीर के लोगों को न्याय दिलाने के लिए आवाज़ उठाई है, जो दुनिया के सबसे क्रूर सैन्य कब्जे में जीवन बिता रहे हैं.

4. 99 फीसदी नक्सली आदिवासी है. उनकी जमीन पर बाहर के लोग कब्जा कर रहे हैं तो विरोध जायज है. नक्सल आंदोलन एक सैन्य संघर्ष है. मैं हिंसा समर्थन नहीं करती हूं लेकिन राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर माओवादियों के खिलाफ हो रहे अत्याचार के खिलाफ हूं.

5. 1947 से भारतीय सेना का देश की जनता के खिलाफ इस्तेमाल होता आ रहा है. कश्मीर के लोग आज़ादी चाहते हैं, उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

6. महात्मा गांधी की सोच जातिवादी थी. अपनी किताब ‘द आईडियल भंगी’ में उन्होंने लिखा है, ‘सफाई करने वाले अपने हाथों से मैला उठाएं और उसे एक गड्डे में जमा करें, ताकि वो जमीन उपजाउ बना सके।’

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