Punjab: हारकर भी जीत गई आप

Punjab is still new hope for Aam Aadmi Party.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अगर सबसे ज्यादा कुछ आश्चर्यजनक रहा, तो वो पंजाब और गोवा के नतीजे. दोनों ही राज्यों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे थे, लेकिन परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे. इस हार के बाद केजरीवाल की रणनीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं, इस बात पर चर्चा की जा रही है कि क्या आप का राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दस्तक देने का सपना टूट गया है? अगर हम उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा के जबरदस्त प्रदर्शन से बाहर निकलकर सोचने का प्रयास करें तो इस सवाल का जवाब निश्चित तौर पर ना punjabहोगा. ये बात सही है कि पार्टी को पंजाब में हार का सामना करना पड़ा और गोवा में वो खाता खोलने में भी असफल रही, लेकिन क्या इस तरह की चर्चाओं और टिप्पणियों से पहले आप के राजनीतिक अनुभव पर नज़र नहीं डालनी चाहिए? भाजपा या कांग्रेस से तुलना की जाए तो आम आदमी पार्टी उस युवा की तरह है, जो बचपन से निकलकर जवानी में कदम रख रहा है. और ऐसा युवा अगर धुरंधरों के सामने कुछ देर भी अपने कदम ज़माए रख पता है तो उसके भविष्य को लेकर सवाल खड़े नहीं किए जाते बल्कि संभावनाएं व्यक्त की जाती हैं. आप ने पहली बार दिल्ली से बाहर निकलकर पंजाब और गोवा में अपनी किस्मत आजमाई, पंजाब में उसे भाजपा और कांग्रेस के अलावा अकाली दल के वोट भी काटने थे. ये सभी पार्टियां सत्ता की राजनीति में लंबा अनुभव रखती हैं, इसलिए आम आदमी पार्टी ने जब अपने चुनावी अभियान को यहां से आगे बढ़ाने का ऐलान किया तो किसी के माथे पर ज्यादा सिलवटें देखने को नहीं मिलीं. अधिकतर नेता यह मानते रहे हैं कि सोशल मीडिया पर लड़ाई लड़ने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली के बाहर अपनी छाप नहीं छोड़ सकती. लेकिन जब आप की सभाओं में भीड़ जुटने लगी, केजरीवाल को सुनने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचने लगे तो सिसायत के मंझे हुए खिलाड़ियों के होश उड़ना शुरू हो गए. यहीं से एक हवा बनना शुरू हुई कि आम आदमी पार्टी पंजाब में झाड़ू लगा सकती है. केवल केजरीवाल या आप कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि विरोधी दलों को भी अपनी हार की आशंका होने लगी थी.

भाजपा को मात

हालांकि परिणाम कुछ और रहे, मगर फिर भी आप अप्रत्यक्ष तौर पर उस भाजपा को मात देने में कामयाब रही, जिसने मोदी लहर पर सवार होकर यूपी और उत्तराखंड में न सिर्फ भगवा झंडा फहराया बल्कि कई रिकॉर्ड भी ध्वस्त कर दिए. बादल की काली छाया भी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को अपने आगोश में नहीं ले सकी. पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं, उसमें आम आदमी पार्टी ने 20 पर जीत हासिल की, जबकि को भाजपा को महज 3 सीटों पैर जीत मिली और उसकी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल महज 15 पर सिमट गई. कांग्रेस को सबसे ज्यादा 77 सीटें मिलीं. अब यदि 2012 के चुनाव परिणाम देखें तो अकाली दल को 56 और भाजपा को 12 पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस के 46 उम्मीदवार ही जीत पाए थे. आम आदमी पार्टी ने पहली बार पहली बार चुनाव लड़ा और सत्ताधारी पार्टियों से ज्यादा वोट प्रतिशत प्राप्त किया, क्या ये किसी जीत से कम है? क्या इसका सीधा सा मतलब ये नहीं है कि जनता भाजपा और अकाली दल के स्थान पर आम आदमी पार्टी को देखना चाहती है?

punjabबस एक चूक

पंजाब में आम आदमी के प्रदर्शन को निराशाजनक नहीं बल्कि उम्मीदों के अनुरूप न होना कहा जा सकता है. पार्टी यहां जनता के सामने एक मजबूत स्थानीय नेतृत्व रखने में चूक गई, और यही शायद उसके कम वोटों का कारण रहा. भगवंत मान और एचएस फुल्का से पार्टी को भले ही फायदा मिला हो, लेकिन यह स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरा साबित नहीं हो सकते थे. इसके अलावा केजरीवाल का पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की अफवाह ने भी पार्टी के खिलाफ काम किया. इससे आप आयात किए हुए नेताओं की पार्टी महसूस होने लगी. लोगों को लगने लगा कि बिना पंजाब को जाने-समझे कोई व्यक्ति कैसे राज्य की बागडोर संभाल सकता है? इसलिए अमरिंदर सिंह की छवि केजरीवाल पर भारी पड़ी. यदि आप मजबूत स्थानीय नेतृत्व पेश करती तो निश्चित तौर पर उसकी झोली में ज्यादा सीटें आतीं.

अब भी मौका

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी चुनाव ज़रूर हारी है, लेकिन विपक्ष की कुर्सी पर उसी का कब्ज़ा है. अगर वो अपनी इस भूमिका को सही ढंग से निभा पाती है, तो अगले चुनाव तक वो जनता के बीच खुद को अच्छी तरह से स्थापित करने में कामयाब होगी. जिन मुद्दों को पार्टी ने चुनाव के दौरान उठाया था उन्हें अब वो विधानसभा में उठा सकती है. यह सब जानते हैं कि अमरिंदर सिंह को लगभग खाली खजाने से जनता की उम्मीदों को पूरा करना होगा, ऐसे में आम आदमी पार्टी को कई मौके मिलेंगे जब वो खुद को बेहतर साबित कर सकती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो आप ने पंजाब में हार कर भी काफी कुछ पाया है, ज़रूरत है उसे समझने और आगे की तैयारी करने की. जहां तक बात गोवा की है तो परिणाम दुःख देने वाले हैं, लेकिन पार्टी का ये पहला प्रयोग था और प्रयोग सफल – असफल होते रहते हैं.

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