कांग्रेस को संकट में छोड़कर विदेश क्यों चले जाते हैं राहुल?

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर विदेश यात्रा पर जाने वाले हैं. अब इसे इत्तेफ़ाक कहें या सोची समझी रणनीति कि राहुल की यात्रा फिर ऐसे वक़्त पर हो रही है जब कांग्रेस संकट में हैं. इस हफ्ते चार दिवसीय नार्वे यात्रा से लौटने के बाद राहुल सितंबर अमेरिका के लिए उड़ान भर लेंगे. इस दौरान में सिलिकॉन वैली से लेकर बोस्टन तक घूमेंगे और वॉशिंगटन डीसी स्थित कार्नेगी इंस्टीट्यूट में एक कांफ्रेंस में शामिल होंगे. इसके अलावा उनका भारतीय निवेशकों से भी मुलाकात का कार्यक्रम है. गौरतलब है कि कांग्रेस इन दिनों अंदरूनी कलह का सामना कर रही है. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और उनके सांसद पुत्र दीपेंद्र हुड्डा भाजपा का दामन थामने को आतुर हैं. इसके अलावा कई अन्य नेता भी बागी तेवर दिखा रहे हैं. ऐसे में राहुल को संकटमोचन की भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन वो विदेश दौरे को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं.

पुरानी आदत
वैसे राहुल इससे पहले भी कई बार संकट के समय पार्टी को अकेला छोड़कर विदेश का रुख कर चुके हैं. बात ज्यादा पुरानी नहीं है, जून में राहुल अपनी नानी से मिलने इटली गए थे. ये वो समय था जब राष्ट्रपति चुनाव को लेकर जीत-हार की रणनीति तय हो रही थी. राहुल अगर चाहते थे मुलाकात को आगे भी बढ़ा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

उठ रहा भरोसा
एक तरफ कांग्रेस की कमान राहुल के हाथों में सौंपने की बातें चल रही हैं, और दूसरी तरफ राहुल पार्टी से जुड़े अहम् मसलों पर ठोस कदम उठाने के बजाए कार्यकर्ताओं को अकेला छोड़कर विदेश यात्रा को अपने आदत बना रहे हैं. अपने उपाध्यक्ष की एक के बाद एक विदेश यात्राओं से कार्यकर्ता अचरज में तो हैं कि साथ ही अब उनके मन में यह शंका भी घर करने लगी है कि क्या राहुल समस्याओं का सामना करने में सक्षम हैं? कई कार्यकर्ता यह सवाल कर रहे हैं कि इस वक्त ज़रूरी क्या है यहां वोटरों से जुड़ना या अमेरिका में लोगों से मेल-मुलाकात करना?

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