ट्रेनिंग के बजाए करवाते थे अफसरों की चाकरी, रेलकर्मी की मौत!

पुणे: दास प्रथा भले ही गुज़रे जमाने की बात हो गई हो, लेकिन रेलवे में यह अब भी मौजूद है. यहां कर्मचारियों को वो सब करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसका उनके ड्यूटी मैन्युअल से कोई नाता नहीं. अगर कोई कर्मचारी इसके खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है. हाल ही में इस प्रथा के चलते ब्रिजेश कुमार नामक रेलकर्मी की मौत हो गई. आरोपों के मुताबिक ट्रेनिग पर आए ब्रिजेश से मंडल रेल अधिकारी (डीआरएम) के बंगले की चाकरी करवाई जा रही थी.

मूलरूप से बिहार निवासी ब्रिजेश ट्रैक मैन की ट्रेनिंग के लिए पुणे आया था. लेकिन ट्रेनिंग के अलावा उससे दूसरे काम ज्यादा करवाए जाते थे, मृतक ने अपने परिजनों से कई बार इसका जिक्र भी किया था. ब्रिजेश की प्रताड़ना का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि वो नौकरी छोड़ने का मन भी बना चुका था, मगर पारिवारिक मज़बूरियों के चलते ऐसा नहीं कर सका.

खाना भी नहीं खाने दिया
जानकारी के मुताबिक 29 मार्च को ब्रिजेश सहित कुछ कर्मचारियों को संगम पार्क स्थित डीआरएम आवास लाया गया. यहां उनसे मोटी-मोटी लकड़ियों को दीवार के दूसरी तरफ फेंकने आदि काम करवाए जा रहे थे, तभी ब्रिजेश की तबीयत ख़राब हो गई. साथी कर्मचारी उसे रेलवे अस्पताल लेकर गए, जहां से दवाइयां देकर उसे वापस काम पर भेज दिया गया. हालांकि ब्रिजेश की तबीयत सुधरने के बजाए बिगड़ती गई और उसने 13 अप्रैल को हड़पसर स्थित नोबल अस्पताल में दम तोड़ दिया.   ब्रिजेश के एक सहकर्मी ने बताया कि उन्हें ट्रेनिंग के तुरंत बाद काम पर लगा दिया गया था, ब्रिजेश को तो खाना खाने का समय भी नहीं मिला था. पीड़ित पक्ष का कहना है कि डॉक्टरों ने मौत की वजह भूखे पेट अत्यधिक भारी काम करना बताई थी, हालांकि नोबल अस्पताल के अनुसार, मौत एक्यूट पैन्क्रियाटाइटिस और कई मल्टी ऑर्गन फेलियर से हुई. बहरहाल मौत की वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इतना साफ़ है कि ब्रिजेश और अन्य कर्मचारियों को नियम विरुद्ध काम करवाकर प्रताड़ित किया जा रहा था.

‘काम तो करना ही होगा’
ट्रेनिंग पर आने वालों को सीमेंट के बोरे ढोने से लेकर हर तरह से छोटे-बड़े काम करवाए जाते हैं, अधिकांश कर्मचारी ख़ामोशी से इसके लिए तैयार भी हो जाते हैं, क्योंकि वे अपनी नौकरी से हाथ धोना नहीं चाहते. ब्रिजेश के साथ ट्रेनिंग ले रहे एक कर्मचारी के मुताबिक, “वरिष्ठ अधिकारियों के स्पष्ट निर्देश हैं कि जो कहा जाएगा करना होगा. हमसे नौकरों की तरह काम करवाया जाता है. अधिकारी अपनी ज़रूरतों के हिसाब से हमारा इस्तेमाल करते हैं.”

रेलवे का इंकार
पुणे मंडल के जनसंपर्क अधिकारी मनोज झवर ने आरोपों से इंकार करते हुए कहा, “किसी भी कर्मचारी से इस तरह काम नहीं कराया जा सकता. जहां तक बात ब्रिजेश कुमार की है, तो उसे डीआरएम निवास लाया ही नहीं गया.”

पर पुख्ता हैं सबूत
रेलवे भले ही पूरे मामले से पल्ला झाड़ रहा हो, लेकिन कई कर्मचारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि ब्रिजेश और अन्य कर्मियों को घटना वाले दिन डीआरएम आवास पर काम करवाने लाया गया था. आज का खबरी के पास इस बातचीत की रिकॉर्डिंग भी मौजूद है. कर्मचारियों का यहां तक कहना है कि इंकार करने पर उन्हें न सिर्फ धमकी दी गई बल्कि यह भी कहा गया कि ये तो महज़ शुरुआत है.

सब जानते हैं अफसर
पुणे रेल मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि रेलवे में बड़े पैमाने पर कर्मचारियों का शोषण हो रहा है. खासकर निचले स्तर के कर्मचारियों को अफसरों के घरों में नौकर की तरह काम करवाया जाता है. कागजों पर कुछ दर्शाया जाता है और हकीकत कुछ और होती है. दिल्ली-मुंबई में बैठे वरिष्ठ अधिकारी भी इस दास प्रथा से वाकिफ हैं, लेकिन कुछ नहीं करते क्योंकि वे खुद भी किसी न किसी रूप में इसका हिस्सा हैं.

कैसे चलेगा घर?
ब्रिजेश घर में एकलौता कमाने वाला था, उसकी मौत के बाद परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया है. ब्रिजेश के दो छोटे भाई हैं. बेटे की मौत के बाद से मां सदमे में है और भाइयों का रो-रोकर बुरा हाल है. वैसे तो नियमानुसार ब्रिजेश के भाई को नौकरी मिलनी चाहिए, लेकिन वो  प्रशिक्षण अवधि में था, इसलिए इस पर संशय बना हुआ है. हालांकि इस संबंध में मनोज झवर ने कहा, ब्रिजेश की मौत ऑन ड्यूटी नहीं हुई है, फिर भी रेलवे उसके परिवार की सहायता के लिए हर संभव प्रयास करेगा.

कैसे सुरक्षित होगा सफ़र?
एक तरफ रेलमंत्री सफ़र को सुरक्षित बनाने पर जोर दे रहे हैं और दूसरी तरफ उन कर्मचारियों से वरिष्ठ अधिकारियों के घर की चाकरी करवाई जा रही है, जिन पर सफ़र को सुरक्षित बनाने की ज़िम्मेदारी है. ब्रिजेश ट्रैक मैन की ट्रेनिंग के लिए पुणे आया था. ट्रैक मैन सुरक्षित रेल सफ़र की महत्वपूर्ण कड़ी है, क्योंकि ट्रैक की देखरेख का ज़िम्मा उसी पर होता है. ऐसे में सवाल उठाना लाज़मी है कि क्या रेलवे वास्तव में सुरक्षित सफ़र के प्रति गंभीर है? यदि सरकार रेलवे में बदलाव चाहती है, तो उसे सबसे पहले इस दास प्रथा को ख़त्म करना होगा.

होनी चाहिए जांच
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष हर्षा शाह ने इस संबंध में कहा, अगर आरोप सही हैं, तो यह बेहद गंभीर मामला है. सेंट्रल रेलवे को इसकी निष्पक्ष जांच करवानी चाहिए. डीआरएम हो या कोई अन्य अधिकारी किसी को भी इस तरह कर्मचारियों से काम करवाने का अधिकार नहीं है.

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