दर्द को नहीं बनने दिया लाचारी

गोल्ड मेडल की जो उम्मीद रियो ओलंपिक में पूरी नहीं हो सकी, उसे मारियप्पन थंगवेलु ने पैरालंपिक खेलों में पूरा कर दिखाया। बीते दिनों उन्होंने पुरुषों के टी 42 ऊंची कूद मुकाबले में 1 89 मीटर की छलांग लगाकर इतिहास रच दिया था। मारियप्पन की इस उपलब्धि को पूरे देश ने सराहा। तमिलनाडु के मारियप्पन के गोल्ड मेडल तक पहुंचने का सफर संघर्षों से भरा रहा। सेलम जिले के mariyappanछोटे से गांव पेरिया वडखनपट्टी के रहने वाले मारियप्पन जब सिर्फ पांच साल के थे, तब सड़क हादसे में उनका दायां पांच कुचल गया। कुली का काम करने वाले पिता और सब्जी बेचने वाली मां के लिए बेटे का इलाज करना आसान नहीं था। काफी प्रसासों के बावजूद माता पिता अपने बच्चे के इलाज के लिए पर्याप्त धन नहीं जुटा सके, नतीजतन मारियप्पन के पैर के घुटने के नीचे का हिस्सा लगभग बेकार हो गया। सब मान चुके थे कि मारियप्पन के लिए जिंदगी में अब कुछ भी बाकी नहीं रहा।

शिक्षक ने पहचाना
मापा पिता अपने बच्चे को इस स्थिति में देखकर पूरी तरह टूट गए थे, लेकिन मारियप्पन ने दर्द को लाचारी नहीं बनने दिया। गांव के एक शिक्षक ने मारियप्पन के अंदर की क्षमता को पहचाना और उन्हें खिलाड़ी बनने के लिए प्रेरित किया। ऊंची कूद में कमाल के प्रदर्शन ने मारियप्पन को 2013 में सुर्खियों में लाया। इसके बाद उनकी नजरें पैरालंपिक खेलों पर जम गईं। इन खेलों से पहले तक चंद लोग ही मारियप्पन को पहचानते थे, लेकिन अब पूरा देश उनकी वाह वाह कर रहा है।

सीखः मारियप्पन की कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किलों के आगे हार मानकर बैठ जाते हैं। तमिलनाडु के इस लाल ने साबित कर दिया है कि यदि दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो आसमां सरीखी बाधाएं भी कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।

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