Survey: साइकिल का पंक्चर होना तय!

  • Survey conducted by Aaj Ka Khabri, shows that SP may lose its shine.

यादव कुनबे में मचे घमासान के चलते समाजवादी पार्टी को विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है। सपा की स्थिति बिल्कुल वैसी हो गई है, जैसी कुछ साल पहले भाजपा की थी। आंतरिक कलह की वजह से भाजपा को लोकसभा सहित विधानसभा चुनावों में भी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। सपा में सुलह के अब तक जितने भी फॉर्मूले निकाले गए हैं, सब नाकाम रहे हैं। इस बात की संभावना बेहद कम है कि पिता पुत्र की लड़ाई जल्द थम जाए, और यदि थमती भी है तो भी पार्टी को नुकसान तो उठाना ही पड़ेगा। यूपी की जनता एक ऐसी पार्टी को पुनः सत्ता में आने का मौका शायद न दे, जो अपने घर के झगड़े ही नहीं सुलझा पा रही है। जनता का मिजाज परखने के लिए आज का खबरी द्वारा कराए गए संक्षिप्त सर्वेक्षण में काफी हद तक यह साफ नजर surveyआ रहा है कि सपा के मतदाता इस बार छिटककर दूसरे खेमे में जाएंगे। इतना ही नहीं हर सूरत में अपनी जीत का दावा करने वाली पार्टी के नेता भी मानते हैं कि हालात इस बार बेहद विपरीत हैं।

जनता को आशंका
आज का खबरी ने अपने वन टू वन सर्वेक्षण में लोगों से जानना चाहा कि क्या मौजूदा परिदृश्य में वो सपा के साथ जाना चाहेंगे? मुलायम सिंह और अखिलेश यादव में से पार्टी का नेतृत्व कौन बेहतर ढंग से कर सकता है? सर्वे में शामिल अधिकतर लोगों ने माना कि सपा में मचे घमासान को देखते हुए वो दूसरा विकल्प तलाश रहे हैं। लोगों का तर्क था कि जो पार्टी घर के झगड़ों को नहीं सुलझा पा रही है, वो उनकी समस्याओं को क्या दूर करेगी। जनता में इस बात को लेकर भी आशंका है कि यदि वो सपा को पुनः सत्ता में लाती है, तो क्या वो स्थायी और मजबूत शासन दे पाएगी?

भरोसा नहीं
आगरा, लखनऊ सहित समाजवादी पार्टी के गढ़ समझे जाने वाले मैनपुरी, इटावा, आजमगढ़, सैफई और तमाम अन्य क्षेत्रों के मतदाताओं की सोच में परिवर्तन देखा जा रहा है। यहां तक की सपा का वोटबैंक समझे जाने वाला मुस्लिम समुदाय भी उससे दूर हो सकता है। इसका फायदा कुछ कांग्रेस को होने की उम्मीद है, क्योंकि यूपी में मुस्लिम समुदाय का वोट भाजपा के खेमे में कम ही जाता है। मतदाता मानते हैं कि सपा कई घड़ों में विभाजित हो चुकी है। भले ही आज सब एकजुट हो जाएं, लेकिन कल फिर भी कलह का मटका फूट सकता है।

अखिलेश बेहतर
मुलायम सिंह और अखिलेश यादव में से पार्टी का नेतृत्व कौन बेहतर ढंग से कर सकता है? इस सवाल के जवाब में अधिकतर लोगों ने अखिलेश की पैरवी की। हालांकि कुछ यह भी मानते हैं कि नेतृत्व बदलने से खास असर नहीं होगा पार्टी की सोच बदलने की जरूरत है। सर्वे की खास बात ये रही कि युवाओं के साथ साथ बुजुर्गों ने भी माना कि अखिलेश ज्यादा बेहतर ढंग से पार्टी को आगे ले जा सकते हैं। उनके मुताबिक, पिछले चुनाव में जनता ने सपा के नाम पर नहीं बल्कि अखिलेश के नाम पर वोट दिए थे, लिहाजा पार्टी को उनके फैसलों को तवज्जो देनी चाहिए।

अपनों को भी डर
पार्टी नेताओं को भी लग रहा है कि इस बार चुनाव में सपा का प्रदर्शन काफी खराब रह सकता है। एक युवा नेता ने कहा, इस लड़ाई में जीत किसी की भी हो, पार्टी की हार होगी। पिछले चुनावों में हम भाजपा की आंतरिक कलह का हवाला देकर जनता को समझाया करते थे कि जो पार्टी अपना घर नहीं संभाल पा रही, वो आपको क्या संभालेगी। आज हम खुद उस स्थिति में पहुंच गए हैं। चुनाव से ऐन पहले विवाद का इस तरह सार्वजनिक होना पार्टी के लिए नुकसानदायक है। हम ऊपरी तौर पर भले ही कुछ भी कहें, लेकिन अंदर से सब डरे हैं।

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