क्या भाजपा के लिए ख़तरे की घंटी बज रही है?

कई विधानसभा चुनाव जीत चुकी भाजपा (BJP) यूँ तो मज़बूत नज़र आती है, लेकिन राजस्थान के उपचुनाव और मध्य प्रदेश के नगरीय निकाय चुनावों में मिली शिकस्त ने उसके माथे की लकीरों को गहरा कर दिया है. भले ही पार्टी नेता ऊपरी तौर पर इन पराजयों को ज्यादा महत्व न दे रहे हों, परंतु अंदर ही अंदर वह इसे लेकर चिंता और चिंतन की स्थिति में हैं. राजस्थान में दो विधानसभा और एक लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए. भाजपा को पूरी उम्मीद थी कि वह आसानी से यहाँ जीत दर्ज कर लेगी, लेकिन परिणाम इसके बिल्कुल विपरीत रहे. हालांकि इस हार को फिल्म पद्मावत के मुद्दे पर केंद्र एवं राज्य सरकार से खफा करणी सेना से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

राजपूत संगठनों ने पद्मावत और दूसरे मुद्दों को लेकर भाजपा को हराने का आह्वान किया था. करणी सेना का दावा है कि यह पहला मौका है जब राजपूत समाज ने भाजपा से अपना पुराना रिश्ता तोड़ा और उसके ख़िलाफ़ में मतदान किया. वैसा राजपूतों का भाजपा से मोह भंग होने का एक और कारण आनंदपाल एनकाउंटर भी है. पिछले साल 24 जून को हुए इस एनकाउंटर के चलते भाजपा और राजपूत समाज के रिश्तों में खटास पैदा हो गई थी. दरअसल, आनंदपाल रावणा राजपूत समाज का था और राजपूत खुद को रावणा समाज के निकट मानते हैं. इससे पहले कि पार्टी और राज्य सरकार इस खटास को दूर करने के लिए कुछ कर पाते संजय लीला भंसाली की फिल्म ने कोड़ में खाज का काम किया.

वहीं, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह की पकड़ कमज़ोर नज़र आने लगी है. नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा को मिली हार ने कुछ हद तक जनता में सरकार के प्रति पनप रहे आक्रोश को उजागर किया है. शिवराज भी हार की गंभीरता को समझते हैं, शायद यही वजह है कि अब उनका धैर्य जल्दी टूटने लगा है. धार शहर के सरदारपुर कस्बे में एक चुनावी रैली के दौरान जिस तरह से उन्होंने अपने सुरक्षा गार्ड को धक्का दिया, उससे यह साफ़ हो जाता है कि शिवराज अत्यधिक दबाव में हैं. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि वह अमूमन शांत और बेफ़िक्र दिखने वाले नेता हैं. शिवराज पर आरोप है कि वह महज घोषणाओं में व्यस्त रहते हैं.

सत्याग्रह की एक खबर के अनुसार, प्रदेश कांग्रेस का तो आरोप है कि शिवराज सिंह अब तक करीब 12 हजार घोषणाएं कर चुके हैं. इनमें से तमाम योजनाएं प्रशासनिक-तकनीकी या वित्तीय कारणों से अधूरी ही अटकी पड़ी हैं. इस सिलसिले में प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता नरेंद्र सलूजा ने अपने अधिकृत ट्विटर अकाउंट से इसी 15 जनवरी को एक दिलचस्प तस्वीर भी साझा की थी. यह तस्वीर धार शहर में लगे एक पोस्टर की थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन हिंदू जागरण मंच की ओर से लगाए गए पोस्टर में मुख्यमंत्री के लिए साफ़ संदेश था, ‘मुख्यमंत्री धार आ रहे हैं, आपका स्वागत है पर आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपया कोई नया वादा न करें. पहले 14 वर्ष पूर्व किए गए वादे पूरा करें. 14 वर्ष का समय कम नहीं होता.’ इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपनों के बीच भी शिवराज को लेकर असंतोष पनप रहा है.

विधानसभा चुनावों के साथ ही अगले साल लोकसभा का चुनाव होना है, उस लिहाज से भाजपा के पास रूठों को मानाने का ज्यादा समय नहीं है. बात चाहे केंद्र की हो या राज्य सरकार की दोनों को लेकर मतदाताओं के मन में शंकाएं पैदा हो रही हैं और यदि इन शंकाओं को जल्द समाप्त नहीं किया गया, तो परिणाम घातक हो सकते हैं.

Gujarat: विकास पर क्यों खामोश रहे मोदी?

अपने हर भाषण में विकास की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Gujarat चुनाव में विकास से बचते नजर आए. अपनी चुनावी रैलियों में उनका पूरा जोर कांग्रेस खासकर राहुल गांधी की कमजोरियों को रेखांकित करने पर ही केन्द्रित रहा. मोदी में आए इस बदलाव से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गुजरात में इस बार भाजपा को नुकसान होने जा रहा है. कांग्रेस नेता मणिशंकर के “नीच” वाले बयान के बाद जिस तरह से मोदी ने अपने लिए इस्तेमाल हुए शब्दों की दुहाई दी और जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के तार पाकिस्तान से जोड़े, उससे इन कयासों को बल मिलता है. जीएसटी आदि कई ऐसे मुद्दे रहे जिन्होंने गुजरात में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया और हार्दिक पटेल ने इस हवा की गति बढ़ाने का काम किया. बावजूद इसके भाजपा का पलड़ा कुछ हद तक भारी समझा जा रहा था, लेकिन पार्टी नेता और खासकर नरेंद्र मोदी के हावभाव देखकर अब यह लगने लगा है कि कांग्रेस की वर्षों की मुराद पूरी हो सकती है.

नयापन नदारद
गुजरात में मोदी के भाषण कांग्रेस की बुराई और राष्ट्रवाद, सेना, चीन, पाकिस्तान, भ्रष्टाचार और गुजराती अस्मिता के इर्द-गिर्द रहे. उन्होंने गुजरात में विकास की बात छेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और न ही बेरोजगारी, निवेश में कमी, लघु एवं मध्यम उपक्रमों की बर्बादी, स्थिर निर्यात एवं मूल्यवृद्धि जैसे मुद्दों पर बात की. कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा बार-बार विकास पर बात करने की चुनौती को भी मोदी ने नहीं स्वीकारा. मोदी के भाषण इस बार पारंपरिक राजनीति तक ही सिमटकर रह गए, उनमें कुछ नयापन नजर नहीं आया. उन्होंने खुद को गुजरात के बेटे के रूप में प्रोजेक्ट कर भावनात्मक आधार पर वोट मांगे. राजनीति का यह अंदाज़ 2014 के नरेंद्र मोदी के अंदाज़ से बिल्कुल अलग है. जो कहीं न कहीं यही इशारा करता है कि गुजरात के लिए भाजपा के पास कोई विकास मॉडल नहीं है.

बदली रणनीति
मोदी यह समझ गए हैं कि इस बार समीकरण अलग हैं. अच्छे दिनों के जो सपने उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान दिखाए थे, वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं. इसलिए विकास की बातों से बात बनने वाली नहीं है. शुरुआती मौकों पर जब स्वयं मोदी और अमित शाह की सभाओं से भीड़ कम होती चली गई और रैलियों में भाजपा के खिलाफ हुटिंग हुई, तभी पार्टी ने अपनी रणनीति को जाति-धर्म से जोड़ दिया. कभी अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, तो कभी राहुल गांधी के धर्म का. हालांकि सभाओं में पहले जैसी भीड़ फिर भी न खिंच सकी. हालांकि जनता का फैसला आना अभी बाकी है, इसके बात ही तय होगा कि उसे भाजपा पसंद है या कांग्रेस.

बदलते गए नारे
अगर 2007 से अब तक की बात करें, जो 2017 के चुनाव में भाजपा किसी खास स्लोगन के साथ मैदान में नहीं आई है.

  • 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी का मुख्य नारा था आतंकवाद विरुद्ध राष्ट्रवाद. ये चुनाव गुजरात दंगों के कुछ महीने बाद ही हुए थे. सांप्रदायिक हिंसा के साये में एक भव्य गौरव यात्रा का आयोजन किया गया था, जिसमें गुजरात की गरिमा और सम्मान को चुनाव का केंद्र बिंदु बनाया गया था.
  • 2007 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ‘जीतेगा गुजरात’ नाम से स्लोगन जारी किया था. इस चुनाव में विकास के प्रति झुकाव देखा गया. कांग्रेस के लिए सोनिया गांधी का मौत के सौदागर वाला बयान नुकसानदायक साबित हुआ था.
  • 2012 में भाजपा ने एकमत गुजरात का नारा केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार की तरफ से गुजरात की गई अनदेखी के खिलाफ एकजुट होने के लिए बनाया गया।
क्या अमित शाह का गणित कमज़ोर है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्राओं को लेकर खासे चर्चा में रहते हैं. एक दौरा ख़त्म होता नहीं कि दूसरे की तैयारी हो जाती है. 2014 में पद संभालने के बाद से मोदी 56 विदेश यात्राएं कर चुके हैं. जिस रफ़्तार से मोदी विदेशों की सैर कर रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि कार्यकाल ख़त्म होते-होते वो इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को काफी पीछे छोड़ देंगे. हालांकि, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को लगता है कि मोदी ने मनमोहन सिंह के मुकाबले कम विदेश यात्राएं की हैं. अब शाह ने किस गणित के आधार पर यह बयान दिया समझना मुश्किल है, क्योंकि आंकडें को कुछ और ही हकीकत बयां कर रहे हैं.

विदेश मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, मोदी ने 3 सालों में 56 विदेशी दौरे किए हैं और कुल 132 विदेशों में गुज़ारे हैं. अब मनमोहन सिंह की बात करें तो अपने 10 सालों के कार्यकाल में उन्होंने 80 विदेश यात्राएं की और 305 विदेशों में रहें. इस हिसाब से देखा जाए तो पूर्व प्रधानमंत्री ने हर साल औसतन 8 विदेशी दौरे किए, जबकि मोदी ने 18. अब सोचने वाली बात यह है कि संख्या में 8 बड़ा होता या 18?

सेंचुरी तय
अमित शाह शायद पीएम मोदी के तीन सालों की तुलना मनमोहन सिंह के 10 सालों के कार्यकाल से कर रहे हैं. अगर ऐसा है भी तो, आने वाले 2 सालों में नरेंद्र मोदी विदेश यात्राओं की सेंचुरी पूरी अवश्य कर लेंगे, क्योंकि उनकी रफ़्तार पहले से ही काफी तेज़ है.