Gujarat: विकास पर क्यों खामोश रहे मोदी?

अपने हर भाषण में विकास की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Gujarat चुनाव में विकास से बचते नजर आए. अपनी चुनावी रैलियों में उनका पूरा जोर कांग्रेस खासकर राहुल गांधी की कमजोरियों को रेखांकित करने पर ही केन्द्रित रहा. मोदी में आए इस बदलाव से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गुजरात में इस बार भाजपा को नुकसान होने जा रहा है. कांग्रेस नेता मणिशंकर के “नीच” वाले बयान के बाद जिस तरह से मोदी ने अपने लिए इस्तेमाल हुए शब्दों की दुहाई दी और जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के तार पाकिस्तान से जोड़े, उससे इन कयासों को बल मिलता है. जीएसटी आदि कई ऐसे मुद्दे रहे जिन्होंने गुजरात में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया और हार्दिक पटेल ने इस हवा की गति बढ़ाने का काम किया. बावजूद इसके भाजपा का पलड़ा कुछ हद तक भारी समझा जा रहा था, लेकिन पार्टी नेता और खासकर नरेंद्र मोदी के हावभाव देखकर अब यह लगने लगा है कि कांग्रेस की वर्षों की मुराद पूरी हो सकती है.

नयापन नदारद
गुजरात में मोदी के भाषण कांग्रेस की बुराई और राष्ट्रवाद, सेना, चीन, पाकिस्तान, भ्रष्टाचार और गुजराती अस्मिता के इर्द-गिर्द रहे. उन्होंने गुजरात में विकास की बात छेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और न ही बेरोजगारी, निवेश में कमी, लघु एवं मध्यम उपक्रमों की बर्बादी, स्थिर निर्यात एवं मूल्यवृद्धि जैसे मुद्दों पर बात की. कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा बार-बार विकास पर बात करने की चुनौती को भी मोदी ने नहीं स्वीकारा. मोदी के भाषण इस बार पारंपरिक राजनीति तक ही सिमटकर रह गए, उनमें कुछ नयापन नजर नहीं आया. उन्होंने खुद को गुजरात के बेटे के रूप में प्रोजेक्ट कर भावनात्मक आधार पर वोट मांगे. राजनीति का यह अंदाज़ 2014 के नरेंद्र मोदी के अंदाज़ से बिल्कुल अलग है. जो कहीं न कहीं यही इशारा करता है कि गुजरात के लिए भाजपा के पास कोई विकास मॉडल नहीं है.

बदली रणनीति
मोदी यह समझ गए हैं कि इस बार समीकरण अलग हैं. अच्छे दिनों के जो सपने उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान दिखाए थे, वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं. इसलिए विकास की बातों से बात बनने वाली नहीं है. शुरुआती मौकों पर जब स्वयं मोदी और अमित शाह की सभाओं से भीड़ कम होती चली गई और रैलियों में भाजपा के खिलाफ हुटिंग हुई, तभी पार्टी ने अपनी रणनीति को जाति-धर्म से जोड़ दिया. कभी अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, तो कभी राहुल गांधी के धर्म का. हालांकि सभाओं में पहले जैसी भीड़ फिर भी न खिंच सकी. हालांकि जनता का फैसला आना अभी बाकी है, इसके बात ही तय होगा कि उसे भाजपा पसंद है या कांग्रेस.

बदलते गए नारे
अगर 2007 से अब तक की बात करें, जो 2017 के चुनाव में भाजपा किसी खास स्लोगन के साथ मैदान में नहीं आई है.

  • 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी का मुख्य नारा था आतंकवाद विरुद्ध राष्ट्रवाद. ये चुनाव गुजरात दंगों के कुछ महीने बाद ही हुए थे. सांप्रदायिक हिंसा के साये में एक भव्य गौरव यात्रा का आयोजन किया गया था, जिसमें गुजरात की गरिमा और सम्मान को चुनाव का केंद्र बिंदु बनाया गया था.
  • 2007 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ‘जीतेगा गुजरात’ नाम से स्लोगन जारी किया था. इस चुनाव में विकास के प्रति झुकाव देखा गया. कांग्रेस के लिए सोनिया गांधी का मौत के सौदागर वाला बयान नुकसानदायक साबित हुआ था.
  • 2012 में भाजपा ने एकमत गुजरात का नारा केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार की तरफ से गुजरात की गई अनदेखी के खिलाफ एकजुट होने के लिए बनाया गया।

रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं. उनके नाम की चर्चा उनकी काबिलियत से ज्यादा इस बात को लेकर थी कि वो दलित हैं. भाजपा की देखादेखी कांग्रेस ने भी दलित कार्ड खेलते हुए मीरा कुमार को मैदान में उतारा था, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली. कोविंद की जीत पर उनके गांव और दलित समुदाय में ख़ुशी की लहर है, लेकिन क्या यह ख़ुशी किसी तरह के लाभ में परिवर्तित हो सकती है? हमारे संविधान में राष्ट्रपति को जो अधिकार प्राप्त हैं, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि दलित राष्ट्रपति से दलितों का कुछ भला होने वाला नहीं है. हां, इतना ज़रूर है कि इससे भाजपा के दलित वोट बैंक में इजाफा ज़रूर हो सकता है.

संविधान के अनुसार राष्ट्रपति केवल सरकार को मशविरा दे सकते हैं और पुनर्विचार के लिए कह सकते हैं, अगर सरकार इंकार कर दे तो उनके पास सहमति देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह जाता. देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद इस पीड़ा को समझते थे. उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि हमें आंख बंद करके ब्रिटेन के पदचिन्हों पर नहीं चलना चाहिए, राष्ट्रपति के अपने कुछ अधिकार होने चाहिए. उस दौर में जवाहरलाल नेहरु और प्रसाद के बीच मतभेद जगजाहिर थे, नेहरू ने राजेन्द्र प्रसाद के 10 साल के कार्यकाल में उनकी कोई बात नहीं मानी.

वैसे भी ज्यादा सलाह-मशविरा देने वाले राष्ट्रपति सरकार को पसंद नहीं आते. अब्दुल कलाम तकरीबन हर बिल पर सरकार को सलाह देते थे. इसी वजह से बेहद लोकप्रिय होने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें दूसरी बार रायसीना हिल्स भेजना मुनासिव नहीं समझा. उनकी जगह कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बना दिया. हमारे राष्ट्रपति की स्थिति इंग्लैंड की महारानी जैसी होती है, जिसके पास कोई ख़ास अधिकार नहीं होते. लिहाजा राष्ट्रपति की कुर्सी पर चाहे दलित बैठे या कोई और होगा वही जो सरकार चाहेगी.

क्या अमित शाह का गणित कमज़ोर है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्राओं को लेकर खासे चर्चा में रहते हैं. एक दौरा ख़त्म होता नहीं कि दूसरे की तैयारी हो जाती है. 2014 में पद संभालने के बाद से मोदी 56 विदेश यात्राएं कर चुके हैं. जिस रफ़्तार से मोदी विदेशों की सैर कर रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि कार्यकाल ख़त्म होते-होते वो इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को काफी पीछे छोड़ देंगे. हालांकि, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को लगता है कि मोदी ने मनमोहन सिंह के मुकाबले कम विदेश यात्राएं की हैं. अब शाह ने किस गणित के आधार पर यह बयान दिया समझना मुश्किल है, क्योंकि आंकडें को कुछ और ही हकीकत बयां कर रहे हैं.

विदेश मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, मोदी ने 3 सालों में 56 विदेशी दौरे किए हैं और कुल 132 विदेशों में गुज़ारे हैं. अब मनमोहन सिंह की बात करें तो अपने 10 सालों के कार्यकाल में उन्होंने 80 विदेश यात्राएं की और 305 विदेशों में रहें. इस हिसाब से देखा जाए तो पूर्व प्रधानमंत्री ने हर साल औसतन 8 विदेशी दौरे किए, जबकि मोदी ने 18. अब सोचने वाली बात यह है कि संख्या में 8 बड़ा होता या 18?

सेंचुरी तय
अमित शाह शायद पीएम मोदी के तीन सालों की तुलना मनमोहन सिंह के 10 सालों के कार्यकाल से कर रहे हैं. अगर ऐसा है भी तो, आने वाले 2 सालों में नरेंद्र मोदी विदेश यात्राओं की सेंचुरी पूरी अवश्य कर लेंगे, क्योंकि उनकी रफ़्तार पहले से ही काफी तेज़ है.

इनकी हिंदी देखकर आप भी शरमा जाएंगे

अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी जैसे हिंदी प्रेमियों की पार्टी भाजपा में ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं है, जो अपने हिंदी के ज्ञान से अर्थ का अनर्थ कर रहे हैं. अब पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी को ही देख लीजिए. एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने जिन शब्दों में स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत का प्रचार किया, उसे देखकर हिंदी को भी शर्म आ जाएगी. ये तस्वीर आजकल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है.

सांसद और वकील मीनाक्षी लेखी ने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से बॉटनी से बीएससी, दिल्ली विश्वविद्यालय से एल.एल.बी किया है. ये तस्वीर तब की है जब मंगलवार 27 जून को लेखी इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड की तरफ से दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंची. इस कार्यक्रम में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेद्र प्रधान, केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन, दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी, सांसद उदित राज आदि भी मौजूद थे.

Source: Social Media

साजिश का शिकार तो नहीं हो रही ‘आप’?

अरविंद केजरीवाल इस वक़्त बुरे दौर से गुज़र रहे हैं. पहले चुनावों में शिकस्त और अब भ्रष्टाचार के आरोप. इन आरोपों की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि इन्हें लगाने वाले विपक्षी नहीं बल्कि केजरीवाल के अपने हैं. और यही वजह है कि हर तरफ से केजरीवाल पर सवालों की बौछार हो रही है. लोग यह जानना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार की खिलाफत पर राजनीतिक पार्टी की नींव रखने वाला एक करिश्माई नेता क्या खुद भ्रष्टाचार में डूब गया है? आम आदमी पार्टी के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि इस बार चोट सीधे उसकी जड़ों पर हुई है. और जब जड़ें कमज़ोर पड़ने लगें तो फिर पेड़ का गिरना स्वभाविक हो जाता है.
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यहां से केजरीवाल के लिए यह साबित करना बेहद मुश्किल होगा कि जो आरोप उनपर लगाएं गए हैं वो बेबुनियाद हैं. और बिना यह साबित करे वो शायद उस विश्वास को पुन: हासिल न कर पाएं, जो इस खुलासे से कुछ हद तक खो गया है. दिल्ली के पूर्व मंत्री और आप से बर्खास्त नेता कपिल मिश्रा का कहना है कि केजरीवाल ने 2 करोड़ की रिश्वत ली, इसके अलावा पार्टी के चंदे को लेकर भी सरकार को अँधेरे पर रखा गया. कपिल के आरोपों को यदि एक ऐसे व्यक्ति की प्रतिक्रिया के तौर पर स्वीकार भी लिया जाए, जो भ्रष्टाचार को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता, तब भी बहुत कुछ ऐसा है जो यह संदेह पैदा करता है कि आम आदमी पार्टी राजनीतिक साजिश का शिकार हो रही है. केंद्र  में सत्ता परिवर्तन के बाद से जिस तरह से एक के बाद एक आप नेता नकारात्मक कारणों से सुर्खियां बंटोर रहे हैं, क्या वो महज़ इत्तेफ़ाक है?

पिछले दो-ढाई सालों में तकरीबन रोज़ किसी न किसी आप नेता पर कोई न कोई आरोप लगा. आरोपों की यह रफ़्तार तो पश्चिम बंगाल में भी देखने को नहीं मिली जहां तृणमूल कांग्रेस और वामदल एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं. कल तक सुशिक्षित और साफ़-सुथरी छवि वाले नेताओं की पार्टी आज एक ऐसी पार्टी बन गई है, जिसके अधिकांश नेता कठघरे में खड़े हैं. क्या ये संभव है? एक-दो नेताओं के आचरण या कार्यशैली सवालों के घेरे में हो सकती है, लेकिन जब पूरी की पूरी पार्टी को एक ही नज़रिए से देखा जाए तो सवाल उठाना लाज़मी है. दरअसल आप ने भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ जिस नई राजनीति की शुरुआत की, यह उसका ही परिणाम है. जब आप कुछ अलग करने की कोशिश करते हैं, तो आपको आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है. और जब आप अपनी कोशिशों में सफल हो जाते हैं तो आलोचनाएं हितों का टकराव बन जाती हैं. आप के साथ भी कुछ ऐसा ही होता नज़र आ रहा है.

kapilआम आदमी पार्टी ने एक ऐसे राजनीतिक परिदृश्य का निर्माण किया, जिसका इंतजार लोगों को लंबे वक़्त से था. एक ऐसा परिदृश्य जहां वादे महज़ वोट हासिल करने का हथियार नहीं थे, बल्कि जनता के दरकते विश्वास को मज़बूत करने का साधन थे. महज़ दिल्ली ही नहीं वीआईपी संस्कृति से मुक्त इस नई सोच की पूरे देश में सराहना हुई. थोड़े ही वक़्त में आप ने इतनी ख्याति अर्जित कर ली कि मंझे हुए राजनीतिज्ञों के मंच तक हिलने लगे. क्या ये वजह आप के खिलाफ साजिश के लिए काफी नहीं है? क्या केंद्रीय एजेंसियों का बार-बार आप पर घेरा कसना साजिश के संदेह को गहरा नहीं करता? सवाल कई हैं, जिनके जवाब खोजे जाने चाहिए और इसके लिए केजरीवाल को भी आगे आना होगा. जिस तरह से उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों पर सीधा जवाब देने के बजाय ईवीएम का मुद्दा उठाया उससे यह संदेश गया कि केजरीवाल कुछ छुपा रहे हैं फिर भले ही उनकी मंशा इसे तूल न देने की रही हो. स्थिति पहली जितनी सरल नहीं है, अब ख़ामोशी का अर्थ होगा स्वीकृति. इसलिए केजरीवाल और उनकी टीम को काउंटर अटैक के साथ ही सेल्फ डिफेन्स का प्रदर्शन भी करना होगा, वरना साजिशों के बादल और घने होते जाएंगे.

आखिर क्यों हार रहे हैं केजरीवाल?

दिल्ली नगर निगम चुनावों में आप आदमी पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसे ही इशारे कर रहे थे. इस हार के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या आम आदमी पार्टी अपने शुरूआती बिंदु पर पहुंचने वाली है? क्या अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक करियर ख़त्म हो गया है? इन सवालों पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि हार और जीत केवल राजनीति ही नहीं बल्कि हर मुकाबले की हकीकत है. और यह ज़रूरी नहीं कि हारने वाला फिर से खड़े होने का साहस न जुटा पाए. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आज जिस दौर से गुज़र रही हैं, भाजपा भी उस दौर से गुज़र चुकी है. इसलिए अरविंद केजरीवाल के पास भी वापसी का मौका है और आगे भी रहेगा, जब तक कि वो खुद अपनी पारी समाप्ति की घोषणा नहीं करते. दिल्ली नगर निगम पर इससे पहले भी भाजपा का कब्ज़ा था, इसलिए यदि वो हारती तो उसे आप से ज्यादा आघात लगता. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह शिकस्त केजरीवाल और उनकी पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. क्योंकि इससे यह प्रत्यक्ष तौर पर नज़र आता है कि जनता आम आदमी पार्टी से मुंह मोड़ रही है. लेकिन इसकी क्या वजह है? क्या केजरीवाल ने अपने वादे पूरे नहीं किए? क्या आप के विधायक और कार्यकर्ताओं ने वैसी ही दबंगई दिखाई, जैसी आजकल यूपी में भाजपाई या उससे पहले सपा और बसपा कार्यकर्ता दिखाते थे? अगर नहीं, तो फिर केजरीवाल में विश्वास दिखाने वाली दिल्ली की जनता एकाएक से उनके खिलाफ कैसे हो गई?
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सूरत तो बदली है
इससे शायाद ही कोई इंकार करे कि केजरीवाल राज में दिल्ली का विकास हुआ है. जिन सरकारी स्कूलों को हिकारत की नज़रों से देखा जाता था, वहां की स्थिति न केवल सुधरी है, बल्कि नई संभावनाएं भी वहां जन्म ले रही हैं. मोहल्ला क्लीनिक के रूप में लोगों को एक ऐसा डॉक्टर मिल गया है, जो बेवजह के चक्कर नहीं लगवाता और ना ही बेवजह जेब ढीली करने पर जोर देता है. सड़कों पर रात गुजरने वालों को भी अच्छे शेल्टर नसीब हो रहे हैं. ख़ास बात यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जो सबसे ज़रूरी और अहम् है. आमतौर पर शिक्षक भी सरकारी ढर्रे में शामिल हो जाते हैं और बच्चों की नैया राम भरोसे आगे बढ़ती रहती है. जैसे कि देश के अधिकांश सरकारी स्कूलों में हो रहा है. दिल्ली के लोग इस बदलाव को महसूस भी कर रहे हैं, लेकिन ये अहसाह अगर वोट में तब्दील नहीं हो सका तो इसकी वजह काफी हद तक आम आदमी पार्टी की कलह और केजरीवाल खुद हैं.

ऐसी पार्टी क्यों चुनें?
दिल्ली में ताजपोशी के बाद से ही लगभग हर सुबह आम आदमी पार्टी से किसी की विदाई का संदेश लेकर आई. गोपाल राय, योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण से लेकर अलग-अलग इकाई के छोटे-बड़े कई नेता पार्टी से अलग होते गए. पिछले कुछ वक़्त से तो पार्टी धधकते माहौल से गुज़र रही है, जिसका धमाका नगर निगम में मिली हार के साथ ही हो गया है. केजरीवाल के सबसे ख़ास कहे जाने वाले कुमार विश्वास भी अपने कवि अंदाज़ में भाजपा को निशाना बनाते-बनाते पार्टी मुखिया पर तीर दाग रहे हैं. और आशुतोष जैसे दूसरे नेताओं के साथ केजरीवाल के संबंधों में भी खिंचाव है. सीधे शब्दों में कहें तो पार्टी बिखराव के रस्ते पर चल निकली है और ऐसी स्थिति में उसके लिए जीत हासिल करना लगभग नामुमकिन है. जनता एक ऐसी पार्टी से अपनी समस्याएं सुलझाने की उम्मीद कैसे कर सकती है, जो खुद के झगड़े ही नहीं सुलझा पा रही है. जिसके नेता अपनी ही पार्टी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. फिर भले ही विरोधी पार्टियां उससे कमतर क्यों न हों. मुंबई हमले के वक़्त देश में कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा था, महंगाई पहले से ही यूपीए सरकार की नींव कमज़ोर कर रही थी, बावजूद इसके जनता ने भाजपा को नकारते हुए कांग्रेस को दोबारा चुना. इसकी वजह महज इतनी ही थी कि भाजपा में आंतरिक कलह अपने चरम पर थी और लाख बुराइयों के बावजूद कांग्रेस एक अनुशासन वाली पार्टी बनी हुई थी.

इतने नकारात्मक क्यों?
इसके अलावा अरविंद केजरीवाल की नकारात्मक राजनीति भी जनता की नज़रों में आप की चमक को फीका करने में लगी है. सुधारों की बात करने वाले केजरीवाल अब राजनीति के कमाल खान बनते जा रहे हैं, जिन्हें हर मुद्दे पर हवा का रुख विरोधी पार्टियों की ओर मोड़ना है. चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो या नोटबंदी केजरीवाल प्रत्यक्ष तौर पर नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते रहे, ये जानते हुए भी कि देश नोटबंदी के फैसले का समर्थन कर रहा है. बुलेट ट्रेन को भी केजरीवाल ने बेकार साबित करने में देर नहीं लगाई, और गोवा एवं पंजाब विधानसभा चुनावों में हार के लिए ईवीएम पर उंगली उठाना शुरू कर दिया. नगर निगम चुनाव में शिकस्त को भी वो इसी नज़रिए से देख रहे हैं. केजरीवाल की बातों में सच्चाई है या नहीं, विषय अब यह नहीं रह गया है, बल्कि यह हो गया है कि आखिर केजरी इतने नकारात्मक क्यों हैं? आप सोशल मीडिया पर देख लीजिये, लोग यही सवाल केजरीवाल से कर रहे हैं. ये वही सोशल मीडिया है, जिसने दिल्ली में आप की जीत में अहम् किरदार निभाया था. नगर निगम हार आम आदमी पार्टी के लिए एक सबक है, और यदि उसने इससे भी कुछ नहीं सीखा, तो परिणाम ज्यादा घातक होंगे.

Shocking video: brother killed for saving sister!

ये वीडियो (Video) सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, इसके मुताबिक राजस्थान के कोटा में छेड़छाड़ का विरोध करने पर कुछ लड़कों ने लड़की के भाई को घर में घुसकर मार डाला. हालांकि अभी साफ़-साफ़ नहीं कहा जा सकता कि वीडियो कहां का है और किस कारण के चलते हत्या को अंजाम दिया गया.

Video: योगी के बिगड़े बोल

योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चुना गया है. योगी अपने विवादित भाषणों के लिए मशहूर हैं, देखने वाली बात होगी कि एक साम्प्रदायिक नेता कैसा शासन चलाता है.

कल के दुश्मन आज दोस्त बन गए

राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी भी नफे-नुकसान के आधार पर होती है. कल तक नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में थे तो कैप्टन अमरिंदर सिंह उनके सबसे बड़े दुश्मन थे, लेकिन आज वही उनके सबसे अज़ीज हो गए हैं. शपथ ग्रहण समारोह में सिद्धू ने सार्वजानिक रूप से कैप्टन के पैर छूकर यह साबित भी कर दिया. सिद्धू अब आम विधायक नहीं हैं वो मंत्री बन गए हैं, हालांकि उनका सपना डिप्टी सीएम बनने का था. वो ये बखूबी जानते हैं कि इस जीत के बाद कांग्रेस में कैप्टन का कद कहीं गुना ज्यादा बढ़ गया है और उनकी अनदेखी करके वो सरकार का हिस्सा बने नहीं रह पाएंगे. यही वजह है कि सिद्धू ने कैप्टन के पैर छूकर यह संदेश दे दिया कि वो अब कोई मनमुटाव नहीं रखना चाहते.

siddhuपुरानी तल्खी
सिद्धू और कैप्टन के रिश्ते काफी पहले से तल्ख़ रहे हैं. भाजपा का दामन छोड़ने के बाद आम आदमी पार्टी में जाने के कयासों के बीच जब सिद्धू ने कांग्रेस में विकल्प तलाशा तो कैप्टन ने इसका पुरजोर विरोध किया था. पंजाब कांग्रेस से जुड़े कुछ नेता इस बात को स्वीकारते हैं कि कैप्टन ने आलाकमान से सिद्धू को टिकट न देने की सिफारिश की थी. इतना ही नहीं उन्होंने राहुल गांधी को यह भी समझाने की कोशिश की थी कि सिद्धू को पार्टी में लाना फायदे के बजाए घाटे का सौदा हो सकता है, मगर राहुल ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया.

बंद करो लड़ाई
कांग्रेस से टिकट पक्का होने के बाद भी नवजोत सिंह सिद्धू कैप्टन पर तीर दागते रहे. एक सभा में उन्होंने कहा था कि “एक अकेला भी भाड़ फोड़ सकता है”, ये बयान कैप्टन के बयान का जवाब था. भाजपा में रहने के दौरन तो इस पूर्व क्रिकेटर ने कैप्टन पर कई आरोप लगाए थे. सूत्र बताते हैं कि चुनाव परिणाम सामने आने के बाद आलाकमान की तरफ से कैप्टन और सिद्धू को यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि पुरानी लड़ाई भुलाकर काम करें. हालांकि अब देखने वाली बात यह होगी कि नफे-नुकसान पर टिकी यह दोस्ती कितने दिन चल पाती है.

Punjab: हारकर भी जीत गई आप

Punjab is still new hope for Aam Aadmi Party.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अगर सबसे ज्यादा कुछ आश्चर्यजनक रहा, तो वो पंजाब और गोवा के नतीजे. दोनों ही राज्यों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे थे, लेकिन परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे. इस हार के बाद केजरीवाल की रणनीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं, इस बात पर चर्चा की जा रही है कि क्या आप का राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दस्तक देने का सपना टूट गया है? अगर हम उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा के जबरदस्त प्रदर्शन से बाहर निकलकर सोचने का प्रयास करें तो इस सवाल का जवाब निश्चित तौर पर ना punjabहोगा. ये बात सही है कि पार्टी को पंजाब में हार का सामना करना पड़ा और गोवा में वो खाता खोलने में भी असफल रही, लेकिन क्या इस तरह की चर्चाओं और टिप्पणियों से पहले आप के राजनीतिक अनुभव पर नज़र नहीं डालनी चाहिए? भाजपा या कांग्रेस से तुलना की जाए तो आम आदमी पार्टी उस युवा की तरह है, जो बचपन से निकलकर जवानी में कदम रख रहा है. और ऐसा युवा अगर धुरंधरों के सामने कुछ देर भी अपने कदम ज़माए रख पता है तो उसके भविष्य को लेकर सवाल खड़े नहीं किए जाते बल्कि संभावनाएं व्यक्त की जाती हैं. आप ने पहली बार दिल्ली से बाहर निकलकर पंजाब और गोवा में अपनी किस्मत आजमाई, पंजाब में उसे भाजपा और कांग्रेस के अलावा अकाली दल के वोट भी काटने थे. ये सभी पार्टियां सत्ता की राजनीति में लंबा अनुभव रखती हैं, इसलिए आम आदमी पार्टी ने जब अपने चुनावी अभियान को यहां से आगे बढ़ाने का ऐलान किया तो किसी के माथे पर ज्यादा सिलवटें देखने को नहीं मिलीं. अधिकतर नेता यह मानते रहे हैं कि सोशल मीडिया पर लड़ाई लड़ने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली के बाहर अपनी छाप नहीं छोड़ सकती. लेकिन जब आप की सभाओं में भीड़ जुटने लगी, केजरीवाल को सुनने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचने लगे तो सिसायत के मंझे हुए खिलाड़ियों के होश उड़ना शुरू हो गए. यहीं से एक हवा बनना शुरू हुई कि आम आदमी पार्टी पंजाब में झाड़ू लगा सकती है. केवल केजरीवाल या आप कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि विरोधी दलों को भी अपनी हार की आशंका होने लगी थी.

भाजपा को मात

हालांकि परिणाम कुछ और रहे, मगर फिर भी आप अप्रत्यक्ष तौर पर उस भाजपा को मात देने में कामयाब रही, जिसने मोदी लहर पर सवार होकर यूपी और उत्तराखंड में न सिर्फ भगवा झंडा फहराया बल्कि कई रिकॉर्ड भी ध्वस्त कर दिए. बादल की काली छाया भी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को अपने आगोश में नहीं ले सकी. पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं, उसमें आम आदमी पार्टी ने 20 पर जीत हासिल की, जबकि को भाजपा को महज 3 सीटों पैर जीत मिली और उसकी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल महज 15 पर सिमट गई. कांग्रेस को सबसे ज्यादा 77 सीटें मिलीं. अब यदि 2012 के चुनाव परिणाम देखें तो अकाली दल को 56 और भाजपा को 12 पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस के 46 उम्मीदवार ही जीत पाए थे. आम आदमी पार्टी ने पहली बार पहली बार चुनाव लड़ा और सत्ताधारी पार्टियों से ज्यादा वोट प्रतिशत प्राप्त किया, क्या ये किसी जीत से कम है? क्या इसका सीधा सा मतलब ये नहीं है कि जनता भाजपा और अकाली दल के स्थान पर आम आदमी पार्टी को देखना चाहती है?

punjabबस एक चूक

पंजाब में आम आदमी के प्रदर्शन को निराशाजनक नहीं बल्कि उम्मीदों के अनुरूप न होना कहा जा सकता है. पार्टी यहां जनता के सामने एक मजबूत स्थानीय नेतृत्व रखने में चूक गई, और यही शायद उसके कम वोटों का कारण रहा. भगवंत मान और एचएस फुल्का से पार्टी को भले ही फायदा मिला हो, लेकिन यह स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरा साबित नहीं हो सकते थे. इसके अलावा केजरीवाल का पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की अफवाह ने भी पार्टी के खिलाफ काम किया. इससे आप आयात किए हुए नेताओं की पार्टी महसूस होने लगी. लोगों को लगने लगा कि बिना पंजाब को जाने-समझे कोई व्यक्ति कैसे राज्य की बागडोर संभाल सकता है? इसलिए अमरिंदर सिंह की छवि केजरीवाल पर भारी पड़ी. यदि आप मजबूत स्थानीय नेतृत्व पेश करती तो निश्चित तौर पर उसकी झोली में ज्यादा सीटें आतीं.

अब भी मौका

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी चुनाव ज़रूर हारी है, लेकिन विपक्ष की कुर्सी पर उसी का कब्ज़ा है. अगर वो अपनी इस भूमिका को सही ढंग से निभा पाती है, तो अगले चुनाव तक वो जनता के बीच खुद को अच्छी तरह से स्थापित करने में कामयाब होगी. जिन मुद्दों को पार्टी ने चुनाव के दौरान उठाया था उन्हें अब वो विधानसभा में उठा सकती है. यह सब जानते हैं कि अमरिंदर सिंह को लगभग खाली खजाने से जनता की उम्मीदों को पूरा करना होगा, ऐसे में आम आदमी पार्टी को कई मौके मिलेंगे जब वो खुद को बेहतर साबित कर सकती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो आप ने पंजाब में हार कर भी काफी कुछ पाया है, ज़रूरत है उसे समझने और आगे की तैयारी करने की. जहां तक बात गोवा की है तो परिणाम दुःख देने वाले हैं, लेकिन पार्टी का ये पहला प्रयोग था और प्रयोग सफल – असफल होते रहते हैं.