नीरव मोदी और कोठारी के साथ क्या सलूक करता चीन?

पहले विजय माल्या, अब नीरव मोदी और विक्रम कोठारी बैंकों के करोड़ों रुपए डकार गए. इस तरह की ख़बरें सुनने के बाद दिमाग में यह सवाल उठता है कि आखिर इन लोगों के साथ क्या किया जाना चाहिए, ताकि फिर कोई ऐसा करने की जुर्रत न कर सके.

इसका जवाब तलाशने के लिए हमें ज्यदा दूर जाने की ज़रूरत नहीं है. हमारा पड़ोसी चीन बैंकों को चूना लगाने वालों के खिलाफ जो कदम उठा रहा है, वैसा यदि कुछ भारत में होता तो शायद नीरव मोदी और कोठारी जैसे लोग कभी अपनी साजिश में कामयाब नहीं होते. चीन की अदालत ने हाल ही में 67 लाख से ज्यादा बैंक डिफ़ॉल्टरों को काली सूची में डाल दिया है. इस सूची में नाम आने का मतलब है कि अब वो विमान या ट्रेन से सफ़र नहीं कर सकते, लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन नहीं कर सके, और उन्हें प्रमोशन भी नहीं मिलेगा.

कतर दिए पर
ग्लोबल टाइम्स की ख़बर के मुताबिक अब तक चीनी सरकार ने 61.5 लाख लोगों के विमान टिकट खरीदने और 22.2 लाख लोगों को तेज़ रफ़्तार वाली ट्रेन में सफ़र करने पर पाबन्दी लगाई है. जिन डिफ़ॉल्टरों को काली सूची में डाला गया है उसमें सरकारी अधिकारी और नेता भी शामिल हैं. कुछ अधिकारियों का डिमोशन भी किया गया है. इस कवायद का असर यह हुआ कि कम से कम 10 लाख डिफ़ॉल्टरों ने अदालत का आदेश मानने की बात कही है.

बच्चों पर असर
चीन की सबसे बड़ी अदालत अपनी वेबसाइट पर बेईमान लोगों के नाम और आईडी नंबर चस्पा करती है. ये लोग विमान या हाई-स्पीड रेलगाड़ियों में सफ़र नहीं कर सकते हैं. इतना ही नहीं इनके बच्चों के महंगे स्कूलों में पढ़ने पर भी पाबंदी लगाई जाती है. डिफ़ॉल्टर तीन सितारा या उससे महंगे होटलों में नहीं ठहर सकते. उन्हें कार बुक कराने के लिए भी सामान्य से अधिक रकम चुकानी पड़ती है.

नौकरी पर गाज़
इस लिस्ट की शुरुआत 2013 में की गई थी, तब से अब तक इसमें 90 लाख लोगों के नाम डाले जा चुके हैं. डिफ़ॉल्टरों में इस कार्रवाई को लेकर इतना खौफ़ है कि एक व्यक्ति ने इससे बचने के लिए प्लास्टिक सर्जरी तक करा ली थी. लिस्ट में नाम आने का मतलब है रोज़गार की संभावनाओं का भी अंत. अधिकांश कंपनियां नौकरी देने से पहले लिस्ट की जांच करती हैं. इस वजह के चलते डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को कार्यकारी पद नहीं दिए गए हैं. अदालत का मानना है कि इस तरह की परेशानियां लोगों को समय पर कर्ज चुकाने के लिए मजबूर करेंगी.

कॉलरट्यून की जगह संदेश
पिछले साल चीन की एक अदालत ने 20 कर्जदारों के फ़ोन पर रिकॉर्ड संदेश डाल दिया था. जब कोई व्यक्ति इन लोगों को फ़ोन करता था तो कॉलरट्यून की जगह यह संदेश सुनाई देता था, “जिस व्यक्ति को आप कॉल कर रहे हैं, उसे अदालतों ने उधार न चुकाने के कारण काली सूची में डाल दिया है. कृपया इया व्यक्ति से पैसा चुकाने का आग्रह कीजिये.” चीन में डिफ़ॉल्टरों का नाम, फ़ोन नंबर, आईडी नंबर, फ़ोटो और घर के पते के साथ अख़बारों में प्रकाशित किया जाता है, टीवी पर दिखाया जाता है. इसके अलावा बसों या लिफ्ट के अंदर भी चस्पा किया जाता है.

मिलिए चीन के जय और वीरू से

शोले के जय और वीरू को तो आप जानते होंगे, लेकिन आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं चीन के दो ऐसे दोस्तों से जो सालों से न केवल एक दूसरे का सहारा बने हुए हैं बल्कि तमाम मुश्किलों के बावजूद प्रकृति के प्रति अपने दायित्त्व को निभा रहे हैं. इन दोस्तों को यदि चीन के जय और वीरू कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा. Jia Haixia और Jia Wenqi हर रोज़ पेड़ लगाते हैं ताकि अपने गांव को बाढ़ से बचाया जा सके. ख़ास बात यह है कि Wenqi के दोनों हाथ नहीं हैं और Haixia नेत्रहीन हैं. पिछले 13 सालों से दोनों के दूसरे की आंख और हाथ बने हुए हैं.

दोनों रोजाना हथौड़ा और लोहे की रॉड लेकर जंगल की ओर निकल जाते हैं. Wenqi आगे-आगे चलते हैं और Haixia उनकी शर्ट पकड़कर पीछे-पीछे. जब बात नदी पार करने की आती है, तो Haixia, Wenqi की पीठ पर चढ़ जाते हैं, ताकि तेज़ बहाव उन्हें गिरा न दे. वैसे तो दोनों बचपन के साथी हैं, लेकिन स्कूल के बाद उनके रास्ते जुदा हो गए पर शायद किस्मत में दोबारा मिलना लिखा था. Haixia को बचपन से एक आंख से दिखाई नहीं देता था और साल 2000 में हुए फैक्ट्री हादसे ने उन्हें पूरी तरह से नेत्रहीन बना दिया. Wenqi जब महज 3 साल के थे, तब हाई वोल्टेज बिजली की तार की चपेट में आने से उनके हाथ चले गए.

13 साल पहले जब दोनों फिर से मिले तो उन्होंने एक साथ रहना तय किया. दोनों को पेड़ पौधों का शौक है. इसलिए सरकारी 8 एकड़ ज़मीन पर पर वो पौधे लगाते हैं और उनकी देखरेख करते हैं. Haixia के मुताबिक, हमारे लिए ये काम मुश्किल नहीं. शुरुआत में गांव वालों ने साथ नहीं दिया, लेकिन अब सब हमारे साथ हैं. वन विभाग की तरफ से इस काम के लिए दोनों को कुछ पैसे दिए जाते हैं, जिससे उनका घर चल जाता है. Haixia और Wenqi पूर्वी चीन में दोस्ती की मिसाल बन चुके हैं.

यहां इमारत के बीच से गुज़रती है ट्रेन

चीन में आपको कई अजब-कारनामे देखने को मिल जाएंगे और इनमें से एक कारनामा है कांगकुइंग शहर की 19 मंजिला इमारत के बीच में से गुज़रती ट्रेन. चीन के दक्षिण-पूर्व में स्थित इस शहर की आबादी 49 मिलियन है और यह 31,000 स्क्वायर मील क्षेत्र में बसा है. यहां जगह की काफी कमी है, ऐसे में जब ट्रेन मार्ग बिछाने की बात आई तो प्रशासन को जगह की कमी से दो-चार होना पड़ा लेकिन होनहार डिज़ाइनरों ने उसका भी हल निकाल लिया.

अंदर ही स्टेशन
ट्रेन को एक 19 मंजिला इमारत के बीच में से निकालने का फैसला लिया गया. इसके दो फायदे हुए तो रूट सीधा रहा और दूसरा इमारत के अंदर ही स्टेशन बना दिया गया. अगर ऐसा नहीं किया जाता तो खर्चा तो बढ़ता ही, अतिरिक्त जगह की भी आवश्यकता पड़ती, जिसकी शहर में पहले से ही कमी है.

बिल्कुल शोर नहीं  
इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे ख़ास बात ये है कि इमारत में रहने वालों को ट्रेन का शोर सुनाई ही नहीं देता. ऐसा इसलिए क्योंकि अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके ट्रेन की आवाज को एक डिश  वॉशर की आवाज जितना कम कर दिया गया है. शहर परिवहन विभाग के प्रवक्ता ने कहा, हमारा शहर जिस ढंग से बना है उसमें नई सड़क या रेल लाइन बिछाने के लिए जगह खोजना चुनौती है.

हेडफ़ोन इस्तेमाल करते हैं तो ये खबर ज़रूर पढ़ें

अगर आप हेडफ़ोन (Headphone) इस्तेमाल करते हैं तो सावधान हो जाएं. बीजिंग से मेलबोर्न जा रही फ्लाइट में एक महिला यात्री हेडफ़ोन फटने से घायल हो गई. महिला के पास बैटरी-ऑपरेटेड हेडफ़ोन था, सोने से पहले उसने हेडफ़ोन बैग में रखने के बजाए गले में ही टंगा छोड़ दिया. आधी रात के वक़्त अचानक एक हल्का सा धमाका हुआ और उसका चेहरा एवं बाल झुलस गए. गनीमत इतनी रही कि headphoneमहिला को ज्यादा चोट नहीं आई. धमाके के चलते पूरे विमान में हडकंप मच गया, कुछ देर तक किसी को समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है. केबिन क्रू सदस्यों ने जब हेडफ़ोन को पानी की बाल्टी में डाला तो उसमें से आग निकल रही थी. धुएं की वजह से पूरे रास्ते यात्री परेशान रहे, कुछ लोगों को तो ऑक्सीजन मास्क भी पहनने पड़े.

पास न रखें

ऑस्ट्रेलियन ट्रांसपोर्ट सेफ्टी ब्यूरो के मुताबिक बैटरी-ऑपरेटेड डिवाइस को निर्धारित सेफ में रखना चाहिए. इतना ही नहीं यदि यात्रियों के पास अलग से कोई बैटरी है तो उसे भी अपने साथ नहीं रखना चाहिए. ब्यूरो के अनुसार पहले भी इस तरह के मामले सामने आ चुके हैं.

CHINA: कर्जदारों को प्लेन-ट्रेन में एंट्री नहीं

विजय माल्या जैसे कर्जदार अगर चीन (China) में होते तो उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता। चीन के सुप्रीम कोर्ट ने कर्ज न चुकाने वाले 70 लाख से ज्यादा लोगों के लिए ऐसा दंड मुकर्रर किया है, जिसे सुनने के बाद कर्जदारों के पैरों तले जमीन खिसक गई है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए, इसके अलावा उनके पर्सनल आईडी नंबर भी ब्लॉक किए जाएं। पर्सनल आईडी ब्लॉक किए जाने डिफॉल्टरों को तमाम नागरिक सुविधाओं से वंचित रहना पड़ेगा। उदाहरण के तौर पर वे न तो अब हवाई जहाज में सफर कर पाएंगे और न ही उन्हें हाईस्पीड ट्रेनों में जगह मिलेगी।

बनी सहमति
मालूम हो कि चीन में बैंकों या अन्य सरकारी संस्थाओं से कर्ज लेकर न चुकाने वाले लोगों को खाका 2013 में तैयार किया गया था। इसी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। चीन के सभी बड़े बैंकों सहित कुल 44 संस्थानों ने एक सहमति पत्र पर दस्तखत किए हैं जिसके अंतर्गत कर्जदारों पर कई तरह की पाबंदियां लगाई जाएंगी। इसमें हवाई एवं ट्रेन सफर के अलावा होटलों में ठहरने और किराए पर कमरा लेने को भी शामिल किया गया है।

इन महिलाओं से भिड़े तो हड्डियां टूटना तय

आमिर खान की दंगल तो आपको याद होगी फिल्म में जिस तरह फोगाट बहनें बड़े बड़े पहलवानों को धूल चटाती हैं, कुछ वैसा ही केरल की मीनाक्षी अम्मा (Amma) करती हैं। फर्क बस इतना है कि मिनाक्षी की उम्र उनसे कहीं ज्यादा है। केरल के वाटकरा में रहने वालीं 76 Meenakshiammaवर्षीय मीनाक्षी मार्शल आर्ट में अपने से आधी उम्र के पुरुषों को भी चित कर देती हैं। वे प्रचीन भारतीय मार्शल आर्ट फॉर्म कलरीपायट्टू की ट्रेनिंग देकर अपना घर चलाती हैं। पिछले दिनों उनके करतब का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ। वीडियो में वह साड़ी पहने गजब की फुर्ती से लाठी चलाती हुईं नजर आ रही हैं। अम्मा का मानना है कि लोगों को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए और इसके लिए मार्शल आर्ट जैसी कला में निपुण होना जरूरी है।

इनका भी मुकाबला नहीं
चीन निवासी 94 वर्षीय झांग हेक्सिन भी मार्शल आर्ट में माहिर हैं। इस बुजुर्ग महिला की बहादुरी के किस्से आए दिन चीनी मीडिया में सुर्खियां बटोरते रहते हैं। पहली नजर में आम महिला नजर आने वालीं हेक्सिन जब मार्शल आर्ट दिखाती हैं तो लोगों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता है। वो पलक झपकते ही बड़े बड़ों को चित कर सकती हैं। मार्शल आर्ट एक्स्पर्ट हेक्सिन को प्यार से कुंग फू ग्रैंडमा भी कहते हैं। उन्होंने चार साल की उम्र से ही मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ली थी।

चीनी बहिष्कार में जल रहे अपने भी हाथ!

सोशल मीडिया पर चीनी सामान के बहिष्कार के लिए चलाए जा रहे कैंपेन का काफी असर देखने को मिला है। दीवाली के मौके पर जहां कई दिन पहले से चीनी सामान की बिक्री आसमान छूने लगती थी, वहीं इस बार उसके खरीददारों की संख्या बेहद सीमित है। इसे देखते हुए व्यापारियों ने क्रिसमस और नए साल के ऑर्डर फिलहाल रोक रखे हैं। कैंपेन की आंशिक सफलता पर जहां इसकी शुरुआत करने वाले यह सोचकर खुशी मना सकते हैं कि वो आतंकवाद जैसे मुद्दे पर भी पाकिस्तान का समर्थन करने वाले चीन को नुकसान पहुंचाने में सफल रहे, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। इस बहिष्कार में हमारे अपने हाथ भी जल रहे हैं। चीनी कच्चे chinaमाल की असेंबलिंग पर निर्भर हजारों इकाइयों में इस वक्त चिंता का माहौल है। यदि इसी तरह चीनी माल के आयात को हतोत्साहित करना जारी रहा, तो उनका व्यवसाय पूरी तरह से ठप हो जाएगा। इन इकाइयों से जुड़ें सैंकड़ो कामगार भी अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं।

35 प्रतिशत कमी
दिल्ली इलेक्ट्रिकल्स ट्रेडर्स एसोसिएशन के मुताबिक, इस बार बिक्री में 30 से 35 प्रतिशत की कमी देखने को मिली है। दिवाली की थोक बिक्री 10 से 12 दिन पहले खत्म हो जाया करती थी, लेकिन अभी आधे से ज्यादा माल पड़ा है। इसे देखते हुए कई व्यापारियों ने क्रिसमस और न्यू ईयर के माल का ऑर्डर टाल दिया है। वो दिवाली के बाद हालात का जायजा लेकर कोई कदम उठाएंगे।

स्पष्ट करें नीति
फेडरेशन ऑफ इंडियन एमएसएमई के सेक्रेटरी जनरल अनिल भारद्वाज कहते हैं, अगर हम चीनी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं तो देसी यूनिट को सस्ती मशीनें और कच्चा माल उपलब्ध कराया जाना चाहिए। वहीं, ट्रेड संगठनों ने सरकार से चीनी सामान के आयात को लेकर नीति स्पष्ट करने की मांग की है। ताकि आने वाले त्यौहारों के लिए कारोबारी चीनी माल के प्रति अपना रुख तय कर सकें।

भारी नुकसान
पिछले साल भी चीनी सामान के बहिष्कार को लेकर अभियान छेड़ा गया था, लेकिन उसे खास तवज्जो नहीं मिली। इस साल उरी हमले के बाद देश में पैदा हुए पाक विरोधी माहौल में चीन के प्रति भी लोगों का आक्रोश खुलकर सामने आ रहा है। कई संगठनों ने चीनी सामान के बहिष्कार की अपील की थी, सोशल मीडिया पर अपील के वायरल होते ही चीनी सामान खरीदने वालों की संख्या में अचानक गिरावट दर्ज की गई। जिन व्यापारियों ने पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए इस बार भारी मात्रा में माल मंगाया था, उनके पास फिलहाल आंसू बहाने के लिए कोई और चारा नहीं है। व्यापारियों का कहना है कि दिवाली के लिए मंगाए गए सामान का एक बड़ा हिस्सा अब भी गोदाम में पड़ा है।

सिंधु संधि रद्द नहीं होगी! ये हैं कारण

उरी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच पैदा हुए तनाव के मद्देनजर सिंधु समझौते पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। देश का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि भारत इस समझौते को तत्काल प्रभाव से रद्द करे, ताकि पाकिस्तान को उसके दुस्साहस का सबक सिखाया जा सके। सरकार के भीतर भी यह आवाज अब जोर पकड़ने लगी है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने इस विषय पर संभावनाएं तलाशना शुरू कर दिया है। हालांकि यह मानना बेहद मुश्किल है कि भारत समझौता रद्द करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। यदि वे ऐसा करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का सामना तो करना ही पड़ेगा, इस बात की भी आशंका बनी रहेगी कि भविष्य में उसे जल संकट से दो चार होना पड़े।

36 फीसदी का नुकसान
सिंधु नदी का उद्गम स्थल चीन है। गौर करने वाली बात यह है कि भारत पाकिस्तान की तरह उसने जल बंटवारे पर कोई अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं की है। इस लिहाज से वह किसी भी स्तर तक जाने के लिए स्वतंत्र है। चीन कई मौकों पर यह साफ कर चुका है कि मुश्किल वक्त में वह पाकिस्तान के साथ देगा। ऐसे में यदि भारत सिंधु समझौते को रद्द करता है, तो चीन सिंधु का बहाव मोड़ने का निर्णय ले सकता है। उसे इस तरह के कामों में महारथ हासिल है। थोड़ा आगे जाकर अगर इस निर्णय के दुष्प्रभावों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि इससे भारत को नदी के 36 फीसदी पानी से हाथ धोना पड़ेगा। जो निश्चित तौर पर वो कभी नहीं चाहेगा।

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पड़ेगी दोहरी मार
बात केवल सिंधु नदी की नहीं है। पाकिस्तान को तकलीफ में देखकर यदि चीन भारत से नाराज होता है, तो मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। उत्तर पूर्वी भारत में बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल भी चीन में ही है। ब्रह्मपुत्र चीन में यारलुंग जांग्बो नाम से पहचानी जाती है। यह नदी भारत से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। ब्रह्मपुत्र के पानी पर भारत के साथ साथ बांग्लादेश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भी निर्भर है। चीन ब्रह्मपुत्र का बहाव मोड़ सकता है, बीच में ऐसी खबरें सामने आ भी चुकी हैं। चीन ने ब्रह्मपुत्र पर तकरीबन 11 बड़े बांध बनाए हैं। यदि नदी के बहाव में परिवर्तन होता है तो भारत की धरती तो सूखेगी ही, बांग्लादेश भी उसका दुश्मन बन जाएगा। यानी उसे दोहरी मार सहनी पड़ेगी।

पानी की तरह बहेगा पैसा
यदि भारत सभी आशंकाओं को नकाराते हुए सिंधु समझौते को रद्द करने का कदम उठाता है, तो भी उसे कई व्यावहारिक कठिनाइयों से गुजरना होगा। पानी रोकने के लिए कई बांध और नहरें बनानी होंगी। जिनके लिए बड़े पैमाने पर खर्चा करना होगा और समय भी काफी लगेगा। बात केवल पैसे की नहीं है, बांध बनेंगे तो विस्थापन की समस्या पैदा होगी। इतना ही नहीं पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी भारत को झेलने पड़ सकते हैं।

सिंधु का महत्व
सिंधु दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। इसकी लंबाई 3000 किलोमीटर से भी ज्यादा है, दूसरे शब्दों में कहें तो यह गंगा नदी से भी बड़ी है। सहायक नदियां चिनाब, झेलम, सतलुज, राबी और ब्यास के साथ इसका संगम पाकिस्तान में होता है। सिंधु नदी बेसिन तकरीबन साढ़े ग्यारह लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। सिंधु नदी का इलाका 11ण्2 लाख किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। ये पाकिस्तान में 47 प्रतिशत, भारत में 39 प्रतिशत, चीन में 8 प्रतिशत और अफगानिस्तान में 6 प्रतिशत है। एक अनुमान के मुताबिक 30 करोड़ लोग सिंधु नदी के आसपास के इलाकों में रहते हैं।

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क्या है सिंधु संधि
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अयूब खान के बीच 1960 में सिंधु समझौता किया गया। इसके तहत सिंधु नदी बेसिन में बहने वालीं 6 नदियों को पूर्वी और पश्चिमी दो हिस्सों में बांटा गया। पूर्वी भाग में बहने वाली नदियों सतलुज, रावी और ब्यास के पानी पर भारत का पूर्ण अधिकार है। जबकि पश्चिमी हिस्से की सिंधु, चिनाब और झेलम पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में हैं। भारत इन नदियों के पानी का केवल सीमित इस्तेमाल कर सकता है। वह इन नदियों पर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट बना सकता है, लेकिन यह ध्यान रखते हुए कि नदी का पानी रोका नहीं जाए। देश में कृषि के लिए इन नदियों के पानी का इस्तेमाल होता है।

भारत को एडवांटेज
सिंधुं समझौते में भारत के पास एडवांटेज यह है कि नदियां भारत से होते हुए पाकिस्तान पहुंचती हैं। ऐसे में वो यदि चाहे तो पानी का बहाव रोक सकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान घबराया हुआ है। पाक के दो तिहाई हिस्से में सिंधु और इसकी सहायक नदियां बहती हैं। एक अनुमान के मुताबिक, करीब उसका 65 प्रतिशत भू भाग सिंधु बेसिन पर ही है। पाकिस्तान ने बिजली बनाने के लिए इस पर कई बांध बनाए हैं। इसके अलावा खेती के लिए भी सिंधु नदी के पानी का उपयोग करता है। अगर सिंधु का बहाव रोका जाता है, तो पाकिस्तान बूंद बूंद के लिए मोहताज हो जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय दबाव
सिंधु समझौते को रद्द न करने को लेकर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी है। चूंकि यह दो देशों के बीच का मामला है, इसलिए भारत को वैश्विक मंच पर कई सवालों के जवाब देने होंगे। पाकिस्तान इसे मानवाधिकारों से जोड़कर भारत के खिलाफ माहौल तैयार करेगा। भारत की बांग्लादेश और नेपाल के साथ जो जल संधियां हैं उन पर भी प्रभाव पड़ सकता है। ये भी एक वजह है कि सरकार बात इतनी आगे नहीं बढ़ने देगी।

विकल्प तो है
पानी पर वैश्विक झगड़ों को लेकर किताब लिख चुके ब्रह्म चेल्लानी का मानना है कि भातर वियाना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के तहत इस आधार पर संधि से पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान आतंकी गुटों का इस्तेमाल उसके खिलाफ कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन होता है, तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।

इंडो-यूएस रिश्तों से पड़ोसियों को लगी मिर्ची

भारत की बढ़ती सामरिक ताकत देख पाकिस्तान और चीन को मिर्ची लगना शुरू हो गया है। दोनों इस कदर बौखला गए हैं कि indoभारत पर रिश्ते बिगाड़ने का आरोप लगा रहे हैं। पाकिस्तान अखबार डॉन कहता है, भारत अमेरिका रक्षा समझौता पाक और चीन पर असर डालेगा। अखबार के मुताबिक भारत और अमेरिका एक दूसरे के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करेंगे। लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम के बाद अमेरिकी नौसेना और वायुसेना के लिए भारत के सैन्य अड्डों से लड़ना आसान हो जाएगा। इस तरह अमेरिका भारत में भी अपना अड्डा स्थापित कर सकेगा। डॉन ने अपनी रिपोर्ट में अमेरिकी पत्रिका फोर्ब्स का हवाला दिया है। फोर्ब्स ने कुछ दिन पहले एक लेख में कहा था कि पाकिस्तान और चीन सावधान हो जाएं। भारत और अमेरिका इस हफ्ते बहुत बड़ा सैन्य समझौता करने जा रहे हैं। उर्दू चैनल समा का कहना है कि इस सौदे का असर क्षेत्रीय सामरिक संघर्ष पर पड़ेगा।

निभा रहा दुश्मनी
चीन के ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, यह समझौता दोनों देशों के लिए बेशक लंबी छलांग होगी, लेकिन इससे भारत अपनी रणनीतिक आजादी खो सकता है और अमेरिकी पिछलग्गु बनता जा रहा है। अखबार आगे कहता है, मोदी पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशों के बाद अब अपना सब्र खो चुके हैं और उन्होंने रुख बदलकर दुश्मनी वाला भाव अपना लिया है।

South China Sea: जानें क्या है विवाद

दक्षिण चीन सागर (South China Sea) पर अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले ने इस मुद्दे को एक बार फिर गर्मा दिया है। पिछले काफी वक्त से यह मामला चीन और फिलिपींस सहित कई देशों में विवाद की वजह बना हुआ है। यहां तेल की खोज को लेकर भारत और चीन भी आमने सामने आ चुके हैं। आइए समझते हैं कि आखिर यह विवाद है क्याः

  • southchinasea
    साउथ चाइना सी पर विवाद की एक बड़ी वजह इस क्षेत्र का आर्थिक महत्व भी है। दुनिया के एक तिहाई व्यापारिक जहाज इस समुद्री इलाके से गुजरते हैं। भारत की बात करें तो उसका 50 से 55 प्रतिशत समुद्री व्यापार यहीं से होता है। इसके अलावा यह माना जाता है कि यहां सागर के गर्त में तेल और गैस का अकूत भंडार है। इसके चलते दक्षिण चीन सागर का महत्व काफी बढ़ गया है।
  • दक्षिण चीन सागर प्रशांत महासागर का एक हिस्सा है। यह समुद्री इलाका सिंगापुर और मलक्का जलडमरूमध्य से लेकर ताइवन जलडमरूमध्य तक 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है।
  • इस इलाके में कई द्वीप हैं जिन पर चीन सहित कई देश अधिकार जता रहे हैं। खासकर स्प्रातली और पारासेल नामक दो बड़े द्वीपसमूह विवाद का मुख्य कारण हैं। चीन इन्हें अपना बताता है, जबकि फिलीपींस आदि देशों का कहना है कि ये उनके अधिकार क्षेत्र में आते हैं। पारासेल द्वीपसमूह पर 1974 तक चीन और वियतनाम का कब्जा था। दक्षिण वियतनाम और चीन के बीच हुई झड़प में चीन के सैनिक मारे जाने के बाद उसने पूरे द्वीपसमूह पर कब्जा जमा लिया।
  • स्प्रातली द्वीपसमूह पर चीन, वियतनाम, मलेशिया, फिलीपींस औ बुनेई काफी वक्त से लड़ रहे हैं। चीन पूरे इलाके पर एकछत्र राज चाहता है ताकि तेल और गैस की संभावनाओं के हकीकत में तब्दील होते ही वो उसका अकेला मालिक बन जाए।