Gujarat: इस जीत में छिपी हैं चिंताएं!

गुजरात (Gujarat) में भाजपा ने लगातार छठवीं बार सत्ता पर कब्ज़ा ज़रूर कर लिए है, लेकिन इस जीत में कई चिंताएं भी छुपी हैं. जिस तरह के प्रचंड बहुमत की उम्मीद नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह कर रहे थे, वोट का आंकड़ा उससे काफी दूर रहा. भाजपा यहां 100 के फेर में ही उलझ गई, जबकि पिछली बार यानी 2012 के विधानसभा चुनाव में उसने 115 सीटें हासिल की थी. इस बात में कोई दोराय नहीं कि जो जीता, वही सिकंदर, लेकिन गिरता वोट प्रतिशत कहीं न कहीं दर्शाता है कि गुजरात की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के कामकाज से खुश नहीं था. जहाँ तक बात हिमाचल की है, तो वहां नरेंद्र मोदी लहर पूरी तरह नज़र आई. राज्य की जनता ने कांग्रेस को काफी गंभीर चोटें दी हैं. हिमाचल में एक तरह से यह साफ़ हो गया था कि जनता सत्ता परिवर्तन चाहती है. क्योंकि कांग्रेस उसकी उम्मीदों के अनुरूप शासन देने में नाकाम रही. पार्टी नेता जनता की सुध लेने के बजाए अपने लड़ाई-झगड़े सुलझाने में ही लगे रहे.

फायदे में कांग्रेस
गुजरात के नतीजे भाजपा के पक्ष में ज़रूर हैं, मगर कांग्रेस राज्य में मज़बूत होती दिखाई दे रही है. अगर पिछले चुनाव से तुलना की जाए, तो पार्टी का रिकॉर्ड सुधरा है. 2012 में कांग्रेस को 61 सीटें मिलीं थीं और इस बार वो 80 के आंकड़े को पार कर गई है. उसे 20 से ज्यादा सीटों का फायदा मिला है. सौराष्ट्र में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा हुआ है. जबकि भाजपा को अपने गढ़ में उम्मीद माफिक परिणाम नहीं मिले हैं. इसके अलावा पटेल बहुल इलाकों में भी भाजपा को नुकसान झेलना पड़ा है.

भाजपा को नुकसान
गुजरात भाजपा को इस बार सीधे तौर पर 19 से 20 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है. 182 सीटों वाले राज्य में 20 सीटों पर हार काफी मायने रखती है. हालांकि इसके पीछे हार्दिक पटेल फैक्टर ने भी काम किया है. भाजपा यदि पटेल को अपने पाले में करने में कामयाब रहती तो जिस प्रचंड जीत के दावे पीएम मोदी और शाह कर रहे थे उसे हासिल किया जा सकता था.

नहीं संभले तो….
गुजरात के नतीजे इशारा कर रहे हैं कि लोगों में भाजपा को लेकर सोच बदल रही है. आलाकमान को ख़ुशी मानाने के साथ ही मंथन भी करना होगा, अन्यथा आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है. भाजपा की जीत के एक बड़ी वजह यह भी रही कि लोग राहुल गांधी को उतना परिपक्व नहीं मानते हैं. कांग्रेस पर भरोसा करने के उनके पास वाजिब कारण नहीं हैं. ये स्थिति काफी हद तक बिल्कुल वैसी ही है, जैसी 2014 से पहले भाजपा की थी. लेकिन समय बदला और भाजपा ने सारे समीकरण बदल दिए. इसलिए भाजपा को भी इसी नज़रिए से सोचना होगा.

Gujarat: विकास पर क्यों खामोश रहे मोदी?

अपने हर भाषण में विकास की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Gujarat चुनाव में विकास से बचते नजर आए. अपनी चुनावी रैलियों में उनका पूरा जोर कांग्रेस खासकर राहुल गांधी की कमजोरियों को रेखांकित करने पर ही केन्द्रित रहा. मोदी में आए इस बदलाव से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गुजरात में इस बार भाजपा को नुकसान होने जा रहा है. कांग्रेस नेता मणिशंकर के “नीच” वाले बयान के बाद जिस तरह से मोदी ने अपने लिए इस्तेमाल हुए शब्दों की दुहाई दी और जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के तार पाकिस्तान से जोड़े, उससे इन कयासों को बल मिलता है. जीएसटी आदि कई ऐसे मुद्दे रहे जिन्होंने गुजरात में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया और हार्दिक पटेल ने इस हवा की गति बढ़ाने का काम किया. बावजूद इसके भाजपा का पलड़ा कुछ हद तक भारी समझा जा रहा था, लेकिन पार्टी नेता और खासकर नरेंद्र मोदी के हावभाव देखकर अब यह लगने लगा है कि कांग्रेस की वर्षों की मुराद पूरी हो सकती है.

नयापन नदारद
गुजरात में मोदी के भाषण कांग्रेस की बुराई और राष्ट्रवाद, सेना, चीन, पाकिस्तान, भ्रष्टाचार और गुजराती अस्मिता के इर्द-गिर्द रहे. उन्होंने गुजरात में विकास की बात छेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और न ही बेरोजगारी, निवेश में कमी, लघु एवं मध्यम उपक्रमों की बर्बादी, स्थिर निर्यात एवं मूल्यवृद्धि जैसे मुद्दों पर बात की. कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा बार-बार विकास पर बात करने की चुनौती को भी मोदी ने नहीं स्वीकारा. मोदी के भाषण इस बार पारंपरिक राजनीति तक ही सिमटकर रह गए, उनमें कुछ नयापन नजर नहीं आया. उन्होंने खुद को गुजरात के बेटे के रूप में प्रोजेक्ट कर भावनात्मक आधार पर वोट मांगे. राजनीति का यह अंदाज़ 2014 के नरेंद्र मोदी के अंदाज़ से बिल्कुल अलग है. जो कहीं न कहीं यही इशारा करता है कि गुजरात के लिए भाजपा के पास कोई विकास मॉडल नहीं है.

बदली रणनीति
मोदी यह समझ गए हैं कि इस बार समीकरण अलग हैं. अच्छे दिनों के जो सपने उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान दिखाए थे, वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं. इसलिए विकास की बातों से बात बनने वाली नहीं है. शुरुआती मौकों पर जब स्वयं मोदी और अमित शाह की सभाओं से भीड़ कम होती चली गई और रैलियों में भाजपा के खिलाफ हुटिंग हुई, तभी पार्टी ने अपनी रणनीति को जाति-धर्म से जोड़ दिया. कभी अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, तो कभी राहुल गांधी के धर्म का. हालांकि सभाओं में पहले जैसी भीड़ फिर भी न खिंच सकी. हालांकि जनता का फैसला आना अभी बाकी है, इसके बात ही तय होगा कि उसे भाजपा पसंद है या कांग्रेस.

बदलते गए नारे
अगर 2007 से अब तक की बात करें, जो 2017 के चुनाव में भाजपा किसी खास स्लोगन के साथ मैदान में नहीं आई है.

  • 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी का मुख्य नारा था आतंकवाद विरुद्ध राष्ट्रवाद. ये चुनाव गुजरात दंगों के कुछ महीने बाद ही हुए थे. सांप्रदायिक हिंसा के साये में एक भव्य गौरव यात्रा का आयोजन किया गया था, जिसमें गुजरात की गरिमा और सम्मान को चुनाव का केंद्र बिंदु बनाया गया था.
  • 2007 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ‘जीतेगा गुजरात’ नाम से स्लोगन जारी किया था. इस चुनाव में विकास के प्रति झुकाव देखा गया. कांग्रेस के लिए सोनिया गांधी का मौत के सौदागर वाला बयान नुकसानदायक साबित हुआ था.
  • 2012 में भाजपा ने एकमत गुजरात का नारा केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार की तरफ से गुजरात की गई अनदेखी के खिलाफ एकजुट होने के लिए बनाया गया।
क्या मनमोहन काल में लिखी गई थी बाबा के जेल जाने की कहानी?

राम रहीम को सजा सुनाए जाने के बाद, जहां इसका क्रेडिट लेने की अप्रत्यक्ष जंग चल रही है वहीं पूर्व सीबीआई अधिकारी के खुलासे ने कांग्रेस को खुश होने का एक मौका दिया है. तत्कालीन जांच अधिकारी एम. नारायणन का कहना है कि डेरा प्रमुख के खिलाफ जांच करते समय उन्हें पूर्व प्रधनामंत्री मनमोहन सिंह का पूरा सहयोग मिला, जिसके बिना आगे बढ़ना संभव नहीं था. नारायणन के मुताबिक, हरियाणा और पंजाब के नेताओं द्वारा राम रहीम के प्रति नरमी बरतने का दबाव डाला जा रहा था. इस बारे में जब मनमोहन सिंह से बात की, तो उन्होंने राजनीतिक दबाव को दरकिनार करते हुए सीबीआई को काम करने की पूरी आज़ादी दी.

नारायणन कहते हैं, मामला 2002 में एक गुमनाम चिट्टी के ज़रिये सामने आया, लेकिन 2007 तक कोई कार्रवाई नहीं की गई. इसके बाद हरियाणा-पंजाब हाईकोर्ट ने तत्कालीन सीबीआई चीफ विजय शंकर को तलब करके 57 दिनों में जांच पूरी करने के निर्देश दिए. बकौल नारायणन यह काम इतना आसान नहीं थी. जब हम जांच करने पहुंचे तो पता लगा कि 1999 से 2002 के बीच 200 से ज्यादा यौन उत्पीड़न की शिकार साध्वियां डेरा छोड़कर चली गईं थीं. भरपूर कोशिशों के बावजूद हम 10 साध्वियों तक पहुंचने में कामयाब रहे, लेकिन सबकी शादी हो चुकी थी और कोई भी आगे आना नहीं चाहती थी. किसी तरह हमने दो साध्वियों को रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए राजी किया और 56वें दिन अदालत में चार्जशीट दाखिल हो सकी.

2009 में रिटायर्ड हुए नारायणन का कहना है कि रणजीत सिंह बाबा का समर्पित सेवादार था, पर जब उसे अपनी बहन के साथ बलात्कार के बारे में पता चला तो वो बहन को लेकर सिरसा से दूर चला गया. इसके कुछ दिनों बाद ही बाबा से जुड़ी एक गुमनाम चिट्टी प्रधानमंत्री और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट पहुंची. बाबा के समर्थकों को शक था कि इस चिट्टी के पीछे रंजीत का हाथ है, जिसके चलते उसकी हत्या करवा दी गई. ये साबित हो चुका है कि जिस रिवाल्वर से रंजीत ही हत्या हुई, वो डेरा के मैनेजर की ही थी. इसके अलावा अपराध स्थल पर डेरा का वॉकी-टॉकी भी मिला था.

रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं. उनके नाम की चर्चा उनकी काबिलियत से ज्यादा इस बात को लेकर थी कि वो दलित हैं. भाजपा की देखादेखी कांग्रेस ने भी दलित कार्ड खेलते हुए मीरा कुमार को मैदान में उतारा था, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली. कोविंद की जीत पर उनके गांव और दलित समुदाय में ख़ुशी की लहर है, लेकिन क्या यह ख़ुशी किसी तरह के लाभ में परिवर्तित हो सकती है? हमारे संविधान में राष्ट्रपति को जो अधिकार प्राप्त हैं, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि दलित राष्ट्रपति से दलितों का कुछ भला होने वाला नहीं है. हां, इतना ज़रूर है कि इससे भाजपा के दलित वोट बैंक में इजाफा ज़रूर हो सकता है.

संविधान के अनुसार राष्ट्रपति केवल सरकार को मशविरा दे सकते हैं और पुनर्विचार के लिए कह सकते हैं, अगर सरकार इंकार कर दे तो उनके पास सहमति देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह जाता. देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद इस पीड़ा को समझते थे. उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि हमें आंख बंद करके ब्रिटेन के पदचिन्हों पर नहीं चलना चाहिए, राष्ट्रपति के अपने कुछ अधिकार होने चाहिए. उस दौर में जवाहरलाल नेहरु और प्रसाद के बीच मतभेद जगजाहिर थे, नेहरू ने राजेन्द्र प्रसाद के 10 साल के कार्यकाल में उनकी कोई बात नहीं मानी.

वैसे भी ज्यादा सलाह-मशविरा देने वाले राष्ट्रपति सरकार को पसंद नहीं आते. अब्दुल कलाम तकरीबन हर बिल पर सरकार को सलाह देते थे. इसी वजह से बेहद लोकप्रिय होने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें दूसरी बार रायसीना हिल्स भेजना मुनासिव नहीं समझा. उनकी जगह कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बना दिया. हमारे राष्ट्रपति की स्थिति इंग्लैंड की महारानी जैसी होती है, जिसके पास कोई ख़ास अधिकार नहीं होते. लिहाजा राष्ट्रपति की कुर्सी पर चाहे दलित बैठे या कोई और होगा वही जो सरकार चाहेगी.

क्या अमित शाह का गणित कमज़ोर है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्राओं को लेकर खासे चर्चा में रहते हैं. एक दौरा ख़त्म होता नहीं कि दूसरे की तैयारी हो जाती है. 2014 में पद संभालने के बाद से मोदी 56 विदेश यात्राएं कर चुके हैं. जिस रफ़्तार से मोदी विदेशों की सैर कर रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि कार्यकाल ख़त्म होते-होते वो इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को काफी पीछे छोड़ देंगे. हालांकि, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को लगता है कि मोदी ने मनमोहन सिंह के मुकाबले कम विदेश यात्राएं की हैं. अब शाह ने किस गणित के आधार पर यह बयान दिया समझना मुश्किल है, क्योंकि आंकडें को कुछ और ही हकीकत बयां कर रहे हैं.

विदेश मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, मोदी ने 3 सालों में 56 विदेशी दौरे किए हैं और कुल 132 विदेशों में गुज़ारे हैं. अब मनमोहन सिंह की बात करें तो अपने 10 सालों के कार्यकाल में उन्होंने 80 विदेश यात्राएं की और 305 विदेशों में रहें. इस हिसाब से देखा जाए तो पूर्व प्रधानमंत्री ने हर साल औसतन 8 विदेशी दौरे किए, जबकि मोदी ने 18. अब सोचने वाली बात यह है कि संख्या में 8 बड़ा होता या 18?

सेंचुरी तय
अमित शाह शायद पीएम मोदी के तीन सालों की तुलना मनमोहन सिंह के 10 सालों के कार्यकाल से कर रहे हैं. अगर ऐसा है भी तो, आने वाले 2 सालों में नरेंद्र मोदी विदेश यात्राओं की सेंचुरी पूरी अवश्य कर लेंगे, क्योंकि उनकी रफ़्तार पहले से ही काफी तेज़ है.

Knowledge Booster: ऐसे चुने जाते हैं राष्ट्रपति

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राष्ट्रपति चुनाव (Election of President) के लिए भाजपा और कांग्रेस समर्थन जुटाने में लगे हैं. मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 24 जुलाई को ख़त्म होने जा रहा है. वहीं उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कार्यकाल 10 अगस्त को समाप्त होगा. भारत में राष्ट्रपति चुनाव अमेरिका जैसे देशों से बिल्कुल अलग है. वहां जनता अपने राष्ट्रपति का चुनाव करती है और यहां जनता के प्रतिनिधि उस दायित्व को निभाते हैं. आइए इस चुनाव प्रक्रिया को विस्तार से समझते हैं:

राष्ट्रपति चुनाव निर्वाचन मंडल (इलेक्टोरल कॉलेज) द्वारा किया जाता है. सभी विधानसभाओं के चुने गए सदस्य और लोकसभा एवं राज्यसभा के सांसद चुनाव में वोट डालते हैं. हालांकि जिन सांसदों को राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जाता है उन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं होता. ऐसे ही विधान परिषद् के सदस्य भी इस चुनाव में मताधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते.

राष्ट्रपति चुनाव के लिए विशेष तरीके से वोटिंग होती है. इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम कहा जाता है. यानी एक वोटर केवल एक ही वोट दे सकता है, लेकिन वह उमीदवारों के लिए अपनी वरीयता तय कर सकता है. जैसे वो बैलेट पेपर पर यह बता सकता है कि उसकी पहली, दूसरी या तीसरी पसंद कौन है. सांसद और विधायकों के वोट का वेटेज अलग-अलग होता है. इसी तरह दो राज्यों के विधायकों के वोटों के वेटज भी भिन्न होगा, यह राज्य की जनसंख्या पर निर्भर करता है.

कैसे निकलता है वेटेज
सांसद
सांसदों के वोट का वेटेज निकालने के लिए सबसे पहले सभी विधानसभाओं के चुने गए सदस्यों के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है. फिर योग को लोकसभा और राज्यसभा सांसदों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है. इस तरह जो परिणाम आता है वो एक सांसद के वोट का वेटेज होता है.

विधायक
इसके लिए संबंधित राज्य की जनसंख्या को चुने गए विधायकों की संख्या से भाग दिया जाता है. जो अंक मिलता है उसे फिर 1000 से भाग देकर एक विधायक के वोट का वेटेज निकाला जाता है.

बाकी चुनावों की तरह इस चुनाव में सबसे ज्यादा मत ही जीत तय नहीं करते. राष्ट्रपति वही बनता है, जो सांसदों एवं विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का आधा से ज्यादा हिस्सा हासिल करे. मौजूदा निर्वाचन मंडल के सदस्यों के वोटों का कुल वेटेज 10,98,882 है. इस लिहाज से जीत के लिए उम्मीदवार को 5,49,442 वोट प्राप्त करने होंगे.

राष्ट्र विरोधी ‘आधार’ आज राष्ट्रहित बन गया है!

सरकार ने आधार कार्ड को पैन से लिंक करवाना अनिवार्य किया है, बैंक खातों के संबंध में भी ये बात लागू होती है. इसके अलावा सरकार कुछ दूसरी योजनाओं को भी इस दायरे में लाने पर गंभीरता से विचार कर रही है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि कुछ वक़्त पहले तक यही आधार कार्ड देश की सुरक्षा के लिए खतरा था. विपक्ष में रहने के दौरान भाजपा और नरेंद्र मोदी ने केवल आधार ही नहीं यूपीए सरकार के कई फैसलों पर सवाल खड़े किए थे, और आज उन्ही को अमल में लाकर वाहवाही लूट रहे हैं. ऐसे में सवाल उठाना लाजमी है कि पार्टी विद डिफ़रेंस का नारा देने वाली भाजपा दूसरों से अलग कैसे है? अपने अब तक के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई पॉलिटिकल यू-टर्न लेकर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कल तक जो फैसले दोषपूर्ण, तर्कहीन, और जनविरोधी थे, वो आज एकदम से त्रुटीरहित, तर्कसंगत, और जनहितैषी कैसे हो गए?

आधार कार्ड (AADHAAR)
तब: आधार कार्ड शुरू से भाजपा के निशाने पर रहा था. आधार कार्ड के माध्यम से गैस सब्सिडी बैंक खाते में जमा कराने का पार्टी ने जबर्दस्त विरोध किया था. 30 जनवरी को दिए अपने एक बयान में भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने कहा था, “आधार का कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि इसे संसद ने नहीं बनाया. सरकारी योजनाओं का लाभ देने के लिए विशिष्ट पहचान संख्या को अनिवार्य नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सवाल उठाया है.” इसी तरह चुनाव के दौरान पार्टी नेता अनंत कुमार ने कहा था, “आधार कार्ड बंद किया जाएगा.”

और अब: सरकार आधार कार्ड को बढ़ावा दे रही है. टैक्स रिटर्न फाइल करने के लिए आधार को पैन कार्ड से लिंक करना अनिवार्य किया गया है. इसके अलावा कई और योजनाओं के लिए भी इसे ज़रूरी किया जा रहा है. गैस सब्सिडी भी सीधे बैंक खाते में ही जमा हो रही है.

एफडीआई (FDI)
तब: भाजपा ने बाकी दलों के साथ मिलकर एफडीआई का कड़ा विरोध किया था. नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कांग्रेस देश को विदेशियों के हाथों में सौंप रही है. पार्टी ने 2012 में इस मुद्दे पर सरकार को पीछे धकेलने के लिए महाबंद भी बुलाया था. उस दौरान नितिन गडकरी ने कहा था, “ ये एक शुरुआत है हम तब तक संघर्ष करेंगे जब तक सरकार कदम वापस नहीं खींच लेती.”

और अब: सरकार का कहना है कि एफडीआई से विकास के रस्ते खुलेंगे. प्रधानमंत्री का कहना है कि भारत अब दुनिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए सबसे खुली अर्थव्यवस्था है. मोदी अब 49  प्रतिशत के कैप को भी भूल चुके हैं.

नोटबंदी (Demonetization)
तब: मोदी सरकार नोटबंदी को कालेधन के खिलाफ अपनी सबसे बड़ी जीत करार देती नहीं थक रही है, लेकिन यूपीए सरकार ने जब ऐसा ही कुछ करने का प्रयास किया था तो भाजपा को रास नहीं आया था. आरबीआई ने जब तक 2005 से पहले के नोट बंद करने की बात कही थी, तो भाजपा ने इसे गरीब विरोधी कदम बताते हुए कहा था कि इसका कालेधन से कोई लेना देना नहीं है. उस वक़्त भाजपा प्रवक्ता रहीं मिनाक्षी लेखी ने कहा था, “यह काले धन के मुद्दे से ध्यान हटाने की साजिश है. सरकार गरीब और ऐसे लोगों को निशाना बना रही है जिनके पास बैंक खाता नहीं है.”

और अब: 1000 और 500 ने नोटों को चलन से बाहर कर दिया गया है. मोदी और भाजपा का कहना है कि इस कदम ने कालाधन जमा करने वालों के साथ-साथ टेरर फंडिंग पर भी चोट की है. पार्टी के जो नेता पहले नोटबंदी शब्द सुनते ही हल्ला करने लगते थे अब वही इसे देशहित करार देने में लगे हैं.

कालाधन (Black Money)
तब: भाजपा कालेधन को लेकर अपने बड़े-बड़े वायदों के बल पर सत्ता में आई. चुनावी रैलियों में पार्टी की तरफ से कहा गया कि सरकार  बनने के 100 दिनों के भीतर कालाधन वापस लेकर आएंगे. इतना ही नहीं विपक्ष में रहते हुए मोदी ने कालेधन वालों के नाम उजागर न करने को लेकर यूपीए सरकार की मंशा पर शक जाहिर किया था.

और अब: सत्ता में आते ही भाजपा 100 दिन संबंधी वायदे को भूल गई, ये कहना ज्यादा बेहतर होगा कि उसने ऐसे किसी वायदे से ही इंकार कर दिया. इसके अलावा नाम उजागर करने को लेकर भी सरकार यूपीए की रह पर है. भाजपा सरकार ने भी कालेधन वालों के नाम बताने से इंकार कर दिया है.

भूमि सौदा (Land swipe deal)
तब: जब यूपीए सरकार ने बांग्लादेश के साथ ज़मीनों की अदला-बदली पर बात आगे बढ़ाई थी, तो भाजपा ने ममता बनर्जी के साथ मिलकर खूब हंगामा मचाया था. लेकिन सरकार बनते ही भाजपा और मोदी को इस सौदे में अच्छाई नज़र आने लगी.

और अब: सरकार इसे ऐतिहासिक समझौता करार दे रही है. मोदी ने 6 जून के अपने ट्वीट में कहा, “भूमि समझौते को मंजूरी प्रदान करने के दस्तावेजों के आदान-प्रदान से इतिहास रच गया है.”

रेल किराया (Rail fare hike)
तब: यूपीए सरकार के कार्यकाल में रेल यात्री किराए में हर बढ़ोत्तरी का भाजपा ने जमकर विरोध किया. उस दौरान उसे ऐसे तर्क तर्कहीन लगते थे कि रेलवे को पटरी पर लाने के लिए किराया बढ़ाना ज़रूरी है. तब सरकार द्वारा किराए में 2 रुपए के इजाफे का भाजपा ने रेल रोको आंदोलन चलाकर विरोध जताया था.

और अब:  सरकार में आते ही मोदी सरकार ने रेल यात्री और भाड़ा दोनों किरायों में वृद्धि कर दी. इस पर सफाई देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था, “रेलवे तभी जीवित रह सकती है जब यात्री मिलने वाली  सुविधाओं के लिए भुगतान करें, ये कठिन लेकिन सही फैसला है.” प्रत्यक्ष तौर पर ही नहीं सरकार ने पिछले दरवाज़ों से भी यात्रियों की जेब ढीली करने के कई उपाय निकाल लिए हैं. प्रीमियम तत्काल के नाम पर रेलवे यात्रियों से जमकर वसूली कर रहा है.

सार: अगर आप किसी विषय की इस हद तक खिलाफत करते हैं कि वो आपकी नज़र में राष्ट्र विरोधी बन जाता है, तो फिर आप खुद उसकी हिमायत कैसे कर सकते हैं?
“If you oppose something how can you defend it”

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.

कल के दुश्मन आज दोस्त बन गए

राजनीति में दोस्ती-दुश्मनी भी नफे-नुकसान के आधार पर होती है. कल तक नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में थे तो कैप्टन अमरिंदर सिंह उनके सबसे बड़े दुश्मन थे, लेकिन आज वही उनके सबसे अज़ीज हो गए हैं. शपथ ग्रहण समारोह में सिद्धू ने सार्वजानिक रूप से कैप्टन के पैर छूकर यह साबित भी कर दिया. सिद्धू अब आम विधायक नहीं हैं वो मंत्री बन गए हैं, हालांकि उनका सपना डिप्टी सीएम बनने का था. वो ये बखूबी जानते हैं कि इस जीत के बाद कांग्रेस में कैप्टन का कद कहीं गुना ज्यादा बढ़ गया है और उनकी अनदेखी करके वो सरकार का हिस्सा बने नहीं रह पाएंगे. यही वजह है कि सिद्धू ने कैप्टन के पैर छूकर यह संदेश दे दिया कि वो अब कोई मनमुटाव नहीं रखना चाहते.

siddhuपुरानी तल्खी
सिद्धू और कैप्टन के रिश्ते काफी पहले से तल्ख़ रहे हैं. भाजपा का दामन छोड़ने के बाद आम आदमी पार्टी में जाने के कयासों के बीच जब सिद्धू ने कांग्रेस में विकल्प तलाशा तो कैप्टन ने इसका पुरजोर विरोध किया था. पंजाब कांग्रेस से जुड़े कुछ नेता इस बात को स्वीकारते हैं कि कैप्टन ने आलाकमान से सिद्धू को टिकट न देने की सिफारिश की थी. इतना ही नहीं उन्होंने राहुल गांधी को यह भी समझाने की कोशिश की थी कि सिद्धू को पार्टी में लाना फायदे के बजाए घाटे का सौदा हो सकता है, मगर राहुल ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया.

बंद करो लड़ाई
कांग्रेस से टिकट पक्का होने के बाद भी नवजोत सिंह सिद्धू कैप्टन पर तीर दागते रहे. एक सभा में उन्होंने कहा था कि “एक अकेला भी भाड़ फोड़ सकता है”, ये बयान कैप्टन के बयान का जवाब था. भाजपा में रहने के दौरन तो इस पूर्व क्रिकेटर ने कैप्टन पर कई आरोप लगाए थे. सूत्र बताते हैं कि चुनाव परिणाम सामने आने के बाद आलाकमान की तरफ से कैप्टन और सिद्धू को यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि पुरानी लड़ाई भुलाकर काम करें. हालांकि अब देखने वाली बात यह होगी कि नफे-नुकसान पर टिकी यह दोस्ती कितने दिन चल पाती है.

Punjab: हारकर भी जीत गई आप

Punjab is still new hope for Aam Aadmi Party.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अगर सबसे ज्यादा कुछ आश्चर्यजनक रहा, तो वो पंजाब और गोवा के नतीजे. दोनों ही राज्यों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे थे, लेकिन परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे. इस हार के बाद केजरीवाल की रणनीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं, इस बात पर चर्चा की जा रही है कि क्या आप का राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दस्तक देने का सपना टूट गया है? अगर हम उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा के जबरदस्त प्रदर्शन से बाहर निकलकर सोचने का प्रयास करें तो इस सवाल का जवाब निश्चित तौर पर ना punjabहोगा. ये बात सही है कि पार्टी को पंजाब में हार का सामना करना पड़ा और गोवा में वो खाता खोलने में भी असफल रही, लेकिन क्या इस तरह की चर्चाओं और टिप्पणियों से पहले आप के राजनीतिक अनुभव पर नज़र नहीं डालनी चाहिए? भाजपा या कांग्रेस से तुलना की जाए तो आम आदमी पार्टी उस युवा की तरह है, जो बचपन से निकलकर जवानी में कदम रख रहा है. और ऐसा युवा अगर धुरंधरों के सामने कुछ देर भी अपने कदम ज़माए रख पता है तो उसके भविष्य को लेकर सवाल खड़े नहीं किए जाते बल्कि संभावनाएं व्यक्त की जाती हैं. आप ने पहली बार दिल्ली से बाहर निकलकर पंजाब और गोवा में अपनी किस्मत आजमाई, पंजाब में उसे भाजपा और कांग्रेस के अलावा अकाली दल के वोट भी काटने थे. ये सभी पार्टियां सत्ता की राजनीति में लंबा अनुभव रखती हैं, इसलिए आम आदमी पार्टी ने जब अपने चुनावी अभियान को यहां से आगे बढ़ाने का ऐलान किया तो किसी के माथे पर ज्यादा सिलवटें देखने को नहीं मिलीं. अधिकतर नेता यह मानते रहे हैं कि सोशल मीडिया पर लड़ाई लड़ने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली के बाहर अपनी छाप नहीं छोड़ सकती. लेकिन जब आप की सभाओं में भीड़ जुटने लगी, केजरीवाल को सुनने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचने लगे तो सिसायत के मंझे हुए खिलाड़ियों के होश उड़ना शुरू हो गए. यहीं से एक हवा बनना शुरू हुई कि आम आदमी पार्टी पंजाब में झाड़ू लगा सकती है. केवल केजरीवाल या आप कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि विरोधी दलों को भी अपनी हार की आशंका होने लगी थी.

भाजपा को मात

हालांकि परिणाम कुछ और रहे, मगर फिर भी आप अप्रत्यक्ष तौर पर उस भाजपा को मात देने में कामयाब रही, जिसने मोदी लहर पर सवार होकर यूपी और उत्तराखंड में न सिर्फ भगवा झंडा फहराया बल्कि कई रिकॉर्ड भी ध्वस्त कर दिए. बादल की काली छाया भी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को अपने आगोश में नहीं ले सकी. पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं, उसमें आम आदमी पार्टी ने 20 पर जीत हासिल की, जबकि को भाजपा को महज 3 सीटों पैर जीत मिली और उसकी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल महज 15 पर सिमट गई. कांग्रेस को सबसे ज्यादा 77 सीटें मिलीं. अब यदि 2012 के चुनाव परिणाम देखें तो अकाली दल को 56 और भाजपा को 12 पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस के 46 उम्मीदवार ही जीत पाए थे. आम आदमी पार्टी ने पहली बार पहली बार चुनाव लड़ा और सत्ताधारी पार्टियों से ज्यादा वोट प्रतिशत प्राप्त किया, क्या ये किसी जीत से कम है? क्या इसका सीधा सा मतलब ये नहीं है कि जनता भाजपा और अकाली दल के स्थान पर आम आदमी पार्टी को देखना चाहती है?

punjabबस एक चूक

पंजाब में आम आदमी के प्रदर्शन को निराशाजनक नहीं बल्कि उम्मीदों के अनुरूप न होना कहा जा सकता है. पार्टी यहां जनता के सामने एक मजबूत स्थानीय नेतृत्व रखने में चूक गई, और यही शायद उसके कम वोटों का कारण रहा. भगवंत मान और एचएस फुल्का से पार्टी को भले ही फायदा मिला हो, लेकिन यह स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरा साबित नहीं हो सकते थे. इसके अलावा केजरीवाल का पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की अफवाह ने भी पार्टी के खिलाफ काम किया. इससे आप आयात किए हुए नेताओं की पार्टी महसूस होने लगी. लोगों को लगने लगा कि बिना पंजाब को जाने-समझे कोई व्यक्ति कैसे राज्य की बागडोर संभाल सकता है? इसलिए अमरिंदर सिंह की छवि केजरीवाल पर भारी पड़ी. यदि आप मजबूत स्थानीय नेतृत्व पेश करती तो निश्चित तौर पर उसकी झोली में ज्यादा सीटें आतीं.

अब भी मौका

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी चुनाव ज़रूर हारी है, लेकिन विपक्ष की कुर्सी पर उसी का कब्ज़ा है. अगर वो अपनी इस भूमिका को सही ढंग से निभा पाती है, तो अगले चुनाव तक वो जनता के बीच खुद को अच्छी तरह से स्थापित करने में कामयाब होगी. जिन मुद्दों को पार्टी ने चुनाव के दौरान उठाया था उन्हें अब वो विधानसभा में उठा सकती है. यह सब जानते हैं कि अमरिंदर सिंह को लगभग खाली खजाने से जनता की उम्मीदों को पूरा करना होगा, ऐसे में आम आदमी पार्टी को कई मौके मिलेंगे जब वो खुद को बेहतर साबित कर सकती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो आप ने पंजाब में हार कर भी काफी कुछ पाया है, ज़रूरत है उसे समझने और आगे की तैयारी करने की. जहां तक बात गोवा की है तो परिणाम दुःख देने वाले हैं, लेकिन पार्टी का ये पहला प्रयोग था और प्रयोग सफल – असफल होते रहते हैं.