Is the Modi Government scared?

MODI सरकार के कुछ हालिया फैसले बताते हैं कि अब उसे आर्थिक सुधारों के नाम पर जनता पर बोझ डालने से डर लगने लगा है. देखें Video:

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.

Punjab: हारकर भी जीत गई आप

Punjab is still new hope for Aam Aadmi Party.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अगर सबसे ज्यादा कुछ आश्चर्यजनक रहा, तो वो पंजाब और गोवा के नतीजे. दोनों ही राज्यों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे थे, लेकिन परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहे. इस हार के बाद केजरीवाल की रणनीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं, इस बात पर चर्चा की जा रही है कि क्या आप का राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दस्तक देने का सपना टूट गया है? अगर हम उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा के जबरदस्त प्रदर्शन से बाहर निकलकर सोचने का प्रयास करें तो इस सवाल का जवाब निश्चित तौर पर ना punjabहोगा. ये बात सही है कि पार्टी को पंजाब में हार का सामना करना पड़ा और गोवा में वो खाता खोलने में भी असफल रही, लेकिन क्या इस तरह की चर्चाओं और टिप्पणियों से पहले आप के राजनीतिक अनुभव पर नज़र नहीं डालनी चाहिए? भाजपा या कांग्रेस से तुलना की जाए तो आम आदमी पार्टी उस युवा की तरह है, जो बचपन से निकलकर जवानी में कदम रख रहा है. और ऐसा युवा अगर धुरंधरों के सामने कुछ देर भी अपने कदम ज़माए रख पता है तो उसके भविष्य को लेकर सवाल खड़े नहीं किए जाते बल्कि संभावनाएं व्यक्त की जाती हैं. आप ने पहली बार दिल्ली से बाहर निकलकर पंजाब और गोवा में अपनी किस्मत आजमाई, पंजाब में उसे भाजपा और कांग्रेस के अलावा अकाली दल के वोट भी काटने थे. ये सभी पार्टियां सत्ता की राजनीति में लंबा अनुभव रखती हैं, इसलिए आम आदमी पार्टी ने जब अपने चुनावी अभियान को यहां से आगे बढ़ाने का ऐलान किया तो किसी के माथे पर ज्यादा सिलवटें देखने को नहीं मिलीं. अधिकतर नेता यह मानते रहे हैं कि सोशल मीडिया पर लड़ाई लड़ने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली के बाहर अपनी छाप नहीं छोड़ सकती. लेकिन जब आप की सभाओं में भीड़ जुटने लगी, केजरीवाल को सुनने के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचने लगे तो सिसायत के मंझे हुए खिलाड़ियों के होश उड़ना शुरू हो गए. यहीं से एक हवा बनना शुरू हुई कि आम आदमी पार्टी पंजाब में झाड़ू लगा सकती है. केवल केजरीवाल या आप कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि विरोधी दलों को भी अपनी हार की आशंका होने लगी थी.

भाजपा को मात

हालांकि परिणाम कुछ और रहे, मगर फिर भी आप अप्रत्यक्ष तौर पर उस भाजपा को मात देने में कामयाब रही, जिसने मोदी लहर पर सवार होकर यूपी और उत्तराखंड में न सिर्फ भगवा झंडा फहराया बल्कि कई रिकॉर्ड भी ध्वस्त कर दिए. बादल की काली छाया भी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को अपने आगोश में नहीं ले सकी. पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं, उसमें आम आदमी पार्टी ने 20 पर जीत हासिल की, जबकि को भाजपा को महज 3 सीटों पैर जीत मिली और उसकी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल महज 15 पर सिमट गई. कांग्रेस को सबसे ज्यादा 77 सीटें मिलीं. अब यदि 2012 के चुनाव परिणाम देखें तो अकाली दल को 56 और भाजपा को 12 पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस के 46 उम्मीदवार ही जीत पाए थे. आम आदमी पार्टी ने पहली बार पहली बार चुनाव लड़ा और सत्ताधारी पार्टियों से ज्यादा वोट प्रतिशत प्राप्त किया, क्या ये किसी जीत से कम है? क्या इसका सीधा सा मतलब ये नहीं है कि जनता भाजपा और अकाली दल के स्थान पर आम आदमी पार्टी को देखना चाहती है?

punjabबस एक चूक

पंजाब में आम आदमी के प्रदर्शन को निराशाजनक नहीं बल्कि उम्मीदों के अनुरूप न होना कहा जा सकता है. पार्टी यहां जनता के सामने एक मजबूत स्थानीय नेतृत्व रखने में चूक गई, और यही शायद उसके कम वोटों का कारण रहा. भगवंत मान और एचएस फुल्का से पार्टी को भले ही फायदा मिला हो, लेकिन यह स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरा साबित नहीं हो सकते थे. इसके अलावा केजरीवाल का पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की अफवाह ने भी पार्टी के खिलाफ काम किया. इससे आप आयात किए हुए नेताओं की पार्टी महसूस होने लगी. लोगों को लगने लगा कि बिना पंजाब को जाने-समझे कोई व्यक्ति कैसे राज्य की बागडोर संभाल सकता है? इसलिए अमरिंदर सिंह की छवि केजरीवाल पर भारी पड़ी. यदि आप मजबूत स्थानीय नेतृत्व पेश करती तो निश्चित तौर पर उसकी झोली में ज्यादा सीटें आतीं.

अब भी मौका

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी चुनाव ज़रूर हारी है, लेकिन विपक्ष की कुर्सी पर उसी का कब्ज़ा है. अगर वो अपनी इस भूमिका को सही ढंग से निभा पाती है, तो अगले चुनाव तक वो जनता के बीच खुद को अच्छी तरह से स्थापित करने में कामयाब होगी. जिन मुद्दों को पार्टी ने चुनाव के दौरान उठाया था उन्हें अब वो विधानसभा में उठा सकती है. यह सब जानते हैं कि अमरिंदर सिंह को लगभग खाली खजाने से जनता की उम्मीदों को पूरा करना होगा, ऐसे में आम आदमी पार्टी को कई मौके मिलेंगे जब वो खुद को बेहतर साबित कर सकती है. कुल मिलाकर कहा जाए तो आप ने पंजाब में हार कर भी काफी कुछ पाया है, ज़रूरत है उसे समझने और आगे की तैयारी करने की. जहां तक बात गोवा की है तो परिणाम दुःख देने वाले हैं, लेकिन पार्टी का ये पहला प्रयोग था और प्रयोग सफल – असफल होते रहते हैं.

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.

 

यूपी को सिर्फ मोदी पसंद हैं

उत्तर प्रदेश (UP) की जनता ने साफ़ कर दिया है कि उसे अखिलेश और राहुल का साथ नहीं बल्कि मोदी पसंद हैं. अब तक के रुझानों के आधार पर यूपी में भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया है. यानी उसे सरकार बनाने के लिए किसी के साथ की ज़रूरत नहीं है. UPभाजपा ने पिछले चुनाव के मुकाबले ऐतिहासिक वोट प्राप्त किए हैं. इसके साथ ही यह भी साफ हो गया है कि नोटबंदी को लेकर जनता में केंद्र सरकार के प्रति किसी तरह गुस्सा नहीं है. वहीं इस चुनाव ने मायावती को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है, बसपा 30-25 सीटों पर ही सिमटकर रह गई है. सपा और कांग्रेस के हाल भी काफी बुरा रहा है, दोनों पार्टियों को जनता ने पूरी तरह नकार दिया है. यूपी में कुल 404 सीटें हैं और बहुमत के लिए 202 सीटों की ज़रूरत है, और भाजपा इस आंकड़े से काफी आगे निकल गई है.

उत्तराखंड में भी भाजपा

उत्तर प्रदेश की तरह ही उत्तराखंड में भी भाजपा जीत की तरफ बढ़ रही है. अब तक के रुझानों के आधार भाजपा को 54 सीटें मिल रही हैं और कांग्रेस महज 9 सीटों पर सिमटकर रह गई है. वहीं पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनाती दिख रही है और गोवा में भी कांग्रेस आगे है. इन दोनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी को करार झटका लगा है. माना जा रहा था कि यहां आप की सरकार बन सकती है.

सास-बहू के झगड़े में बिखरी सपा!

सास-बहू के झगड़े पारिवारिक शांति के दुश्मन को होते ही हैं, लेकिन अगर यह अपने चरम पर पहुंच जाएं तो राजपाट भी तबाह होते देर नहीं लगती। उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी सपा में आजकल इसी झगड़े के चलते घमासान मचा हुआ है। हालात ये हो चले हैं कि न पिता मुलायम सिंह यादव को बेटे अखिलेश की सूरत भा रही है और न अखिलेश को मुलायम की। घर का ये झगड़ा अब सार्वजनिक तौर पर सामने आ गया है। सूत्र बताते हैं कि मुलायम की दूसरी पत्नी साधना और अखिलेश की पत्नी डिंपल के बीच spविवाद चल रहा है। कुछ दिनों पहले यह विवाद तीखी कहासुनी में तब्दील हुआ और इसका प्रभाव पार्टी एवं सरकारी स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों में देखने को मिला। यूपी समाजवादी पार्टी के एक नेता के मुताबिक, साधना अपने बेटे प्रतीक के लिए राजनीति में आगे लाना चाहती हैं। उनकी चाह है कि प्रतीक को इस बार के विधानसभा चुनाव में बड़े रूप में पेश किया जाए। इसी मुद्दे को लेकर सास बहू में कहासुनी हुई और विवाद आग की तरह भड़क उठा।

गायब हुआ प्यार
अखिलेश और मुलायम के बीच का प्यार अब गायब हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक घर की चारदीवारी में दोनों के बीच यदि संवाद होता है तो बस आरोप प्रत्यारोप के लिए। इस पूरे खेल में अमर सिंह की भूमिका बेहद खास बताई जा रही है। अमर अपने अपमान का बदला लेने और अपना खोया रुतबा वापस पाने के लिए फूट डालो, राजनीति करो की भूमिका अपना रहे हैं। खुद अखिलेश यादव भी मानते हैं कि पारिवारिक कलह के पीछे अमर सिंह का हाथ है। दूसरी तरफ शिवपाल भी साधना के बेटे प्रतीत का साथ दे रहे हैं। इस वजह से विवाद और भी तेज हो गया है।

चुनावी मजबूरी
सूत्रों के अनुसार, मुलायम सिंह अखिलेश को पार्टी से बाहर करने का मन बना चुके हैं। लेकिन राजनीतिक मजबूरी के चलते वह फैसला नहीं ले पा रहे। यदि अभी अखिलेश को हटाया जाता है, तो इसका असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। वैसे एक बात यह है कि यदि सपा विधानसभा चुनाव जीतती है तो अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं सौंपी जाएगी।

घर बैठे बनवाएं वोटर आईडी कार्ड

वोटर आईडी कार्ड (Voter ID card) बनवाना जितना सरल लगता है, असल में उतना होता नहीं। कई बार सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद भी आप अधिकारियों की लापरवाही के चलते मतदान के अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाते। लोगों की इस परेशानी को खत्म करने के लिए सरकार द्वारा ऑनलाइन आवेदन प्रणाली अमल में लाई गई है। यानी अब आप घर बैठे बैठे वोटर आईडी के लिए अप्लाई कर सकते हैं। आपको बस निम्न चरणांे का पालन करना होगाः

votekeyboardरजिस्ट्रेशन करेंः आपको सबसे पहले चुनाव आयोग की वेबसाइट http://www.nvsp.in पर जाकर रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। साइट पर दिए न्यू रजिस्ट्रेशन ऑप्शन को क्लिक करें और निर्देशों का पालन करें।

सही जानकारी भरेंः न्यू रजिस्ट्रेशन पर क्लिक करने के बाद एक पेज खुलेगा, जिसमें आपके बारे में जानकारियां मांगी गईं होंगी। सभी जानकारी को सावधानीपूर्वक भरें। क्योंकि गलत जानकारी भरने पर चुनाव आयोग आपके खिलाफ कार्रवाई भी कर सकता है। आपको व्हाइट बैकग्राउंड वाली अपनी एक कलर फोटो भी अपलोड करनी होगी।

बदलाव का विकल्पः जानकारी सब्मिट करने के बाद आप 15 दिनों तक उसमें बदलाव कर सकते हैं। साथ ही आप अपने वोटर आईडी कार्ड का स्टेटस भी ऑनलाइन जांच सकते हैं।

होगी जांचः आपके आवेदन भरने के बाद चुनाव आयोग की ओर से नियुक्त बूथ लेवर अधिकारी यानी बीएलओ आपके घर आएगा। बीएलओ आपके द्वारा अपलोड किए गए दस्तावेजों की जांच करेगा। आपको सभी दस्तावेजों की हार्डकॉपी उसे सत्यापन के लिए देनी होगी। इसलिए पहले से ही एक सेट तैयार करके रखें। सत्यापन के एक महीने के अंदर पोस्ट द्वारा आपके पते पर वोटर आईडी कार्ड पहुंच जाएगा।

जरूरी दस्तावेजः आपको एड्रस और आईडी प्रूफ के लिए अलग अलग दस्तावेज अपलोड करने होंगे। आप पासपोर्ट, 10वीं की मार्कशीट, बर्थ सर्टिफिकेट, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड, बैंक पासबुक, फोन, गैस बिल, इनकम टैक्स का फॉर्म 16 आदि में से कोई दो दस्तावेज स्कैन करके अपलोड कर सकते हैं।

ये तो होना ही था गुरू…

नवजोत सिंह सिद्धू ने राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। वो कल भाजपा छोड़कर आप का हाथ थामने का ऐलान कर सकते हैं। हालांकि ये ऐलान महज औपचारिकता भर होगा, क्योंकि यह पूरी तरह साफ है कि सिद्धू अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी में शामिल होने जा रहे हैं। पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और आप सिद्धू को मुख्यमंत्री के रूप sidhuमें पेश कर सकती है। सिद्धू पिछले काफी वक्त से केजरीवाल के संपर्क में थे। उनके इस नए रिश्ते की चर्चा तो तभी शुरू हो गई थी, जब उन्होंने केजरीवाल की तारीफ की थी। सिद्धू भाजपा आलाकमान से काफी नाराज चल रहे थे। उनकी नाराजगी को देखते हुए ही तीन महीने पहले पार्टी ने उन्हें राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचाया। लेकिन अब लगता है कि सिद्ध पार्टी के इस प्रयास से खुश नहीं थे।

सिद्धू की नाराजगी की शुरूआत 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हुई। लगातार दो बार अमृतसर संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने वाले सिद्धू को पिछली बार भाजपा ने मैदान में नहीं उतारा। उनकी जगह अरुण जेटली को अमृतसर से चुनाव लड़ाया गया। हालांकि पार्टी सिद्धू को दूसरी सीट से टिकट देना चाहती थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। कहा जाता है कि अकाली दल के दबाव में भाजपा ने सिद्धू को अमृतसर से दूर किया था। अलाकमान के इस एक फैसले ने सिद्धू को इस कदर नाराज कर दिया था कि सार्वजनिक तौर पर भी इसका आभास हो जाता था। तभी काफी हद तक ये तय हो गया था कि सिद्धू भाजपा का साथ छोड़ देंगे।

शाह कंपनी से अनबन
नवजोत सिंह सिद्धू और अमित शाह के बीच अनबन की खबरें कई बार आ चुकी हैं। सूत्र बताते हैं कि दोनों एक दूसरे को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते। वैसे अमित शाह को भाजपा के लगभग सभी वरिष्ठ नेता पसंद नहीं करते, फिर चाहे उसमें लालकृष्ण आडवाणी हों, यशवंत सिन्हा या कोई और। उधर, खबर ये भी है कि भाजपा ने निलंबित कीर्ति आजाद की पत्नी भी आप के साथ आ सकती हैं।

क्या वाकई राहुल को पप्पू समझने लगी है जनता?

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद कांग्रेस अब तक की सबसे बुरी स्थिति में पहुंच गई है। 1951 52 में जहां देश के 93 फीसदी हिस्से पर कांग्रेस का राज था, आज वो सिमटकर मात्र 14 प्रतिशत रह गया है। जबकि भाजपा ने पिछले कुछ सालों में जबरदस्त छलांग लगाई है। साल 2000 में पार्टी देश के महज 19 फीसदी हिस्से पर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रही थी, वहीं आज 65 फीसदी क्षेत्र में भगवा झंडा लहरा रहा है। कांग्रेस के इस हाल के लिए पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर उंगलियां उठ रही हैं। Rahul कांग्रेस के सिर्फ पोस्टर ब्वॉय ही नहीं हैं, बल्कि नीति निर्धारण में सबसे ज्यादा उन्हीं ही चलती है। पांच राज्यों में rahul-gandhi-पार्टी के चुनावी अभियान का खाका उन्हीं की देखरेख में तैयार किया गया था। अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही, लेकिन बीते 2 सालों में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस 6 राज्य गंवा चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या जनता वास्तव में राहुल को पप्पू समझने लगी है। एक ऐसा पप्पू जिसके पास होने की संभावना दिन ब दिन और कम होती जा रही हैं। चुनावी नजीते बताते हैं कि मतदाताओं को राहुल गांधी में ऐसा करिश्माई नेता नजर नहीं आता, जो उनके सपनों को साकार कर सके।

राहुल का व्यक्तित्व एक ऐसे नेता का बन गया है, जिसके साथ लोग फोटो खिंचवाना तो पसंद करते हैं, लेकिन वोट देना नहीं। कुछ हद तक राज ठाकरे की तरह। ठाकरे की हर सभा में जबरदस्त भीड़ रहती है। इतना ही नहीं, टीवी पर जब उनका भाषण चल रहा होता है, तो लोग काम धंधा छोड़कर उन्हें सुनने बैठ जाते हैं। महाराष्ट्र में उनकी कड़वी जुबान को बेहद पसंद किया जाता है, बावजूद इसके ठाकरे को वोट नहीं मिलते। पिछले विधानसभा चुनाव में मनसे की दुर्गती इसका सबसे जीवंत सबूत है। वैसे ऐसा नहीं है कि राहुल ने जमीनी स्तर पर काम करने का प्रयास नहीं किया। उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन तैयार करने के लिए वे गांव गांव घूमे। दलितों के घर रात गुजारी, उनके साथ खाना खाया, उनकी समस्याएं जानीं। भट्टा पारसौल में जहां यूपी सरकार के मंत्री तक नहीं पहुंच सके, वहां राहुल ने सबसे पहले पहुंचकर हर किसी को चौंका दिया था। केवल यूपी ही नहीं उन्होंने देश के कई राज्यों में दौरे किए, और वीआईपी नेता एवं जनता के बीच की दूरी को कम करने का प्रयास किया। ये कहना गलत नहीं होगा कि कुछ वक्त पहले तक राहुल को पसंद करने वालों की संख्या अच्छी खासी थी, लेकिन अब वो जैसे नगण्य होती जा रही है। इसके लिए कुछ हद राहुल खुद भी जिम्मेदार हैं।

राजबाला प्रकरण ने राहुल की छवि को काफी प्रभावित किया। इस घटना के बाद यह माना जाने लगा कि राहुल गांधी के लिए हर घाव के मायने अलग हैं। मसलन, यदि विपक्षी पार्टियों की सरकार वाले राज्य में यदि कोई गरीब रोता है तो राहुल को उसके आंसू नजर आ जाते हैं, लेकिन अपनी पार्टी की सरकार वाले राज्यों में गरीब की चीख पुकार भी उनके कानों तक नहीं पहुंचती। राजबाला जब दिल्ली पुलिस की लाठियों का शिकार हुईं उस वक्त राहुल गरीब और कमजोर तबके की आवाज बनने के लिए सुर्खियां बंटोर रहे है, मगर उन्होंने राजबाला का हाल जानने की जहमत नहीं उठाई। जबकि पूरा देश पुलिस के इस वहशीपन को कोस रहा था। राहुल के लिए राजबाला के घाव इसलिए अलग थे, चूंकि एक तो घटना दिल्ली में हुई जहां शीला दीक्षित की सरकार थी और केंद्र में कांग्रेस बैठी थी। दूसरी बात यह कि राजबाला बाबा रामदेव की भक्त थीं, जो कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। सोशल मीडिया पर इसके लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष की जमकर आलोचना हुई, शायद बाद में उन्हें इसका मलाल भी हुआ होगा।

Rahul-Gandhi-Sleeping

राहुल की ओर से आए दिन होने वाली गलतियों ने भी उन्हें एक गंभीर युवा नेता की छवि से मुक्त कर दिया है। सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो मौजूद हैं, जिसमें राहुल गलतियां करते नजर आ जाते हैं। जनता भला एक ऐसे व्यक्ति पर भरोसा कैसे कर सकती है, जो कागज पर लिखे होने के बावजूद आंकड़ों और तथ्यों गलतियां कर जाए। उम्मीदवारों की सूची बताकर खाली कागज फाड़ना या उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार के आंकड़ों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करना, राहुल हर ऐसे स्टंट के बाद मतदाता की नजर से गिरते चले गए। यही वजह है कि उन्हें आजकल पप्पू के नाम से भी संबोधित किया जाता है। जिस तरह बॉलीवुड में आलिया भट्ट पर चुटकुले बनते हैं, उसी तरह राजनीति में हंसने के लिए राहुल गांधी के नाम का सहारा लिया जाता है।

बदल गई सूरत
पांच राज्यों के चुनाव के बाद कांग्रेस विधायकों की संख्या 163 से घटकर 115 रह गई है। पुडुचेरी में भले ही कांग्रेस जीती हो, लेकिन यह जीत एक तरह से उसके लिए बेमानी है। इस वक्त उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम में ही कांग्रेस की सरकार बची है। 2014 से अब पार्टी के हाथ से 6 राज्य निकल चुके हैं। बिहार को छोड़ दिया जाए तो राहुल गांधी पार्टी के लिए कुछ खास नहीं कर सके हैं। बिहार में पार्टी को नीतीश कुमार और लालू यादव से हाथ मिलाने का फायदा हुआ।

 rahul gandhi

यहां भी की गलती
कांग्रेस का दम निकालने में बागियों की सबसे बड़ी भूमिका रही। असम में भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हेमंत बिस्वा शर्मा पहले कांग्रेस में थे, लेकिन अपनी अनदेखी के चलते उन्होंने कमल थाम लिया। शर्मा ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया था कि वो जितनी बार भी चुनावी चर्चा के लिए राहुल के पास पहुंचे, उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई। वे ज्यादातर अपने कुत्ते के साथ खेलने में व्यस्त रहे। राहुल को लेकर पार्टी के अंदर भी स्थितियां विपरीत होती जा रही हैं। दिग्विजय सिंह सरीखे नेता जो कल तक राहुल को कमान सौंपने की वकालत करते थे, आज वो इस मुद्दे पर कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं बोलते। अधिकतर वरिष्ठ नेता मानने लगे हैं कि यदि कांग्रेस की कमान राहुल को सौंपी जाती है, तो पार्टी इससे भी बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं। अब यह तो वक्त ही बताएगा कि युवराज से पप्पू बने राहुल राजनीतिक परीक्षा में कब पास हो पाते हैं।

Election: भाजपा के अच्छे दिन, कांग्रेस की आंख में आंसू

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पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे जहां कांग्रेस के लिए मायूसी भरे हैं, वहीं भाजपाई खेमे में उत्साह का माहौल है। भाजपा असम में पहली बार सरकार बनाने जा रही है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का जादू बरकरार है, तो केरल में लेफ्ट गठबंधन एलडीफ को बहुमत मिला है। केरल और असम दोनों ही जगह चुनाव से पहले कांग्रेस की सरकार थी। कांग्रेस के लिए तमिलनाडु में डीएमके के साथ जाना भी फायदेमंद साबित नहीं हुआ। राज्य में अम्मा की एआईडीएमके ने विपक्षी पार्टियों के लिए सारी संभावनाओं को खत्म कर दिया। नतीजों से गदगद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि देश कांग्रेस मुक्त भारत की ओर बढ़ रहा है।

असम पर कब्जा
भाजपा के लिए असम में जीत काफी मायने रखती है। क्योंकि पार्टी ने 15 साल से सत्ता पर काबिज कांग्रेस उखाड़ फेंका है। भाजपा ने यहां केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल को बतौर सीएम प्रोजेक्ट किया था। पार्टी को यहां असम गण परषिद और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट जैसे क्षेत्रीय दलों का साथ मिला है। कांग्रेस के तीन बार से मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई के खिलाफ असंतोष का माहौल कायम हो गया था, जिसका खामियाजा उसे उठाना पड़ा।

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बंगाल में ममता राज
ममता बनर्जी के लिए चुनावी नतीजे राहत भरे हैं। राज्य के माहौल को देखते हुए माना जा रहा था कि इस बार पलड़ा भाजपा का भरी रह सकता है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 2011 में विधानसभा चुनाव में जीत के बाद ममता ने 2014 में लोकसभा चुनाव में ज्यादा बड़ी जीत हासिल की थी और इस बार वे उससे भी आगे निकल गई हैं।
केरल से कांग्रेस दरकिनार
केरल में लेफ्ट ने शानदार प्रदर्शन किया है। वैसे यहां उत्तर प्रदेश की तरह हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन की परंपरा है। इसलिए पहले से ही माना जा रहा था कि बदलाव होगा। हालांकि वामदलों को इतना समर्थन मिलेगा इसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। भाजपा ने स्थानीय पार्टी भारत धर्म जन सेना के साथ गठबंधन किया था। पार्टी को आस थी कि उसके जरिए वो एझवा और नायर समुदाय के बीच बैठ बना सकती है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। चुनावी साल में लेफ्ट पार्टियों ने सोलर घोटाले को कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया और इसमें सफल भी हुईं।
तमिलनाडु में अम्मा ही अम्मा
तमिलनाडु में अम्मा की आंधी बरकरार रही। अम्मा के लिए यह जीत काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य की परंपरा हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन की रही है। लेकिन इस बार जनता इस परंपरा को तोड़ते हुए जयललिता को बहुमत दिया। राजनीतिक विश्लेषक मानकर चल रहे थे इस बार एआईडीएमके को सत्ता से जाना होगा, क्योंकि बाढ़ के वक्त सरकार के कुप्रबंधन से जनता में खासी नाराजगी थी। इसके अलावा सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे थे। मगर नतीजे अंदाजे से बिल्कुल अलग रहे। दरअसल, अम्मा ने सरकारी खजाने से तमाम ऐसी सब्सिडी योजनाएं शुरू की हैं, जिनकी वजह से उनकी छवि गरीब समर्थक सीएम की बन गई है। लोग इस बात को लेकर आशंकित थे कि अगर दूसरी सरकार बनती है तो शायद वो इन योजनाओं को बंद कर दे। इसलिए जनता ने अम्मा को एक और मौका दिया। वहीं पुडुचेरी में कांग्रेस गठबंधन जीतने में सफल रहा है।