आप जानते हैं कि ATM किसके दिमाग की उपज थी?

आज बैंकों से पैसा निकालना पहले जितना मुश्किल नहीं रहा. ATM कार्ड साथ हो, तो पलक-झपकते ही पैसा निकल जाता है. इसके अलावा अब तो ATM द्वारा अपने खातों में पैसा जमा करने की सुविधा भी शुरू हो गई है. ATM के आविष्कार से पहले तक पैसा निकालने या जमा करने के लिए बैंकों में लंबी-लंबी लाइनें लगा करती थीं. अब अधिकांश लोग उस स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकते. हालांकि नोटबंदी ने ज़रूर कुछ महीनों तक लोगों को गुज़रे ज़माने में पहुंचा दिया था. ATM से पैसा निकालते समय क्या कभी आपके मन में आया है कि यह किसके दिमाग की उपज है? सबसे पहला ATM कहाँ लगा और भारत में इसकी शुरुआत कब हुई? आइए हम आपको बताते हैं….

सबसे पहले ATM मशीन का इस्तेमाल 27 जून, 1967 को लंदन के बार्कलेज बैंक में हुआ था. जिस शख्स ने इसका आविष्कार किया उनका नाम था जॉन शेफर्ड बैरन. बहुत कम लोग जानते हैं कि स्कॉटलैंड निवासी बैरन का जन्म 23 जून 1925 को भारत के मेघालय में हुआ था. बैरन के जन्म के समय उनके पिता चिटगांव पोर्ट के कमिश्नरेट के चीफ़ इंजीनियर थे.

कैसे आया ख्याल?
ATM के आविष्कार के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. एक दिन शेफर्ड बैरन को किसी ज़रूरी काम के लिए बैंक से पैसा निकालना था. लेकिन जब तक के बैंक पहुंचे, बैंक बंद हो चुका है. उस वक़्त बैरन को काफी गुस्सा आया. उन्होंने सोचा कि ऐसा कुछ होना चाहिए, जिससे लोग जब चाहें पैसा निकाल सकें. यह विचार मन में आते ही उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया. उनकी कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद लंदन के बार्कलेज बैंक की एक शाखा में दुनिया की पहली ATM मशीन लगी.

भारत में शुरुआत
ATM मशीन की शुरुआत भारत में 1987 के आसपास मानी जाती है. सबसे पहले हांगकांग एंड शंघाई बैंकिंग कॉर्पोरेशन (HSBC) की मुंबई शाखा में ATM मशीन लगाई गई. उसके बाद धीरे-धीरे बाकी बैंकों ने भी इस आविष्कार को अपना अभिन्न अंग बना लिया और आज तो इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

Bharat Ratna: प्रधानमंत्री जिन्होंने खुद ही अपना नाम भेज दिया!

भारत रत्न (Bharat Ratna) और उससे जुड़े किस्से तो आपने बहुत सुने होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक प्रधानमंत्री ऐसे भी थे जिन्होंने इस सम्मान के लिए स्वयं ही अपने नाम की सिफारिश की थी. दरअसल यह किस्सा 1955 के दौर का है. जवाहरलाल नेहरु उन दिनों देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे. 15 जुलाई 1955 को नेहरु को भारत रत्न से नवाजा गया था. नियम के अनुसार प्रधानमंत्री हर साल भारत रत्न के लिए राष्ट्रपति के पास कुछ प्रस्ताव भेजते हैं. राष्ट्रपति जिस पर मुहर लगाते हैं उसे भारत रत्न दिया जाता है.

पंडित नेहरु ने इस सम्मान के लिए खुद की राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से अपने नाम की सिफारिश की थी. प्रधानमंत्री रहते हुए नेहरु को भारत रत्न कैसे मिल सकता है, इसे लेकर कई बार सवाल उठाए गए. सूचना के अधिकार के तहत यह बात सामने आई कि राष्ट्रपति डॉ. प्रसाद ने तय किया था नेहरु को भारत रत्न मिलना चाहिए. यानी नेहरु ने खुद अपने नाम की सिफारिश की थी, क्योंकि नियम के अनुसार तो प्रधानमंत्री ही राष्ट्रपति को नाम सुझाते हैं.

मुफलिसी में दिन गुज़ार रहे ये क्रिकेट सितारे

क्रिकेट की दुनिया चकाचौंध से भरपूर है, यहां पैसे की कोई कमी नहीं है. एक बार जिसने नाम कमा लिया, लक्ष्मी की मेहरबानी उस पर अपने आप होने लगती है. रिटायरमेंट के बाद भी कोच बनकर या कमेंट्री आदि माध्यम से cricketer अच्छी खासी रकम कमा लेते हैं. लेकिन कुछ खिलाड़ी ऐसे भी हैं, जो क्रिकेट की दुनिया में शौहरत हासिल करने के बावजूद आज मुफलिसी में जीवन गुजार रहे हैं.
cricketerऑलराउंडर क्रिस केन्स
न्यूज़ीलैण्ड टीम के सबसे शानदार ऑलराउंडर माने जाने वाले क्रिस केन्स 62 टेस्ट और 215 वनडे खेले और क्रमश: 3320 और 4950 रन बनाए. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर केन्स ने अपनी एक अलग ही पहचान स्थापित की थी. 2006 में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से सन्यास किया और 2013 में आईसीएल में भाग लिया. लेकिन यहां उन पर फिक्सिंग के आरोप लगे, उसके बाद वो एकदम से गायब हो गए. 2014 में उन्हें ऑकलैंड में बस अड्डा साफ़ करते हुए पाया गया.

ऑलराउंडर क्रिस हैरिस
ऑलराउंडर क्रिस हैरिस 90 के दशक में न्यूज़ीलैण्ड टीम का अहम हिस्सा थे. उन्होंने 23 टेस्ट और 250 वनडे खेले जिसमें 5519 रन बनाए एवं 218 विकेट लिए. 2004 में क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. बाद में जीवन गुजारने के लिए वो ऑस्ट्रेलियाई कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव बन गए.

गेंदबाज़ अरशद खान
पाकिस्तानी गेंदबाज़ अरशद खान ने 9 टेस्ट और 58 वनडे खेले और क्रमश: 31 एवं 133 विकेट लिए. खान 1999 में पाकिस्तान की उस टीम का हिस्सा थे, जिसने श्रीलंका के खिलाफ एशिया टेस्ट चैंपियनशिप जीती थी. 2006 में रिटायरमेंट के बाद खान को जीवन जीने के लिए वो सबकुछ करना पड़ा, जिसके बारे में कोई क्रिकेटर कभी सोच भी नहीं सकता. 2015 में खबर आई कि अरशद ऑस्ट्रेलिया में बतौर कैब ड्राइवर काम कर रहे हैं.

गेंदबाज़ हेनरी ओलांगा
90 के दशक में जिम्बाब्वे के इस तेज़ गेंदबाज़ का खौफ था. दिग्गज खिलाड़ी भी इसके सामने खेलने से डरते थे. ओलांगा ने 30 टेस्ट और 50 वनडे खेले, जिसमें क्रमश: 68 और 58 विकेट लिए. 2003 के विश्व कप में उन्होंने और एंडी फ्लावर ने जिम्बाब्वे सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए हाथ पर काली पट्टी बाँधी थी. इसके बाद दबाव के चलते दोनों देश छोड़कर इंग्लैंड चले गए. 2007 में एंडी तो इंग्लैंड टीम के कोच बन गए, लेकिन ओलांगा कुछ ख़ास नहीं कर सके. बाद में उन्होंने म्यूजिक में हाथ आजमाया.

Canadian way can reduce traffic problem in India!

Anuj Ismail (Special correspondent Canada)

In order to curb the traffic menace the city of Winnipeg introduced a new app called WAZE, a user friendly app that gives real time traffic information from city’s transportation management center and with the help of Winnipeg drivers who have the app.
trafficThe app gives real time information about traffic snarls, road accident, and route diversion due to accident or bad weather and also tells about gas station and food joints. It is a free two way data exchange where city provides Waze with advance and real time information. In exchange, Waze provides and update city with real time traffic information with the help of commuters who can update the traffic information in the app.

It can be a game changer if India adapts similar kind of app which helps to provide real time information about traffic, it help a great deal to curb the traffic menace in the metropolitan cities. Besides rising population, traffic menace is one of the challenges that the country is facing right now and in days to come this problem will only rise and reaches the next level.

Inhabitants of India who are in Winnipeg, feels that this technology will be a boon for the country and it will help a great deal, however if the citizens do not actively participate then this app will be of no use.

What Indians says

“This app can do wonders only if the citizens work hand in hand with the local administration, daily commuters can send pictures, videos of the traffic menace or even update about traffic snarls, road construction or any road accident which has resulted into traffic back up.” Said Parag Shah, self employed.

Asif Sheikh, working professional claimed, “It is more important to change the mindset of the commuters, the inhabitants of the city will have to take the initiative and work hand in hand with the local administration.  It can be huge success in India only if the citizens participate.”

It’s about time that the young tech savvy generation take over the initiative by providing adequate support to the local administration. Change the mindset and abide by the traffic rule like stopping at the red signal, giving way to the pedestrians etc.

इन महिलाओं से भिड़े तो हड्डियां टूटना तय

आमिर खान की दंगल तो आपको याद होगी फिल्म में जिस तरह फोगाट बहनें बड़े बड़े पहलवानों को धूल चटाती हैं, कुछ वैसा ही केरल की मीनाक्षी अम्मा (Amma) करती हैं। फर्क बस इतना है कि मिनाक्षी की उम्र उनसे कहीं ज्यादा है। केरल के वाटकरा में रहने वालीं 76 Meenakshiammaवर्षीय मीनाक्षी मार्शल आर्ट में अपने से आधी उम्र के पुरुषों को भी चित कर देती हैं। वे प्रचीन भारतीय मार्शल आर्ट फॉर्म कलरीपायट्टू की ट्रेनिंग देकर अपना घर चलाती हैं। पिछले दिनों उनके करतब का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ। वीडियो में वह साड़ी पहने गजब की फुर्ती से लाठी चलाती हुईं नजर आ रही हैं। अम्मा का मानना है कि लोगों को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए और इसके लिए मार्शल आर्ट जैसी कला में निपुण होना जरूरी है।

इनका भी मुकाबला नहीं
चीन निवासी 94 वर्षीय झांग हेक्सिन भी मार्शल आर्ट में माहिर हैं। इस बुजुर्ग महिला की बहादुरी के किस्से आए दिन चीनी मीडिया में सुर्खियां बटोरते रहते हैं। पहली नजर में आम महिला नजर आने वालीं हेक्सिन जब मार्शल आर्ट दिखाती हैं तो लोगों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता है। वो पलक झपकते ही बड़े बड़ों को चित कर सकती हैं। मार्शल आर्ट एक्स्पर्ट हेक्सिन को प्यार से कुंग फू ग्रैंडमा भी कहते हैं। उन्होंने चार साल की उम्र से ही मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ली थी।

क्या सुसाइड करने समुद्रतट पर आईं थीं व्हेल?

न्यूजीलैंड के समुद्रतट पर बीते दिनों सैकड़ों व्हेल (Whale) मृत पाई गईं। एक दिन जब सुबह लोग दक्षिण आइलैंड टापू के फेयरवेल स्पिट तट पर पहुंचे तो हर तरफ व्हेल ही व्हेल नजर आ रही थीं। बिना वक्त गंवाए बचाव कार्य शुरू किया गया, लेकिन तब तक 300 से ज्यादा व्हेल दम तोड़ चुकी थीं। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है, भारत सहित तमाम देशों में समुद्र किनारे व्हेलों के मारे जाने की घटनाएं होती रही हैं। फेयरवेल स्पिट बीच पर 2015 में भी 100 के आसपास व्हेल मारी गई थीं। पिछले साल तमिलनाडु के तूतीकोरिन तट पर 73 व्हेल मृत पाईं गई थीं। इसी दौरान ब्रिटेन के लिंकनशायर समुद्र तट पर भी तीन स्पर्म व्हेल ने दम तोड़ दिया था। ये मछलियां अपेकक्षाकृत ज्यादा गहरे पानी में रहती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों के लिए ये समझना मुश्किल था कि आखिर स्पर्म व्हेल किनारे आईं कैसे?

सुसाइडल टेंडेंसी (Suicidal Tendencies)
व्हेल का समुद्र तट की ओर रुख करने का स्पष्ट कारण अब तक सामने नहीं आ सका है। हालांकि ऐसा माना जाता है कि बीमार या घायल होने के चलते व्हेल रास्ता भटककर समुद्र तट पर आ पहुंचती हैं। कई बार ऐसा होता है कि एक व्हेल किनारे आ जाती है और  फिर वो दूसरी व्हेलों को मदद का संकेत भेजती है। संकेत मिलने पर दूसरी व्हेल वहां आने लगती हैं और वो भी फंस जाती हैं। वैसे इसके पीछे सुसाइडल टेंडेंसी से भी इंकार नहीं किया जा सकता। खुद वैज्ञानिक इस थ्योरी को पूरी तरह खारिज नहीं करते।

इतिहास में उल्लेख
आज से करीब दो हजार साल पहले यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने एक घोड़े की खुदकुशी का जिक्र किया था। उनके मुताबिक जब घोड़े को इस बात का अहसास हुआ कि उसने अपनी मां के साथ सेक्स किया है तो उसने समुंदर में कूदकर खुदकुशी कर ली। इसी तरह ग्रीक विचारक क्लॉडियस ऐलियन ने अपनी किताब में जानवरों की आत्महत्या की 21 घटनाओं पर प्रकाश डाला था। इसमें शिकारी कुत्तों की एक घटना का भी जिक्र है, जिन्होंने अपने मालिक की मौत के बाद खाना छोड़कर जान दे दी। एक बाज के बारे में भी क्लॉडियस ने बताया है, जिसने अपने मालिक की चिता में खुद को जला लिया था।

खुद को डुबा दिया
1845 में लंदन के अखबार इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज में छपी एक खबर ने सबको यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि क्या जानवरों में भी इंसानों जैसे भाव होते हैं? खबर के मुताबिक, काले रंग के एक कुत्ते ने समुंदर में कूदकर जान दे दी। कुत्तों को अच्छा तैराक माना जाता है, लेकिन इस कुत्ते ने तैरने की कोशिश ही नहीं की। कुत्ते को डूबता देखकर कुछ लोग उसे बाहर निकालकर लाए, मगर वो दोबारा पानी में कूद गया और अपनी जान देकर ही माना। एक अन्य खबर में बिल्ली के पेड़ से लटककर जान देने का उल्लेख किया गया, जो अपने बच्चों की मौत से बेहद दुखी थी। इसी तरह चीन में बाड़े में बंद भालू ने अपने बच्चे को मारकर खुद भी जान दे दी थी। बच्चे को एक बेहद तकलीफदेह इंजेक्शन लगाया जाता था। मां से बच्चे की यह तकलीफ देखी नहीं गई और बच्चे को मारकर खुद भी आत्महत्या कर ली।

मादाओं की संख्या ज्यादा
इंसानों की तरह जानवरों में सुसाइडल टेंडेंसी मादाओं में ज्यादा होती है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि नर की अपेक्षा ज्यादातर मादाएं मानसिक तनाव और पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए खुदकुशी कर लेती हैं। हालांकि सुसाइडल टेंडेंसी पर अब तक कोई एक राय नहीं बन पाई है। कुछ वैज्ञानिक ऐसे भी हैं, जिन्हें लगता है जानवरों में ऐसी कोई भावना नहीं होती।

सबसे बड़ा सवाल?
यह बात हम सब जानते हैं कि मनुष्य जैसी संवेदनाओं के चलते जानवर भी डिप्रेशन सरीखी मानसिक बीमारियों का शिकार होते हैं। इसलिए मालिक के साथ कुछ बुरा होने पर उन्हें भी बुरा महसूस होता है। वो दर्द होने पर रोते भी हैं और खुशी में चहकते भी हैं, बस उनका अंदाज अलग होता है। जब इंसान डिप्रेशन में अपनी जान देने जैसा कदम उठा सकता है, तो क्या जानवर ऐसा नहीं कर सकते? इस सवाल का जवाब पूरी तरह मिलना अभी बाकी है।

The End of the ‘Tiger Show’

By Dr. Suhas Kumar

I guess it may be difficult for a number of people to sympathize with animals that are at the receiving end of a human action or inaction and are suffering; therefore, this story that criticizes human apathy towards mute animals may cause some amount of heartburn in certain readers. This story is about the “Tiger Show”- an activity – pursued in the tiger reserves of Madhya Pradesh for almost 3 decades.

You may not be aware that the ‘Tiger Show’ was organized only in three of the tiger reserves of Madhya Pradesh, and it was an exception as nowhere else in the entire country any other tiger reserve has ever organized this activity for visitors. The “Tiger Show” – the way it was organized – brazenly militated against one of the prime objectives of the tiger reserves i.e. to provide a safe, secure and trauma free abode to tigers.
After the baiting of tigers was stopped in the early eighties, the practice of tracking tiger by trained elephants and mahouts for the purpose of showing them to visitors began. As in Madhya Pradesh the ‘tiger’ always remained the prime object of adverts published by the hotels, and tourism department for luring visitors to the reserves, to ensure that the visitors don’t miss to see a tiger, the ‘elephant ride’ permissible under the notified rules (Rule34 of the M.P. Wildlife Protection Rules,1974) was unofficially modified, and christened ‘Tiger show’.

The Tiger Show was discontinued briefly for a year during the tourist season 1995-96 following protest from some conservationists of national repute. After that, it restarted as a major activity in Kanha and Bandhavgarh tiger reserves and later in Pench and continued till 2012, when finally a ban was imposed by the CWLW.
Several guidelines have been issued from time to time by the National Tiger Conservation Authority and the Chief Wildlife Warden of Madhya Pradesh to regulate tiger viewing in a manner that it exerts the least impact on the tigers’ behavior and avoids disrupting its normal activities. But as you would notice the term-“Tiger Show” was never mentioned in these instructions or rules notified by the state till 2009.

Guidelines issued by the CWLW in 1994 and again in 1996 are particularly relevant. The common gist of these instructions is as follows:

  1. Tiger must not be restrained or encircled for the purpose of showing it to the tourists.
  2. Elephant rides will be permitted only on forest roads, existing pathways and old elephant tracks. Elephant ride must not be organized in areas other than designated above and never along the river and stream banks and in grasslands. In special circumstances, the officer in charge of the PA may prohibit the use of any area for the elephant ride.
  3.  At a time only one elephant will be permitted on a particular track.
  4. Tigress with less than 6-month-old cubs must not be tracked for the purpose of showing it to tourists.
  5.  Elephant’s health condition must be considered before deciding the total duration of a ride.
  6. The Elephant rides will be organized up to 3hrs after sunrise and one hrs before sunset.
    vii. In case a tiger is sighted from the elephant back, a distance of at least 30 meters must be maintained from the animal.
  7. Elephants must be kept in camps at more than one place to avoid damage to the habitats.

Project Tiger Directorate (now NTCA) also issued instructions in 2003 and 2007. The gist of the 2003 instructions is as follows:

“Considerable tourist influx (both inland and foreign) in many of our Protected Areas and Tiger Reserves, necessitate regulation of such visitation in the interest of minimizing the biotic disturbance to wild animals and their habitat. Therefore, ecotourism should be fostered in the right perspective in these areas, so that there is no compromise or trade –off in wildlife interests since our Tiger Reserves are ecotypical repositories of the valuable gene pool. Hence, the following may be ensured in this regard:

  • tigerThe tourist visitation should be regulated as per the carrying capacity of the area.
  • In place of open gypsies and smaller vehicles, medium sized buses, with a closed body and sliding windows, may be used for park excursions. This will minimize the risk of close encounters with wild animals, apart from reducing the number of vehicles inside the park at any point in time.
  •  A minimum mandatory distance of at least 500 meters should be maintained between two vehicles plying on the same road.
  •  A minimum mandatory distance of 30 meters should be maintained by tourist vehicles while spotting a tiger or any other wild animal.
  • The route guides should be more professionally trained and the penalty should be imposed on visitors in case they violate park rules. Further, a model calculation of the Tourist Carrying Capacity is also appended for ready reference, which is fairly robust and can be computed in a site-specific manner by collecting some basic field data. It is requested, this computation may please be done for your Reserve and this Ministry may be apprised accordingly.
  • Since a certain amount of risk is always involved in jungle excursions despite all precautions, a standardized ‘Indemnity Bond’ may also be prescribed indemnifying the park authorities from litigation/arbitration which may arise on account of accidents suffered by tourists during park round. All due formalities in this regard may be completed before the tourists are allowed entry into the Tiger Reserve.
  • Under no circumstances tourist excursions should be allowed during the night for apart from causing immense disturbance to wild animals, such ventures are extremely risky. It is also reiterated, no tourist facilities should be created in the ‘core Zone’ of a Tiger Reserve.”

In 2007, the NTCA again issued instructions for regulating tourism in tiger reserves. This circular repeats many of the instructions issued earlier and elaborates the reason for maintaining distance of 30 metres while viewing tigers. The circular expresses concern over excessive tiger: man interaction that culminates in the aberrant behaviour of tigers and results in attack on tourists and villagers and also makes the tigers of the reserves vulnerable to poaching.

In Kanha tiger reserve the ‘Tiger show’ was arranged only in some parts of the tourism zone in the Kanha-Kisli and Mukki ranges. Every day the tiger tracking exercise began just before dawn and once the tiger was located a wireless message was sent to the entry gates and the tiger show ticket window at Kanha; and the elephants from camps were moved to the location where the tiger had been sighted. Even the ticket counter at Kisli used to display the locations of the tiger show every day. Sometimes, visitors, who could not watch a tiger even after purchasing tickets for the ‘show’, used to make a lot of ruckus compelling the field personnel to restrain tigers at one place to show it to the maximum number of visitors .There were also a rumour that some unscrupulous staff became quite friendly with some tour operators and went out of the way to ensure that their guests get to see a tiger.

It is interesting to note that despite tiger being a major motivation for most tourists for visiting Kanha, my study revealed that only 21.48% of the visitors and in Pench, 6.5% among Indians and 12.6% among the foreigners actually availed the tiger show in tourist season 2008-09 Unlike Kanha tiger reserve, at Pench, visitors opted for elephant ride even if there was no news of tiger. In 2006-07, 262 visitors and in 2007-08, 36 visitors availed elephant ride not associated with the tiger-show (Kumar.S., 2013).
Before the entry rules were amended in 2010, the ‘Tiger show’ was not a legally sanctioned activity as this activity was not included in the notified entry rules. The prescribed activity had always been ‘elephant ride’, but the tour operators and the reserve management in Kanha and Bandhavgarh reserves – had nicknamed it as ‘Tiger show’ for obvious reasons. The amendment included the words – “’Tiger and leopard show ” under the main activity-‘Elephant ride’, making tiger show a legitimate recreational activity. ..

During my field survey many visitors, field personnel, and guides complained about mismanagement during the tiger show. Besides, disrupting the normal activity of tiger by restraining it at one location with 4-5 elephants, a lot of disturbance was created by taxis and tourists once a wireless message about tiger’s presence was flashed. Photographic evidence confirms that the directions of NTCA and CWLW that mandates maintaining at least 30-metre distance from the animal during viewing and at least 500 meters between two vehicles were often flouted. There is also photographic evidence depicting breach of the code of conduct prescribed by the mandatory instructions issued by the CWLW and the NTCA.

I was very uncomfortable with the tiger show; not because viewing tiger is a profanity but because of the way the ‘tiger shows’ were organized – The usual scene at tiger show was like this – usually when a tiger, after a long hunting expedition in the night wanted a peaceful sleep 4 elephants mounted by curious and hyper-excited tourists surrounded it; some elephants were maneuvered very close to the sleeping tiger so that tourists could take a picture of the tiger supine with all four legs in the air, And when the tiger woke up from the clamour around it and attempted to wriggle out of the cordon, the elephants followed and surrounded it again.
My protests against the tiger show were usually dismissed by my peers and superiors with the statements like – “it hardly matters, people come to tiger reserves to watch tigers, let them watch”. Dismayed by my failure to convince my bosses and colleagues, I penned down an appeal on behalf of Kanha’s tigers. The poem appears at the end of this note.

Many years passed and I continued to tolerate this aberration with disgust and anguish as many of the impractical subordinates do every day. And then came an opportunity, the NTCA issued fresh guidelines in October 2012 in response to a Supreme Court judgement. The court agreed to those guidelines and ordered strict adherence to it. Without losing much time, I got an order issued by the CWLW banning tiger show in tiger reserves. Some months later, in April 2013, the Principal Secretary and the CWLW went to Dhudwa tiger reserve to attend a meeting convened by the NTCA. After returning from there, the CWLW, my immediate boss, informed me that the member secretary, NTCA had expressed his disagreement to our banning the tiger show. He added that now the PS wants to revive the tiger show. I said – “yes sir, we may start it once again but before that, we would have to get a written ‘’go ahead’’ from the NTCA as the business of organizing the tiger show clearly militates against the new guidelines.” My boss agreed, and I drafted another letter, got it signed and dispatched it the same day.

The letter reads as follows:-
(04.04.2013) “Please recall the issue of recommencing tiger show raised with you recently during the workshop at Dhudwa tiger reserve. You had mentioned that tiger show is permissible under the guidelines issued by the NTCA. As you are aware ‘Tiger Show’ was one of the recreational activities in Kanha and Bandhavgarh tiger reserves before the issuance of the gazette notification of the guidelines under section 38-O(c) of the Wildlife (Protection) Act, 1972, for project tiger, by the NTCA on 15.10.2012. We were constrained to stop tiger show as the directive contained in article 2.2.15 prohibits ‘cordoning off’ wildlife with the purpose of showing it to visitors, Secondly, the directive also prohibits viewing of wildlife from a distance less than 20 meters.
As you are aware ‘Tiger Show’ is an activity that involves deliberate and persistent pursuit of tiger for the purpose of showing it to the visitors, it involves tracking and locating the tiger in the wee hours and then keeping it localized with the help of elephants to make it available for the visitors to see; obviously without cordoning off the tiger and pursuing it closely, it would be difficult to keep it available for the visitors.
Now, in order to recommence this ‘show’ for visitors, as advised by you, a clarification about it will be required along with very clear instructions from NTCA as to how the ‘tiger show’ should be organized by the tiger reserve managers. I would, therefore, request you to do the needful accordingly”
As I had expected, the CWLW never got a reply and perhaps, now the tigers of Kanha, Bandhavgarh and Pench would have a long reprieve from persecution. I pray it remains this way.

PANNA : Where have the Tigers Gone?

  • Originally written in 2009-With Post Script, 2015.

By Dr. SUHAS KUMAR

In 2009, two young wild tigresses – one from Kanha and another from Bandhavgarh were translocated to Panna to supplement the struggling tiger population, which, reportedly, was very-very small or non-existent. And after a gap of several months, a middle-aged male was brought from Pench Tiger Reserve to give company to the reintroduced females.

To find out the reasons for the sudden disappearance of tigers from Panna, the government of India ordered an investigation by a special team (SIT) headed by a former director of project tiger and the state government set up a high-level committee to investigate the causes. While the SIT squarely blamed the state government for mismanagement and its failure to curb poaching, the committee proposed some ecological perspective saying that the females left the park to safeguard their cubs from male tigers. In my opinion, both these findings are not wholly correct.

That the habitat of Panna, till 2007, did support a good number of tigers is undisputable for I have firsthand knowledge of this fact – during a one day tour of the reserve in July 2007, I had seen fresh pug marks at 3 different locations 10-15 km apart and heard vocalization by a tiger near Madla entry point of the tiger reserve.
The confirmation that the Panna reserve had lost all of its female tigers and from among the males merely a lone survivor roamed came after several rounds of checking and rechecking by the experts. This lone survivor was then wandering outside the safe confines of the tiger reserve; the staff had seen its pugmarks near Panna town in the fields along the Panna – Satna Road.

When I learned all these details in March 2009 through newspapers, I was totally at a loss as it was difficult for me to understand how in a short span of a year and a half all the tigers of Panna had suddenly vanished. I was also confused because, in the preceding three years, Panna Tiger Reserve had undergone a massive protection facelift? If poaching was the explanation I was unable to perceive how, in a short span of time, such large scale extirpation of the tiger could go unreported without a whimper in the press for Panna was a hot destination for media after a researcher had made a series of allegations against the management.
I devoted some time to search for likely causes for this sad state of affairs at Panna and came out with some hypotheses. In my view, the reason for the disappearance of a species is manifold – and in most cases, it is a combination of unsuitable ecological conditions and anthropogenic decimating factors like poaching. When an endangered species suddenly vanishes the so called experts tend to blame it on ‘poaching’ alone. And nobody cares to find out the other reasons.

Poaching, in and around Panna Tiger Reserve is a reality, no doubt, but almost all other tiger bearing areas face the same threat. Today amply networked and equipped professional gangs of poachers are involved and in this trade and the local traditional hunter communities are their partners. But what are the other factors besides poaching to explain the mysterious disappearance of all tigers from Panna over a short duration (between July 2007 to March 2009)?

The plausible hypotheses to explain the mysterious disappearance of tigers, which I am inclined to offer, is based on my knowledge of the terrain and the tigers of Panna, are:
i. The habitat had only a few female; some were poached within their territories that extended beyond the reserve and the remaining few, except one, dispersed out of the reserve in search of better hunting grounds. The presence of this lone female with two cubs was noticed in adjoining North Panna forest division in 2009.

ii. Males spread out and moved to other areas beyond the tiger reserve in search of prey and fecund females.
The above two hypotheses draw support from Dr. Raghu Chundawat’s Tiger Ecology Research. He concludes that the male tigers of Panna operate in a much wider area – one of the radio-collared males had a territory as huge as 277 square km, and females of Panna Tiger reserve have territories larger than those reported for females from any other PAs (Sunquist, 1981; Smith, 1984; Karanth and Sunquist, 2000). The territory the female tigers either extended beyond the Park boundary or touched its periphery, exposing breeding females to external threats (Chundawat,R. 2001).

This also means that the male tigers no longer seen within the reserve left the park after the disappearance of the females and might have moved out into the territorial forests of Satna, Rewa, Chhatarpur, Chanderi, Sagar, Damoh or Tikamgarh. Or, may be in the forests of Uttar Pradesh – a quick look at the Google map of this landscapes reveals the extent of dense and sparse forest cover beyond the tiger reserve which the tigers of Panna might use as their extended habitats. The support for this hypothesis comes from the field reports of the sudden appearance of a tiger in Damoh forest division – about 180 km away. That the tiger from Panna could wander off to far away forests of Damoh was confirmed again when a male radio-collared tiger that had strayed out of the Panna tiger reserve was recaptured from there. I also believe that a tiger and a tigress that have made Madhav national park their home since 2007 were also refugees from Panna tiger reserve. The habitat of Madhav National Park had recovered from severe depletion resulting from almost seven years of mismanagement until a sensible and hard-working officer arrived on the scene in 2006. Till then it had been more than 25 years for Madhav – once a playground for tigers – to have cradled a resident one, though pugmarks of transients were seen off and on. The recent and continued occupation of Madhav’s rejuvenated habitat by two tigers is a case of reclamation of a resurrected, potential habitat by dispersing tigers.
Dr. Chundawat’s research also points out two major problems about natural prey of tiger at Panna-

i. Panna National Park has an estimated density of 32 prey /km2 is low in comparison to other high tiger density areas.
ii. chital population has a poor fawn and yearlings ratio per female, indicating reduced productivity of the population.

His research attributes poor utilization of habitat by herbivores to the sparsely wooded landscape and the absence of water in tiger reserve’s upper plateau in summer season. Besides, chital, which usually forms a significant portion of tigers natural prey, are not very productive in the dry deciduous and water scarce landscape of Panna, making tiger utterly dependent on supplementary prey like cattle. Considering these two constraints that the tigers of Panna were facing, relocation of 9 villages that had a sizable cattle population – an important prey supplement for tigers – had an effect on prey availability as most families of these nine villages moved out along with their cattle in 2008-09 leaving the habitat suddenly bereft of supplementary prey (cattle). Another management intervention that might have adversely affected availability of prey for the tigers was the translocation of about 5000 feral cattle from the reserve to the pens by the end of 2008. The restricted distribution of chital in the undisturbed areas in and around Badgadi, a village that was relocated about 20 years back, may have been another reason why tigers were forced to move out of the reserve in search of prey. If a formidable male had occupied the stronghold of chital “Badgadi” and its immediate surrounds , other tigers would find a little courage to prey on chital there.

Some well-meaning people, who point out that the Panna tiger reserve has a good population of blue bull and therefore there is no dearth of prey for tiger, should consider that blue bull is not a preferred prey of tiger. And compared to cattle it makes a tough quarry as it is much agiler and alert than the cattle, besides it inhabits drier and sparsely vegetated tracts which the tiger usually avoids for such tracts are water deficient and provide little ambush cover. Because tiger has evolved as a specialized forest-edge predator following the cervid-radiation in Asia (Sunquist and Karanth, 1999), its survival and hunting strategies are more cued to cervids than prey found in open habitat. Tigers do not avoid blue bull consciously but preys only sparingly on the blue bull that occupy forest-edge habitat. Moreover, the blue bull is less likely to achieve their optimal densities in these forest habitats. Therefore, in Panna, prey species like nilgai and chinkara may be playing a limited role in the ecology of tigers. The Cervid and the bovid populations usually achieve their maximum densities in a mosaic of forest habitat in Asia, and therefore, these habitats support higher tiger densities

The research carried out by Chundawat in Panna suggests that the tiger’s habitat occupancy is directly linked with water and prey availability but in Panna the productivity of natural prey like chital and sambar has been suboptimal compared to other reserves, even the fawn to yearling survival rate has been very low. Gogate and Chundawat (1997) report that chital is the most preferred prey in Panna (concerning number) and this species is utilized more than its availability. It is only in the case of Panna that chital has been reported as the preferred prey whereas in all other cases so far chital has been reported to be the principal prey and this, perhaps, indicates the absence of habitats that are conducive to the proliferation of chital. Hence in Panna, there is a need to create and maintain such habitats (Mathai Manu Verghese, June 1999, Wildlife Institute of India, Dehradun). Managing the relocated village sites at a seral stage as edge habitats consisting of grassland juxtaposed by woodlands and creating more waterholes should become the prime focus of management.

If data of cattle kill for three consecutive years (2004, 2005 and 2006), for the villages evacuated in 2007, are analyzed, one may be able to draw some useful conclusions. I would also suggest that all the DFOs of the districts which I have listed in this note may be asked to mount a vigil to locate evidence of tiger in their forests and immediately report the presence of any tiger within their respective jurisdictions. As I have said earlier the tiger and its remaining non-PA habitats need more protection outside the PAs than within, the DFOs need to be equipped and made responsible for the protection of tigers within their jurisdictions. But it seems, at present, they appear to be in a state of denial of the threat of poaching and even reluctant to confirm presence of tigers in the areas under their charge ?

In my view, the management needs to begin a planned intervention to augment water availability in water-scarce habitats and try to reclaim the abandoned village sites as grasslands so that the chital, a versatile species, may respond favourably and become more productive. With better habitats, the fawn to yearling survival rate, which is meagre right now, would certainly improve. The another significant intervention required is to equip and make the forest officers, who manage territories around the tiger reserve, responsible for tigers and wildlife so as to protect tigers from poachers and secure breeding areas of the female tigers that extend beyond the boundary of the tiger reserve.

If we could take these measures without losing time – we may hope the return of the tigers to Panna, or else, We may be witnessing the last of the tigers in this unfortunate reserve. I hope that the nomad tigers would come back as the habitat and prey base improve, but I also fear that the unfavourable conditions beyond the safe confines of the tiger reserve may have already decimated the wandering tigers. The fate of the vagrant tigers outside tiger reserve remains uncertain. Outside it is wild-wild west – poachers lurk with their gin-traps, sticks and iron bars and the upset villagers, whose cattle is killed, lie in wait with their devices to electrocute or poison tigers. With this sad scene outside the reserves, there is but a flimsy hope that out of ten straying tigers probably only one would get a safe passage back home. ( P.S. – In 2013, CCMB, Hyderabad published a research paper confirming that one of the cubs born in Panna after reintroduction carries the genes of a tiger thought to have been exterminated before 2009- an undeniable proof that one of the resident tiger that had left PNP had returned and mated with one of the reintroduced tigresses)

Now in the prevailing situation what the female tigers brought from Kanha and Bandhavgarh could do remains to be seen. The chances are – the lucky males that have so far escaped the trap or the live wire will return by the onset of winter when the mating season reaches its peak. It is time, therefore, to ensure – by putting in place pointed protection machinery inside and outside the tiger reserve- that the nomads outside the reserves remain safe and the females within the tiger reserve do not stray out. And by employing a network of informers in the peripheral villages and by swift preemptive actions poachers are kept at bay. Pressure on the poachers must never relax.

( P.S.- The tiger from Pench and the females from Kanha ,Bandhavgarh have successfully resurrected the tiger population in Panna and by 2015 there were around 30 resident tigers in Panna tiger reserve)

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Note : The views expressed above are solely of the author and not written in any official capacity( additions made in 2015).
( The original note written on 26.3.2009 was Sent To Dr. P.B Gango padhyaya, the then CWLW, MP and Shri H.S. Panwar, Member of the Committee constituted by the State Government to inquire into the issue of Vanishing tigers of Panna.)

नोटबंदी ने फीकी की गोवा की चमक

  • पर्यटन विभाग के दावे खोखले
  • अधिकांश गोवा इलेक्ट्रॉनिक भुगतान से दूर

नए साल के स्वागत के लिए गोवा में सैलानियों का जमावड़ा लगने लगा है, लेकिन पहले जैसी रौनक नजर नहीं आ रही। आलम ये है कि पिछले साल के मुकाबले पर्यटन क्षेत्र से जुड़े व्यापारियों की कमाई का आंकड़ा इस बार आधे से भी कम है। खासकर उन व्यापारियों पर सबसे ज्यादा मार पड़ी है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे। दिसंबर से जनवरी तक गोवा में सबसे ज्यादा चहल पहल होती है। पीक सीजन में छोटे बड़े व्यापारी पूरे साल की कमाई कर लेते हैं, मगर नोटबंदी के साइड इफ्ेक्ट के चलते पर्यटन व्यवसाय की कमर टूट गई है। इस सीजन में भी गोवा के अधिकतर होटल, रेस्त्रां खाली पड़े हैं। जो देसी विदेशी सैलानी गोवा पहुंच भी रहे हैं, वो कैश की किल्लत के चलते इलेक्ट्रॉनिक भुगतान को तवज्जो दे रहे हैं। जिसका फायदा केवल सीमित वर्ग को हो रहा है, क्योंकि आज भी गोवा में अधिकतर व्यापारी नकदी पर ही निर्भर हैं। पर्यटन विभाग भले ही गोवा को कैशलेस सिटी घोषित कर रहा हो, मगर हकीकत इससे कोसो दूर है।

आधी हुई कमाई
goaकैंडोलिम बीच के पास स्थित रेस्त्रां इनफर्नो सैलानियों के बीच काफी लोकप्रिय है। नोटबंदी से पहले तक यहां इतनी भीड़ होती थी कि पर्यटकों को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता था। लेकिन आज यहां का नजारा काफी अलग है। अधिकतर कुर्सियां खाली पड़ी हुईं हैं। रेस्त्रां के मैनेजर ने कहा, डीमॉनिटाइजेशन के चलते हमारी कमाई आधी हो गई है। हम शुरू से ही डिजिटल पेमेंट स्वीकारते आ रहे हैं, लेकिन कैश में भुगतान करने वालों की संख्या ज्यादा ही रही है। दिसंबर की शुरुआत से ही हमारे यहां इतने सैलानी आते थे कि सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती थी। अब आप देख ही सकते हैं, मैं कितने आराम से बैठा हूं।

खाली कुर्सियां
इनफर्नो से कुछ ही दूरी पर टीमा नामक रेस्त्रां है। यहां ग्राउंड फ्लोर पर आपको बीयर का लुत्फ उठाते विदेशी सैलानी जरूर नजर आ जाएंगे, लेकिन यदि आप फर्स्ट फ्लोर पर बने रेस्टोरेंट में जाएं तो आपको खाली कुर्सियां ही नजर आएंगी। यहां के कर्मचारियों को डर है कि यदि हालात ऐसे ही बने रहे तो कहीं उन्हें नौकरी से हाथ न धोना पड़े। वेटर योगेश ने कहा, रेस्टोरेंट में काफी कम लोग आ रहे हैं। जो कुछ कुर्सियां भरती हैं, वो रात में ही भरती हैं। दिन में तो हमारे पास ज्यादा काम ही नहीं होता। पिछले साल दिसंबर में काफी भीड़ थी।

शैक भी बेजार
goaबीच पर बने शैक की बात करें तो यहां भी हालात कुछ अलग नहीं है। समुद्र की खूबसूरती को निहारते हुए पेट पूजा करने वालों की संख्या पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। अधिकांश जो सैलानी बीच पर आ रहे हैं, वो कुछ खाने पीने रेस्टबैड पर आराम फरमाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। बॉबी शैक में काम करने वाले पीटर ने कहा, अधिकतर पर्यटकों का यही सवाल होता है कि कार्ड चलेगा? चूंकि अब तक मशीन मिली ही नहीं है, इसलिए हमें मना करना पड़ता है। जो कुछ कमाई हो रही है वो सिर्फ रेस्टबैड से ही हो रही है। क्योंकि ये महज 100 रुपए घंटे में मिल जाता, तो सैलानियों को दिक्कत भी नहीं होती।

हर कोई त्रस्त
नुकसान केवल होटल या रेस्त्रां मालिकों को ही नहीं हुआ है। टैक्सी चलाने वाले, छोटा मोटा सामान बेचने वाले भी त्रस्त है। इन goaदिनों टैक्सी ड्राइवर जयेश का अधिकतर वक्त दोस्तों से बात करने में गुजरता है, जबकि पिछले साल तक उनके पास खाना खाने का भी वक्त नहीं रहता था। जयेश ने कहा, धंधा तो जैसे खत्म ही हो गया है। मापसा बस स्टैंड से कौंडोलिम बीच तक पहले दिन में 5 6 चक्कर लग जाते थे और एक ट्रिप के 500 रुपए मिलते थे। इसके अलावा साइट सीइंग से जो कमाई होती थी वो अलग। अब तो बमुश्किल एक दो चक्कर ही लग पा रहे हैं। कुछ ऐसी ही कहानी कैंडोलिम मार्केट में कपड़ों की दुकान चलाने वाले अल्ताफ की है। अल्ताफ मूलरूप से कश्मीर से हैं और पिछले कई सालों से गोवा में रह रहे हैं। उन्होंने कहा, कमाई तो बहुत कम हो गई है। समझ नहीं आ रहा कि खर्चे कैसे चलेंगे। हमने पीओएस मशीन के लिए अप्लाई किया है, लेकिन उसे आने में वक्त लगेगा।

क्या -क्या बंद होगा
goaकलंगुट बीच पर कपड़ों की दुकान चलाने वाले दिनेश कुमार का हाल भी अल्ताफ की तरह है। मूलरूप से उत्तर भारतीय दिनेश तंज भरे लहजे में कहते हैं, पता नहीं आने वाले दिनों में और क्या क्या बंद होगा। जिनका नाम लेकर नोटबंदी की गई उनकी सेहत पर कोई असर हुआ होगा या नहीं, ये हम नहीं जानते लेकिन हमारी स्थिति बहुत खराब हो गई है। पीक सीजन होने के बावजूद आप देख ही रहे हैं पूरी दुकान खाली पड़ी है। अब इससे ज्यादा और मैं क्या कह सकता हूं।

 

कभी ऐसा नहीं हुआ
जूलियट कार बाइक रेंटल के मालिक मिस्टर डिसूजा कहते हैं, आप देख सकते हैं मेरी सारी गाडि़यां यहीं खड़ी हैं। पिछले साल स्थिति ये थी कि मुझे अपने साथियों की गाडि़यां मांगनी पड़ी थीं। दिसंबर आधे से ज्याद गुजर गया है, लेकिन कमाई न के बराबर हुई है। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि मेरी एक भी गाड़ी किराए पर नहीं गई। देखते हैं आगे क्या होगा।

goagoa

चीनी बहिष्कार में जल रहे अपने भी हाथ!

सोशल मीडिया पर चीनी सामान के बहिष्कार के लिए चलाए जा रहे कैंपेन का काफी असर देखने को मिला है। दीवाली के मौके पर जहां कई दिन पहले से चीनी सामान की बिक्री आसमान छूने लगती थी, वहीं इस बार उसके खरीददारों की संख्या बेहद सीमित है। इसे देखते हुए व्यापारियों ने क्रिसमस और नए साल के ऑर्डर फिलहाल रोक रखे हैं। कैंपेन की आंशिक सफलता पर जहां इसकी शुरुआत करने वाले यह सोचकर खुशी मना सकते हैं कि वो आतंकवाद जैसे मुद्दे पर भी पाकिस्तान का समर्थन करने वाले चीन को नुकसान पहुंचाने में सफल रहे, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। इस बहिष्कार में हमारे अपने हाथ भी जल रहे हैं। चीनी कच्चे chinaमाल की असेंबलिंग पर निर्भर हजारों इकाइयों में इस वक्त चिंता का माहौल है। यदि इसी तरह चीनी माल के आयात को हतोत्साहित करना जारी रहा, तो उनका व्यवसाय पूरी तरह से ठप हो जाएगा। इन इकाइयों से जुड़ें सैंकड़ो कामगार भी अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं।

35 प्रतिशत कमी
दिल्ली इलेक्ट्रिकल्स ट्रेडर्स एसोसिएशन के मुताबिक, इस बार बिक्री में 30 से 35 प्रतिशत की कमी देखने को मिली है। दिवाली की थोक बिक्री 10 से 12 दिन पहले खत्म हो जाया करती थी, लेकिन अभी आधे से ज्यादा माल पड़ा है। इसे देखते हुए कई व्यापारियों ने क्रिसमस और न्यू ईयर के माल का ऑर्डर टाल दिया है। वो दिवाली के बाद हालात का जायजा लेकर कोई कदम उठाएंगे।

स्पष्ट करें नीति
फेडरेशन ऑफ इंडियन एमएसएमई के सेक्रेटरी जनरल अनिल भारद्वाज कहते हैं, अगर हम चीनी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं तो देसी यूनिट को सस्ती मशीनें और कच्चा माल उपलब्ध कराया जाना चाहिए। वहीं, ट्रेड संगठनों ने सरकार से चीनी सामान के आयात को लेकर नीति स्पष्ट करने की मांग की है। ताकि आने वाले त्यौहारों के लिए कारोबारी चीनी माल के प्रति अपना रुख तय कर सकें।

भारी नुकसान
पिछले साल भी चीनी सामान के बहिष्कार को लेकर अभियान छेड़ा गया था, लेकिन उसे खास तवज्जो नहीं मिली। इस साल उरी हमले के बाद देश में पैदा हुए पाक विरोधी माहौल में चीन के प्रति भी लोगों का आक्रोश खुलकर सामने आ रहा है। कई संगठनों ने चीनी सामान के बहिष्कार की अपील की थी, सोशल मीडिया पर अपील के वायरल होते ही चीनी सामान खरीदने वालों की संख्या में अचानक गिरावट दर्ज की गई। जिन व्यापारियों ने पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए इस बार भारी मात्रा में माल मंगाया था, उनके पास फिलहाल आंसू बहाने के लिए कोई और चारा नहीं है। व्यापारियों का कहना है कि दिवाली के लिए मंगाए गए सामान का एक बड़ा हिस्सा अब भी गोदाम में पड़ा है।