एक पैसे में 10 लाख का बीमा

indian-railwaysभारतीय रेलवे ने यात्रियों को दीवाली की सौगात देते हुए महज एक पैसे में दस लाख रुपए का बीमा मुहैया कराने की घोषणा की है। यात्रियों से अब बीमा के लिए 92 पैसे लिए जा रहे थे, लेकिन 31 अक्टूबर के लिए उसे घटाकर एक पैसा कर दिया गया है। हालांकि ये सुविधा केवल उन्हीं को मिलेगी जो आईआरसीटीसी से टिकट बुक कराते हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह योजना 31 अक्टूबर तक बुक होने वाले टिकटों पर लागू होगी। बीमा राशि में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है, वो दस लाख रुपए ही रहेगी।

Parking: रेलवे छुपा रहा इंश्योरेंस की जानकारी

क्या आप जानते हैं कि रेलवे स्टेशन की Parking से अगर आपका वाहन चोरी या क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो आप मुआवजे की मांग कर सकते हैं? रेलवे बोर्ड की पार्किंग पॉलिसी में इसका साफ तौर पर उल्लेख किया गया है, लेकिन अफसोस की बात है कि रेलवे खुद इसकी जानकारी देना Parkingमुनासिब नहीं समझता। उल्टा Parking शुल्क के नाम पर जो रसीद थमाई जाती है, वो और गफलत पैदा करती है। मसलन, रसीद पर बड़े-बड़े शब्दों में अंकित रहता है पार्किंग एट ओनर्स रिस्क, इससे तो यही समझ आता है कि हर तरह के नुकसान की जिम्मेदारी वाहन मालिक की होगी। जबकि ऐसा नहीं है। बोर्ड की पार्किंग पॉलिसी कहती है, यदि पार्किंग परिसर में कोई वाहन क्षतिग्रस्त या चोरी होता है तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी ठेकेदार को उठानी होगी। इतना ही नहीं उसे वाहनों को बीमा कवर मुहैया कराने के लिए निर्धारित तिथि पर प्रीमियम भरना होगा और उसकी एक प्रति कमर्शियल विभाग में जमा करनी होगी। पुणे रेल मंडल की अगर बात करें तो कमर्शियल विभाग और पार्किंग ठेकेदार के बीच जो करार किया गया है, उसमें भी इंश्योरेंस की शर्त शामिल है। इसके बावजूद रेल प्रशासन द्वारा यात्रियों को इस महत्वपूर्ण प्रावधान की जानकारी  नहीं दी जा रही। ऐसा तब है जब पुणे स्टेशन की पार्किंग में वाहनों की सुरक्षा पर कई बार गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं।दरअसल पार्किंग पॉलिसी में बीमे की बात तो कही गई है, लेकिन इसका जिक्र नहीं है कि यह जानकारी यात्रियों को मुहैया कराना अनिवार्य है। इसी को आधार बनाकर रेलमंडल खामोशी से सबकुछ देखते रहते हैं। पुणे में पार्किंग ठेकेदार के खिलाफ कई शिकायतें हैं, मगर कमर्शियल विभाग के प्यार के चलते वो सालों से बचता चला आ रहा है।

क्या किया जा सकता है
पार्किंग स्थल पर शुल्क दर्शाने के लिए जैसे बोर्ड लगाए जाते हैं, ठीक उसी तरह बीमा कवर के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है। साथ ही पार्किंग शुल्क की पर्ची पर भी इसका जिक्र किया जा सकता है। इस पर्ची का खाका रेलवे का कमर्शियल विभाग तैयार करता है, इसलिए बीमे की जानकारी अंकित करना उसके लिए कोई मुश्किल काम नहीं है।

क्या होगा फायदा
पार्किंग कर्मचारी इस बात को बखूबी जानते हैं कि शिकायतों से उनका कुछ बिगडऩे वाला नहीं है। खासकर पुणे में यह कई बार सिद्ध हो चुका है। ऐसे में यदि बीमे की जानकारी यात्रियों को होगी तो कर्मचारियों पर कहीं न कहीं ठीक ढंग से काम करने का मानसिक दबाव रहेगा। क्योंकि लापरवाही की सूरत में क्लेम के आवेदन बढ़ेंगे, जिसका खामियाजा ठेकेदार को उठाना होगा।

परेशानी से डरते हैं
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष हर्षा शाह कहती हैं, रेलवे ने यात्रियों के हित में कई प्रावधान किए हैं, लेकिन उनकी जानकारी आम लोगों shahतक पहुंच नहीं पाती। अगर पार्किंग परिसर में वाहनों का बीमा होता है, तो इससे यात्रियों को अवगत कराया जाना चाहिए। केवल पुणे ही नहीं, अधिकतर स्टेशनों की पार्किंग में वाहनों की दुगर्ती होती है, ऐसे में यदि लोगों को बीमा के बारे में पता होगा तो इससे रेलवे और ठेकेदार दोनों की परेशानियां बढ़ेंगी, संभव है इसलिए अधिकारी खामोश रहते हैं।

कर सकते हैं मांग
मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पीडी पाटिल कहते हैं, अगर पार्किंग परिसर में वाहन क्षतिग्रस्त या चोरी होता है तो उसकी शिकायत ठेकेदार से करनी चाहिए, यदि वो कुछ नहीं करता तो कमर्शियल विभाग से संपर्क करना चाहिए। पीडि़त क्लेम की मांग कर सकता है, इसीलिए इंश्योरेंस का प्रावधान किया गया है।

नहीं तो क्या फायदा?
रिटायर्ड सीनियर डिविजनल कमर्शियल मैनेजर अशोक मल्होत्रा भी मानते हैं कि रेलवे को इंश्योरेंस के बारे में लोगों की जानकारी देनी चाहिए। वे कहते हैं, अगर यात्रियों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर कुछ प्रावधान किए गए हैं, तो उन्हें इसके बारे में पता होना चाहिए। वरना ऐसे प्रावधानों का क्या औचित्य।

कोई सुरक्षा नहीं
पुणे रेलवे स्टेशन की मुख्य गेट और ताड़ीवाला रोड की पार्किंग का ठेका सैयद अफसर इब्राहिम के पास है। दोनों ही जगहों पर वाहनों की  सुरक्षा का कोई ध्यान नहीं रखा जाता। अगर आप चाहें तो अपनी पुरानी गाड़ी लगाकार महज 10 रुपए में किसी दूसरे की नई गाड़ी भी ले जा सकते हैं। क्योंकि पार्किंग कर्मचारी महज वसूली तक ही सीमित रहते हैं। वो ये तक देखना जरूरी नहीं समझते कि जो गाड़ी आप ले जा रहे हैं, वो आपकी है या नहीं। पार्किंग शुल्क की पर्ची पर न तो वाहन का नंबर दर्ज किया जाता है और न ही वापसी पर पर्ची दिखाने की मांग की जाती है। ऐसा नहीं है कि कमर्शियल विभाग को इसकी जानकारी नहीं है। अधिकारी हालात से पूरी तरह वाकिफ हैं, लेकिन फिर भी ठेकेदार पर कार्रवाई का मन नहीं बना पाते। अब इसके पीछे क्या कारण है, ये वही बेहतर समझते हैं।

Natural disaster: संपत्ति बीमा करवाया क्या?

चेन्नई इस वक्त प्राकृतिक आपदा की मार झेल रहा है। अब तक वहां 290 के आसपास लोगों की मौत हो चुकी है और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ है। इससे पहले हरिद्वार, जम्मू-कश्मीर और ओडिशा को भी प्रकृति के कहर का सामना करना पड़ा था। Natural disaster का सिलसिला पिछले chenniकुछ सालों में बहुत तेजी से बढ़ा है। बाढ़ और भूकंप अब आम हो गए हैं। इसे देखते हुए संपत्ति बीमा लेना समझदारी वाला फैसला हो सकता है। कई लोग इस अपनाने भी लगे हैं। यहां हम आपको बीमा और क्लेम से जुड़ी कुछ बातें बता रहे हैं:

बीमा लेने के फायदे
बीमा लेने वाले अधिकतर लोग जीवन या वाहन बीमा तक सीमित रहते हैं। संपत्ति बीमा को हम यह सोचकर नकार देते हैं कि उसे कुछ होने वाला नहीं है। जबकि चेन्नई जैसी घटनाएं एक ही झटके में हमारी सोच को गलत साबित कर देती हैं। आज के वक्त में जीवन और वाहन बीमा के साथ-साथ संपत्ति बीमा भी बहुत महत्वपूर्ण है। संपत्ति बीमा प्राकृतिक आपदा की स्थिति में आपके घर के सामान और निर्माण को होने वाले नुकसान की भरपाई करने में मददगार साबित होता है।

अगर कागजात हो जाएं?
आमतौर पर माना जाता है कि अगर पॉलिसी के कागजात खो गए तो क्लेम हासिल नहीं किया जा सकता। लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। प्राकृतिक आपदा की स्थिति में कंपनियां बीमा धारकों की परेशानी को समझते हुए केवल कुछ जरूरी जानकारी के आधार पर ही क्लेम आवेदन स्वीकार कर लेती हैं। मसलन, इंश्योरेंस का साल, बीमा धारक का नाम, प्रीमियम आदि। इसलिए यदि प्राकृतिक आपदा में आपके इंश्योरेंस के कागजात हो जाते हैं तो घबरवाने की कोई जरूरत नहीं है।

उतना मुश्किल नहीं
विशेषज्ञों के मुताबिक, आपदा की स्थिति में क्लेम लेना अब उतना मुश्किल नहीं है जितना पहले हुआ करता था। बीमाधारक अपने नुकसान का आकलन करते हुए कंपनी की हेल्पलाइन पर इसकी जानकारी दे सकता है या आसपास स्थिति कार्यालय को सूचित कर सकता है। अधिकतर बीमा कंपनियां प्राकृतिक आपदा के लिए एक अलग विंग बनाकर रखती हैं, ताकि क्लेम का निपटारा जल्द किया जा सके। जम्मू-कश्मीर और ओडिशा में आई आपदा के दौरान भी कंपनियों ने इसी तरह से प्रभावितों के आवेदनों को निपटाया था।

LPG: बीमा है पर बताते नहीं

LPG गैस सिलेंडर से होने वाली दुर्घटनाओं में इजाफे के बावजूद अधिकतर उपभोक्ता इस बात से अंजान हैं कि हादसे की स्थिति में वो मुआवजे के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसकी वजह है गैस कंपनियों और डिस्ट्रीब्यूटर स्तर पर होने वाली लापरवाही। सालाना करोड़ों रुपए प्रीमियम का lpgभुगतान करने के बाद भी कंपनियां इस बारे में उपभोक्ता को जानकारी देना मुनासिब नहीं समझतीं। पुणे जिले में 140 के आसपास गैस एजेंसियां हैं और उपभोक्ताओं की संख्या 24 लाख से ज्यादा है। बीते कुछ सालों में जिले में कई दुर्घटनाएं भी हुईं, लेकिन एक भी उपभोक्ता ने अब तक मुआवजे के लिए आवेदन नहीं किया। अधिकारी स्वयं इस बात की पुष्टि करते हैं। कंपनी और डिस्ट्रीब्यूटर दोनों की तरफ से अधिकृत उपभोक्ताओं को बीमा कवर दिया जाता है। कंपनियों की वेबसाइट पर सिटीजन चार्टर के तहत जानकारी भी दी गई है, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर इसे स्वीकारने में दोनों ही कतराते हैं। इस संबंध में जब डिस्ट्रीब्यूटरों से बात की गई तो उन्होंने इसे कंपनी की पॉलिसी करार दिया और कंपनी अधिकारी बीमे को डीलरों की जिम्मेदारी ठहराते रहे।

कहीं जिक्र नहीं
गैस कंपनियों की तरफ से अधिकृत उपभोक्ताओं को ग्राहक पुस्तिका दी जाती है, जिस पर सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश होते हैं। इस पुस्तिका में भी बीमा कवर के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इतना ही नहीं सिलेंडर की डिलेवरी के दौरान मिलने वाली रसीद पर भी बीमे का जिक्र नहीं रहता।

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सबसे ज्यादा ताज्जुब की बात तो ये है कि बीमे की राशि को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। कंपनी अधिकारियों से लेकर डीलर और यहां तक कि महाराष्ट्र गैस डीलर एसोसिएशन के पास भी इसका कोई सीधा जवाब नहीं मिला। हालांकि इंडेन के एक अधिकारी ने इतना जरूर कहा कि डिस्ट्रीब्यूटर की तरफ से 10 लाख का बीमा करवाया जाता है, लेकिन जब उनसे कंपनी के बीमा कवर के बारे पूछा गया तो वो खामोश हो गए।

नियमों का उल्लंघन
जानकारी के मुताबिक कंपनियों के अलावा डीलर स्तर पर भी उपभोक्ताओं का थर्ड पार्टी बीमा कराया जाता है। लेकिन वो भी इस संबंध में उपभोक्ता को कुछ बताना जरूरी नहीं समझते। जबकि नियमानुसार उन्हें डिस्प्ले बोर्ड के माध्यम से इसकी जानकारी देना आवश्यक है। शहर के अधिकांश डिस्ट्रीब्यूटर इस नियम की खुलेआम अवेहलना कर रहे हैं।