J&K: बनेगा एफिल टावर से भी ऊंचा पुल

जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल बन रहा है. इसकी ऊंचाई एफिल टावर से भी 35 मीटर अधिक होगी. 1100 करोड़ की लागत से बनने जा रहे इस पुल के 2019 तक पूरा होने की उम्मीद है. इसके निर्माण में 24,000 टन इस्पात इस्तेमाल किया जाएगा, और यह नदी तल से 358 मीटर ऊंचा होगा. यह पुल चीन की बेईपैन नदी पर बने शुईबाई रेलवे पुल का रिकॉर्ड तोड़ेगा, जो 275 मीटर ऊंचा है.

260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलने वाली हवा को झेलने की क्षमता वाला 1.135 किलोमीटर लंबा यह पुल कटरा और श्रीनगर को जोड़ेगा. संवेदनशील इलाका होने की वजह से पुल की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है.

J&K: ‘सेना की मज़बूरी भी तो समझिए’

जम्मू कश्मीर (J&K) में सेना द्वारा एक युवक को जीप से बांधकर घुमाने का वीडियो सामने आने के बाद कश्मीर के हाल पर चर्चाएं फिर तेज़ गई हैं. कुछ लोग इसे जायज़ ठहरा रहे हैं तो कुछ का कहना है कि ये मानवाधिकारों का खुले तौर पर उल्लंघन है. पूर्व सेनाधिकारी लेफ़्टिनेंट जनरल एच एस पनाग का भी मानना है कि इससे भारतीय सेना की छवि ख़राब हुई है. हालांकि जम्मू-कश्मीर में पदस्थ या वहां सेवाएं दे चुके सैन्यकर्मी विरोध से इत्तेफ़ाक नहीं रखते. उनका कहना है कि घाटी के हालातों की समीक्षा दिल्ली में बैठकर नहीं हो सकती.

सद्भावना के बदले पत्थर
घाटी में चार साल सेवाएं दे चुके एक अधिकारी ने कहा, सेना कश्मीर में सद्भावना मिशन चला रही है, जिसका नारा है ‘आवाम और जवान अमन है मुकाम’ जबकि इसके बदले में हमें गालियां मिलती हैं. हम कश्मीरियों की हिफाजत करते हैं और वो हम पर पत्थर बरसाते हैं. हमारे हाथों में बंदूक ज़रूर होती है, लेकिन वो तमाम क़ानूनी बंदिशों से बंधे होते हैं. हम अच्छे से जानते हैं कि यदि खुद को बचाने में भी किसी पर गोली चल गई तो भविष्य पर कार्रवाई की तलवार लटकती रहेगी. ऐसे में कठोर फैसले केवल तभी लिए जाते हैं जब कोई और संभावना जीवित न हो. सेना पर सवाल उठाने वालों से मेरी यही गुज़ारिश है कि कभी हमारे मानवाधिकारों की भी चिंता करें.

तो आप क्या करेंगे?
कश्मीर में दो साल सेवाएं देने के बाद दिल्ली पदस्थ एक नायाब सूबेदार ने कहा, सेना की हर कार्रवाई पर बयानबाज़ी बिल्कुल वैसी ही है जैसे स्टेडियम में बैठकर बल्लेबाज़ के शॉट पर सवाल उठाना. कश्मीर के हालात को बेहतर वही समझ सकता है, जो वहां दिन-रात गुज़ार रहा है. सवाल उठाने वालों से मैं बस यही पूछना चाहता हूं कि अगर उनकी जान खतरे में हो तो वो पहले हमलावरों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में सोचेंगे या अपनी जान बचाने के बारे में? वहां हाथों में पत्थर लिए भीड़ हमें मारने पर उतारू है, और हम अपनी हिफाज़त के लिए किसी को ढाल भी नहीं बना सकते? वो हर व्यक्ति जिसे लगता है कि सेना गलत कर रही है, उसे कुछ दिन कश्मीर में गुजारकर आना चाहिए.

अगर गोलियां चलाते तो?
वॉलेंटरी रिटायरमेंट ले चुके एक कर्नल कहते हैं, घाटी के हालात बेहद ख़राब हो चुके हैं. पहले आतंकियों से ज्यादा खतरा था, अब वहां का आवाम भी सेना के लिए खतरा बन गया है. अगर आप मानवाधिकारों के चश्मे से देखेंगे तो किसी व्यक्ति को जीप से बांधकर घुमाने को गलत कहा जा सकता है. लेकिन वक़्त की नजाकत के आगे इसका कोई मोल नहीं. अगर सेना सुरक्षित निकलने के लिए गोलियां चलाती, तो शायद स्थिति ज्यादा ख़राब होती. कश्मीर में वो जो कुछ कर रही है, अपने बचाव में कर रही है. यदि उसे आम कश्मीरियों के प्रति हमदर्दी नहीं होती तो विपदाओं के वक़्त वो देवदूत क्यों बनती?

संयम की ज़रूरत किसे?
पंजाब में पदस्थ एक अन्य सैन्यकर्मी का भी मानना है कि सेना को ऐसे मुश्किल फैसले विकट स्थितियों में ही लेने पड़ते हैं. उन्होंने कहा, हर बार संयम बरतने की सलाह सेना को दी जाती है, जबकि ये पाठ कश्मीरियों को पढ़ाया जाना चाहिए. अगर घाटी के लोग आम नागरिकों की तरह रहेंगे, तो फिर ऐसी नौबत ही नहीं आएगी. अकेले सेना ही नहीं, पुलिस को भी निशाना बनाया जाता है, और बड़े अफ़सोस की बात है कि उस वक़्त न तो कश्मीर के नेता हमारे बारे में कोई पोस्ट डालते हैं और न ही उग्र भीड़ को हमारे मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए दोषी ठहराया जाता है.

J&K: सेना के कैंप पर फिर हमला!

indian-armyआतंकवादियों ने एक बार फिर सेना को निशाना बनाया है। रविवार रात को बारामूला में 46 राष्ट्रीय राइफल कैंप पर आतंकियों ने हमला बोला। देर रात तक दोनों ओर से गोलीबारी चलती रही। खबरों के मुताबिक, आतंकवादियों ने सबसे पहले ग्रेनेड से हमला बोला, फिर फायरिंग शुरू कर दी। गौरतलब है कि राष्ट्रीय राइफल्स आतंक निरोधी अभियानों को अंजाम देती है। भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से आशंका जताई जा रही थी कि पाकिस्तानी पलटवार कर सकता है। उधर, जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने ट्वीट में लिखा है, बारामूला के मेरे साथियों ने मुझे फोन करके बताया है कि आसपास गोलीबारी हो रही है। मैं इलाके में लोगों की सलामती की दुआ करता हूं।

‘वो बम फेंक रहे हैं, हमें मार देंगे’

  • हमले से दो दिन पहले ही घर लौटने की इच्छा जताई थी शहीद ने

उरी हमले में शहीद हुए जवानों के परिजन इंसाफ चाहते हैं, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पाकिस्तान को करारा जवाब देने की अपील की है। इस हमले से जहां पूरा देश स्तब्ध है, वहीं यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर कब तक हमारे जवान यूं ही शहीद होते रहेंगे। घाटी में सुरक्षा बल आतंकियों के निशाने पर शुरू से रहे हैं, लेकिन इस तरह भारतीय सीमा में घुसकर आर्मी बेस पर हमला 26 kashmirattackसाल में पहली बार हुआ है। तमाम राजनीतिक दलों ने भी पाकिस्तान के इस कृत्य की निंदा करते हुए सरकार से कहा है कि वो बातों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाए।

मेरा बेटा बहुत छोटा था
हमले में शहीद हुए नायक एसके विद्यार्थी की बेटी ने नम आंखों से कहा, हमलावरों को माकूल जवाब दिया जाना चाहिए। शहीद अशोक की पत्नी का रो रोकर बुरा हाल है। पाकिस्तान को गाली देते हुए वो कहती हैं, पाक को कुत्ता है, उसके बारे में क्या कहूं। शहीद जी दलाई के पिता ने सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए यह सवाल भी उठाया कि आखिर उनके बेटे को वहां क्यों भेजा गया। उन्होंने कहा, मेरा बेटा महज 22 साल का था, जबकि उरी आमतौर पर वरिष्ठों को भेजा जाता है। दलाई की मां ने कहा, उसने गुरुवार को मुझे फोन पर कहा था कि मैं यहां से चला जाऊंगा। यहां बम फेंके जा रहे हैं, वे हमें मार देंगे।

रणनीति तैयार
उधर, सरकार ने पाकिस्तान को घेरने के लिए खास रणनीति तैयार की है। सोमवार को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई इस बैइक में पाक को दुनिया से अलग थलग करने और उसे आतंकी देश घोषित करवाने का फैसला लिया गया है। गौरतलब है कि शुरुआती जांच में आतंकियों के पास से मिले पाकिस्तानी हथियार, जीपीएस डेटा और पश्तो भाषा में लिखे नोट्स बताते हैं कि वो सीमा पार से आए थे। भारत इन्ही सबूतों के बल पर पाक को घेरेगा।

फिर शहीद हुए जवान, फिर मिला कार्रवाई का भरोसा

  • कश्मीर में आर्मी बेस पर सबसे बड़ा हमला

कश्मीर में सुरक्षा बलों को निशाना बनाते हुए आतंकियों ने उरी सेक्टर में मौजूद आर्मी हेडक्वॉर्टर पर रविवार सुबह हमला बोला। जिसमें 17 जवान शहीद हो गए। पिछले 26 सालों में कश्मीर में पहली बार किसी आर्मी बेस पर इतना बड़ा हमला किया गया है। सेना की तरफ से की गई जवाबी कार्रवाई में 5 आतंकियों के मारे जाने की भी खबर है। प्रधानमंत्री ने हमले पर दुख जताते हुए J&Kभरोसा दिलाया है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। जानकारी के मुताबिक, चार फिदायीन आतंकी सुबह 4 बजे एलओसी से सटे उरी सेक्टर में स्थित सेना के मुख्यालय में दाखिल हुए। तार काटकर कैंप में पहुंचने के बाद उन्होंने धमाके किए, साथ ही एडमिनिस्ट्रिेटिव बैरक को भी आग लगा दी। स्थिति को काबू करने के लिए सेना ने पैराकमांडो टीम को मौके पर एयरड्रॉप किया।

इसलिए बड़ा हमला
किसी भी आर्मी बेस कैंप पर किया गया ये सबसे बड़ा हमला है। इससे पहले पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले में 7 जवान शहीद हुए थे। 16 साल पहले दिल्ली के लाल किले में आर्मी बेस पर किए गए हमले में 3 जवान शहीद हुए थे, जबकि इस हमले में 17 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। गौरतलब है कि 2014 में उरी सेक्टर में ही झेलम नदी के रास्ते घुसे 6 आतंकियों ने इस कैंप सहित चार ठिकानों पर हमला किया था। जिसमें सेना के 8 और पुलिस के 3 जवान शहीद हुए थे।

सिखाएंगे सबक
हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर भरोसा दिलाया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। पीएम ने कहा, कायराना आतंकी हमले की हम पुरजोर निंदा करते हैं। मैं देश को भरोसा दिलाता हूं कि इस घिनौने हमले के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। उधर, गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपना रूस दौरा टाल दिया है। राजनाथ ने दोपहर को उच्च स्तरीय बैठक ली, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार भी शामिल थे।

कश्मीर में फिर हमले, जवान शहीद

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कश्मीर में फिर हमलों का सिलसिला शुरू हो गया है। रविवार को पुंछ के अल्लाह पीर में मुठभेड़ के बाद कई इलाकों से इस तरह की खबरें सुनने में आ रही हैं। जानकारी के मुताबिक, आतंकियों ने तीन स्थानों पर घुसपैठ की कोशिश की है। सुरक्षाबलों की ओर की जा रही कार्रवाई में चार आतंकी मारे जा चुके हैं। जबकि एक पुलिसकर्मी भी शहीद हुआ है, साथ ही 3 सुरक्षाकर्मियों के घायल होने की खबर है। आतंकियों ने सुबह अल्लाह पीर इलाके में स्थित मिनी सचिवालय को निशाना बनाया। इसके बाद नौगाम सेक्टर में एलओसी के पास सुरक्षाबलों की उनसे मुठभेड़ हुई। गौरतलब है कि घाटी में माहौल गर्माने के लिए सीमा पार से घुसपैठ की कोशिशें लगातार जारी हैं। तकरीबन दो साल के बाद घाटी के कुछ इलाकों में सेना की तैनाती की गई है। अगर हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए तो फिर से पूरी तरह कमान सेना के हाथ में दी जा सकती है। इसके मद्देनजर घुसपैठ बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

J&K: न पैसा मिल रहा, न शिक्षा

जम्मू कश्मीर (J&K) में चली हिंसा का सबसे ज्यादा खामियाजा उन आम कश्मीरियों और बच्चों को उठाना पड़ रहा है, जिन्हें न बुरहान वानी की मौत से कोई लेना देना है और न खोखली आजादी के नारों से। आठ जुलाई से भड़की हिंसा में अब तक 135 करोड़ रुपए के कारोबार का नुकसान हो चुका है। पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों को सबसे ज्यादा मार सहनी पड़ी है। जो लोग रोज कमाकर खाने वाले हैं, उनके घरों के चूल्हे कई दिनों से जले ही नहीं हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति बच्चों की है। हिंसा के चलते स्कूलों पर ताले लगे हैं। जिन बच्चों की बोर्ड की परीक्षा है, उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि क्या करें। मौजूदा हालातों से राज्य सरकार को भी 300 करोड़ का वित्तीय नुकसान हुआ है।

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Photo credit: Waseem Andrabi /HT Photo

खाली पड़े शिकारे
बुरहान वानी की मौत से पहले तक कश्मीर में सबकुछ सामान्य था। पर्यटकों की आवाजाही से स्थानीय लोगों अच्छी कमाई की आस थी, लेकिन एक ही झटके में सबकुछ खत्म हो गया। खूबसूरत डल झील पर शिकारे पड़े हैं और वो पर्यटकों से कब गुलजार होंगे कोई नहीं जानता। एक बार तो तय है कि आने वाले कई महीनों तक सैलानी कश्मीर का रुख करने वाले नहीं हैं। कश्मीर ट्रेडर्स एंड मैन्यूफैक्चररर्स फेडरेशन के अध्यक्ष मोहम्मद यासीन खान के मुताबिक, रोजाना 135 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है।

हमारा क्या दोष
बच्चों के लिए बुरहान वानी की मौत एक सजा बन गई है। पिछले 50 दिनों से वो पूरी तरह घर में कैद होकर रहे गए हैं। 15 वर्षीय फातिमा शेख सवाल करती हैं, हमें क्यों सजा दी जा रही है। हमें स्कूल जाकर पढ़ाई करनी है, क्यों कोई इस बात को नहीं समझता। स्कूल टीचर इरफान मलिक कहते हैं, बच्चों के बारे में सोचकर बहुत बुरा लगता है। वो बिना कुसूर के सजा भुगत रहे हैं। उनके भविष्य के बारे में न सरकार को चिंता है और न अलगाववादियों को।

J&K आपबीतीः पहचान जाते तो हमें मार देते

जम्मू कश्मीर (J&K ) में हालात अब तक सामान्य नहीं हुए हैं। आतंकी बुरहान वानी की मौत के इतने दिनों बाद भी हिंसा बदस्तूर जारी है। भारत के इस स्वर्ग का दीदार करने के लिए जो लोग घाटी पहुंचे थे, उनमें से कई अब तक वहीं फंसे हुए हैं। जो किसी तरह वापस आने में सफल रहे, वो खुद को खुशनसीब मान रहे हैं। 60 वर्षीय पुणे निवासी चंद्रकांता मेहरा उन्हीं लोगों में से एक हैं। चंद्रकांता कुछ दिनों के लिए अपनी बेटी और दामाद से मिलने कश्मीर गईं थीं, लेकिन हिंसा के चलते उन्हें लंबे समय तक वहीं रहना पड़ा। चंद्रकांता के दामाद सशस्त्र बल में हैं और पिछले काफी वक्त से कश्मीर में पदस्थ हैं। आज का खबरी से बातचीत में चंद्रकांता ने अपनी आपबीती बयां कीः

J&K

“मैं जुलाई के पहले सप्ताह में कश्मीर पहुंची। मेरे बेटी और दामाद मुझे उधमपुर स्टेशन पर लेने आ गए थे। वहां से हमने कार में श्रीनगर तक का सफर तय किया। हसीन वादिया, पहाड़ों का सीना चीरकर बनाई गईं सड़कें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वाकई मैं किसी स्वर्ग में हूं। कुछ घंटों की यात्रा के बाद हम घर पहुंचे। यहां कड़ा पहरा था। चप्पे चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात थे। थोड़ी देर के लिए मुझे समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों, लेकिन जल्द ही इसका जवाब मिल गया।

अगले दिन हमने खूबसूरत डल झील का दीदार किया। जो शिकारा केवल मैंने केवल फिल्मों में देखा था, उस पर सवार होना किसी सपने के पूरे होने जैसा था। शाम को जब घर पहुंचे तो पता ही नहीं था कि डूबते सूरज के साथ कश्मीर में मेरे हसीन पलों का सूरज भी डूबने वाला है। अगली सुबह खबर आई कि बाहर कुछ हुआ है। क्या हुआ है पता नहीं। जब मेरे दामाद आए तो पता चला कि एक आतंकवादी की मौत हुई है। हमने सोचा भी नहीं था कि एक आतंकी के लिए इस कदर लोग सड़कों पर उतर सकते हैं।

जलने लगा कश्मीर
देखते ही देखते पूरे कश्मीर में हिंसा शुरू हो गई। हर रोज किसी के मौत की खबर आती। वो इंसान जो न जाने खुद कितने लोगों की हत्या का दोषी था, उसकी मौत पर इस तरह बेगुनाहों को निशाना बनाते देखना बहुत दुखदायी था। कल तक जिस कश्मीर को मैंने स्वर्ग की तरह देखा था, वो चंद घंटों में ही नर्क से बदतर हो गया था। हमारा हर पल दहशत और खौफ के साये में गुजर रहा था। गनीमत बस इतनी थी कि हम सशस्त्र बलों के घेरे में थे। एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब गोलियों का शोर और नारों की आवाज कानों में न पड़े हों। मुझे 20 जुलाई को वापस पुणे जाना था, लेकिन घर से बाहर निकलने के बारे में हम सोच भी नहीं सकते थे।

J&K

पूरी दुनिया से अलग
पूरा एक महीना ऐसे ही घर पर बैठे बैठे गुजर गए। फोन पर कभी कभी पुणे बात हो जाया करती थी, वहां भी सब लोग बहुत चिंतित थे। फिर एक दिन फोन भी बंद कर दिए गए। हम बाकी दुनिया से पूरी तरह कट गए थे। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम अपने ही देश के किसी हिस्से में हैं। जो फोन जिंदगी का हिस्सा बन गया है, वो लंबे वक्त तक किसी शो पीस की तरह टेबल पर पड़ा रहा। पहली बार मैं इस तरह के माहौल का सामना कर रही थी। शाम होते ही प्रदर्शनकारी गेट के बाहर जमा होकर नारे लगाते थे। मुझे यह देखकर बेहद हैरानी हुई कि नारे लगाने वालों में बच्चे भी शामिल थे। मुंह पर कपड़ा बांधे, हाथों में पत्थर लिए वो क्यों उग्र भीड़ का हिस्सा बन रहे थे, इसका इल्म उन्हें खुद भी नहीं होगा।

काट दिए हाथ!
सुरक्षा बलों की मौजूदगी में जो प्रदर्शनकारी इस तरह नारेबाजी करते थे, उनकी गैरमौजूदगी में वो हमारे साथ क्या करते ये सोचकर भी मेरी रूह कांप जाती थी। 15 अगस्त के मद्देनजर हालात और बिगड़ने की आशंका थी, इसलिए मेरे दामाद ने कहा कि इससे पहले ही निकलना होगा। मौजूदा स्थिति में उधमपुर या जम्मू तक पहुंचना मुमकिन नहीं था, इसलिए हमने फ्लाइट से जाने का फैसला किया। हमारे घर से श्रीनगर एयरपोर्ट की दूरी मुश्किल से आधा घंटा थी। सारी तैयारियां हो चुकी थीं, मगर बाहर से आ रही खबरें हमें किसी एक निर्णय पर कायम होने नहीं दे रही थीं। जिस दिन हमें निकलना था उससे एक रोज पहले जो खबर आई, उसने कुछ देर के लिए मेरी सांसें रोक दीं। इस खबर में कितनी सच्चाई थी, ये तो नहीं पता लेकिन लोग चर्चा जरूर कर रहे थे कि किसी जवान के हाथ काट दिए गए हैं। वो जवान छुट्टी से वापस अपने कैंप लौट रहा था।

J&K

अजनबी पर भरोसा
आखिरकार हमने 11 अगस्त को श्रीनगर से निकलने के फैसले पर मुहर लगाई। अब समस्या यह थी कि एयरपोर्ट तक कैसे पहुंचा जाए। भले ही एयरपोर्ट घर से 30 मिनट की दूरी पर था, लेकिन उग्र प्रदर्शनकारियों के बीच से वहां तक पहुंचना लगभग असंभव था। इसके अलावा सबसे बड़ा सवाल यह भी था कि हमें वहां तक लेकर कौन जाएगा। क्या कोई टैक्सी या रिक्शे वाला अपनी जान जोखिम में डालेगा? सुरक्षा बलों के वाहनों को देखते ही प्रदर्शनकारी बेकाबू हो जाते थे, इसलिए हमें एयरपोर्ट किसी प्राइवेट वाहन से ही जाना था। हमने पास में ही रहने वाले एक टैक्सी ड्राइवर से बात की, पहले तो उसने इंकार कर दिया। मगर थोड़े अनुरोध के बाद वो तैयार हो गया। उसने हमसे कहा कि आपकी फ्लाइट का समय चाहे जो हो, हमें सुबह की पहली अज़ान से पूर्व एयरपोर्ट पहुंचना होगा। क्योंकि अज़ान होते ही प्रदर्शनकारी सड़कों पर कब्जा जमा लेते हैं। हमारी फ्लाइट सुबह आठ बजे थी, लेकिन हमें घर से रात तीन बजे निकलना पड़ा। ड्राइवर पर भरोसा करें या नहीं ये उलझन हमारे दिमाग में थी, पर हमारे पास उस पर भरोसा करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था।

J&K

हम घिर चुके थे
इस बात की प्रबल संभावना थी कि अगर ड्राइवर जिहादी सोच से इत्तेफाक रखता होगा, तो वो हमें एयरपोर्ट के बजाए कहीं और ले जाए। क्योंकि प्रदर्शनकारी सुरक्षा बल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझते हैं। अब तक जिन जवानों के साये में मैं खुद को महफूज महसूस कर रही थी, उस सुरक्षा घेरे से बाहर निकलना एक अजीब सा डर पैदा करने वाला था। सर्द हवाओं में भी मेरे माथे पर पसीना था। हमारी कार सुनसान सड़कों पर दौड़ती जा रही थी, मेरे मन में बस यही सवाल चल रहा था कि 30 मिनट कब पूरे होंगे। तभी अचानक ड्राइवर ने ब्रेक लगाए। सामने कुछ लोग खड़े थे। ड्राइवर ने हमसे सोने का नाटक करने को कहा। अधिकतर लोगों ने अपना चेहरा ढंका हुआ था। उन्होंने कश्मीरी भाषा में ड्रावइर से कुछ कहा। शायद हमारे बारे में पूछ रहे थे। ड्राइवर कार से उतरकर उनसे बात करने लगा। हमारी धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। अगले पल क्या होने वाला है, हमें कुछ पता नहीं था। डर के चलते मेरे हाथ पैर कांपने लगे थे। लगभग 5-6 मिनट के बाद ड्राइवर वापस आया और हम वहां से आगे बढ़ दिए। ड्राइवर हमारी पहचान बता देता तो शायद वो हमें मार देते।

सबसे खौफनाक अनुभव

ये 6 मिनट मेरी जिंदगी का सबसे खौफनाक अनुभव थे। हालांकि मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई थीं। हम थोड़ा सा ही आगे बढ़े होंगे कि एक पत्थर कार की खिड़की के ठीक ऊपर लगा। अगर वो जरा सा भी नीचे लगता तो शायद हमें चोट लग सकती थी। ड्राइवर भी समझ नहीं पा रहा था कि इतनी रात में पत्थर कौन फेंक रहा है। चंद ही सेकंड में उसे इस सवाल का जवाब मिल गया। बाइक पर सवार तीन लड़के तेजी से हमारी कार के पास आ रहे थे। वो शायद हमें रोकना चाहते थे, मगर ड्राइवर ने स्पीड बढ़ा दी। अगले कुछ मिनटों में हम एयरपोर्ट पहुंच गए। एक दिल दहलाने वाले सफर के समाप्त होने की खुशी मेरे चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। हमने ड्राइवर का शुक्रिया अदा किया और अंदर आ गए। अपनी इस कश्मीर यात्रा और उस कश्मीरी ड्राइवर को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी”।

कश्मीर में कब बहाल होगी शांति?

कश्मीर में शांति बहाली एक और कोशिश के बीच बीएसएफ को वहां तैनाती का फैसला लिया गया है। लगभग एक दशक बाद J&Kबीएसएफ घाटी में मोर्चा संभाला है। इसके अलावा सीआरपीएफ की 77 कंपनियों को भी यहां तैनात किया जा रहा है। अलग अलग राज्यों से कंपनियों को रवाना होने के निर्देश दिए गए हैं। गौरतलब है कि इन जवानों को हालात से निपटने के लिए स्पेशल ट्रेनिंग दी गई है। सीआरपीएफ डीजी ने बताया कि हमारे दो हजार से ज्यादा जवान घायल हो चुके हैं। इस समय राज्य में सभी तरह के करीब 50 हजार जवान मौजूद हैं।
पुरानी स्थिति
कश्मीर में हिंसा के बीच आतंकी 6 से ज्यादा रैलियां निकाल चुके हैं। 90 के दशक के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि आतंकियों ने सरेआम रैलियां निकाली हैं। सुरक्षाबलों को उनके बारे में पूरी जानकारी है, मगर उनके हाथ बंधे हुए हैं। वहीं, थलसेना प्रमुख दलबीर सिंह ने सभी पक्षों से बातचीत की अपील की है। उनका कहना है शांति स्थापित करने के लिए सबको साथ आना होगा।

पाकिस्तानी झंडा हटाने के लिए जवान ने लगाई जान की बाजी, फहराया तिरंगा

दक्षिण कश्मीर (J&K) के त्राल में मोबाइल टावर पर लगे पाकिस्तानी झंडे को हटाने के लिए सीआरपीएफ जवान ने अपनी जान की बाजी लगा दी। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जवान ने 50 मीटर ऊंचे टॉवर पर चढ़कर पहले पाक का झंडा निकाला और फिर वहां तिरंगा J&Kफहरा दिया। जवान की इस बहादुरी और तिरंगे के प्रति सम्मान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। मालूम हो कि 8 जुलाई को एनकाउंटर में मारा गया आतंकी बुरहान वानी त्राल का ही रहने वाला था। उसकी मौत के बाद पूरे कश्मीर में तनाव का माहौल है। कई जगहों पर पाकिस्तान झंडे लहराते पहले भी देखे गए हैं।

    इंडिपेडेंस डे के मौके पर आला अफसरों ने सीआरपीएफ जवानों को निर्देश दिए थे कि किसी भी इलाके में पाक झंडा दिखाई नहीं देना चाहिए। सर्चिंग अभियान के दौरान जब कॉन्स्टेबल सचिन कुमार की नजर मोबाइल टॉवर पर लगे पाकिस्तानी झंडे पर पड़ी तो वह बिना वक्त गंवाए टॉवर पर चढ़ गए और वहां तिरंगा फहरा दिया। सचिन के साथियों ने ड्रोन की मदद से इस पूरी घटना का वीडियो तैयार किया, जिसे सोशल मीडिया पर खूब पसंद किया जा रहा है।