क्या परेश रावल ने कुछ गलत कहा?

अरुंधति रॉय को लेकर परेश रावल के बयान पर बवाल मचा हुआ है. उनके पक्ष में जितने लोग हैं, उतनी ही संख्या विरोधियों की भी नज़र आ रही है. परेश अब केवल अभिनेता नहीं बल्कि भाजपा सांसद भी हैं, इसलिए विरोध के स्वर ज्यादा ऊंचे हो गए हैं. और शायद यही एकमात्र वजह है कि उनके शब्दों के चयन पर सवाल उठाए जा सकते हैं. सम्मानित हस्तियों से हमारे देश में मर्यादा का धागा तोड़ने की अपेक्षा नहीं की जाती. वरना आम हिन्दुस्तानियों के मुंह से अरुंधति के लिए इस तरह के शब्द कोई नई बात नहीं है.

बुकर सम्मान मिलने के बाद से अरुंधति की ज़ुबान इतनी तल्ख़ हो गई है कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और सेक्युलर लोगों को छोड़कर उसकी चुभन हर कोई महसूस कर रहा है. कभी वो कश्मीर पर भारत के अधिकार को नाजायज़ ठहराती हैं, तो कभी खून की होली खेलने वाले नक्सली उन्हें शोषित नज़र आते हैं. अरुंधति के लिए भारत सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना एक फैशन बन गया है. जब कैमरों की नज़र और खबरनवीसों की कलम उनसे दूर जाने लगती है, तो वो राष्ट्रविरोधी से दिखने वाले शब्दों में पिरोकर अपने बयान को उछाल देती हैं. इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अरुंधति अपने बयानों से आम देशवासियों की सहनशीलता को परखती रखती हैं. और जब कभी उनके खिलाफ कार्रवाई जैसी सुगबुगाहट शुरू होती है, तो वो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दे देती हैं.

विचारों का प्रवाह सरकार की नीतियों के अनुरूप हो, ये ज़रूरी नहीं. लेकिन जब विचार सीधे तौर पर देश की संप्रभुता से टकराने लगें, उसके असंख्य नागरिकों की भावनाओं को आहत करने लगें, तो उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में नहीं रखा जा सकता. कश्मीर को लेकर अरुंधति के बयान न केवल घाटी की हिंसा में घी का काम करते हैं, अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत के दावों पर सवाल भी उठाते हैं. इसलिए परेश रावल ने जो कहा वो महज़ क्रिया की प्रतिक्रिया है. जब चुभन हद से ज्यादा बढ़ जाए तो कभी-कभी मर्यादाओं की दीवार भी ढह जाती है…

अरुंधति के विवादित बोल

1. भारत 7 से साथ लाख सैनिक भी कश्मीर में तैनात कर दे, वो अपने उद्देश्यों में सफल होने वाला नहीं है (सबसे ताज़ा बयान)

2. कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा. यह एक ऐतिहासिक तथ्य है, जिससे सरकार भी परिचित है (2010 में दिया बयान).

3.मैंने कश्मीर के लोगों को न्याय दिलाने के लिए आवाज़ उठाई है, जो दुनिया के सबसे क्रूर सैन्य कब्जे में जीवन बिता रहे हैं.

4. 99 फीसदी नक्सली आदिवासी है. उनकी जमीन पर बाहर के लोग कब्जा कर रहे हैं तो विरोध जायज है. नक्सल आंदोलन एक सैन्य संघर्ष है. मैं हिंसा समर्थन नहीं करती हूं लेकिन राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर माओवादियों के खिलाफ हो रहे अत्याचार के खिलाफ हूं.

5. 1947 से भारतीय सेना का देश की जनता के खिलाफ इस्तेमाल होता आ रहा है. कश्मीर के लोग आज़ादी चाहते हैं, उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

6. महात्मा गांधी की सोच जातिवादी थी. अपनी किताब ‘द आईडियल भंगी’ में उन्होंने लिखा है, ‘सफाई करने वाले अपने हाथों से मैला उठाएं और उसे एक गड्डे में जमा करें, ताकि वो जमीन उपजाउ बना सके।’

Kashmir: पाक कलाकारों ने दिखाया रंग

कश्मीर (Kashmir) के मुद्दे पाकिस्तानी कलाकारों ने भी अपनी सरकार के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर पाक कलाकारों ने कश्मीर के समर्थन में अभियान छेड़ दिया है। अपने वीडियो संदेशों में ये कलाकार कहते नजर आ रहे हैं कि वो एक मनुष्य हैं और हर हाल में कश्मीर के साथ हैं। यह वीडियो सामने आने के बाद अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या बॉलीवुड में पाकिस्तानी कलाकारों का समर्थन जायज है? गौरतलब है कि पाकिस्तानी कलाकारों पर बैन की मांग का करण जौहर, शाहरुख खान, सलमान सहित कई दिग्गजों ने विरोध किया था।

pakistaniरवैये पर गौर करें
इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा सांसद और पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने कहा, क्या भारत के उन लोगों को जवाब है, जो राजनीति को कला के साथ नहीं मिलाना चाहते? जरा देखिए उनका क्या रवैया है? अब यह यहां रहने वाले ऐसे लोगों की प्रतिक्रिया का वक्त है। वहीं, शिवसेना नेता अरविंद सावंत ने कहा, इन कलाकारों को कश्मीर के मुद्दे पर ही क्यों बात करनी है? उनसे कहो कि पाकिस्तान ने जब हम पर हमला किया है, हमें नुकसान पहुंचाया है, उस पर भी हमें बात करनी है। हम तो शुरू से ही इन लोगों का विरोध करते आ रहे हैं। हमारे देश के लोगों को इन कलाकारों से देशभक्ति सीखने की जरूरत है।

हमसे ज्यादा देशभक्त

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गायक अभिजीत भट्टाचार्य ने कहा, मैं तो पहले से ही कहता आ रहा हूं कि पाकिस्तानी ज्यादा देशभक्त हैं। वो यहां खाते हैं और जब देश की बात आती है तो अपने मुल्क के साथ खड़े हो जाते हैं। हमारे देश में 90 फीसदी फिल्म उद्योग के लोग ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में उनको ज्यादा प्यार करते हैं। हमें तो बॉलीवुड का हिस्सा बनने पर कई बार शर्म आती है। भोजपुरी स्टार रवि किशन कहते हैं, मैंने पहले ही कहा था कि इन लोगों को भारत में काम नहीं देना चाहिए। ये अपने रंग दिखा ही देंगे। जहां तक बात कश्मीर की है तो पहले अपना पाकिस्तान संभालो।

‘अब आतंकी भी उपदेश दे रहे’

  • UN में भारत ने पाकिस्तान को दिया मुंहतोड जवाब

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के वानी राग का भारत ने मुंहतोड़ जवाब दिया है। यूएन में भारत के स्थायी मिशन की फर्स्ट सेक्रेटरी ऐनम गंभीर ने राइट टू रिप्लाई का इस्तेमाल करते हुए पाक को जमकर खरी खोटी सुनाई। गंभीर ने नवाज शरीफ के कश्मीर में मानवाधिकारों की हिमायत करने पर कहा, मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन आतंकवाद है। अगर इसका इस्तेमाल देश की unनीति के तौर पर होता है, तो यह एक युद्ध अपराध है। हमारा देश आतंकवाद को समर्थन देने से जुड़ी पाकिस्तान की लंबे वक्त से चली आ रही पॉलिसी का भुक्तभोगी है। उन्होंने आगे कहा, पाकिस्तान के जहरीले अभियान को पूरी दुनिया महसूस कर रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने आज एक ऐसे देश से मानवाधिकारों और आत्म निर्भरता का उपदेश सुना है, जिसने खुद को वैश्विक आतंकवाद के केंद्र के तौर पर स्थापित किया है। पाकिस्तान एक आतंकी मुल्क है, जो अंतरराष्ट्रीय मदद में मिली अरबों की रकम आतंकवादियों को देता है।

क्या कहा था शरीफ ने
मालूम हो कि पाक पीएम शरीफ ने यूएन महासभा में कश्मीर का मुद्दा उठाते हुए आतंकी वानी को युवा नेता बताया था। शरीफ ने दोनों देशों के बीच शांति बहाली को लेकर कहा कि यह तब तक संभव नहीं है, जब तक कश्मीर मसला नहीं सुलझ जाता। इतना ही नहीं उन्होंने परमाणु संपन्न होने की धमकी भी दी।

‘वो बम फेंक रहे हैं, हमें मार देंगे’

  • हमले से दो दिन पहले ही घर लौटने की इच्छा जताई थी शहीद ने

उरी हमले में शहीद हुए जवानों के परिजन इंसाफ चाहते हैं, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पाकिस्तान को करारा जवाब देने की अपील की है। इस हमले से जहां पूरा देश स्तब्ध है, वहीं यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर कब तक हमारे जवान यूं ही शहीद होते रहेंगे। घाटी में सुरक्षा बल आतंकियों के निशाने पर शुरू से रहे हैं, लेकिन इस तरह भारतीय सीमा में घुसकर आर्मी बेस पर हमला 26 kashmirattackसाल में पहली बार हुआ है। तमाम राजनीतिक दलों ने भी पाकिस्तान के इस कृत्य की निंदा करते हुए सरकार से कहा है कि वो बातों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाए।

मेरा बेटा बहुत छोटा था
हमले में शहीद हुए नायक एसके विद्यार्थी की बेटी ने नम आंखों से कहा, हमलावरों को माकूल जवाब दिया जाना चाहिए। शहीद अशोक की पत्नी का रो रोकर बुरा हाल है। पाकिस्तान को गाली देते हुए वो कहती हैं, पाक को कुत्ता है, उसके बारे में क्या कहूं। शहीद जी दलाई के पिता ने सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए यह सवाल भी उठाया कि आखिर उनके बेटे को वहां क्यों भेजा गया। उन्होंने कहा, मेरा बेटा महज 22 साल का था, जबकि उरी आमतौर पर वरिष्ठों को भेजा जाता है। दलाई की मां ने कहा, उसने गुरुवार को मुझे फोन पर कहा था कि मैं यहां से चला जाऊंगा। यहां बम फेंके जा रहे हैं, वे हमें मार देंगे।

रणनीति तैयार
उधर, सरकार ने पाकिस्तान को घेरने के लिए खास रणनीति तैयार की है। सोमवार को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई इस बैइक में पाक को दुनिया से अलग थलग करने और उसे आतंकी देश घोषित करवाने का फैसला लिया गया है। गौरतलब है कि शुरुआती जांच में आतंकियों के पास से मिले पाकिस्तानी हथियार, जीपीएस डेटा और पश्तो भाषा में लिखे नोट्स बताते हैं कि वो सीमा पार से आए थे। भारत इन्ही सबूतों के बल पर पाक को घेरेगा।

फिर शहीद हुए जवान, फिर मिला कार्रवाई का भरोसा

  • कश्मीर में आर्मी बेस पर सबसे बड़ा हमला

कश्मीर में सुरक्षा बलों को निशाना बनाते हुए आतंकियों ने उरी सेक्टर में मौजूद आर्मी हेडक्वॉर्टर पर रविवार सुबह हमला बोला। जिसमें 17 जवान शहीद हो गए। पिछले 26 सालों में कश्मीर में पहली बार किसी आर्मी बेस पर इतना बड़ा हमला किया गया है। सेना की तरफ से की गई जवाबी कार्रवाई में 5 आतंकियों के मारे जाने की भी खबर है। प्रधानमंत्री ने हमले पर दुख जताते हुए J&Kभरोसा दिलाया है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। जानकारी के मुताबिक, चार फिदायीन आतंकी सुबह 4 बजे एलओसी से सटे उरी सेक्टर में स्थित सेना के मुख्यालय में दाखिल हुए। तार काटकर कैंप में पहुंचने के बाद उन्होंने धमाके किए, साथ ही एडमिनिस्ट्रिेटिव बैरक को भी आग लगा दी। स्थिति को काबू करने के लिए सेना ने पैराकमांडो टीम को मौके पर एयरड्रॉप किया।

इसलिए बड़ा हमला
किसी भी आर्मी बेस कैंप पर किया गया ये सबसे बड़ा हमला है। इससे पहले पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले में 7 जवान शहीद हुए थे। 16 साल पहले दिल्ली के लाल किले में आर्मी बेस पर किए गए हमले में 3 जवान शहीद हुए थे, जबकि इस हमले में 17 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। गौरतलब है कि 2014 में उरी सेक्टर में ही झेलम नदी के रास्ते घुसे 6 आतंकियों ने इस कैंप सहित चार ठिकानों पर हमला किया था। जिसमें सेना के 8 और पुलिस के 3 जवान शहीद हुए थे।

सिखाएंगे सबक
हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर भरोसा दिलाया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। पीएम ने कहा, कायराना आतंकी हमले की हम पुरजोर निंदा करते हैं। मैं देश को भरोसा दिलाता हूं कि इस घिनौने हमले के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। उधर, गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपना रूस दौरा टाल दिया है। राजनाथ ने दोपहर को उच्च स्तरीय बैठक ली, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार भी शामिल थे।

कश्मीर में फिर हमले, जवान शहीद

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कश्मीर में फिर हमलों का सिलसिला शुरू हो गया है। रविवार को पुंछ के अल्लाह पीर में मुठभेड़ के बाद कई इलाकों से इस तरह की खबरें सुनने में आ रही हैं। जानकारी के मुताबिक, आतंकियों ने तीन स्थानों पर घुसपैठ की कोशिश की है। सुरक्षाबलों की ओर की जा रही कार्रवाई में चार आतंकी मारे जा चुके हैं। जबकि एक पुलिसकर्मी भी शहीद हुआ है, साथ ही 3 सुरक्षाकर्मियों के घायल होने की खबर है। आतंकियों ने सुबह अल्लाह पीर इलाके में स्थित मिनी सचिवालय को निशाना बनाया। इसके बाद नौगाम सेक्टर में एलओसी के पास सुरक्षाबलों की उनसे मुठभेड़ हुई। गौरतलब है कि घाटी में माहौल गर्माने के लिए सीमा पार से घुसपैठ की कोशिशें लगातार जारी हैं। तकरीबन दो साल के बाद घाटी के कुछ इलाकों में सेना की तैनाती की गई है। अगर हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए तो फिर से पूरी तरह कमान सेना के हाथ में दी जा सकती है। इसके मद्देनजर घुसपैठ बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

J&K: न पैसा मिल रहा, न शिक्षा

जम्मू कश्मीर (J&K) में चली हिंसा का सबसे ज्यादा खामियाजा उन आम कश्मीरियों और बच्चों को उठाना पड़ रहा है, जिन्हें न बुरहान वानी की मौत से कोई लेना देना है और न खोखली आजादी के नारों से। आठ जुलाई से भड़की हिंसा में अब तक 135 करोड़ रुपए के कारोबार का नुकसान हो चुका है। पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों को सबसे ज्यादा मार सहनी पड़ी है। जो लोग रोज कमाकर खाने वाले हैं, उनके घरों के चूल्हे कई दिनों से जले ही नहीं हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति बच्चों की है। हिंसा के चलते स्कूलों पर ताले लगे हैं। जिन बच्चों की बोर्ड की परीक्षा है, उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि क्या करें। मौजूदा हालातों से राज्य सरकार को भी 300 करोड़ का वित्तीय नुकसान हुआ है।

J&K
Photo credit: Waseem Andrabi /HT Photo

खाली पड़े शिकारे
बुरहान वानी की मौत से पहले तक कश्मीर में सबकुछ सामान्य था। पर्यटकों की आवाजाही से स्थानीय लोगों अच्छी कमाई की आस थी, लेकिन एक ही झटके में सबकुछ खत्म हो गया। खूबसूरत डल झील पर शिकारे पड़े हैं और वो पर्यटकों से कब गुलजार होंगे कोई नहीं जानता। एक बार तो तय है कि आने वाले कई महीनों तक सैलानी कश्मीर का रुख करने वाले नहीं हैं। कश्मीर ट्रेडर्स एंड मैन्यूफैक्चररर्स फेडरेशन के अध्यक्ष मोहम्मद यासीन खान के मुताबिक, रोजाना 135 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है।

हमारा क्या दोष
बच्चों के लिए बुरहान वानी की मौत एक सजा बन गई है। पिछले 50 दिनों से वो पूरी तरह घर में कैद होकर रहे गए हैं। 15 वर्षीय फातिमा शेख सवाल करती हैं, हमें क्यों सजा दी जा रही है। हमें स्कूल जाकर पढ़ाई करनी है, क्यों कोई इस बात को नहीं समझता। स्कूल टीचर इरफान मलिक कहते हैं, बच्चों के बारे में सोचकर बहुत बुरा लगता है। वो बिना कुसूर के सजा भुगत रहे हैं। उनके भविष्य के बारे में न सरकार को चिंता है और न अलगाववादियों को।

J&K आपबीतीः पहचान जाते तो हमें मार देते

जम्मू कश्मीर (J&K ) में हालात अब तक सामान्य नहीं हुए हैं। आतंकी बुरहान वानी की मौत के इतने दिनों बाद भी हिंसा बदस्तूर जारी है। भारत के इस स्वर्ग का दीदार करने के लिए जो लोग घाटी पहुंचे थे, उनमें से कई अब तक वहीं फंसे हुए हैं। जो किसी तरह वापस आने में सफल रहे, वो खुद को खुशनसीब मान रहे हैं। 60 वर्षीय पुणे निवासी चंद्रकांता मेहरा उन्हीं लोगों में से एक हैं। चंद्रकांता कुछ दिनों के लिए अपनी बेटी और दामाद से मिलने कश्मीर गईं थीं, लेकिन हिंसा के चलते उन्हें लंबे समय तक वहीं रहना पड़ा। चंद्रकांता के दामाद सशस्त्र बल में हैं और पिछले काफी वक्त से कश्मीर में पदस्थ हैं। आज का खबरी से बातचीत में चंद्रकांता ने अपनी आपबीती बयां कीः

J&K

“मैं जुलाई के पहले सप्ताह में कश्मीर पहुंची। मेरे बेटी और दामाद मुझे उधमपुर स्टेशन पर लेने आ गए थे। वहां से हमने कार में श्रीनगर तक का सफर तय किया। हसीन वादिया, पहाड़ों का सीना चीरकर बनाई गईं सड़कें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वाकई मैं किसी स्वर्ग में हूं। कुछ घंटों की यात्रा के बाद हम घर पहुंचे। यहां कड़ा पहरा था। चप्पे चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात थे। थोड़ी देर के लिए मुझे समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों, लेकिन जल्द ही इसका जवाब मिल गया।

अगले दिन हमने खूबसूरत डल झील का दीदार किया। जो शिकारा केवल मैंने केवल फिल्मों में देखा था, उस पर सवार होना किसी सपने के पूरे होने जैसा था। शाम को जब घर पहुंचे तो पता ही नहीं था कि डूबते सूरज के साथ कश्मीर में मेरे हसीन पलों का सूरज भी डूबने वाला है। अगली सुबह खबर आई कि बाहर कुछ हुआ है। क्या हुआ है पता नहीं। जब मेरे दामाद आए तो पता चला कि एक आतंकवादी की मौत हुई है। हमने सोचा भी नहीं था कि एक आतंकी के लिए इस कदर लोग सड़कों पर उतर सकते हैं।

जलने लगा कश्मीर
देखते ही देखते पूरे कश्मीर में हिंसा शुरू हो गई। हर रोज किसी के मौत की खबर आती। वो इंसान जो न जाने खुद कितने लोगों की हत्या का दोषी था, उसकी मौत पर इस तरह बेगुनाहों को निशाना बनाते देखना बहुत दुखदायी था। कल तक जिस कश्मीर को मैंने स्वर्ग की तरह देखा था, वो चंद घंटों में ही नर्क से बदतर हो गया था। हमारा हर पल दहशत और खौफ के साये में गुजर रहा था। गनीमत बस इतनी थी कि हम सशस्त्र बलों के घेरे में थे। एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब गोलियों का शोर और नारों की आवाज कानों में न पड़े हों। मुझे 20 जुलाई को वापस पुणे जाना था, लेकिन घर से बाहर निकलने के बारे में हम सोच भी नहीं सकते थे।

J&K

पूरी दुनिया से अलग
पूरा एक महीना ऐसे ही घर पर बैठे बैठे गुजर गए। फोन पर कभी कभी पुणे बात हो जाया करती थी, वहां भी सब लोग बहुत चिंतित थे। फिर एक दिन फोन भी बंद कर दिए गए। हम बाकी दुनिया से पूरी तरह कट गए थे। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम अपने ही देश के किसी हिस्से में हैं। जो फोन जिंदगी का हिस्सा बन गया है, वो लंबे वक्त तक किसी शो पीस की तरह टेबल पर पड़ा रहा। पहली बार मैं इस तरह के माहौल का सामना कर रही थी। शाम होते ही प्रदर्शनकारी गेट के बाहर जमा होकर नारे लगाते थे। मुझे यह देखकर बेहद हैरानी हुई कि नारे लगाने वालों में बच्चे भी शामिल थे। मुंह पर कपड़ा बांधे, हाथों में पत्थर लिए वो क्यों उग्र भीड़ का हिस्सा बन रहे थे, इसका इल्म उन्हें खुद भी नहीं होगा।

काट दिए हाथ!
सुरक्षा बलों की मौजूदगी में जो प्रदर्शनकारी इस तरह नारेबाजी करते थे, उनकी गैरमौजूदगी में वो हमारे साथ क्या करते ये सोचकर भी मेरी रूह कांप जाती थी। 15 अगस्त के मद्देनजर हालात और बिगड़ने की आशंका थी, इसलिए मेरे दामाद ने कहा कि इससे पहले ही निकलना होगा। मौजूदा स्थिति में उधमपुर या जम्मू तक पहुंचना मुमकिन नहीं था, इसलिए हमने फ्लाइट से जाने का फैसला किया। हमारे घर से श्रीनगर एयरपोर्ट की दूरी मुश्किल से आधा घंटा थी। सारी तैयारियां हो चुकी थीं, मगर बाहर से आ रही खबरें हमें किसी एक निर्णय पर कायम होने नहीं दे रही थीं। जिस दिन हमें निकलना था उससे एक रोज पहले जो खबर आई, उसने कुछ देर के लिए मेरी सांसें रोक दीं। इस खबर में कितनी सच्चाई थी, ये तो नहीं पता लेकिन लोग चर्चा जरूर कर रहे थे कि किसी जवान के हाथ काट दिए गए हैं। वो जवान छुट्टी से वापस अपने कैंप लौट रहा था।

J&K

अजनबी पर भरोसा
आखिरकार हमने 11 अगस्त को श्रीनगर से निकलने के फैसले पर मुहर लगाई। अब समस्या यह थी कि एयरपोर्ट तक कैसे पहुंचा जाए। भले ही एयरपोर्ट घर से 30 मिनट की दूरी पर था, लेकिन उग्र प्रदर्शनकारियों के बीच से वहां तक पहुंचना लगभग असंभव था। इसके अलावा सबसे बड़ा सवाल यह भी था कि हमें वहां तक लेकर कौन जाएगा। क्या कोई टैक्सी या रिक्शे वाला अपनी जान जोखिम में डालेगा? सुरक्षा बलों के वाहनों को देखते ही प्रदर्शनकारी बेकाबू हो जाते थे, इसलिए हमें एयरपोर्ट किसी प्राइवेट वाहन से ही जाना था। हमने पास में ही रहने वाले एक टैक्सी ड्राइवर से बात की, पहले तो उसने इंकार कर दिया। मगर थोड़े अनुरोध के बाद वो तैयार हो गया। उसने हमसे कहा कि आपकी फ्लाइट का समय चाहे जो हो, हमें सुबह की पहली अज़ान से पूर्व एयरपोर्ट पहुंचना होगा। क्योंकि अज़ान होते ही प्रदर्शनकारी सड़कों पर कब्जा जमा लेते हैं। हमारी फ्लाइट सुबह आठ बजे थी, लेकिन हमें घर से रात तीन बजे निकलना पड़ा। ड्राइवर पर भरोसा करें या नहीं ये उलझन हमारे दिमाग में थी, पर हमारे पास उस पर भरोसा करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था।

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हम घिर चुके थे
इस बात की प्रबल संभावना थी कि अगर ड्राइवर जिहादी सोच से इत्तेफाक रखता होगा, तो वो हमें एयरपोर्ट के बजाए कहीं और ले जाए। क्योंकि प्रदर्शनकारी सुरक्षा बल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझते हैं। अब तक जिन जवानों के साये में मैं खुद को महफूज महसूस कर रही थी, उस सुरक्षा घेरे से बाहर निकलना एक अजीब सा डर पैदा करने वाला था। सर्द हवाओं में भी मेरे माथे पर पसीना था। हमारी कार सुनसान सड़कों पर दौड़ती जा रही थी, मेरे मन में बस यही सवाल चल रहा था कि 30 मिनट कब पूरे होंगे। तभी अचानक ड्राइवर ने ब्रेक लगाए। सामने कुछ लोग खड़े थे। ड्राइवर ने हमसे सोने का नाटक करने को कहा। अधिकतर लोगों ने अपना चेहरा ढंका हुआ था। उन्होंने कश्मीरी भाषा में ड्रावइर से कुछ कहा। शायद हमारे बारे में पूछ रहे थे। ड्राइवर कार से उतरकर उनसे बात करने लगा। हमारी धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। अगले पल क्या होने वाला है, हमें कुछ पता नहीं था। डर के चलते मेरे हाथ पैर कांपने लगे थे। लगभग 5-6 मिनट के बाद ड्राइवर वापस आया और हम वहां से आगे बढ़ दिए। ड्राइवर हमारी पहचान बता देता तो शायद वो हमें मार देते।

सबसे खौफनाक अनुभव

ये 6 मिनट मेरी जिंदगी का सबसे खौफनाक अनुभव थे। हालांकि मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई थीं। हम थोड़ा सा ही आगे बढ़े होंगे कि एक पत्थर कार की खिड़की के ठीक ऊपर लगा। अगर वो जरा सा भी नीचे लगता तो शायद हमें चोट लग सकती थी। ड्राइवर भी समझ नहीं पा रहा था कि इतनी रात में पत्थर कौन फेंक रहा है। चंद ही सेकंड में उसे इस सवाल का जवाब मिल गया। बाइक पर सवार तीन लड़के तेजी से हमारी कार के पास आ रहे थे। वो शायद हमें रोकना चाहते थे, मगर ड्राइवर ने स्पीड बढ़ा दी। अगले कुछ मिनटों में हम एयरपोर्ट पहुंच गए। एक दिल दहलाने वाले सफर के समाप्त होने की खुशी मेरे चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। हमने ड्राइवर का शुक्रिया अदा किया और अंदर आ गए। अपनी इस कश्मीर यात्रा और उस कश्मीरी ड्राइवर को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी”।

कश्मीर में कब बहाल होगी शांति?

कश्मीर में शांति बहाली एक और कोशिश के बीच बीएसएफ को वहां तैनाती का फैसला लिया गया है। लगभग एक दशक बाद J&Kबीएसएफ घाटी में मोर्चा संभाला है। इसके अलावा सीआरपीएफ की 77 कंपनियों को भी यहां तैनात किया जा रहा है। अलग अलग राज्यों से कंपनियों को रवाना होने के निर्देश दिए गए हैं। गौरतलब है कि इन जवानों को हालात से निपटने के लिए स्पेशल ट्रेनिंग दी गई है। सीआरपीएफ डीजी ने बताया कि हमारे दो हजार से ज्यादा जवान घायल हो चुके हैं। इस समय राज्य में सभी तरह के करीब 50 हजार जवान मौजूद हैं।
पुरानी स्थिति
कश्मीर में हिंसा के बीच आतंकी 6 से ज्यादा रैलियां निकाल चुके हैं। 90 के दशक के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि आतंकियों ने सरेआम रैलियां निकाली हैं। सुरक्षाबलों को उनके बारे में पूरी जानकारी है, मगर उनके हाथ बंधे हुए हैं। वहीं, थलसेना प्रमुख दलबीर सिंह ने सभी पक्षों से बातचीत की अपील की है। उनका कहना है शांति स्थापित करने के लिए सबको साथ आना होगा।

पाकिस्तानी झंडा हटाने के लिए जवान ने लगाई जान की बाजी, फहराया तिरंगा

दक्षिण कश्मीर (J&K) के त्राल में मोबाइल टावर पर लगे पाकिस्तानी झंडे को हटाने के लिए सीआरपीएफ जवान ने अपनी जान की बाजी लगा दी। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जवान ने 50 मीटर ऊंचे टॉवर पर चढ़कर पहले पाक का झंडा निकाला और फिर वहां तिरंगा J&Kफहरा दिया। जवान की इस बहादुरी और तिरंगे के प्रति सम्मान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। मालूम हो कि 8 जुलाई को एनकाउंटर में मारा गया आतंकी बुरहान वानी त्राल का ही रहने वाला था। उसकी मौत के बाद पूरे कश्मीर में तनाव का माहौल है। कई जगहों पर पाकिस्तान झंडे लहराते पहले भी देखे गए हैं।

    इंडिपेडेंस डे के मौके पर आला अफसरों ने सीआरपीएफ जवानों को निर्देश दिए थे कि किसी भी इलाके में पाक झंडा दिखाई नहीं देना चाहिए। सर्चिंग अभियान के दौरान जब कॉन्स्टेबल सचिन कुमार की नजर मोबाइल टॉवर पर लगे पाकिस्तानी झंडे पर पड़ी तो वह बिना वक्त गंवाए टॉवर पर चढ़ गए और वहां तिरंगा फहरा दिया। सचिन के साथियों ने ड्रोन की मदद से इस पूरी घटना का वीडियो तैयार किया, जिसे सोशल मीडिया पर खूब पसंद किया जा रहा है।