तीनों सेनाओं की सलामी में क्यों होता है अंतर?

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क्या आपने कभी गौर किया है कि सेना के अधिकारियों का सलामी देने का तरीका अलग-अलग होता है. मसलन, आर्मी, नेवी और एयर फ़ोर्स के जवान जब सलामी देते हैं, तो उसमें समानता के साथ-साथ कुछ अंतर भी होते हैं. आइए अंतर उनकी वजहों के बारे में जानते हैं:

सबसे पहले बात करते हैं थल सेना यानी आर्मी की. आर्मी में सलामी खुली हथेली से दी जाती है और हाथ को उस व्यक्ति की ओर रखा जाता है जिसे सलामी दी जाती है. इसका आश्य यह दर्शाना है कि सलामी देने वाले के पास कोई हथियार नहीं है और उस पर विश्वास किया जा सकता है.

नेवी में सलामी हथेली को नीचे की ओर रखकर दी जाती है. दरअसल पहले ज़्यादातर काम सैनिक अपने हाथों से करते थे. इस वजह से उनके हाथ चिकने और गंदे हो जाते थे. इसलिए सलामी देते वक़्त हाथ नीचे की ओर रखा जाता था, ताकि वरिष्ठ अधिकारियों को अपमान महसूस न हो. यही परंपरा अब तक चली आ रही है.

वायु सेना में सलामी हाथ को 45 डिग्री के एंगल पर रखकर दी जाती है. यह आसमान में उसके बढ़ते कदमों को दर्शाता है. इससे पहले वायु सेना में सलामी आसमान की तरफ हथेली रखकर दी जाती थी.

Knowledge Booster: ऐसे चुने जाते हैं राष्ट्रपति

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राष्ट्रपति चुनाव (Election of President) के लिए भाजपा और कांग्रेस समर्थन जुटाने में लगे हैं. मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 24 जुलाई को ख़त्म होने जा रहा है. वहीं उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कार्यकाल 10 अगस्त को समाप्त होगा. भारत में राष्ट्रपति चुनाव अमेरिका जैसे देशों से बिल्कुल अलग है. वहां जनता अपने राष्ट्रपति का चुनाव करती है और यहां जनता के प्रतिनिधि उस दायित्व को निभाते हैं. आइए इस चुनाव प्रक्रिया को विस्तार से समझते हैं:

राष्ट्रपति चुनाव निर्वाचन मंडल (इलेक्टोरल कॉलेज) द्वारा किया जाता है. सभी विधानसभाओं के चुने गए सदस्य और लोकसभा एवं राज्यसभा के सांसद चुनाव में वोट डालते हैं. हालांकि जिन सांसदों को राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जाता है उन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं होता. ऐसे ही विधान परिषद् के सदस्य भी इस चुनाव में मताधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते.

राष्ट्रपति चुनाव के लिए विशेष तरीके से वोटिंग होती है. इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम कहा जाता है. यानी एक वोटर केवल एक ही वोट दे सकता है, लेकिन वह उमीदवारों के लिए अपनी वरीयता तय कर सकता है. जैसे वो बैलेट पेपर पर यह बता सकता है कि उसकी पहली, दूसरी या तीसरी पसंद कौन है. सांसद और विधायकों के वोट का वेटेज अलग-अलग होता है. इसी तरह दो राज्यों के विधायकों के वोटों के वेटज भी भिन्न होगा, यह राज्य की जनसंख्या पर निर्भर करता है.

कैसे निकलता है वेटेज
सांसद
सांसदों के वोट का वेटेज निकालने के लिए सबसे पहले सभी विधानसभाओं के चुने गए सदस्यों के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है. फिर योग को लोकसभा और राज्यसभा सांसदों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है. इस तरह जो परिणाम आता है वो एक सांसद के वोट का वेटेज होता है.

विधायक
इसके लिए संबंधित राज्य की जनसंख्या को चुने गए विधायकों की संख्या से भाग दिया जाता है. जो अंक मिलता है उसे फिर 1000 से भाग देकर एक विधायक के वोट का वेटेज निकाला जाता है.

बाकी चुनावों की तरह इस चुनाव में सबसे ज्यादा मत ही जीत तय नहीं करते. राष्ट्रपति वही बनता है, जो सांसदों एवं विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का आधा से ज्यादा हिस्सा हासिल करे. मौजूदा निर्वाचन मंडल के सदस्यों के वोटों का कुल वेटेज 10,98,882 है. इस लिहाज से जीत के लिए उम्मीदवार को 5,49,442 वोट प्राप्त करने होंगे.

Knowledge Booster: चेक पर क्यों लिखे होते हैं 23 नंबर?

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चेक का उपयोग तो आपने कई बार किया होगा, लेकिन क्या आपने कभी उस पर अंकित 23 डिजिट के नंबर पर गौर किया है? चेक पर लिखे हर नंबर का कुछ न कुछ मतलब होता है. आइए आपको इसके बारे में बताते हैं:

चेक नंबर: चेक पर दिए गए पहले 6 नंबर चेक नंबर कहलाते हैं. बैंक में चेक जमा करते वक़्त आपको यही नंबर डिपाजिट स्लिप में भरना होता है. इसके अलावा इसे आप अपने रिकॉर्ड के तौर पर भी चेक बुक में दर्ज करते हैं.

MICR कोड: MICR यानी Magnetic Ink Character Recognition कोड चेक नंबर के बाद के 9 डिजिट होते हैं. यह नंबर दर्शाता है कि चेक किस बैंक से जारी हुआ है. ये तीन भागों में बंटा होता है. पहली तीन डिजिट शहर का पिन कोड होती हैं, जिससे आप यह पता लगा सकते हैं कि चेक किस शहर से है. अगली तीन डिजिट बैंक का यूनिक कोड होती हैं. और सबसे आखिरी की तीन डिजिट बैंक की ब्रांच का कोड होती हैं.

बैंक अकाउंट नंबर: चेक नंबर और MICR कोड के बाद अगली 6 डिजिट बैंक अकाउंट नंबर होती हैं. नई चेक बुक में इसे शामिल किया गया है.

ट्रांजेक्शन ID: आखिरी के दो डिजिट का मतलब है ट्रांजेक्शन ID. अगर ये 29,30 और 31 है तो चेक एट पार है जबकि 09, 10 और 11 का अर्थ है कि चेक लोकल है.

Knowledge Booster: पीएम के बॉडीगार्ड क्यों रखते हैं ब्रीफकेस?

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क्या आपने कभी गौर किया है कि प्रधानमंत्री के साथ सूटबूट में चलने वाले सुरक्षा अधिकारियों के हाथ में ब्रीफकेस क्यों होता है? अधिकतर लोगों को लगता है कि इसमें हथियार होते हैं, जो मुश्किल वक्त में पीएम की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। हालांकि ये ब्रीफकेस हथियारों से कहीं बढ़कर है। प्रधानमंत्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप यानी एसपीजी पर होती है। एसपीजी कमांडो एफएनएफ 2000 असॉल्ट राइफल, ऑटोमैटिक गन और 17 एम जैसे आधुनिक हथियारों से लैस रहते हैं। एसपीजी पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार की सुरक्षा भी संभालती है।

कमांडो के हाथों में जो ब्रीफकेस होता है तो वास्तव में न्यूक्लियर बटन होता है, जिसे पीएम से कुछ दूरी पर रखा जाता है। बेहद पतला दिखने वाले सूटकेस को पोर्टेबल बुलेट फ्रूप शील्ड या पोर्टेबल फोल्डआउट बैलिस्टक शील्ड भी कहा जाता है। मुश्किल परिस्थिति में पीएम को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कमांडो इसे एक झटके में खोल सकते हैं, ये एनआईजी लेवल 3 की सुरक्षा देती है। सामान्य शब्दों में इसे ढाल भी कहा जा सकता है। ब्रीफकेस में एक गुप्त जेब भी होती है, जिसमें पिस्तौल रखी जाती है।


Knowledge Booster: क्या होती है Z, X कैटेगिरी सुरक्षा?

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अति विशिष्ट लोगों को सुरक्षा के घेरे में चलते हुए तो आपने बहुत देखा होगा। आपने Z सिक्योरिटी, Y सिक्योरिटी जैसी श्रेणियों के बारे में भी सुना होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये श्रेणियां वास्तव में होती क्या हैं और किस आधार पर सुरक्षा प्रदान की जाती है? अगर नही तो हम आपको यहां विस्तार से इस बारे में बताने जा रहे हैंः

कैसे मिलती है सुरक्षा?
Z,Xअगर किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति या नेता को जान का खतरा हो तो उसे सुरक्षा मुहैया कराई जाती है। ये सुरक्षा मंत्रियों को मिलने वाली सुरक्षा से अलग है। संबंधित व्यक्ति इस बारे में सरकार से आवेदन करता है और सरकार खुफिया एजेंसियों के जरिए पता लगाती है कि खतरे की बात में कितनी सच्चाई है। यदि खतरे की पुष्टि होती है तो सुरक्षा मुहैया कराई जाती है। गृह सचिव, महानिदेशक और मुख्य सचिव की समिति यह तय करती है कि संबंधित व्यक्ति को किस श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए। हालांकि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जज, राज्यों के गवर्नर, मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री अपने आप ही सुरक्षा के पात्र हो जाते हैं।

कौन करता है सुरक्षा?
पुलिस के साथ साथ कई एजेंसियां हैं जो वीआईपी, वीवीआईपी को सुरक्षा कवर मुहैया कराती हैं। जैसे स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप एनपीजी, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड एनएसजी, भारत तिब्बत सीमा पुलिस आईटीबीपी और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल सीआरपीएफ। वैसे तो विशिष्ट व्यक्ति की सुरक्षा का जिम्मा एनएसजी के कंधों पर ही होता है, लेकिन जिस तरह से जेड प्लस सुरक्षा लेने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है उसे देखते हुए सीआईएसएफ को भी यह काम सौंपा जा रहा है। मौजूदा वक्त में एनएसजी 15 लोगों को जेड प्लस सुरक्षा दे रही है, जबकि सीआईएसएफ भी कुछ को यह सुरक्षा मुहैया करा रही है।

क्या होती हैं श्रेणियां?

  • जेड प्लसः इसके तहत 36 जवानों को सुरक्षा में लगाया जाता है, जिसमें 10 से अधिक एनएसजी कमांडो और पुलिस अधिकारी शामिल होते हैं। अधिकतर नेता इस सुरक्षा घेरे की जुगत में लगे रहते हैं।
  • जेडः इस श्रेणी में 22 जवान सुरक्षा मुहैया कराते हैं, जिसमें 5 एनएसजी कमांडो के साथ पुलिस अधिकारी होते हैं।
  • वाईः इसमें संबंधित व्यक्ति को 11 जवानों का सुरक्षा कवच मिलता है, जिसमें 1 या 2 एनएसजी कमांड और पुलिसकर्मी शामिल होते हैं।
  • एक्सः 5 या 2 जवानों वाले इस सुरक्षा कवच में केवल सशस्त्र जवान ही शामिल होते हैं।

कौन करता है पीएम की सुरक्षा?
प्रधानमंत्री की सुरक्षा का जिम्मा स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप यानी एसपीजी उठाती है। वैसे भूतपूर्व प्रधानमंत्री और उनके परिजनों को भी यह सुरक्षा मिलती है, लेकिन केवल 1 साल के लिए। हालांकि कुछ विशेष कानूनी प्रावधानों के जरिए यह सुविधा राजीव गांधी और अब उनके परिजनों को अनिश्चितकाल के लिए दी गई है।

Knowledge Booster: पैनकार्ड पर क्यों होता है यूनिक नंबर?

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आपने पैनकार्ड का न जाने कितनी बार इस्तेमाल किया होगा, लेकिन क्या आपने कभी उस पर अंकित नंबरों पर गौर किया है? क्या आप जानते हैं कि पैनकार्ड पर दिए गए 10 अंकों के नंबर का मतलब क्या है? दरअसल, पैन पर मौजूद हर नंबर और अक्षर का एक खास मतलब होता है। पहले तीन डिजिट अंग्रेजी के अक्षर होते हैं, जो A से लेकर Z तक कुछ भी हो सकते हैं। ये क्या होंगे और इनका क्रम क्या होगा, इस बात का निर्धारित आयकर विभाग करता है।

knowledgeपैनकार्ड पर दिया गया चौथा अक्षर सबसे खास होता है। इसी से पता चलता है कि पैनकार्ड किसी व्यक्ति का है या कंपनी का। यदि कार्ड पर P अंकित है तो इसका अर्थ है एकल व्यक्ति। अगर F है तो फर्म, C है तो कंपनी। इसी तरह यदि पैनकार्ड पर A -AOP दिया है तो इसका अर्थ है एसोसिएशन ऑफ पर्सन, T – ट्रस्ट, H- HUF हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली, B -BOI बॉडी ऑफ इंडिविजुअल, L- लोकल, J- आर्टिफिशियजल ज्यूडिशियल पर्सन, G- गवर्नमेंट।

पैनकार्ड पर मौजूद पांचवां अक्षर आपके सरनेम से बनता है। यानी अगर आपका सरनेम शर्मा है, तो कार्ड का पांचवां अक्षर होगा एस। आपके सरनेमा का अंग्रेजी का पहला अक्षर आपके पैनकार्ड का पांचवां अक्षर होगा। छठवें डिजिट से लेकर नौवें डिजिट तक अंक होते हैं। जो 0001 से लेकर 9999 तक कुछ भी हो सकता है। यह वे नंबर होते हैं, जिसकी सीरीज पैनकार्ड बनवाते समय आयकर विभाग में चल रही होती है। ठीक आपके वाहन के रजिस्ट्रेशन नंबर की तरह। पैनकार्ड का आखिरी डिजिट एक लेटर होता है, जो एक अल्फाबेट चेक डिजिट है।

Knowledge Booster: जानें वारंटी और गारंटी का अंतर

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सामान खरीदते वक्त आप अक्सर ही वारंटी या गारंटी के बारे में सुनते होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दोनों में क्या अंतर है? अगर नहीं तो यहां हम आपको इनसे रूबरू कराने जा रहे हैं। वैसे तो दोनों के ही अपने फायदे हैं, मगर गारंटी हर हाल में वारंटी से बेहतर रहती है। आइए जानें क्यों?

guaranteeक्या होती है वारंटी?
यदि किसी सामान पर वारंटी दी गई है तो आप खराबी की स्थिति में उसे एक निश्चित अवधि तक रिपेयर करा सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वारंटी में सामान बदलने का विकल्प नहीं होता। यानी अगर आपका प्रॉडेक्ट खराब हो गया तो विक्रेता बिना किसी शुल्क के उसकी मरम्मत करेगा, लेकिन प्रॉडेक्ट रिप्लेस नहीं किया जाएगा। वारंटी को आप अतिरिक्त पैसा देकर बढ़वा भी सकते हैं। अक्सर वारंटी की अवधि गारंटी से अधिक होती है, क्योंकि इसमें कंपनी को प्रॉडेक्ट बदलना नहीं होता।

क्या होती है गारंटी?
गारंटी के तहत आप खराब उत्पाद को बदल सकते हैं। यदि विक्रेता यह पाता है कि उत्पाद में किसी तरह की खराबी है तो वह उसे बदलकर नया दे सकता है। यही वजह है कि अधिकांश कंपनियां गारंटी की अवधि अपेक्षाकृत कम रखती हैं। वारंटी की तरह आप गारंटी को आगे नहीं बढ़वा सकते। वारंटी को लीगल डॉक्यूमेंट की तरह कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन गारंटी को नहीं।

Knowledge Booster: काला कोट ही क्यों पहनते हैं वकील?

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आपने टीवी पर वकीलों को तर्क वितर्क करते तो बहुत देखा होगा, लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि उनके कोट का रंग काला ही क्यों होता है? आमतौर पर यही समझा जाता है कि काला कोट और सफेद पैंट अदालत का ड्रेसकोड है, यह बात सही है लेकिन इसके पीछे की हकीकत से अधिकांश लोग परिचित नहीं हैं। आज हम आपको इसी हकीकत से रूबरू कराने जा रहे हैंः

वकालत की शुरुआत 1327 में एडवर्ड तृतीय द्वारा की गई थी। उस दौरान न्यायाधीशों की वेशभूषा तैयार गई थी, जिसके तहत Knowledge कोर्ट रूम में जज अपने सिर पर एक विग पहनते थे। वकीलों को चार भागों में विभाजित किया गया था, स्टूडेंट, प्लीडर, बेंचर और बैरिस्टर। यह सभी न्यायाधीशों का स्वागत अपने अपने अंदाज में करते थे। उस वक्त गाउन को को लाल कपड़े और भूरे रंग से तैयार किया जाता था। 1601 से वकीलों को कपड़ों में बदलाव की शुरुआत हुई। 1637 में यह प्रस्ताव रखा गया कि काउंसिल को जनता के अनुरूप ही कपड़े पहनने चाहिए।

शोक में मिला कोट
1694 में क्वीन मैरी की गंभीर बीमारी के चलते मौत हो गई थी। उनके पति राजा विलियंस ने सभी न्यायाधीशों और वकीलों को सार्वजनिक रूप में शोक मनाने के लिए काले गाउन पहनकर आने का आदेश दिया। जज और वकीलों ने आदेश का पालन किया, लेकिन शायद विलियंस अपना आदेश रद्द करना भूल गए। जिसके चलते आज भी वकीलों की वेशभूषा लगभग वैसी है। फर्क बस इतना है कि गाउन की जगह अब कोट ने ले ली है। अधिनियम 1961 के तहत वकीलों को अदालतों में सफेद बैंड टाई के साथ काला कोट पहनकर आना अनिवार्य किया गया था। माना जाता है कि यह ड्रेसकोड वकीलों में अनुशासन लाता है और उनमें न्याय के प्रति विश्वास जगाता है।

Knowledge Booster: सफेद ही क्यों होते हैं अधिकतर विमान?

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आपने हवाई जहाज में कई बार सफर किया होगा। अपने घर के ऊपर से उन्हें उड़ते हुए रोज देखते भी होंगे, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि अधिकांश विमानों का रंग सफेद ही क्यों होता है? नॉलेज बूस्टर में आज हम आपको विमानों के रंग से लेकर कुछ अन्य रोचक तथ्य बताने जा रहे हैं, जिनसे शायद आप पहले परिचित न होंः

विमान को सफेद रंग का बनाए जाने के पीछे कई कारण हैं। जैसे यदि हम मूल कारण की बात करें तो सफेद रंग का होने की वजह से दरार या तेल रिसाव जैसी खराबियों को आसानी से पहचाना जा सकता है। जबकि किसी दूसरे रंग में इनकी पहचान थोडी़ मुश्किल flightहै। दूसरा मुख्य कारण ये है कि सफेद रंग गर्मी को आसानी से रिफ्लेक्ट करता है, जिससे 30 हजार फीट की ऊंचाई पर भी विमान ठंडा बना रहता है। इसके अलावा सफेद रंग का होने की वजह से विमान को आसमान में आसानी से देखा जा सकता है, इससे हादसों की आशंका कम रहती है।

विमान के इंटीरियर पर यदि आप गौर करें तो पाएंगे कि इसकी खिड़कियां गोल या घुमावदार होती हैं। दरअसल, ऐसा इसलिए किया गया है कि खिड़कियां हवा के प्रेशर को बर्दाश्त कर सकें। शुरुआती दौर में विमान की खिड़कियां चौकोर हुआ करती थीं और दबाव के चलते वह टूट जाती थीं। खिड़कियां गोल होने से इस पर पड़ने वाला दबाव विभाजित हो जाता है। इससे इनके टूटने की आशंका कम रहती है। एक बात यह भी गौर करने वाली है कि विमान की खिड़कियां ट्रेन या बस की तरह बड़ी क्यों नहीं होतीं? हजारों फीट की ऊंचाई पर दबाव अत्याधिक होता है। खिड़कियां जितनी बड़ी होंगी, उनका कांच टूटने की आशंका इतनी ही ज्यादा रहेगी। इसलिए इनका आकार छोटा रखा जाता है। रही कॉकपिट के शीशे की तो वह काफी मजबूत और महंगा होता है।

यदि आपने विमान में सफर किया है तो आप जरूर जानते होंगे लैंडिंग और टेकऑफ के दौरान खिड़कियां के शटर खोले जाते हैं। इसके पीछे कोई तकनीकी वजह नहीं है, ऐसा ऐहतियात के तौर पर किया जाता है। कई मामलों में विमान में सवार यात्रियों की सजगता के चलते हादसों को टाला जा सके। इसलिए खिड़कियों को खोला जाता है, ताकि टेकऑफ या लैंडिंग के वक्त यात्री किसी खराबी को नोटिस करते हैं तो उसे वक्त रहते दुरुस्त किया जा सके।

Knowledge Booster: जानें क्या है कावेरी विवाद

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कावेरी नदी के पानी और लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु में जंग छिड़ी हुई है। बेंगलुरू सहित राज्य के अलग अलग हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। ताजा विवाद की वजह सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला है, जिसमें तमिलनाडु को 15,000 क्यूसेक पानी देने का जिक्र किया गया है। हालांकि दोनों राज्यों के बीच नदी के पानी को लेकर खिंचातानी बहुत पुरानी है। जब भी मानसून उम्मीदों पर पानी फेरता है, ऐसे ही तलवारें खिंच जाती हैं। आइए इस विवाद को विस्तार से समझते हैंः

kaveriकावेरी का महत्व
कावेरी को दक्षिण की गंगा कहा जाता है। यह एक अंतरराज्यीय नदी है, जो पश्चिमी घाट के पर्वत ब्रह्मगिरी से निकलती है। कर्नाटक और तमिलनाडु कावेरी घाटी में पड़ने वाले प्रमुख राज्य हैं। लगभग 800 किलोमीटर लंबी यह नदी दक्षिण पूर्व में प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

कर्नाटक का तर्क
कर्नाटक का दावा है कि अंग्रेजों के जमाने में कावेरी नदी विवाद को लेकर दोनों राज्यों में जो समझौता हुआ था, उसमें उसे के साथ नाइंसाफी हुई। क्योंकि उसे पानी का उचित हिस्सा नहीं दिया गया। कर्नाटक यह भी कहता है कि चूंकि वह नदी के बहाव के रास्ते में सबसे पहले पड़ता है, इसलिए पानी पर उसका पूरा अधिकार है।

तमिलनाडु की मांग
तमिलनाडु की मांग है कि उसे अपने हिस्से का तिगुना पानी मिलता रहे। दरअसल, कावेरी कोडागु से निकलती है और कर्नाटक, तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरल से बहती है। अब ऐसे में यदि कर्नाटक का हिस्सा बढ़ता है तो तमिलनाडु सहित बाकी राज्यों का हिस्सा खुद ब खुद कम हो जाएगा। तमिलनाडु का कहना है कि यदि पर्याप्त पानी नहीं दिया गया, तो उसके यहां गंभीर जल संकट पैदा हो जाएगा। जिससे कृषि का प्रभावित होना लाजमी है।

kaveriविवाद का इतिहास
कावेरी नदी विवाद अंग्रेजों के जमाने का है। मैसूर राजशाही और मद्रास प्रेजिडेंसी के बीच कावेरी जल बंटवारे को लेकर 1924 में एक समझौता हुआ था। जिसके तहत मैसूर को कन्नमबाड़ी गांव में 44 8 हजार मिलियन क्यूबिक फीट पानी का इस्तेमाल करते हुए एक बांध बनाने की इजाजत मिल गई। यह समझौता अगले 50 सालों के लिए हुआ, और तय किया गया कि ये अवधि समाप्त होने के बाद समझौते की समीक्षा की जाएगी। आजादी के बाद दोनों राज्यों को जल बंटवारे को लेकर चिंता सताने लगी। दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। आजादी के बाद स्टेट ऑफ मैसूर का नाम कर्नाटक पड़ा। आजादी के 12 साल बाद कर्नाटक ने तमिलनाडु से समझौते के कई प्रावधानों में संशोधन की मांग की, मगर उसने इंकार कर दिया।

1970 में कावेरी फैक्ट फाइडिंग कमेटी ने पाया कि तमिलनाडु की सिंचाई योग्य जमीन 1,440,000 एकड़ से बढ़कर 2,580,000 एकड़ हो गई है, जबकि कर्नाटक की सिंचाई योग्य भूमि 680,000 एकड़ है। इसके बाद तमिलनाडु के लिए ज्यादा पानी की मांग ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया। 1972 में केंद्र सरकार द्वारा करवाए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि तमिलनाडु कावेरी का 489 मिलियन क्यूबिक फीट टीएमसी इस्तेमाल करता है। वहीं, कर्नाटक महज 177 टीएमसी फीट।

जब इस विवाद का कोई हल नहीं निकला, तो 1990 में केंद्र सरकार ने जल बंटवारे के लिए कावेरी जल ट्राइब्यूनल का गठन किया। 2007 में ट्राइब्यूनल ने तमिलनाडु को 419, कर्नाटक को 270, केरल को 30 टीएमसी और पुडुचेरी को 7 टीएमसी फीट पानी देना तय किया। हालांकि, कर्नाटक और तमिलनाडु ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने हाल ही में कर्नाटक सरकार को आदेश दिया कि आने वाले दस दिनों तक तमिलनाडु के किसानों के लिए 15000 क्यूसेक पानी छोड़ा जाए।

मानसून की कमजोरी कारण
मानसून के कमजोर रहने पर दोनों राज्यों में जल बंटवारे को लेकर हालात बेकाबू हो जाते हैं। मौजूदा वक्त में भी यही हो रहा है। इस बार उम्मीद जताई गई थी कि मानसून सामान्य रहेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कर्नाटक और तमिलनाडु में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है। कर्नाटक का कहना है कि वह तमिलनाडु की कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए पानी नहीं छोड़ सकता, क्योंकि उसे पेयजल आपूर्ति के लिए अतिरिक्त जल की आवश्यकता है।