Video: Congress MLA Asha Kumari Slaps Woman Constable, Gets Slapped Back

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में हार की समीक्षा करने के लिए शिमला पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अब इस बात की भी समीक्षा करनी चाहिए कि अपने नेताओं के मिजाज को किस तरह ठंडा रखा जाए. एक महिला कांस्टेबल ने जब कांग्रेस विधायक आशा रानी को बैठक में जाने से रोका तो उन्होंने उसे थप्पड़ रसीद कर दिया, हालांकि ये बात अलग है चंद ही सेकंड में उनके गाल भी लाल हो गए. देखिये पूरा video….

Major Prafulla: सच्चाई जाने बिना ही वीडियो कर दिया वायरल

ख़बरों को सबसे जल्दी फ्लैश करने के चक्कर में नामी मीडिया संस्थान यह भी जांचना ज़रूरी नहीं समझते कि खबर सही है या नहीं. शहीद मेजर प्रफुल्ल अंबादास मोहरकर (Major Prafulla) का जो वीडियो मीडिया और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है वो असल में उनका है ही नहीं. हिंदुस्तान, दैनिक जागरण सहित कई दिग्गज मीडिया संस्थानों ने अपनी वेबसाइट पर इस वीडियो को मेजर प्रफुल्ल के आखिरी शब्द बताकर शेयर किया है. जबकि 16 जनवरी 2017 को ये वीडियो सीआरपीएफ यानि केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स ने अपने ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किया था. वीडियो पोस्ट करते हुए ये बताया गया था कि सीआरपीएफ के अस्टिटेंट कमांडेंट सतवंत सिंह ने छत्तीसगढ़ के बस्तर में किस तरह अपनी बहादुरी और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया?

दरअसल वारयल वीडियो 8 साल पहले साल 2009 का है जब असिस्टेंट कमाडेंट सतवंत सिंह छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ एक एनकाउंटर में बुरी तरह घायल हो गए थे. आपको बता दें कि वायरल वीडियो में दिख रहे सतवंत सिंह को बचा लिया गया था. सिंह फिलहाल सीआरपीएफ से रिटायर हो चुके हैं और मुंबई में रिजर्व बैंक ऑफ में तैनात हैं.

आप जानते हैं कि ATM किसके दिमाग की उपज थी?

आज बैंकों से पैसा निकालना पहले जितना मुश्किल नहीं रहा. ATM कार्ड साथ हो, तो पलक-झपकते ही पैसा निकल जाता है. इसके अलावा अब तो ATM द्वारा अपने खातों में पैसा जमा करने की सुविधा भी शुरू हो गई है. ATM के आविष्कार से पहले तक पैसा निकालने या जमा करने के लिए बैंकों में लंबी-लंबी लाइनें लगा करती थीं. अब अधिकांश लोग उस स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकते. हालांकि नोटबंदी ने ज़रूर कुछ महीनों तक लोगों को गुज़रे ज़माने में पहुंचा दिया था. ATM से पैसा निकालते समय क्या कभी आपके मन में आया है कि यह किसके दिमाग की उपज है? सबसे पहला ATM कहाँ लगा और भारत में इसकी शुरुआत कब हुई? आइए हम आपको बताते हैं….

सबसे पहले ATM मशीन का इस्तेमाल 27 जून, 1967 को लंदन के बार्कलेज बैंक में हुआ था. जिस शख्स ने इसका आविष्कार किया उनका नाम था जॉन शेफर्ड बैरन. बहुत कम लोग जानते हैं कि स्कॉटलैंड निवासी बैरन का जन्म 23 जून 1925 को भारत के मेघालय में हुआ था. बैरन के जन्म के समय उनके पिता चिटगांव पोर्ट के कमिश्नरेट के चीफ़ इंजीनियर थे.

कैसे आया ख्याल?
ATM के आविष्कार के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. एक दिन शेफर्ड बैरन को किसी ज़रूरी काम के लिए बैंक से पैसा निकालना था. लेकिन जब तक के बैंक पहुंचे, बैंक बंद हो चुका है. उस वक़्त बैरन को काफी गुस्सा आया. उन्होंने सोचा कि ऐसा कुछ होना चाहिए, जिससे लोग जब चाहें पैसा निकाल सकें. यह विचार मन में आते ही उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया. उनकी कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद लंदन के बार्कलेज बैंक की एक शाखा में दुनिया की पहली ATM मशीन लगी.

भारत में शुरुआत
ATM मशीन की शुरुआत भारत में 1987 के आसपास मानी जाती है. सबसे पहले हांगकांग एंड शंघाई बैंकिंग कॉर्पोरेशन (HSBC) की मुंबई शाखा में ATM मशीन लगाई गई. उसके बाद धीरे-धीरे बाकी बैंकों ने भी इस आविष्कार को अपना अभिन्न अंग बना लिया और आज तो इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

2017 की ये तस्वीरें बताती हैं कि इंसानियत अभी जिंदा है

ऐसे वक़्त में आपकी सौहार्द और भाईचारा राजनीतिक साजिशों की भेंट चढ़ रहा है 2017 की कुछ तस्वीरें बताती हैं कि दुनिया में इंसानियत अभी भी जिंदा है. आइए तस्वीरों के माध्यम से जानते हैं कुछ ऐसे ही लोगों के बारे में जिन्होंने अपनी परवाह किए बिना दूसरों की जिंदगी बचाई..

रोक दिया राष्ट्रपति का काफिला
ऐसे मामले कम ही सुनने में आते हैं जब किसी सामान्य व्यक्ति की जान बचाने के लिए वीवीआईपी को इंतज़ार करवाया जाए. बेंगलुरु ट्रैफिक पुलिस के सब इंस्पेक्टर एमएल निजालिंगप्पा को जब पता चला कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के काफिले की वजह से एक एम्बुलेंस फंसी हुई है, तो उन्होंने राष्ट्रपति के काफिले को रोककर एम्बुलेंस को रास्ता दिया.

मुश्किल वक़्त में मिली मदद
बारिश के दौर में कभी न थमने वाले मुंबई की रफ़्तार भी मंद पड़ जाती है. इस साल जब ऐसा हुआ तो मुंबईवासियों ने बारिश में फंसे लोगों के लिए मदद के दरवाजे खोल दिए. उन्हें खाना-पानी से लेकर ज़रूरत का हर समान मुहैया करवाया गया. पीड़ितों के लिए फ़रिश्ता बनकर आने वालों में कई मुस्लिम परिवार भी शामिल थे. दादर स्थित गुरुद्वारे में 750 लोगों को आसरा दिया गया था.

मिलती है मुफ्त की सवारी
ऑटो वालों पर अक्सर ज़रूरत से ज्यादा पैसे वसूलने के आरोप लगते हैं, लेकिन कर्नाटक निवासी मंजुनाथ निगप्पा ज़रुरतमंदों को मुफ्त में सफ़र करवाते हैं. दिन में मंजुनाथ आम इंसान की तरह नौकरी करते हैं और रात को लोगों की मदद. दिन ढलते ही उनका ऑटो एम्बुलेंस बन जाता है, कोई भी बस एक कॉल पर उनसे सहायता मांग सकता है. इतना ही नहीं अपनी कमाई का कुछ हिस्सा को एक संस्था को दान भी करते हैं.

जवान बने हॉकर का सहारा
उत्तर प्रदेश में जब एक हॉकर की साइकिल चोर ले भागे, तो पुलिसकर्मियों ने मदद का हाथ आगे बढ़ाया. उत्तर प्रदेश पुलिस के डायरेक्टर जनरल के कार्यालय से ट्विटर पर यह स्टोरी पोस्ट की गई थी. पुलिसकर्मियों ने हॉकर को नई साइकिल खरीद के दी, ताकि उसे पैदल न भटकना पड़े.

वीडियो नहीं बनाया, बचाया
टेक्सास में जब एक गाड़ी में डूबने लगी और कोई सहायता नहीं आई, तो आसपास मौजूद लोगों ने इंसानियत का परिचय दिया. लोगों ने मानव श्रृंखला बनाकर कार में फंसे आदमी को सुरक्षित बाहर निकाला. आजकल इस तरह के नज़ारे कम ही देखने को मिलते हैं, क्योंकि लोग किसी की मदद करने के बजाए वीडियो बनाना ज्यादा पसंद करते हैं.

उतर गया 80 फीट गहरे कुंए में
दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जो जानवरों के प्रति भी संवेदना रखते हैं. राजस्थान के अलवर में जब एक आवारा कुत्ता 80 फीट गहरे कुएं में गिर गया तो एक शख्स अपनी जान दांव पर लगाकर उसकी जान बचाई. स्थानीय एनजीओ की मदद से वो शख्स रस्सी के सहारे कुएं में उतरा और कुत्ते को बाहर निकालकर लाया.

ऑटो वाला बना मिसाल
वरिजाश्री वेनुगोपाल को वीजा इंटरव्यू के लिए 5 हजार की ज़रूरत थी, लेकिन किसी भी एटीएम से पैसे नहीं निकल रहे थे. ऐसे मुश्किल वक़्त में एक ऑटो ड्राइवर ने उनकी सहायता की. उस ड्राइवर ने अपने पास से पांच हजार रुपए वरिजाश्री को दिए. हालांकि वरिजाश्री को सिर्फ एक सवारी के रूप में ही जानते थे, फिर भी वो मदद के लिए तैयार हो गए. सोशल मीडिया पर यह स्टोरी काफी वायरल हुई थी.

फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से क्यों डर रहे हैं नेता?

आपराधिक मामलों का सामना कर रहे नेता इन दिनों खौफ में हैं. इस खौफ की वजह मोदी सरकार का वह हलफनामा जिसमें उसने आपराधिक मामलों में शामिल सांसद और विधायकों के मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालत बनाने की बात कही थी. नेताओं की बेचैनी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने राज्यसभा में इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया. उन्होंने इस संबंध में संविधान की धारा 15 का उल्लेख करते हुए कहा, जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता. मैं सांसद और विधायक को अलग जाति मानता हूँ. तो फिर किस आधार पर सरकार सांसदों और विधायकों के लिए अलग अदालत बना सकती है?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय का मानना है कि जब नेताओं को स्पेशल स्टेटस चाहिए, तो फिर स्पेशल कोर्ट क्यों नहीं? उनके मुताबिक, देश में सांसद-विधायकों पर 1500 से ज्यादा आपराधिक मामले चल रहे हैं. यही वजह है कि उपाध्याय ने कोर्ट से गुहार लगायी है कि ऐसे मामलों के निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट बनाया जाए.

महाराष्ट्र सबसे आगे
एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) के अनुसार 2014 में लोकसभा में चुनकर आए 542 सांसदों में से 185 आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो देश के 34 फीसदी सांसद आपराधिक रिकॉर्ड वाले हैं. 2009 की लोकसभा में यह आंकड़ा 158 था. राज्यों के हिसाब से देखा जाए तो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसद हैं. दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश और फिर बिहार का नंबर आता है.

Gujarat: इस जीत में छिपी हैं चिंताएं!

गुजरात (Gujarat) में भाजपा ने लगातार छठवीं बार सत्ता पर कब्ज़ा ज़रूर कर लिए है, लेकिन इस जीत में कई चिंताएं भी छुपी हैं. जिस तरह के प्रचंड बहुमत की उम्मीद नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह कर रहे थे, वोट का आंकड़ा उससे काफी दूर रहा. भाजपा यहां 100 के फेर में ही उलझ गई, जबकि पिछली बार यानी 2012 के विधानसभा चुनाव में उसने 115 सीटें हासिल की थी. इस बात में कोई दोराय नहीं कि जो जीता, वही सिकंदर, लेकिन गिरता वोट प्रतिशत कहीं न कहीं दर्शाता है कि गुजरात की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के कामकाज से खुश नहीं था. जहाँ तक बात हिमाचल की है, तो वहां नरेंद्र मोदी लहर पूरी तरह नज़र आई. राज्य की जनता ने कांग्रेस को काफी गंभीर चोटें दी हैं. हिमाचल में एक तरह से यह साफ़ हो गया था कि जनता सत्ता परिवर्तन चाहती है. क्योंकि कांग्रेस उसकी उम्मीदों के अनुरूप शासन देने में नाकाम रही. पार्टी नेता जनता की सुध लेने के बजाए अपने लड़ाई-झगड़े सुलझाने में ही लगे रहे.

फायदे में कांग्रेस
गुजरात के नतीजे भाजपा के पक्ष में ज़रूर हैं, मगर कांग्रेस राज्य में मज़बूत होती दिखाई दे रही है. अगर पिछले चुनाव से तुलना की जाए, तो पार्टी का रिकॉर्ड सुधरा है. 2012 में कांग्रेस को 61 सीटें मिलीं थीं और इस बार वो 80 के आंकड़े को पार कर गई है. उसे 20 से ज्यादा सीटों का फायदा मिला है. सौराष्ट्र में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा हुआ है. जबकि भाजपा को अपने गढ़ में उम्मीद माफिक परिणाम नहीं मिले हैं. इसके अलावा पटेल बहुल इलाकों में भी भाजपा को नुकसान झेलना पड़ा है.

भाजपा को नुकसान
गुजरात भाजपा को इस बार सीधे तौर पर 19 से 20 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है. 182 सीटों वाले राज्य में 20 सीटों पर हार काफी मायने रखती है. हालांकि इसके पीछे हार्दिक पटेल फैक्टर ने भी काम किया है. भाजपा यदि पटेल को अपने पाले में करने में कामयाब रहती तो जिस प्रचंड जीत के दावे पीएम मोदी और शाह कर रहे थे उसे हासिल किया जा सकता था.

नहीं संभले तो….
गुजरात के नतीजे इशारा कर रहे हैं कि लोगों में भाजपा को लेकर सोच बदल रही है. आलाकमान को ख़ुशी मानाने के साथ ही मंथन भी करना होगा, अन्यथा आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है. भाजपा की जीत के एक बड़ी वजह यह भी रही कि लोग राहुल गांधी को उतना परिपक्व नहीं मानते हैं. कांग्रेस पर भरोसा करने के उनके पास वाजिब कारण नहीं हैं. ये स्थिति काफी हद तक बिल्कुल वैसी ही है, जैसी 2014 से पहले भाजपा की थी. लेकिन समय बदला और भाजपा ने सारे समीकरण बदल दिए. इसलिए भाजपा को भी इसी नज़रिए से सोचना होगा.

दोस्त हो तो ऐसा! इस अभिनेता ने अपने दोस्तों को दिए एक-एक मिलियन डॉलर

दोस्ती के किस्से तो आपने बहुत सुने होंगे, लेकिन ये सबसे अलग है. हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता जॉर्ज क्लूनी (George Clooney) ने अपने 14 सबसे करीबी दोस्तों को एक-एक मिलियन डॉलर उपहार के तौर पर दिए हैं. क्लूनी के दोस्त रानडे गेरबेर ने इस बात का खुलासा किया है. गेरबेर के मुताबिक 2013 में क्लूनी ने अपने घर पर एक डिनर रखा था, जिसमें उनके अलावा 13 अन्य दोस्तों को आमंत्रित किया गया था. जब सभी दोस्त आए, तो क्लूनी ने उनसे कुर्सियों पर रखे 14 सूटकेस खोलने को कहा. जैसे कि उन्होंने सूटकेस खोला, उनकी आँखें खुली रह गईं. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, क्लूनी ने कहा, “मैं आप लोगों को बताना चाहता हूँ कि मेरे जीवन में आप क्या मायने रखते हैं. जब मैं लॉस एंजिल्स आया, तो मैंने सड़कों पर रातें गुजरीं. मैं खुद को भाग्यशाली समझता हूँ कि उस मुश्किल वक़्त में आप सभी मेरा साथ देने के लिए मौजूद थे. अगर आप न होते थे मैं कभी इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता”.

टैक्स भी भरा
क्लूनी ने आगे कहा, “यह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था, आज भी जब हम एक साथ हैं, तो मैं आपको कुछ वापस देना चाहता हूँ”. गेरबेर के मुताबिक, सूटकेस में पैसों के साथ एक-एक रसीद भी रखी हुई थी, जब हमने उसे देखा तो पता चला कि क्लूनी ने टैक्स भी खुद भी भर दिया था, ताकि सभी दोस्त पूरी राशि घर ले जा सकें.

कोई चिंता नहीं
क्लूनी ने अपने दोस्तों से कहा, “अब आपको अपने बच्चों की पढ़ाई की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, आपको अपने कर्ज को लेकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. इतना ही नहीं मैंने सभी का टैक्स भी भर दिया है, अब यह एक मिलियन आपके हैं”. गेरबेर मशहूर मॉडल सिंडी क्रॉफोर्ड के पति हैं और क्लूनी के बिज़नेस पार्टनर भी. पहले उन्होंने एक मिलियन डॉलर लेने से इंकार किया, लेकिन जब क्लूनी ने जोर दिया तो मना नहीं कर सके. हालांकि गेरबेर का कहना है कि वे इस राशि को दान कर देंगे.

जब बाजुओं में दम था-सब दीवाने थे, जब उम्र बढ़ी-अकेला छोड़ गए!

किसी ज़माने में अपने बाजुओं की ताकत से विश्व विख्यात बॉक्सर मोहम्मद अली को टक्कर देने वाले कौर सिंह (kaur singh) आज दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं. आलम ये है कि उन्हें अपने इलाज के लिए प्राइवेट फाइनेंसर से 2 लाख रुपए उधार लेने पड़े हैं. कौर सिंह एकमात्र ऐसी बॉक्सर हैं, जिन्हें 1980 में एक एग्बिज़ीशन मैच के दौरान मोहम्मद अली से लड़ने मौका मिला. इतना ही नहीं 1982 के एशियाई खेलों में उन्होंने भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता था. इस उपलब्धि के लिए सरकार ने कौर को पहले अर्जुन अवॉर्ड और 1983 में पद्मश्री से सम्मानित किया. 1984 में कौर सिंह ने लॉस एंजलिस ओलिंपिक में लगातार को बाउट जीतकर सबको चौंका दिया था.

सेना का वीर
कौर सिंह का सफ़र 1971 में सेना में हवलदार के रूप में शुरू हुआ. ये वही दौर था जब भारत और पाकिस्तान जंग के मैदान में आमने-सामने थे. सिंह ने इस युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया था, जिसके लिए सेना ने उन्हें बहादुरी सम्मान से नवाजा. रिटायर्ड होने के बाद वे पंजाब स्थित अपने गाँव वापस आ गए. गुज़रते वक्त के साथ-साथ कौर सिंह गुमनामी के अंधेरे में खोते गए. न तो सरकार ने और न ही किसी चाहने वाले ने उनकी सुध ली.
देर से सही पर मदद आई
उन्हें दिल की बीमारी के इलाज के लिए पैसे उधार लेने पड़े. हालांकि सेना ने 3 लाख रुपए की मदद ज़रूर की, लेकिन ये रकम इलाज के लिए काफी नहीं थी. कौर सिंह का मामला जब सुर्ख़ियों में आया तब कहीं जाकर केंद्र सरकार की नींद खुली और खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने नेशनल वेलफ़ेयर फंड फॉर स्पोर्ट्स पर्सन्स से कौर सिंह को 5 लाख रुपये देने की घोषणा की है. सरकार के इस कदम की सराहना हुई, लेकिन सवाल भी ज़रूर उठे कि क्या देश का नाम रौशन करने वालों के प्रति सरकारी उदासीनता कब समाप्त होगी?

तिरेंगे में क्यों लिपटे थे शशि कपूर?

बीते दिनों जब बॉलीवुड अभिनेता शशि कपूर का निधन हुआ, तो ज़्यादातर लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर उनके शव को तिरंगे में क्यों लपेटा गया. उनके मन में यह सवाल था कि शशि कपूर कोई विख्यात नेता या मुख्यमंत्री भी नहीं रहे, तो फिर ऐसा क्यों किया गया? दरअसल, शशि कपूर पद्म विभूषण से सम्मानित थे, इसलिए उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई. उनके शव को तिरंगे में लपेटा गया और पुलिस ने उन्हें बंदूकों की सलामी दी.

किसे मिलता है राजकीय सम्मान
भारत में वर्तमान और पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्री मंत्री और मुख्यमंत्रियों को राजकीय सम्मान दिया जाता है. इसके अलावा अगर केंद्र और राज्य सरकारें चाहें तो वह देश के किसी भी सम्मानित व्यक्ति को यह सम्मान दिला सकती हैं.

क्या है प्रक्रिया
राजनीति, साहित्य, विज्ञान, कानून और कला क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली हस्तियों को यह सम्मान दिया जा सकता है. साथ ही भारत रत्न, पद्म विभूषण और पद्म भूषण प्राप्त शख्स भी इसके हक़दार हो सकते हैं. हालांकि इसके लिए केंद्र या राज्य सरकार को इसकी सिफारिश करनी होती है. निर्णय लेने के बाद राज्य के डीजीपी को इससे अवगत कराया जाता है, ताकि अंतिम संस्कार के समय राजकीय सम्मान की तैयारी की जा सके.

योगी राज में उत्तर प्रदेश (UP) पुलिस बिना किसी सियासी खौफ़ के काम कर रही है…इसकी एक बानगी उस वक़्त देखने को मिली जब अपने समर्थकों को छुड़ाने थाने पहुंचीं  सपा महिला नेता को SSP मंजिल सैनी ने खूब फटकार लगाई. आप भी देखिये यह VIDEO: