आधा खाना किसके लिए छोड़ता है ये डॉग?

अगर आप कुत्तों से प्यार करते हैं, तो ये खबर आपके लिए है. हालांकि इसे पढ़कर आपकी आंखें ज़रूर नम हो जाएंगी. यह खबर एक ट्वीट के ज़रिये दुनिया के सामने आई, और देखते ही देखते इसने लोगों को भावुक कर दिया. दरअसल @_EasyBreasy_ नामक यूजर ने कुछ दिनों पहले ट्विटर पर अपने डॉग्स स्टिच, कुकी और उनके खाने के बर्तन की तस्वीरें साझा कीं. उस बर्तन में आधा खाना बचा हुआ था. यूजर कैप्शन में लिखा है कि उनके घर में सिर्फ एक ही बर्तन था, जिसमें  स्टिच और कुकी खाना खाते थे. कुकी पहले आधा खाना खाकर आधा अपने साथी स्टिच के लिए छोड़ देता था. स्टिच बाद में उसे खाती थी, लेकिन दुःख की बात यह है कि स्टिच अब इस दुनिया में नहीं है. कुछ समय पहले ही उसकी मौत हो गई, लेकिन कुकी अभी भी उसके लिए बर्तन में आधा खाना छोड़ता है.

करता है इंतज़ार
यूजर के मुताबिक कुकी कितना भी भूखा हो, वो आधा खाना ही खाता है. उसे इंतज़ार रहता है कि स्टिच अपना आधा खाना खाने आएगी. हमें लगा था कि कुकी धीरे-धीरे नॉर्मल हो जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. वो अब तक स्टिच को नहीं भूल पाया है. हर रोज़ वो आधा खाना बर्तन में ही छोड़ देता है. इस ट्वीट को 41 हज़ार से ज्यादा लाइक मिल चुके हैं, और तकरीबन 19,500 बार री-ट्वीट किया जा चुका है.

घोड़े ने मालिक को ऐसे दी अंतिम विदाई

किसी अपने के बिछड़ने का गम जितना इंसानों को होता है, उतना जानवरों को भी। ब्राजील निवासी वॉग्नर डी लीमा की नए साल के पहले दिन एक सड़क हादसे में मौत हो गई। उनकी अंतिम यात्रा में परिवार के सदस्यों के अलावा जिसकी आंखें सबसे ज्यादा नम थीं, वो उनका घोड़ा था। घोड़े ने न केवल कॉफिन से सिर लगाकर अपने मालिक को अंतिम विदाई दी, बल्कि पूरे रास्ते वो जोर जोर से आवाज निकालता रहा। अंतिम यात्रा में शामिल हर शख्स का दुख सेरेनो नामक इस घोड़े के दर्द को देखकर दोगुना हो गया। वॉग्नर का भाई वैंडो सेरेनो को अंतिम यात्रा में इसलिए लेकर आया था, ताकि वो जान सके कि उसका मालिक अब कभी लौटकर नहीं आएगा।

सबकुछ था उसका
वैंडो ने कहा, यह घोड़ा वॉग्नर के लिए सबकुछ था। दोनों एक दूसरे की जान थे, इसलिए मैं नहीं चाहता था कि सेरेनो अपने मालिक को आखिरी बार देखने से महरूम रह जाए। पूरी यात्रा के दौरान सेरेनो कभी जोर जोर से आवाजें निकालता, कभी एक ही जगह खड़ा हो जाता। वो बीच बीच में वॉग्नर के कॉफिन से जाकर अपना सिर टकराता।

मानो रो रहा हो
नए साल के पहले दिन वॉग्नर की बाइक नियंत्रण खोने के चलते दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। वॉग्नर को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन दो गंभीर ऑपरेशन के बावजूद भी उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। वॉग्नर एक कॉउबॉय था और पिछले आठ सालों के सेरेनो के साथ परफॉर्म कर रहा था। दोनों ने दर्जनों पुरस्कार और कैश प्राइज़ जीते थे। वॉग्नर की दोस्त लिमिरा ने कहा, एक घोड़े को इस तरह से रोते देखना अविश्वसनीय था। यदि मैं अपनी आंखों से नहीं देखती तो शायद मुझे विश्वास ही नहीं होता। जैसे ही हम कॉफिन को ले जाने लगे, सेरेनो ने जोर जोर से आवाजें निकालना शुरू कर दिया मानो वो रो रहा हो। इसके बाद उसने जोर जोर से अपने पैरों को जमीन पर पटकना शुरू कर दिया।

नोटबंदी के चलते बैंक के बाहर लगी कतार एक खुन्नस खाई प्रेमिका के लिए वरदान साबित हुई। लड़की ने जैसे ही लाइन में लगे atmअपने चार साल पुराने प्रेमी को देखा, तो उसने तुरंत अपने भाई को बुलाया लिया। इसके बाद दोनों ने मिलकर प्रेमी की जमकर पिटाई की। लड़की का कहना है कि दोनों के बीच चार साल पहले काफी प्यार था। लेकिन प्रेमी अचानक उसे छोड़कर भाग गया। सोमवार को जब लाइन में वो उसे नजर आया तो उसका गुस्सा फूट पड़ा। उसने प्रेमी को सबक सिखाने के लिए तुरंत अपने भाई और पिता को फोन कर बुला लिया। जिन्होंने मौके पर पहुंचकर लड़के की पिटाई कर डाली। पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है और घायल पूर्व प्रेमी को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

कुत्ते की याद में बना दिया बस स्टॉप

dogअपने चाहने वालों की याद में लोग क्या क्या नहीं करते, फिर चाहे वह इंसान हो या जानवर। केरल पल्लीपुरम गांव के लोगों ने अपने प्रिय कुत्ते को श्रद्धांजलि देते हुए उसके नाम पर बस स्टॉप बनवाया है। इस बस स्टॉप का नाम कुत्ते के नाम पर उड्डनम रखा गया है। उड्डनम 9 साल पहले गांव में आया था। उसके बाद से वो गांववासियों की जिंदगी का हिस्सा बन गया।

    पूरा गांव उड्डनम को बेहद चाहता था। कुत्ते की मौत के 40वें दिन एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। आमतौर पर ऐसी सभाएं इंसानों की याद में होती हैं। इसके बाद गांव वालों ने उड्डनम की याद में एक बस स्टॉप और वेटिंग स्टैंड का निर्माण करवाया। खास बात ये है कि बस स्टॉप के पास कुत्ते की बड़ी बड़ी तस्वीरें भी लगी हुई हैं। उड्डनम की मौत करीब 6 महीने पहले हुई थी।

दगा किया तो मिली गोली!

हिजबुल आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर घाटी सुलग रही है। स्थानीय तौर पर दावा किया गया है कि वानी के जनाजे में 2 लाख लोग शामिल हुए, इससे वानी की फैन फॉलोइंग का अंदाजा लगाया जा सकता है। वानी ने घाटी में थोड़े ही वक्त में vaniखुद को एक हीरो के तौर पर स्थापित कर लिया था। उसके चाहने वालों में महिलाओं की संख्या भी काफी ज्यादा थी। वानी मूलरूप से श्रीनगर से 50 किलोमीटर दूर शरीफाबाद नामक गांव का रहने वाला था। इस गांव तक पहुंचने का रास्ता जिस तरह से टेड़ामेड़ा है, उसी तरह से वानी की जिंदगी भी चरमपंथ की आड़ी तिरछी राहों से होते हुए सुरक्षा बलों की गोली पर जाकर खत्म हुई।

   कहा जा रहा है कि वानी को सुरक्षाबल केवल इसलिए निशाना बना सके क्योंकि उसकी गर्लफ्रेंड ने उसके ठिकाने के बारे में सूचना दी थी। हालांकि ये बात अलग है कि घाटी के लोग इस बात पर यकीन नहीं करते। उनके मुताबिक बुरहान वानी के साथ चंद पल बिताने के लिए लड़कियां अपना सबकुछ कुर्बान करने को तैयार रहती थीं। ऐसे में यह जानते हुए भी कि सुरक्षा बल उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे, कोई क्यों भला मुखबरी करेगा। वैसे वानी की आशिक मिजाजी के किस्से श्रीनगर से लेकर शरीफाबाद तक फैले हैं। उसके कई महिलाओं से संबंध थे। अपनी कदकाठी और चरपमंथी विचारधारा वाले समुदाय में फिली शौहरत के चलते वह हर थोड़े वक्त में माशूका बदलता रहता था। लड़कियां इस बात को बखूबी जानती थीं कि वानी ज्यादा वक्त तक उनके साथ नहीं रहेगा बावजूद इसके वो रिश्ता बनाने को तैयार हो जाती थीं।

साथी से किया दगा
वानी के खिलाफ घाटी में कोई कुछ सुनना, बोलना नहीं चाहता। जो उसकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं, वो भी खामोश रहना पसंद कर रहे हैं। उन्हें लगता है यदि उन्होंने कुछ कहा तो उनकी जिंदगी खतरे में पड़ सकती है। हालांकि दबी जुबान में वो यह स्वीकारते हैं कि वानी की रंगीन मिजाजी के चलते अंदरूनी तौर पर असंतोष बढ़ रहा था। ऐसी चर्चा है कि वानी ने अपने साथी की गर्लफ्रेंड के साथ भी संबंध बनाए थे। जिसके चलते दोनों में विवाद हुआ था। वानी के ठिकाने के बारे में उसकी महबूबाओं को कोई जानकारी नहीं होती थी, केवल साथी जानते थे कि वो कब कहां जाएगा। लिहाजा स्थानीय लोगों को लगता है कि वानी से नफरत करने वाले उसके किसी साथी ने ही मुखबरी की और गर्लफ्रेंड वाला मामला उछाल दिया ताकि उस पर किसी को शक न हो।

wani

लगते थे पोस्टर
22 वर्षीय वानी अपनी आतंकी सोच के चलते घाटी में पोस्टरबॉय बन गया था। आलम ये था कि वानी के पोस्टर घरों में लगे मिल जाया करते थे। सोशल मीडिया पर सक्रिय वानी का स्थानीय नेटवर्क बेहद मजबूत था। घाटी के किस घर में क्या हो रहा है, उसे हर बात की जानकारी थी। वैसे ऐसा नहीं है कि पूरी की पूरी घाटी उसे पसंद करती थी। अमन पसंद लोग वानी की सोच के विस्तारित रूप को देखकर चिंतित भी थे और आक्रोषित भी। हालांकि ये बात अलग है कि उनकी संख्या बेहद सीमित थी। कहा जाता है कि वानी बीच बीच में युवाओं से प्रत्यक्ष तौर पर मुखातिब होता था। वो तब तक उन्हें बरगलाता था, जब तक कि वो जिहाद के इस रूप को अपना नहीं लेते।

भाई के नाम पर
कहा जाता है कि वानी ने 2010 में घाटी में हुई हिंसा का हवाला देकर बंदूक उठाई। उस दौरान पुलिस के साथ संघर्ष में वानी का भाई घायल हुआ था, जिसका प्रतिशोध लेने के लिए वो आतंकी बन गया। हालांकि स्थानीय लोग बताते हैं कि वो बचपच से ही चरमपंथी विचारधारा से प्रभावित था।  पाकिस्तान से भारत के प्रति आग उगलने वाले आतंकी वानी के हीरो हुआ करते थे। 2010 में जो हुआ, उसने केवल बुरहान वानी को जल्दी बंदूक उठाने के लिए प्रेरित किया।

wani

कई पुलिसकर्मी लापता
घाटी में हिंसा के बाद से अब तक कई पुलिसकर्मी लापता हैं। आशंका जताई जा रही है कि प्रदर्शनकारियों ने उन्हें अगवा कर लिया है। जो सुरक्षाकर्मी हिंसा में घायल हुए थे उनमें से कुछ ही हालत गंभीर बताई जा रही है। सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बीच प्रदर्शनकारी सड़कों पर फैले हैं।

जानें कैसे धधका कश्मीर
स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर कैसे नफरत और हिंसा की आग में जला, कैसे कश्मीर के युवाओं ने अमन परस्ती के बजाए पाकिस्तान के बहकावे में आकर बंदूक को अपना साथ बनाया। इस तरह के कई सवालों के जवाब आप कश्मीर पर लिखी गईं किताबों से प्राप्त कर सकते हैं। यहां हम आपकी सहायता के लिए कुछ किताबों के लिंक दे रहे हैं। जो एमाजोन पर काफी सस्ते दामों में उपलब्ध हैं।


प्यार का इंतजार: 20 साल से स्टेशन के बाहर बैठा  है शख्स

प्यार में हद से गुजर जाने की कहानियां तो आपने बहुत सुनी होंगी, लेकिन ये कहानी कुछ हटके है। ताईवान के ताइनान शहर में रहने वाला एक शख्स पिछले 20 सालों से रेलवे स्टेशन के बाहर अपनी प्रेमिका का इंतजार कर रहा है। वर्तमान समय में आह जी की उम्र 47 साल है, जब वो महज 27 साल manwaitingका था, तब उसे ट्रेन में एक युवती मिली थी। बातों-बातों में दोनों एक दूसरे को इतना पसंद करने लगे कि चंद पलों की मुलाकात दोस्ती से होते हुए प्यार में तब्दील हो गई। उस युवती ने आह जी से अगले दिन ताइनान स्टेशन के बाहर मिलने को कहा था। आह जी तो वक्त पर पहुंच गया, लेकिन वो युवती नहीं आई। उस दिन को आह जी इंतजार करने के बाद वापस लौट गया, मगर दूसरे दिन भी जब युवती नहीं आई तो उसने स्टेशन के बाहर ही अपना डेरा जमा लिया। पिछले 20 सालों से आह जी अपने प्यार के लौटने का इंतजार कर रहा है, उसे उम्मीद है कि एक न एक दिन उसका ये इंतजार जरूर खत्म होगा। आह जी के खाने-पीने का इंतजाम स्टेशन से गुजरने वाले लोग करते हैं। उसके परिवार वालों ने कई बार घर वापस लौटने की गुजारिश की, लेकिन आह जी ने इंकार कर दिया।

वो जरूर आएगी
आह जी ने कहा, ट्रेन में कुछ देरी की बातचीत में मुझे उससे प्यार हो गया था। वो भी मुझे पसंद करने लगी थी। हम दोनों ने अगले दिन मिलने का फैसला लिया। हमने सोचा कि हमारी मुलाकात ट्रेन में हुई है, इसलिए पहली डेटिंग के लिए स्टेशन से बेहतर कुछ और नहीं हो सकता। उसने अलगे दिन स्टेशन के बाहर आने का वादा किया। दूसरे दिन मैं तय वक्त से पहले ही स्टेशन पर पहुंच गया था, लेकिन वो नहीं आई। मुझे लगा शायद वो किसी काम में फंस गई होगी, अगले दिन जरूर आएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। मुझे हर पल उसका इंतजार है, और मैं जानता हूं कि एक न एक दिन वो जरूर आएगी।

AGRA: ताज है, विकास नहीं

  • ऐतिहासिक विरासत से संपन्न शहर मूलभूत जरूरतों के लिए भी तरस रहा 

Taj Mahal

Agra की पहचान ऐतिहासिक रूप से संपन्न शहरों में होती है। यहां छोटी-बड़ी कई ऐतिहासिक धरोहरें हैं, जिसमें ताजमहल सबसे प्रमुख है। ताज के दीदार के लिए हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। इसके बावजूद सरकार यहां के विकास को लेकर गंभीर नहीं। आगरा को देखकर आज भी ऐसा लगता है, जैसे ये शहर पुरातनकाल से बाहर नहीं निकल सका है। सालों पहले मुख्य सड़कों  की चौड़ाई जितनी थी, वो आज भी लगभग उतनी ही है। जबकि इस दरमियान आबादी और वाहनों की संख्या में जबदस्त इजाफा हुआ है। ऐसा लगता है जैसे राज्य सरकार ने ऐतिहासिक धरोहरों के स्वरूप में बदलाव पर रोक संबंधी अदालती आदेश को पूरे शहर के संदर्भ में मान लिया है। इसलिए वो कुछ भी बदलना नहीं चाहती। मूलभूत जरूरतें जैसे बिजली-स्वच्छ पानी आज भी आगरा के लिए अबूझ पहेली बनी हुई हैं। स्वच्छा आगरा का नारा यहां भी बिल्कुल वैसा ही नजर आता है, जैसा प्रधानमंत्री का स्वच्छ भारत अभियान। पूरे शहर की बात छोड़ दीजिए ताजमहल के आसपास और यमुना किनारे की गंदगी बिना चश्मे के भी देखी जा सकती है। ऐसे में सरकार का मूल समस्याओं को सुलझाने के बजाए पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए महज अस्थायी विकल्पों तक सीमित होकर रहना आगरावासियों को अब अखरने लगा है। उनका मानना है कि शहर की आतंरिक जरूरतों को पूरा करके एवं सुनियोजित विकास को आगे बढ़ाकर भी पर्यटकों को अपनी ओर खींचा जा सकता है। बैलून उड़ाने जैसी योजनाओं को अमल में लाने से ज्यादा जरूरी ऐसी व्यवस्था करना है कि पर्यटक आगरा से अच्छी यादों के साथ विदा हो।

नाइट कल्चर जरूरी
वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक मल्होत्रा मानते हैं कि आगरा की अहमियत के हिसाब से उसका विकास नहीं हो सका है। वे कहते हैं, जिस तरह ताजमहल भारत की शान है, ठीक वैसे ही आगरा को भी देश की शान बनाने के बारे में सोचना होगा। राज्य सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वो स्थायी तौर पर abhishekविकास का खाका तैयार करे। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए आगरा में नाइट कल्चर विकसित किया जाना चाहिए, अभी क्या रहा है कि पर्यटक सुबह आते हैं, ताज देखते हैं और शाम को वापस दिल्ली निकल जाते हैं। जब वो शहर में रुकेंगे ही नहीं, तो इससे उनका जुड़ाव कैसे होगा। अभिषेक कहते हैं, सरकार को लगता है कि वो 10 दिन ताजमहोत्सव लगाकर या वैकल्पिक योजनाएं बनाकर साल भर के लिए पर्यटकों को आकर्षित कर सकती है। जबकि ऐसा नहीं है। एक दूसरी बात जो इस शहर को लगातार पीछे धकेल रही है, वो है गंदगी। आगरा में दाखिल होते ही पर्यटकों को गंदगी के अंबार नजर आने लगते हैं। ऐसे में वो यहां से अच्छी यादें लेकर जाएंगे भी तो कैसे। तीसरी बात जो मुझे जरूरी लगती है वो ये कि आगरा आने वाले प्रशासनिक अधिकारियों का तबादला जल्दी न किया जाए। कोई अधिकारी जब तक शहर के विकास का खाका खींचता है, तब तक उसका तबदाला कर दिया जाता है। कम से कम 10 साल की योजना बनाई जाए और सरकार स्वयं इस बात की निगरानी करे कि अधिकारी उस पर कितना अमल कर रहे हैं।

नहीं बदली सूरत

आगरा कैन्टोन्मेंट बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. पंकज महेंद्रू कहते हैं, यह हकीकत है कि हेरीटेज सिटी के मुताबिक आगरा का विकास नहीं हुआ। जिस शहर में हर साल लाखों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं, वहां विकास को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जानी चाहिए थी। आगरा में ऐसा बहुत कुछ है, जो इसे एक आदर्श शहर बनने से रोकता है। यहां न अच्छी सड़कें हैं, न साफ-सफाई। यातायात जाम की समस्या दिन ब दिन गंभीर होती जा रही है, लेकिन इससे निपटने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कोई हलचल दिखाई नहीं देती। सालों से शहर का स्वरूप लगभग एक जैसा है। हालांकि, यमुना एक्सप्रेस वे बनने से आगरा को फायदा हुआ है, मगर शहर के अंदरूनी परिदृश्य में बदलाव भी बेहद जरूरी है। आगरा को स्मार्ट सिटी बनाने की तैयारी है पर मेरा मानना है कि इसे टूरिज्म सिटी के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए। जैसे कि गोवा। उनके मुताबिक, बिगड़ती कानून व्यवस्था इस शहर की सबसे बड़ी समस्या है। जिसने आगरा की छवि और पर्यटन व्यवसाय को प्रभावित किया है। साथ ही लपके नामक प्रजाति के फलने-फूलने से भी पर्यटन की दृष्टि से आगरा को नुकसान हुआ है।

अच्छा एयरपोर्ट तक नहीं
रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स में अतिरिक्त सुरक्षा आयुक्त के तौर पर पुणे में पदस्थ रहे विनोद कुमार को भी लगता है कि सालों बाद भी आगरा में कुछ नहीं बदला। वे कहते हैं, मैंने 1972-73 में आगरा छोड़ा, कई शहर होते हुए आखिरी पोस्टिंग पुणे मिली। पुणे में महज कुछ सालों में जो विकास देखा, Vinod Kumarउसका 10 फीसदी भी आगरा में देखने को नहीं मिला। आज भी जब कभी आगरा जाना होता है, तो लगता है सबकुछ पहले जैसा है। वही, संकरी सड़कें, गंदगी। नए आगरा को भी सुनियोजित ढंग से विकसित नहीं किया गया है, सड़कों की चौड़ाई यहां भी बहुत कम है। यह देखकर बेहद अफसोस होता है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आगरा में ढंग का हवाई अड्डा तक नहीं है। जहां लाखों सैलानी आते हैं, वहां इतने सालों में एक हवाई अड्डा तो विकसित हो ही सकता था। शिर्डी तक हवाई मानचित्र पर आ चुका है, लेकिन आगरा के लिए सीधी फ्लाइट नहीं मिलती। कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर आगरा उत्तर प्रदेश की बजाए महाराष्ट्र में होता तो शायद ज्यादा विकसित होता।

योजनाबद्ध विकास नहीं

एक्सल कम्प्यूटर एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर संजीव अरोड़ा कहते हैं, इस बात में कोई दोराय नहीं कि आगरा का विकास उस तरह से नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था। लेकिन जहां तक बात गंदगी की है, तो इसके लिए शहरवासी भी कम कुसूरवार नहीं हैं। जिस तरह से हम अपना घर साफ रखने के बारे में सोचते हैं, ठीक उसी तरह अगर शहर के बारे में सोचें तो तस्वीर काफी हद तक बदल सकती है। बाकी आगरा में ट्रैफिक समस्या गंभीर बनती जा रही है, इसकी वजह है सुनियोजित विकास का अभाव। एमजी रोड जैसी शहर की मुख्य सड़क की चौड़ाई भी सालों से लगभग एक जैसी है। एक्सप्रेस वे से दिल्ली से आगरा का सफर जितने समय में पूरा किया जाता है, उससे दोगुना शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में लग जाता है। विकास की योजनाएं भविष्य को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, लेकिन आगरा को देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता। आगरा ने उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश को जो ख्याति दिलाई है, उसके अनुरूप शहर को विकसित किया जाना बहुत जरूरी है। अगर पर्यटक यहां से अच्छी यादें लेकर जाएंगे, तभी वे दोबारा आने के बारे में सोचेंगे।

दुख होता है देखकर
पुणे रेल मंडल के सेवानिवृत्त जनसंपर्क अधिकारी वाई के सिंह मूल रूप से आगरा निवासी हैं। वे पिछले कई सालों से पुणे में हैं, जब कभी भी सिंह आगरा जाते हैं, उन्हें लगता है जैसे यह शहर आगे बढ़ने के बजाए पीछे लौट रहा है। सिंह कहते हैं, आगरा में स्वच्छता को लेकर कुछ खास किया गया yk singhहो, ऐसा नजर नहीं आता। जो स्थिति पहले थी कमोबेश वही आज है। एक ऐसा शहर जहां लाखों पर्यटक आते हैं, वहां साफ-सफाई बेहद जरूरी हो जाती है। पर्यटक जो देखेंगे वही आगे बताएंगे। आज के जमाने में माउथ पब्लिसिटी काफी मायने रखती है, अगर कोई एक पर्यटक 10 अन्य लोगों से आगरा की बुराई करता है तो संभव है उसमें से तीन-चार यहां आने की योजना रद्द कर दें। बात केवल पर्यटकों के न आने से होने वाले नुकसान की नहीं है, बात है हमारी छवि की। आगरा से फतेहपुर सीकरी जाते समय आपको सड़क किनारे शौच करते छोटे-बड़े अनगिनत लोग मिल जाएंगे। कई दफा विदेशी पर्यटक इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर लेते हैं। दूसरा मुद्दा है, कानून व्यवस्था का। आगरा की लचर कानून व्यवस्था के चलते ही पर्यटक यहां रुकने से कतराने लगे हैं। दिल्ली उन्हें ज्यादा सुरक्षित लगता है। वो दिल्ली में ठहरते हैं आगरा घूमने आते हैं और रात होने से पहले वापस लौट जाते हैं। यह देखकर बेहद दुख होता है कि जो शहर सरकार की आय का सबसे बड़ा जरिया है, उसी की सुध नहीं ली जा रही।

Sultanganj

  • सुल्तानगंज की पुलिया पर अब जाकर फ्लाईओवर बनाने का काम शुरू हुआ है। जबकि सालों से यहां ट्रैफिक जाम की समस्या है।

नहीं मिला ताज का फायदा
व्यवसायी प्रशांत अग्रवाल मानते हैं कि ताजमहल का जो फायदा आगरा को मिलना चाहिए था वो तो नहीं मिला, उल्टा उसे नुकसान जरूर उठाना पड़ा। ताज के लिए आगरा से बड़े पैमाने पर उद्योग हटाए गए। उस वक्त जिस खतरे की बात कही गई वो आज भी कायम है मसलन, ताज का काला पड़ना ,prashant यमुना के गंदे पानी से निकलने वाली गैसें उसे प्रभावित कर रही हैं। सालों से शहर का विकास थमा हुआ है अगर कुछ बढ़ा है वो है अपराध। सरकार पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ढेरों काम कर रही है, मगर उसमें शहर का विकास शामिल नहीं है। सरकार को यह समझना चाहिए कि अगर शहर खूबसूरत होगा तो इससे पर्यटन को ही बढ़ावा मिलेगा। जयपुर जैसे दूसरे शहर देखने के बाद लगता है कि आगरा अभी बहुत पीछे है। पिछले 10 सालों पर अगर नजर डालें तो विकास के नाम पर महज औपचारिकताएं ही पूरी की गई हैं। मैं तो यही कहूंगा कि ताजमहल के होने का आगरा को कुछ खास फायदा नहीं मिला।